सरसों की मड़ाई के बाद बचे सूखे डंठल से किसान कमा सकते हैं अतिरिक्त मुनाफा, जानिए 5 उपयोगी तरीके अवध क्षेत्र में पिंजी कहे जाने वाले सरसों के सूखे डंठलों को फेंकने के बजाय झाड़ू, टटिया, ईंधन और जैविक खाद बनाकर किसान अच्छा लाभ कमा सकते हैं। तिलहन की कटाई और मड़ाई का काम पूरा होने के बाद खेतों में अक्सर पौधों के सूखे डंठल बिखरे रह जाते हैं। सुल्तानपुर समेत पूरे अवध क्षेत्र में आम बोलचाल में इसे पिंजी या सरसों का डंडा कहा जाता है। ज्यादातर किसान इसे बेकार अवशेष या कूड़ा मानकर या तो खेत में ही छोड़ देते हैं या फिर अनुपयोगी समझकर बाहर फेंक देते हैं। उचित प्रबंधन और थोड़ी सी मेहनत से यही सूखा बायोमास किसानों की अतिरिक्त कमाई का एक मजबूत जरिया बन सकता है। कई ऐसे पारंपरिक और व्यावसायिक तरीके मौजूद हैं, जिनके जरिए इस कृषि अपशिष्ट से बाजार में नियमित आमदनी हासिल की जा सकती है। सफाई के लिए बड़े पैमाने पर उपयोगी झाड़ू का निर्माण व्यावसायिक नजरिए से सरसों के सूखे डंठल बहुत काम के साबित होते हैं। किसान अनिल कुमार के मुताबिक इन डंठलों को आपस में व्यवस्थित रूप से बांधकर मजबूत झाड़ू बनाई जा सकती है। यद्यपि ये झाड़ू लंबे समय तक चलने वाली स्थायी झाड़ू नहीं होतीं, लेकिन खलिहानों, बड़े चबूतरों और खुले विस्तृत परिसरों की त्वरित सफाई के लिए इन्हें बेहद कारगर माना जाता है। ग्रामीण और कस्बाई बाजारों में ऐसी कच्ची झाड़ू आसानी से 25 से 30 रुपये प्रति नग के भाव पर बिक जाती हैं, जिससे बिना किसी बड़े निवेश के तुरंत नकद राशि मिल जाती है। पशु बाड़ों के लिए सुरक्षात्मक टटिया का निर्माण गांवों में पशुओं की देखभाल और घरेलू भंडारण के लिए टटिया का व्यापक प्रयोग होता है। ग्रामीण परिवार इसका इस्तेमाल जानवरों को कड़ाके की ठंड और तेज हवाओं से बचाने के लिए बाड़ा घेरने, भूसा ढकने और उपलों को वर्षा या नमी से सुरक्षित रखने में करते हैं। जब सरसों के सूखे डंठलों को अरहर के डंठलों के साथ मिलाकर एक सघन जालीदार टटिया तैयार की जाती है, तो वह काफी टिकाऊ और हवा रोकने में सक्षम बनती है। स्थानीय स्तर पर ऐसी एक टटिया बाजार में लगभग 1000 रुपये तक में बिकती है, जिससे किसानों को डंठल की अच्छी कीमत मिल जाती है। ईंट भट्ठों के लिए बायोमास ईंधन के रूप में आपूर्ति ईंट निर्माण उद्योग में सरसों के डंठल की नियमित और भारी मांग रहती है। ईंट पकाने के दौरान भट्ठों में कोयले के साथ आग को तेजी से भड़काने और आंच को समान रूप से फैलाने के लिए यह सूखा डंठल अत्यधिक प्रभावशाली माना जाता है। भट्ठों पर बेचने के लिए जरूरी शर्त यह है कि डंठल अच्छी तरह से थ्रेशर से मड़ा हुआ हो और छोटे-छोटे टुकड़ों में कटा हुआ हो। इस तरह तैयार किए गए मड़े हुए डंठल की कीमत बाजार में लगभग 800 रुपये प्रति कुंतल तक पहुंच जाती है, जिससे किसान थोक स्तर पर मोटी कमाई कर सकते हैं। खेत