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  "title": "न्यूयॉर्क की अदालत ने अफगान नागरिकों के देश निकाला आदेश पर शनिवार तक लगाई अंतरिम रोक",
  "summary": "एक अमेरिकी संघीय न्यायाधीश ने ट्रंप प्रशासन द्वारा हिरासत में लिए गए अफगान शरणार्थियों को अफगानिस्तान या पाकिस्तान भेजने की योजना पर अस्थाई रोक लगा दी है।",
  "content": "अमेरिकी आव्रजन अधिकारियों द्वारा हिरासत में लिए गए अफगान शरणार्थियों को पाकिस्तान या अफगानिस्तान वापस भेजने की योजना पर न्यूयॉर्क की एक संघीय अदालत ने तात्कालिक रोक लगा दी है। डिस्ट्रिक्ट जज वैलेरी कैप्रॉनी ने मंगलवार को यह निर्देश पारित किया, जिसमें शनिवार तक इस तरह के किसी भी निष्कासन पर पाबंदी तय की गई है। यह कदम तब उठाया गया जब मानवाधिकार संगठनों, कानूनी प्रतिनिधियों और अमेरिकी सांसदों ने इस बात को लेकर गंभीर चिंता जताई कि जबरन वतन वापसी से इन लोगों की जान और सुरक्षा को सीधा खतरा पैदा हो सकता है। अदालत में प्रस्तुत सरकारी जवाब और कानूनी याचिकाओं के केंद्र में निष्कासन उड़ानों की तैयारी और विदेशी धरती पर लोगों को भेजने की नीतियां शामिल थीं।\n\n \n\nअदालती आदेश और उड़ानों पर सरकारी स्थिति\n\nसुनवाई के दौरान अमेरिकी सरकार के प्रतिनिधियों ने अदालत को अवगत कराया कि आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन (ICE) ने निकट भविष्य में ऐसी कोई उड़ान निर्धारित नहीं की है। सरकारी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि कम से कम मौजूदा सप्ताह के अंत तक अफगानिस्तान या पाकिस्तान की ओर जाने वाली न तो कोई विशेष चार्टर्ड उड़ान तय है और न ही वाणिज्यिक टिकटों के माध्यम से कोई व्यवस्था की गई है। अदालत ने इस आधिकारिक रुख को दर्ज करते हुए निर्देश दिया कि संबंधित विभाग शनिवार तक इसी स्थिति का कड़ाई से पालन करें। इस तरह शनिवार तक किसी भी अफगान नागरिक को अमेरिकी हिरासत से निकाल कर उन देशों के लिए रवाना नहीं किया जा सकेगा।\n\nअदालत में पेश किए गए दस्तावेजों से संकेत मिला था कि प्रशासन ने सोमवार के दिन इन निष्कासनों को शुरू करने की तैयारी की थी। इन अदालती फाइलों में लुइसियाना राज्य से उड़ानों के संचालन का ब्योरा दिया गया था, जहां संघीय एजेंसी ICE अपने प्रमुख हिरासत और आव्रजन प्रसंस्करण केंद्र संचालित करती है। दस्तावेजों में दर्ज यात्रा कार्यक्रम के तहत पाकिस्तान को अंतिम गंतव्य के रूप में चिन्हित किया गया था। चूंकि एजेंसी आमतौर पर कई सप्ताह पहले से उड़ानों का कार्यक्रम तय करती है, इसलिए इस योजना की भनक लगते ही मामला तुरंत अदालती समीक्षा के दायरे में आ गया।\n\n \n\nहिरासत में मौजूद अफगान और जोखिम के दायरे में लोग\n\nनागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों के अनुसार, एजेंसी के नोटिस मिलने के बाद हिरासत में लिए गए 80 से अधिक अफगान नागरिकों ने सहायता के लिए संपर्क साधा था। इन लोगों को सूचित किया गया था कि उन्हें इस सप्ताह पाकिस्तान के रास्ते निकाला जा सकता है। प्रभावित समूह में महिलाएं, पूर्व पुलिस अधिकारी, धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्य और ऐसे व्यक्ति शामिल हैं जिनके पारिवारिक संबंध अमेरिकी सेना से रहे हैं। शरणार्थी सहायता संस्थाओं ह्यूमन राइट्स फर्स्ट और अफगानइवैक ने रेखांकित किया कि हिरासत में रखे गए इनमें से अधिकांश लोगों के पास अपना पक्ष रखने के लिए कोई स्वतंत्र कानूनी प्रतिनिधित्व तक मौजूद नहीं था।