रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति बैठक: बढ़ती महंगाई और कमजोर रुपये के बीच रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी के आसार कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, डॉलर के मुकाबले कमजोर होते रुपये और 4.82 प्रतिशत पहुंची महंगाई के दबाव में भारतीय रिजर्व बैंक अपनी 11 महीने की नरमी समाप्त कर रेपो दर 5.50 प्रतिशत कर सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की अक्टूबर 2026 की बैठक एक ऐसे नाजुक मोड़ पर शुरू हो रही है, जहां केंद्रीय बैंक के सामने आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने और लगातार पैर पसारती महंगाई को थामने की दोहरी चुनौती खड़ी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में निरंतर उछाल और घरेलू मुद्रा पर गहराता दबाव नीति निर्माताओं को कड़े फैसले लेने के लिए विवश कर रहा है। वित्तीय बाजारों में इस बात की व्यापक संभावना जताई जा रही है कि रिजर्व बैंक अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नक्शेकदम पर चलते हुए अपनी पिछली नीतिगत नरमी को विराम दे सकता है और रेपो दर में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की घोषणा कर सकता है। अगर ऐसा कदम उठाया जाता है, तो पिछले ग्यारह महीनों से जारी यथास्थिति का सिलसिला टूट जाएगा और बचत, ऋण तथा बाजार की तरलता पर इसका सीधा असर दिखाई देगा। वैश्विक आर्थिक दबाव और मौद्रिक नीति का संतुलन केंद्रीय बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति बुधवार, 7 अक्टूबर को अपने ताजा नीतिगत निर्णयों की घोषणा करने वाली है। पिछले साल दिसंबर 2025 से ही रेपो दर 5.25 प्रतिशत के स्तर पर स्थिर बनी हुई है। इसके साथ ही स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी दर 5 प्रतिशत, मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी दर 5.50 प्रतिशत और बैंक दर 5.50 प्रतिशत पर टिकी हुई है, जबकि रिजर्व बैंक का आधिकारिक रुख अब तक तटस्थ रहा है। हालांकि, मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियां इस नीतिगत रुख में बदलाव की मांग कर रही हैं। पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को संकट में डाल दिया है, क्योंकि फारस की खाड़ी से होने वाले कच्चे तेल के व्यापार पर सीधा जोखिम मंडरा रहा है। इस तनाव की वजह से आयातित ऊर्जा की लागत में भारी इजाफा हुआ है, जिससे भारत में महंगाई का दबाव तेजी से गहराने लगा है। कैपिटल इकोनॉमिक्स में डिप्टी चीफ इमर्जिंग मार्केट्स इकोनॉमिस्ट शिलान शाह का मानना है कि बाजार की आम राय अब इस बात पर केंद्रित हो चुकी है कि मौद्रिक नीति समिति बुधवार को अपनी बैठक के समापन पर नीतिगत दर को 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर देगी। उनका विश्लेषण यह भी रेखांकित करता है कि साल 2027 की पहली छमाही तक रेपो दर चढ़कर 6.00 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, जो बाजार की मौजूदा उम्मीदों की तुलना में काफी सख्त दृष्टिकोण है। इस तरह के संभावित नीतिगत बदलाव के पीछे मुख्य आधार खुदरा मुद्रास्फीति में आई हालिया तेजी और बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अत्यधिक तरलता है, जिसने केंद्रीय बैंक के पास आगे और हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहने की गुंजाइश को काफी हद तक कम कर दिया है। महंगाई दर में लगातार इजाफा और लक्ष्य से दूरी घरेलू मोर्चे पर जारी सांख्यिकीय आंकड़े भी नीतिगत सख्ती के पक्ष में संकेत दे रहे हैं। अगस्त 2026 में भारत की मुख्य खुदरा मुद्रास्फीति की दर बढ़कर 4.82 प्रतिशत दर्ज की गई, जो दिसंबर 2024 के बाद का उच्चतम स्तर है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक लगातार दसवें महीने बढ़त की राह पर रहा है, और यह लगातार तीसरा महीना है जब मुद्रास्फीति रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के प्राथमिक लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। हालांकि मौजूदा 4.82 प्रतिशत का स्तर केंद्रीय बैंक द्वारा तय किए गए 6 प्रतिशत के ऊपरी सहनशीलता दायरे के भीतर आता है, फिर भी महंगाई का यह बढ़ता रुझान किसी भी सूरत में अनदेखा