# भारत की 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ के पीछे का सच, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के बीच आर्थिक दावों का विश्लेषण

> 7.8% जीडीपी विकास दर के बावजूद भारत में बढ़ती महंगाई, गिरते शेयर बाजार और शहरी बेरोजगारी ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

**Type:** article · **Category:** मनी · **Published:** 2026-09-26 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/money/india-ki-7-8-pratishat-gdp-growth-ke-piche-ka-sach-badhti-mahangai-aur-berojgari-ke-bich-aarthik-daavon-ka-vishleshan-38868 · **Language:** Hindi
**Tags:** जीडीपी विकास दर, भारतीय अर्थव्यवस्था, खाद्य महंगाई, शेयर बाजार गिरावट, बेरोजगारी दर, विदेशी संस्थागत निवेशक, होम लोन ईएमआई

भारत की आर्थिक वृद्धि के आंकड़े अक्सर एक बेहद चमकदार तस्वीर पेश करते हैं, विशेष रूप से ऐसे समय में जब पूरी दुनिया भू-राजनीतिक तनावों, व्यापारिक युद्धों, ऊर्जा संकट और आर्थिक अनिश्चितताओं से घिरी हुई है। कागजों पर, हाल ही में घोषित 7.8 प्रतिशत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) विकास दर देश को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में दर्शाती है, जो दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के दावे को मजबूत करती है। हालांकि, यह शानदार दिखने वाला आंकड़ा आम नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन के संघर्षों से बिल्कुल अलग नजर आता है। इस तेज आर्थिक विकास और आम परिवारों की स्थिर वित्तीय स्थिति के बीच का यह अंतर कई बड़े सवाल खड़े करता है कि आखिर इस विकास का असली लाभ किसे मिल रहा है।

## आर्थिक विकास दर के आंकड़ों पर गहराता विवाद
7.8 प्रतिशत की जीडीपी विकास दर के आंकड़े जारी होने के बाद से ही अर्थशास्त्रियों और वित्तीय विशेषज्ञों के बीच एक गंभीर बहस छिड़ गई है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुख्य आंकड़ा देश की जमीनी आर्थिक हकीकत को पूरी तरह से बयां नहीं करता है। मिसाल के तौर पर, भारत के पूर्व वित्त सचिव सुभास चंद्र गर्ग ने इन आंकड़ों पर गहरी असहमति जताई है। गर्ग का कहना है कि गणना के तरीकों और तकनीकी बदलावों के कारण यह आंकड़ा वास्तविक स्थिति से काफी दूर है। उनके आकलन के अनुसार, देश की वास्तविक आर्थिक वृद्धि दर केवल 2.6 प्रतिशत ही रही है, जिसके चलते उन्होंने इस 7.8 प्रतिशत के आंकड़े को सांख्यिकीय रूप से पूरी तरह से अर्थहीन करार दिया है।

इसी तरह, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी इस आर्थिक विकास की बुनियादी प्रकृति पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। राजन ने आर्थिक संकेतकों के बीच मौजूद एक बड़े विरोधाभास की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि यदि देश की अर्थव्यवस्था वास्तव में 7 प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ रही है, तो निजी क्षेत्र के निवेश और विदेशी पूंजी के प्रवाह में भी इसी तरह की बड़ी तेजी दिखनी चाहिए थी। लेकिन वास्तविकता यह है कि कॉर्पोरेट निवेश और विदेशी संस्थागत निवेशकों का निवेश लगातार कमजोर बना हुआ है। राजन का मानना है कि इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सुस्ती और जीडीपी के बड़े आंकड़ों का आपस में मेल नहीं खाता, जो यह संकेत देता है कि देश की आर्थिक विकास की कहानी में कहीं न कहीं कोई बड़ी विसंगति जरूर है।

## प्रति व्यक्ति आय के स्तर पर वैश्विक तुलना
भले ही भारत की समग्र अर्थव्यवस्था का आकार लगातार बड़ा हो रहा है, लेकिन वैश्विक स्तर पर प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत समृद्धि और औसत आय के आंकड़े अभी भी काफी कम हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा जारी किए गए अनुमानों के मुताबिक, भारत की प्रति व्यक्ति आय वर्तमान में लगभग 2,813 डॉलर है। यदि इसे भारतीय रुपये में बदला जाए, तो यह सालाना लगभग 2,69,520.60 रुपये बैठती है। इसे रोजाना के स्तर पर देखा जाए, तो यह प्रति व्यक्ति मात्र 738.41 रुपये प्रतिदिन का औसत बनती है।

दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था के लिए यह औसत आय अन्य देशों की तुलना में काफी कम है, जबकि उन देशों की जीडीपी विकास दर भारत से कम है। उदाहरण के लिए, सिंगापुर की विकास दर 5.9 प्रतिशत है, लेकिन वहां की प्रति व्यक्ति आय 107,758 डॉलर है। इसी तरह, इंडोनेशिया की विकास दर 5.29 प्रतिशत होने के बावजूद वहां प्रति व्यक्ति आय 5,362 डॉलर है। अपने पड़ोसी देश बांग्लादेश को ही देखें, तो 4.7 प्रतिशत की धीमी विकास दर के बावजूद वहां की प्रति व्यक्ति आय 2,911 डॉलर है, जो भारत से अधिक है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि तेज जीडीपी विकास दर का मतलब यह नहीं है कि आम लोगों की आय में भी उसी अनुपात में सुधार हो रहा है।

## रसोई के बजट पर महंगाई की भारी मार
भारतीय परिवारों पर सबसे बड़ा और सीधा असर रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों से पड़ा है। अगस्त के महीने में, त्योहारी सीजन से ठीक पहले खुदरा बाजारों में सब्जियों की कीमतें 40 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक बढ़ गईं, जिसने आम जनता के बजट को पूरी तरह बिगाड़ दिया। थोक मंडियों और खुदरा दुकानों के बीच कीमतों का भारी अंतर यह दिखाता है कि ग्राहकों को रोजमर्रा की बुनियादी सब्जियों के लिए कितनी अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है।

आलू, जो हर भारतीय रसोई का मुख्य हिस्सा है, थोक मंडियों में 12 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रहा है, लेकिन खुदरा बाजार में पहुंचते-पहुंचते इसकी कीमत 20 रुपये प्रति किलोग्राम हो जाती है। प्याज की स्थिति और भी खराब है, जहां थोक मंडियों में कीमत 36 से 45 रुपये है, वहीं खुदरा बाजार में यह 75 से 80 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रहा है। टमाटर की खुदरा कीमत 40 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच है, जबकि थोक मंडियों में इसके दाम केवल 23 से 25 रुपये प्रति किलोग्राम हैं। अन्य सब्जियों की कीमतें भी इसी तरह आसमान छू रही हैं। खुदरा बाजारों में बीन्स 50 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम और बैंगन 40 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव मिल रहे हैं। बंदगोभी, जो थोक मंडी में 15 रुपये प्रति किलोग्राम है, खुदरा उपभोक्ताओं को लगभग 40 रुपये में मिल रही है, जबकि फूलगोभी की खुदरा कीमत थोक के 30 रुपये के मुकाबले 60 से 80 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच चुकी है।

महंगाई का यह असर केवल ताजी सब्जियों तक ही सीमित नहीं है। चीनी की कीमतों में भी पिछले महीने बड़ी तेजी देखी गई और यह 70 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई, जो 30 से 40 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाती है। यदि थोक क्विंटल के स्तर पर बात करें, तो आपूर्ति में कमी के कारण केवल दो महीनों से भी कम समय में चीनी की कीमतों में 80 प्रतिशत से अधिक का उछाल आया। इस संकट से निपटने और घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भारत को चीनी का निर्यात बंद करना पड़ा और दूसरे देशों से इसका आयात शुरू करना पड़ा। इन तमाम कारणों से अगस्त 2026 में खाद्य और पेय पदार्थों की महंगाई दर बढ़कर 5.95 प्रतिशत पर पहुंच गई, जिसने आम लोगों की क्रय शक्ति पर सीधा प्रहार किया है।

## सेवाओं की बढ़ती लागत और बचत पर घटता रिटर्न
खाद्य पदार्थों के अलावा, अन्य आवश्यक सेवाओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है, जिससे आम जनता पर चौतरफा दबाव बढ़ गया है। रेस्टोरेंट और होटल जैसी सेवाओं के लिए उपभोक्ता कीमतों में 8.38 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके साथ ही, पर्सनल केयर, सामाजिक सुरक्षा और अन्य विविध वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों में 15.17 प्रतिशत का बड़ा उछाल देखा गया, जबकि परिवहन से जुड़ी महंगाई भी बढ़कर 4.6 प्रतिशत हो गई है। इसका मतलब यह है कि लोगों को जीवन जीने के लिए हर स्तर पर अधिक पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं

वहीं दूसरी तरफ, आम नागरिकों को अपनी गाढ़ी कमाई की बचत पर मिलने वाला ब्याज इस महंगाई दर का मुकाबला करने में असमर्थ साबित हो रहा है। इस समय सरकारी और निजी बैंक एक साल की सावधि जमा (FD) पर केवल 6.10 प्रतिशत से 6.50 प्रतिशत के बीच ब्याज दरें दे रहे हैं। बचत पर मिलने वाले इस रिटर्न की वास्तविक ताकत को महंगाई के साथ तुलना करके ही समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई बैंक एफडी पर 6.50 प्रतिशत ब्याज दे रहा है और उसमें से अगस्त की 4.82 प्रतिशत की महंगाई दर को घटा दिया जाए, तो बचतकर्ता को मिलने वाला वास्तविक रिटर्न केवल 1.68 प्रतिशत ही बचता है। ब्याज से होने वाली इस मामूली कमाई पर जब टैक्स (TDS) कट जाता है, तो यह वास्तविक रिटर्न और भी कम हो जाता है, जिससे लोगों की पैसों की क्रय शक्ति लगातार घटती जा रही है।

## शेयर बाजार में गिरावट और विदेशी निवेशकों की निकासी
बैंकों में कम रिटर्न मिलने के बीच शेयर बाजार भी निवेशकों के लिए कोई बड़ा सहारा नहीं बन सका है। प्रमुख संवेदी सूचकांक सेंसेक्स में इस साल अब तक 13.3 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है, और पिछले साल की समान अवधि की तुलना में यह करीब 9 प्रतिशत नीचे है। दिसंबर 2025 में दर्ज किए गए अपने सर्वकालिक उच्च स्तर 86,159.02 अंक से सेंसेक्स 14.23 प्रतिशत तक लुढ़क चुका है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी भी इसी रास्ते पर है, जिसमें इस साल अब तक 11.50 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह अपने पिछले साल के स्तर से 7 प्रतिशत और अपने सर्वकालिक शिखर 26,373.20 अंक से 12.3 प्रतिशत नीचे कारोबार कर रहा है।

इस बड़ी गिरावट के कारण वैश्विक रैंकिंग में भी भारतीय शेयर बाजार को नुकसान उठाना पड़ा है। भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा शेयर बाजार होने की अपनी स्थिति से खिसककर सातवें स्थान पर आ गया है, जबकि ताइवान पांचवें और दक्षिण कोरिया छठे स्थान पर काबिज हो गए हैं। इस गिरावट की एक मुख्य वजह विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा लगातार की जा रही बिकवाली है। विदेशी निवेशक साल 2021 से ही भारतीय बाजारों में लगातार बिकवाल बने हुए हैं। साल 2024 और 2025 दोनों में विदेशी निवेशकों ने 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी निकाली। साल 2026 के पहले नौ महीनों से भी कम समय में यह निकासी और तेज हो गई, जिससे 3,73,891 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड पूंजी बाजार से बाहर चली गई, जो यह दर्शाती है कि विदेशी निवेशकों का भरोसा भारतीय बाजार में कुछ कमजोर हुआ है।

## महानगरों में घर खरीदना हुआ बेहद चुनौतीपूर्ण
निवेश पर कम रिटर्न के साथ-साथ आम लोगों के लिए रहने के लिए अपना खुद का घर खरीदना भी बेहद मुश्किल होता जा रहा है। नाइट फ्रैंक के अफोर्डेबिलिटी इंडेक्स की 2026 की पहली छमाही की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के आठ प्रमुख शहरों में से केवल छह शहर ही ऐसे बचे हैं जो घर खरीदने के मामले में वहनीयता की सीमा के भीतर आते हैं। इस सूचकांक में होम लोन की मासिक किस्त (EMI) और आय के अनुपात का 50 प्रतिशत होना एक सीमा माना जाता है। यदि यह अनुपात 50 प्रतिशत से अधिक हो, तो उसे आम बजट से बाहर माना जाता है।

भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई में यह ईएमआई और आय का अनुपात बढ़कर 69 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया है, जबकि दिल्ली-एनसीआर में यह 67 प्रतिशत है, जो वहनीयता की सीमा से बहुत ज्यादा है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए यह स्थिति और भी अधिक चिंताजनक है। साल 2025 के आंकड़ों से पता चलता है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए ईएमआई और आय का अनुपात जो साल 2020 में 43 प्रतिशत था, वह साल 2025 में बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया है, यानी इसमें 17 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है। मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए भी यह अनुपात 28 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत पर पहुंच गया है। इसके अलावा, शीर्ष आठ शहरों में सस्ते मकानों की आपूर्ति भी तेजी से घटी है, जो साल 2018 में कुल मकानों का 52.4 प्रतिशत थी, वह साल 2025 में घटकर केवल 17 प्रतिशत रह गई है, जिससे लोगों को घर खरीदने के लिए अपनी क्षमता से कहीं अधिक कर्ज लेना पड़ रहा है।

## रोजगार की जमीनी हकीकत और तकनीकी छंटनी
रोजगार के मोर्चे पर भी आंकड़े मिले-जुले संकेत दे रहे हैं। अगस्त के महीने में देश की बेरोजगारी दर जुलाई के 5.1 प्रतिशत से मामूली रूप से घटकर 5 प्रतिशत पर आ गई। इस मामूली सुधार के पीछे मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की बेरोजगारी में आई गिरावट रही, जो 4.5 प्रतिशत से घटकर 4.1 प्रतिशत रह गई, जो पिछले साल दिसंबर के बाद का सबसे निचला स्तर है। हालांकि, शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी की समस्या और बढ़ गई है, जहां यह दर 6.7 प्रतिशत से बढ़कर 6.8 प्रतिशत पर पहुंच गई है।

समग्र रोजगार की स्थिति में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला है। पिछले साल अगस्त के 52.2 प्रतिशत की तुलना में इस साल रोजगार दर केवल थोड़ी बढ़कर 52.8 प्रतिशत हुई है। श्रम बल की भागीदारी दर भी 55.4 प्रतिशत से मामूली बढ़त के साथ 55.6 प्रतिशत पर पहुंच सकी है। अगस्त 2026 में निजी क्षेत्र की भर्तियों में 5 प्रतिशत की वृद्धि जरूर दर्ज की गई, जिससे पिछले पांच महीनों से जारी गिरावट का सिलसिला थमा, लेकिन यह अभी भी फरवरी के अपने उच्चतम स्तर से काफी नीचे है।

दूसरी तरफ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक तकनीकों के बढ़ते उपयोग के कारण सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र में नौकरियों पर संकट मंडरा रहा है। ट्रूअप ट्रैकर के आंकड़ों के अनुसार, साल 2026 में अब तक 622 तकनीकी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर छंटनी की है, जिससे 1,90,058 लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है। इसका मतलब है कि औसतन लगभग 709 तकनीकी कर्मचारी हर दिन अपनी नौकरी गंवा रहे हैं। इन चुनौतियों के बीच देश में टैक्स की दरें भी काफी ऊंची हैं, जहां भारत में व्यक्तिगत आयकर की अधिकतम दर 39 प्रतिशत है, जो सिंगापुर के 24 प्रतिशत, इंडोनेशिया के 35 प्रतिशत, बांग्लादेश के 30 प्रतिशत और अमेरिका की संघीय कर दर 37 प्रतिशत की तुलना में काफी अधिक है।

## इसका आप पर असर
मैक्रोइकॉनॉमिक आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच का यह बड़ा अंतर दर्शाता है कि आम नागरिकों को अपनी घटती क्रय शक्ति से निपटने के लिए अपने व्यक्तिगत वित्त का प्रबंधन अधिक सावधानी से करना होगा।