\n\nअमेरिकी सेना और अंतरराष्ट्रीय सहायता अभियानों में सहयोग देने के बाद हजारों अफगान नागरिकों ने अपना मुल्क छोड़ा था। उन व्यक्तियों ने लगातार आशंका जताई है कि पूर्व में किए गए उस काम की वजह से वे तालिबान के निशाने पर हैं और देश वापस भेजे जाने पर उन्हें प्रताड़ना या जान का जोखिम उठाना पड़ सकता है। इन कमजोरियों को देखते हुए कानूनी दलों ने तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की मांग उठाई थी।\n\n \n\nअमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों का कड़ा विरोध\n\nइस प्रस्तावित निष्कासन को लेकर वाशिंगटन के विधायी हलकों में भी तीव्र आपत्ति दर्ज कराई गई। कैलिफोर्निया के डेमोक्रेटिक प्रतिनिधि स्कॉट पीटर्स के नेतृत्व में लिखे गए एक औपचारिक पत्र में इस पूरी प्रक्रिया पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। इस पत्र पर प्रतिनिधि सभा और सीनेट के 65 अन्य सदस्यों ने भी अपने हस्ताक्षर किए। सांसदों ने आगाह किया कि सुरक्षा तंत्र से जुड़े या संवेदनशील पृष्ठभूमि वाले लोगों को इस तरह वापस धकेलने से वे सीधे तौर पर राजनीतिक उत्पीड़न, प्रताड़ना अथवा मृत्यु के मुंह में जा सकते हैं।\n\nयह संयुक्त संदेश विदेश मंत्री मार्को रुबियो और होमलैंड सिक्योरिटी सेक्रेटरी मार्कवेन मुलिन को सोमवार को भेजा गया था। सांसदों ने जोर देकर कहा कि जिन लोगों ने अमेरिकी अभियानों के दौरान सहयोग दिया था, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बुनियादी मानवीय और नैतिक जिम्मेदारी है, और उन्हें बिना पुख्ता सुरक्षा प्रबंधों के किसी तीसरे देश में नहीं धकेला जाना चाहिए।\n\n \n\nतीसरे देश में निष्कासन की नीति और अफगानिस्तान की आपत्ति\n\nमौजूदा प्रशासन ने पहले भी हजारों प्रवासियों को उनके मूल वतन के अलावा अन्य तीसरे देशों में निर्वासित करने की कार्यप्रणाली अपनाई है। जब किसी व्यक्ति के मूल देश में सीधी वापसी संभव नहीं होती, तब ऐसी वैकल्पिक व्यवस्थाओं का सहारा लिया जाता रहा है। अदालती दस्तावेजों में यह भी स्पष्ट किया गया कि जहां औपचारिक कूटनीतिक संबंधों का अभाव होता है, वहां सीधी वापसी में बड़ी बाधाएं आती हैं। अफगानिस्तान में तालिबान प्रशासन के साथ औपचारिक संबंधों की अनुपस्थिति को ऐसे ही संदर्भ के रूप में देखा गया, जबकि अन्य मामलों में इसे आव्रजन रोकने की सख्त नीति के तौर पर भी लागू किया गया है।\n\nन्यायाधीश द्वारा आदेश पर हस्ताक्षर किए जाने से पहले काबुल में विदेश मंत्रालय के उप प्रवक्ता जिया अहमद तकाल ने इस योजना पर तीखा ऐतराज जताया था। तकाल ने कहा कि अमेरिका द्वारा अफगान नागरिकों को पाकिस्तान स्थानांतरित करने की सूचनाओं पर इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान गंभीर चिंता व्यक्त करता है। उन्होंने जोर दिया कि अमेरिका को अपने फैसले मानवाधिकारों और वैध मांगों के आधार पर लेने चाहिए, और किसी तीसरे देश को दूसरे राष्ट्र के नागरिकों के भविष्य और भाग्य का फैसला करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।