नहीं किया जा सकता। जेएम फाइनेंशियल के विश्लेषकों ने इस स्थिति को एक जटिल नीतिगत दुविधा बताया है। उनका कहना है कि मौद्रिक नीति समिति को अब यह तय करना है कि वह ब्याज दरों में पहले ही बढ़ोतरी करके बाजार को स्थिरता दे या फिर आयातित महंगाई के दबाव को चुपचाप झेलने का जोखिम उठाए। यदि रिजर्व बैंक दरें बढ़ाता है, तो यह उसके अब तक के नरम रुख से एक स्पष्ट बदलाव होगा, विशेष रूप से तब जब घरेलू आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति के आंतरिक कारक दर वृद्धि की सीधी वकालत नहीं कर रहे हैं। फिर भी, अमेरिका और भारत के बीच बॉन्ड यील्ड के कम होते अंतर की वजह से मौजूदा ब्याज दरों को जस का तस बनाए रखना रिजर्व बैंक के लिए काफी खर्चीला साबित हो रहा है। अत्यधिक बैंकिंग नकदी और दर वृद्धि का तालमेल आर्थिक वृद्धि पर पड़ने वाले प्रभाव को आंशिक रूप से संतुलित कर सकता है और बाहर से आने वाली महंगाई पर लगाम कस सकता है। रुपये की कमजोरी और विदेशी मुद्रा भंडार की चुनौती जेएम फाइनेंशियल के आकलन के अनुसार, ब्याज दरों में यह वृद्धि वैश्विक स्तर पर जारी मौद्रिक सख्ती के व्यापक चक्र का ही एक स्वाभाविक हिस्सा है। रिजर्व बैंक के लिए यह समय का सबसे कठिन चुनाव है कि यह वृद्धि अक्टूबर में की जाए या फिर दिसंबर तक का इंतजार किया जाए। यह फैसला अंततः इस बात पर निर्भर करेगा कि वैश्विक तेल की कीमतें कितनी देर तक ऊंची बनी रहती हैं और क्या अमेरिकी फेडरल रिजर्व भी अक्टूबर 2026 में अपनी नीतिगत दरों में पुनः बढ़ोतरी का कदम उठाता है। विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि यदि मौद्रिक नीति समिति 7 अक्टूबर को दरों में कोई बदलाव नहीं करने का फैसला लेती है, तो इसका तत्काल असर घरेलू मुद्रा पर पड़ेगा और भारतीय रुपये पर बिकवाली का दबाव गहरा जाएगा। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक को रुपये को सहारा देने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में भारी हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। लेकिन हाल के दिनों में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में आई तेज गिरावट को देखते हुए बार-बार डॉलर बेचकर रुपये को थामना लंबे समय तक टिकाऊ समाधान नहीं दिखता। पश्चिम एशिया के संकट से उपजी अनिश्चितता और कच्चे तेल की ऊंची खरीद के चलते अमेरिकी डॉलर की मांग में अप्रत्याशित उछाल आया है। वर्तमान समय में भारतीय रुपया प्रति डॉलर 96.2 के स्तर पर पहुंच चुका है, जो पिछले दो महीनों का निचला स्तर है। दूसरी ओर, अमेरिकी डॉलर इंडेक्स लगभग 102 के स्तर के करीब बना हुआ है, जो पिछले 17 महीनों का सबसे मजबूत स्तर है। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में लगातार सक्रिय रहकर रुपये की गिरावट को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है, लेकिन 96 प्रति डॉलर का अहम स्तर टूटने के बाद मुद्रा के और अधिक कमजोर होने का जोखिम बढ़ गया है। मजबूत वित्तीय बुनियाद और सीमित बढ़ोतरी का तर्क हालांकि हर बाजार विशेषज्ञ आक्रामक नीतिगत सख्ती की आशंका से पूरी तरह सहमत नहीं है। कैपिटलएक्सबी के कार्यकारी निदेशक और सह-संस्थापक अजिताभ भारती का मानना है कि भारत की व्यापक आर्थिक बुनियाद अब भी काफी सुदृढ़ है, जिससे यह संकेत मिलता है कि ब्याज दरों में कोई भी बदलाव नाटकीय होने के बजाय संतुलित और नपा-तुला ही रहेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत में मुद्रास्फीति की स्थिति काफी बेहतर और नियंत्रित दायरे में है। दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंक, विशेष रूप से फेडरल रिजर्व और बैंक ऑफ जापान, जड़ जमा चुकी महंगाई से निपटने के लिए दरों में आक्रामक बढ़ोतरी कर रहे हैं, लेकिन भारत की स्थिति उनसे बिल्कुल भिन्न है। अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच भारत की औसत खुदरा मुद्रास्फीति दर महज 1.9 प्रतिशत रही थी, जो रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से बहुत नीचे थी। हालिया महीनों में महंगाई में आई तेजी के बावजूद यह वैश्विक स्तर पर अन्य देशों के मुकाबले काफी नियंत्रित है। इसके अलावा, भारत की राजकोषीय स्थिति में उल्लेखनीय अनुशासन देखने को मिला