- **घरेलू बजट पर असर:** खुदरा सब्जियों की कीमतों में हाल ही में 50 प्रतिशत तक का उछाल आया है, जिसका सीधा मतलब है कि परिवारों को अपनी दैनिक खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा खर्च करना होगा।
- **बचत के मूल्य पर प्रभाव:** बैंक सावधि जमा (FD) की ब्याज दरें वास्तविक महंगाई दर से कम होने के कारण टैक्स कटौती के बाद निवेशकों को नकारात्मक वास्तविक रिटर्न मिल रहा है, जिससे उन्हें अपनी बचत के लिए अन्य निवेश विकल्पों पर विचार करना होगा।
- **घर खरीदारों पर प्रभाव:** मुंबई और दिल्ली-एनसीआर जैसे महानगरों में ईएमआई और आय का अनुपात क्रमशः 69 और 67 प्रतिशत तक बढ़ने के कारण मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवारों पर कर्ज का भारी बोझ पड़ेगा, जिससे घर खरीदना और मुश्किल हो जाएगा।
- **रोजगार सुरक्षा पर असर:** तकनीकी क्षेत्र में ऑटोमेशन और एआई के कारण बड़े पैमाने पर हो रही छंटनी को देखते हुए नौकरी चाहने वालों और नए पेशेवरों को अपने करियर को सुरक्षित रखने के लिए तुरंत नए डिजिटल कौशल सीखने की आवश्यकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
उच्च जीडीपी विकास दर और आम नागरिकों के सामने आने वाली वित्तीय चुनौतियों के बीच का यह बड़ा अंतर घरेलू और वैश्विक बाजारों में कई संरचनात्मक असंतुलनों के कारण है।

- **संरचनात्मक विसंगति:** देश की जीडीपी विकास दर मुख्य रूप से चुनिंदा बड़े कॉर्पोरेट क्षेत्रों द्वारा संचालित हो रही है, न कि आम जनता की खपत से, जिसके कारण विकास दर तो ऊंची दिखती है लेकिन पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं।
- **आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं:** प्रतिकूल मौसम और स्थानीय स्तर पर फसलों के कम उत्पादन के कारण बुनियादी सब्जियों और चीनी की आपूर्ति में भारी कमी आई है, जिसने सीधे तौर पर खाद्य महंगाई को बढ़ावा दिया है।
- **वैश्विक पूंजी का पलायन:** वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों में वृद्धि और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजारों से बड़े पैमाने पर अपनी पूंजी वापस निकाल ली है, जिससे घरेलू शेयर बाजारों में गिरावट आई है।
- **ऑटोमेशन के कारण नौकरियों में कमी:** आईटी सेवा क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के तेजी से बढ़ते उपयोग ने एंट्री-लेवल नौकरियों को बड़े पैमाने पर समाप्त कर दिया है, जिससे शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर बढ़ गई है।

## सवाल-जवाब

### 1. लेख में भारत की आधिकारिक जीडीपी विकास दर कितनी बताई गई है?
कागजों पर भारत की आधिकारिक जीडीपी विकास दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो इसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बनाती है।

### 2. आईएमएफ (IMF) के अनुसार भारत की प्रति व्यक्ति आय कितनी है?
भारत की प्रति व्यक्ति आय 2,813 डॉलर (लगभग 2,69,520.60 रुपये सालाना या 738.41 रुपये प्रतिदिन) है, जो बांग्लादेश की 2,911 डॉलर की प्रति व्यक्ति आय से भी कम है।

### 3. अगस्त 2026 में खाद्य और पेय पदार्थों की महंगाई दर कितनी थी?
अगस्त 2026 में खाद्य और पेय पदार्थों की महंगाई दर 5.95 प्रतिशत तक पहुंच गई, जिसका मुख्य कारण आलू और प्याज जैसी सब्जियों की कीमतों में भारी उछाल था।

### 4. मुंबई और दिल्ली-एनसीआर में घर खरीदना क्यों मुश्किल माना जा रहा है?
मुंबई में होम लोन ईएमआई और आय का अनुपात 69 प्रतिशत और दिल्ली-एनसीआर में 67 प्रतिशत है, जो कि सामान्य वहनीयता सीमा (50 प्रतिशत) से काफी अधिक है।

### 5. साल 2026 में तकनीकी क्षेत्र में कितनी छंटनी हुई है?
ट्रूअप ट्रैकर के आंकड़ों के अनुसार, साल 2026 में अब तक 622 तकनीकी कंपनियों ने 1,90,058 कर्मचारियों को नौकरी से निकाला है, जो औसतन 709 लोग प्रतिदिन बैठता है।

### 6. अन्य देशों की तुलना में भारत में व्यक्तिगत आयकर की अधिकतम दर कितनी है?
भारत में व्यक्तिगत आयकर की अधिकतम दर 39 प्रतिशत है, जो सिंगापुर (24 प्रतिशत), बांग्लादेश (30 प्रतिशत), इंडोनेशिया (35 प्रतिशत) और अमेरिका (37 प्रतिशत) से काफी अधिक है।

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