\n\n \n\nअस्थाई राहत और मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया\n\nशरणार्थियों के अधिकारों के लिए संघर्षरत संगठनों ने इस अंतरिम अदालती रोक का स्वागत किया, हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि यह समाधान सीमित समय के लिए है। अफगानइवैक के अध्यक्ष शॉन वैनडाइवर ने एक संवाददाता सम्मेलन में स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, \"आज का दिन अच्छा है, लेकिन यह केवल एक अस्थाई राहत है, स्थायी समाधान नहीं।\" उन्होंने कहा कि इस कदम से लड़ाई हमेशा के लिए खत्म नहीं हुई है बल्कि यह केवल एक ठहराव है, जिसके चलते वे हवाई गतिविधियों की निगरानी जारी रखेंगे।\n\nह्यूमन राइट्स फर्स्ट में शरणार्थी और प्रवासी अधिकार नीति निदेशक सावित्री आरवे ने अफगानिस्तान लौटने पर पेश आने वाले खतरों का विस्तृत विवरण दिया। आरवे ने बताया कि जबरन भेजे जाने वाले लोगों को मनमानी हिरासत, मौत की सजा, सार्वजनिक कोड़े मारने और बदले की भावना से की जाने वाली हिंसा का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा, \"जोखिम बहुत अधिक थे,\" और यह भी जोड़ा कि महिलाओं और लड़कियों के लिए शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक अभिव्यक्ति पर पहले से ही बेहद कड़े प्रतिबंध लागू हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान की भूमिका और अमेरिका के साथ उसके समझौतों की स्पष्टता पर भी सवाल उठाए हैं। आरवे ने कहा कि राहत मिलने के बावजूद वे यह सुनिश्चित करने के लिए उड़ानों पर नजर बनाए रखेंगे कि कोई विमान रवाना न हो सके।\n\nइसका आप पर असर\nअमेरिकी आव्रजन अदालतों और हिरासत केंद्रों में कानूनी प्रक्रियाओं का सामना कर रहे अफगान प्रवासियों के लिए यह फैसला फौरी राहत लेकर आया है।\n\n• हिरासत में मौजूद अफगान नागरिकों पर प्रभाव: अमेरिकी हिरासत केंद्रों में बंद 80 से अधिक अफगान प्रवासियों को शनिवार तक जबरन निर्वासन से सुरक्षा मिली है। इससे उनके वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को आगे की कानूनी याचिकाएं दायर करने का जरूरी समय मिल गया है।\n• सहयोगियों और शरणार्थियों के परिवारों पर असर: अमेरिकी सेना और गैर-सरकारी संगठनों के साथ काम कर चुके अफगान नागरिकों के परिजनों को तात्कालिक सुरक्षा की उम्मीद मिली है। यदि यह रोक जारी रहती है, तो उन्हें किसी तीसरे देश भेजे जाने की अनिश्चितता से बचाया जा सकेगा।\n• नागरिक अधिकार और कानूनी प्रक्रियाओं पर प्रभाव: आव्रजन वकीलों को बिना कानूनी प्रतिनिधित्व वाले बंदियों से संपर्क करने का मौका मिला है। इस आदेश के बाद मानवाधिकार संगठन उड़ानों और सरकारी कदमों की बारीकी से पड़ताल कर पा रहे हैं।\n• वैश्विक शरणार्थी समुदाय पर असर: किसी तीसरे देश में प्रवासियों को जबरन भेजने की अमेरिकी नीति की न्यायिक समीक्षा तेज होगी। इस आदेश से साबित होता है कि राजनयिक संबंधों की कमी के बावजूद शरणार्थियों के बुनियादी सुरक्षा अधिकारों को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह अदालती आदेश तब जारी हुआ जब अमेरिकी आव्रजन अधिकारियों द्वारा लुइसियाना से पाकिस्तान के रास्ते दर्जनों अफगान बंदियों को अचानक निर्वासित करने की योजना सार्वजनिक हो गई।