है। सरकार का कुल वित्तीय घाटा वित्त वर्ष 2025 के 7.7 प्रतिशत से घटकर वित्त वर्ष 2026 में सकल घरेलू उत्पाद के 7.4 प्रतिशत पर आ गया है, जबकि केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026 के लिए तय किए गए अपने 4.4 प्रतिशत के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पूरी तरह हासिल किया है। यह राजकोषीय सतर्कता भारतीय रिजर्व बैंक को ऐसी नीतिगत छूट प्रदान करती है जो दुनिया के अन्य केंद्रीय बैंकों के पास उपलब्ध नहीं है। अजिताभ भारती के अनुसार, इन सभी मजबूत बुनियादी पहलुओं को देखते हुए इस बैठक में अधिकतम 25 बेसिस प्वाइंट की दर वृद्धि की ही सर्वाधिक संभावना नजर आती है, जिससे रेपो दर बढ़कर 5.50 प्रतिशत पर पहुंचेगी और यह प्रमुख वित्तीय सर्वेक्षणों के अनुमानों से पूरी तरह मेल खाती है। भारत वैश्विक ब्याज दर प्रवृत्तियों की आंख मूंदकर नकल नहीं कर सकता। केंद्रीय बैंक को मध्यम मुद्रास्फीति के माहौल में आर्थिक गतिविधियों पर अनावश्यक दबाव डाले बिना मुद्रा की स्थिरता और आंतरिक तरलता प्रबंधन के बीच संतुलन साधना होगा। वित्त वर्ष 2027 के लिए खुदरा महंगाई दर के 5.1 प्रतिशत पर रहने का अनुमान है और राजकोषीय आंकड़े नियंत्रण में हैं, ऐसे में दरों में अत्यधिक आक्रामक बढ़ोतरी अनावश्यक होने के साथ-साथ विकास दर को नुकसान भी पहुंचा सकती है। चालू वित्त वर्ष में 50 से 75 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की आशंका यद्यपि वित्तीय बाजार के अधिकांश प्रतिभागी मौजूदा नीतिगत चक्र में 25 बेसिस प्वाइंट की वृद्धि का ही अनुमान लगा रहे हैं, लेकिन चालू वित्त वर्ष के दौरान कुल 50 से 75 बेसिस प्वाइंट तक की दर वृद्धि की संभावना को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। बंधन लाइफ के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और हेड ऑफ इक्विटी अविनाश अग्रवाल का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत रास्ते की नकल करने की संभावना बेहद कम है। कोई भी नीतिगत कदम घरेलू मुद्रास्फीति, आर्थिक वृद्धि, बैंकिंग तरलता और वित्तीय स्थिरता के वास्तविक आधार पर ही उठाया जाएगा, न कि केवल अमेरिकी केंद्रीय बैंक के कदमों से प्रेरित होकर। इसके बावजूद, बंधन लाइफ इंश्योरेंस का अनुमान है कि गंभीर व्यापक आर्थिक चुनौतियों, बढ़ते आयात बिल और पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव को देखते हुए रिजर्व बैंक चालू चक्र के दौरान नीतिगत रेपो दर में कुल मिलाकर 50 से 75 बेसिस प्वाइंट तक की बढ़ोतरी करने पर विचार कर सकता है। बुधवार, 7 अक्टूबर को आने वाला निर्णय यह तय करेगा कि भारत की अर्थव्यवस्था आने वाले महीनों में वैश्विक झटकों और घरेलू महंगाई से निपटने के लिए किस नीतिगत रास्ते पर आगे बढ़ेगी। इसका आप पर असर रिजर्व बैंक द्वारा संभावित 25 बेसिस प्वाइंट की रेपो दर बढ़ोतरी से आम नागरिकों के घरेलू बजट, कर्ज की लागत और बचत योजनाओं पर सीधा वित्तीय प्रभाव पड़ेगा। • कर्जदारों के लिए: बैंकों द्वारा फ्लोटिंग रेट होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरों में तुरंत बढ़ोतरी की जा सकती है। इससे आपकी मासिक ईएमआई का बोझ बढ़ जाएगा या लोन की पुनर्भुगतान अवधि लंबी हो जाएगी। • जमाकर्ताओं के लिए: फिक्स्ड डिपॉजिट और रिकरिंग डिपॉजिट कराने वाले निवेशकों को आने वाले दिनों में अपनी बचत पर बेहतर ब्याज दरें मिलेंगी। वरिष्ठ नागरिकों और नियमित आय चाहने वाले बचतकर्ताओं के लिए यह कदम अतिरिक्त रिटर्न कमाने का अवसर बनेगा। • घरेलू बजट पर: अगस्त में खुदरा मुद्रास्फीति 4.82 प्रतिशत पर पहुंचने और तेल की बढ़ती कीमतों के कारण रोजमर्रा की वस्तुओं और परिवहन लागत पर दबाव बना रहेगा। हालांकि ब्याज दरों में बढ़ोतरी का उद्देश्य बाजार में अतिरिक्त नकदी घटाकर कीमतों को धीरे-धीरे नियंत्रण में लाना है। • मुद्रा विनिमय और आयात: डॉलर के मुकाबले रुपये के 96.2 के स्तर पर गिरने से विदेश यात्रा, विदेशी शिक्षा और आयातित इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद महंगे हो जाएंगे। केंद्रीय बैंक की नीतिगत सख्ती का मकसद रुपये में और अधिक तेज गिरावट को रोकना भी है। ऐसा क्यों हुआ रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी पर विचार करने का मुख्य कारण घरेलू खुदरा मुद्रास्फीति में लगातार हो रही वृद्धि और वैश्विक भू-राजनीतिक संकट के चलते कच्चे तेल की कीमतों में आया उछाल है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होता अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपये पर गहराता दबाव केंद्रीय बैंक को अपनी ग्यारह महीने की नीतिगत नरमी को समाप्त करने पर मजबूर कर रहा है। • ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनाव: पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण फारस की खाड़ी में तेल जहाजों की आवाजाही पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। इस आपूर्ति व्यवधान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों को ऊंचा बनाए रखा है, जिससे भारत के लिए आयातित लागत बढ़ गई है। • लगातार बढ़ती खुदरा महंगाई: भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर अगस्त 2026 में 4.82 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो दिसंबर 2024 के बाद का उच्चतम स्तर है। खुदरा मुद्रास्फीति लगातार दसवें महीने बढ़ी है और पिछले तीन महीनों से केंद्रीय बैंक के 4 प्रतिशत के प्राथमिक लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। • घरेलू मुद्रा पर निरंतर दबाव: भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले दो महीने के निचले स्तर 96.2 पर पहुंच गया है, जबकि अमेरिकी डॉलर इंडेक्स 102 के करीब मजबूत बना हुआ है। यदि रिजर्व बैंक दरों में बढ़ोतरी नहीं करता है, तो रुपये पर बिकवाली का दबाव और बढ़ जाएगा, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार में तेजी से कमी आ सकती है। • वैश्विक मौद्रिक सख्ती का चक्र: दुनिया भर के प्रमुख केंद्रीय बैंक, विशेषकर अमेरिकी फेडरल रिजर्व, महंगाई को थामने के लिए सख्त मौद्रिक नीतियां अपनाए हुए हैं। अमेरिकी और भारतीय बॉन्ड यील्ड के बीच अंतर कम होने के कारण रिजर्व बैंक के लिए वर्तमान ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखना आर्थिक रूप से खर्चीला होता जा रहा है। सवाल-जवाब 1. रिजर्व बैंक की मौद्रic नीति समिति की बैठक के फैसले कब सामने आएंगे? आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अगुवाई में छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को अपने नीतिगत निर्णयों की घोषणा करेगी। 2. अक्टूबर 2026 की बैठक में रेपो रेट में कितनी बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही है? वित्तीय विश्लेषकों और बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि रिजर्व बैंक रेपो दर में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी करके इसे 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर सकता है। 3. मौजूदा समय में रिजर्व बैंक की मुख्य नीतिगत ब्याज दरें किस स्तर पर हैं? दिसंबर 2025 से रेपो दर 5.25 प्रतिशत, स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी दर 5.00 प्रतिशत, तथा एमएसएफ और बैंक दर 5.50 प्रतिशत पर बनी हुई हैं। 4. भारत में खुदरा मुद्रास्फीति का हालिया आंकड़ा क्या रहा है? अगस्त 2026 में भारत की खुदरा मुद्रास्फीति दर 4.82 प्रतिशत दर्ज की गई, जो दिसंबर 2024 के बाद का सबसे उच्च स्तर है और लगातार तीसरे महीने 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर रही है। 5. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की वर्तमान स्थिति क्या है? भारतीय रुपया वर्तमान में 96.2 प्रति डॉलर के दो महीने के निचले स्तर पर कारोबार कर रहा है, जबकि डॉलर इंडेक्स 102 के स्तर के करीब बना हुआ है। 6. क्या चालू वित्त वर्ष में ब्याज दरों में 75 बेसिस प्वाइंट तक की बढ़ोतरी हो सकती है? बंधन लाइफ इंश्योरेंस के विश्लेषकों के अनुसार, वैश्विक व्यापक आर्थिक चुनौतियों और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण चालू चक्र में दरें कुल 50 से 75 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ाई जा सकती हैं। https://trendkia.com/money/rbi-mpc-meeting-october-2026-repo-rate-hike-looms-as-inflation-risks-and-falling-rupee-mount-pressure-43646 TrendKia — Har trend, sabse pehle.