\n\n• सीधे खतरे की चेतावनी: मानवाधिकार संगठनों और 66 अमेरिकी सांसदों ने लिखित रूप से आगाह किया कि इन लोगों को वापस भेजने पर उनकी जान जा सकती है। अमेरिकी सेना और सहायता मिशनों से जुड़े होने के कारण तालिबान से बदले की हिंसा, प्रताड़ना और मनमानी गिरफ्तारी का गंभीर अंदेशा था।\n• बिना कानूनी मदद के नोटिस: एजेंसी ICE ने लुइसियाना के केंद्रों में बंद 80 से ज्यादा अफगानों को अचानक निर्वासन का नोटिस थमा दिया था। इनमें से ज्यादातर बंदियों के पास कोई वकील नहीं था, जिसके चलते नागरिक अधिकार समूहों ने तुरंत अदालत का दरवाजा खटखटाया।\n• तीसरे देश की विवादित नीति: काबुल में तालिबान सरकार के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध न होने के कारण प्रशासन ने लोगों को पाकिस्तान भेजने की रणनीति बनाई। इस गोपनीय व्यवस्था और अफगानिस्तान के आधिकारिक विरोध ने मामले को कानूनी रूप से और संवेदनशील बना दिया।\n• सरकारी उड़ानों का अभाव: सुनवाई के दौरान न्याय विभाग ने खुद स्वीकार किया कि मौजूदा हफ्ते के अंत तक कोई निर्वासन उड़ान निर्धारित नहीं है। न्यायाधीश ने इस सरकारी स्थिति को ही कानूनी आदेश में बदलकर उड़ानों पर शनिवार तक औपचारिक पाबंदी लगा दी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. न्यूयॉर्क की अदालत ने क्या फैसला सुनाया है?\nसंघीय न्यायाधीश वैलेरी कैप्रॉनी ने अमेरिकी प्रशासन को आदेश दिया है कि वह हिरासत में लिए गए अफगान नागरिकों को शनिवार तक अफगानिस्तान या पाकिस्तान न भेजे।\n\n2. इस निष्कासन योजना के तहत कितने अफगान नागरिक प्रभावित हो रहे थे?\nआव्रजन नोटिस मिलने के बाद 80 से अधिक अफगान बंदियों ने मदद के लिए वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से संपर्क किया था।\n\n3. निर्वासन उड़ानों की तैयारी कहां से की जा रही थी?\nअदालती दस्तावेजों के अनुसार, इन उड़ानों को लुइसियाना स्थित आव्रजन प्रसंस्करण और हिरासत केंद्रों से रवाना करने की तैयारी थी।\n\n4. अमेरिकी सांसदों ने इस कदम पर क्या आपत्ति जताई?\nप्रतिनिधि स्कॉट पीटर्स और 65 अन्य सांसदों ने विदेश मंत्री मार्को रुबियो और होमलैंड सिक्योरिटी सेक्रेटरी मार्कवेन मुलिन को पत्र लिखकर कहा कि इससे कमजोर लोगों को प्रताड़ना या मौत का खतरा हो सकता है।\n\n5. अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय का इस मामले पर क्या रुख था?\nउप प्रवक्ता जिया अहमद तकाल ने कहा कि अफगान नागरिकों को पाकिस्तान भेजने की योजना चिंताजनक है और किसी तीसरे देश को दूसरे राष्ट्र के नागरिकों के भविष्य का फैसला नहीं करना चाहिए।\n\n6. मानवाधिकार समूहों ने अफगानिस्तान में किन खतरों का उल्लेख किया?\nह्यूमन राइट्स फर्स्ट की सावित्री आरवे ने बताया कि वहां लौटने वालों को मनमानी हिरासत, मौत की सजा, सार्वजनिक कोड़े और महिलाओं पर भारी बंदिशों का सामना करना पड़ता है।",
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