की उर्वरता बढ़ाने के लिए पोषक जैविक खाद यदि किसान इन डंठलों को सीधे बाजार में बेचना नहीं चाहते, तो वे अपनी खुद की फसल के लिए इनसे उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद तैयार कर सकते हैं। इसके लिए खेत या घर के पास एक चौड़ा परंतु कम गहराई वाला गड्ढा खोदना होता है। इस गड्ढे में सरसों के सूखे डंठलों को अच्छी तरह बिछाकर उसके ऊपर करीब 3 इंच मिट्टी की परत चढ़ा दी जाती है। इसके उपरांत उस पर हल्का पानी छिड़क कर नमी बना दी जाती है। लगभग 2 से 3 महीने के भीतर यह सारा वानस्पतिक कचरा प्राकृतिक रूप से गलकर सड़ जाता है, जिससे पौधों के लिए पोषक तत्वों से भरपूर शुद्ध जैविक खाद तैयार हो जाती है। इसका आप पर असर फसल अवशेषों को जलाने या फेंकने के बजाय उनका वाणिज्यिक उपयोग किसानों के खर्च घटाने और नई आमदनी जोड़ने का सीधा साधन है। • सीधी अतिरिक्त कमाई: किसान अनुपयोगी डंठलों से झाड़ू, टटिया या भट्ठे का ईंधन बनाकर नकद पैसा जुटा सकते हैं। इससे प्रति कुंतल 800 रुपये तक और टटिया बनाकर 1000 रुपये प्रति इकाई तक का लाभ संभव है। • खाद की लागत में बचत: डंठल से खुद जैविक खाद तैयार करने से बाजार से रासायनिक उर्वरक खरीदने की निर्भरता घटती है। 2 से 3 महीने के भीतर खेत में ही मुफ्त प्राकृतिक पोषक तत्व उपलब्ध हो जाते हैं। • ग्रामीण पशुधन की सुरक्षा: डंठलों से बनी टटिया मवेशियों को सर्दियों में ठंड से बचाने का सस्ता और टिकाऊ साधन उपलब्ध कराती है। इससे पशुपालकों को शेड की दीवारों के लिए महंगे प्लास्टिक या टिन की जरूरत नहीं पड़ती। • पर्यावरण संरक्षण में मदद: अवशेषों का सदुपयोग होने से पराली और डंठल जलाने की समस्या पर स्वतः रोक लगती है। इससे हवा का प्रदूषण रुकता है और जमीन की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति बरकरार रहती है। ऐसा क्यों हुआ सरसों की कटाई के बाद बड़ी मात्रा में कठोर और रेशेदार डंठल बच जाते हैं, जिन्हें पारंपरिक रूप से निपटाना किसानों के लिए कठिन होता है। इन अवशेषों के विशेष भौतिक गुणों और स्थानीय बाजार की जरूरतों के कारण ही इनके व्यावसायिक उपयोग के नए रास्ते खुले हैं। • फसल अवशेष का स्वभाव: सरसों के दाने अलग करने के बाद बचा हुआ तना बहुत सख्त और सूखा होता है। सामान्य मवेशी इसे चारे के रूप में सीधे नहीं खा सकते, इसलिए किसान इसे कचरा मानकर छोड़ देते थे। • उच्च ज्वलनशीलता और मजबूती: सूखे डंठल बहुत जल्दी आग पकड़ते हैं और इनमें अच्छी तापीय ऊर्जा होती है। इसी खूबी के चलते ईंट भट्ठों में कोयले को शीघ्र दहकाने के लिए इनकी भारी मांग बनी रहती है। • ग्रामीण कुटीर जरूरतों की मांग: देहात में पशु बाड़ों को ढकने और चारा-उपला सुरक्षित रखने के लिए पारंपरिक प्राकृतिक पर्दों की जरूरत पड़ती है। अरहर और सरसों के डंठल का संयोजन इस काम के लिए सबसे सस्ता और सुलभ ढांचा तैयार करता है। सवाल-जवाब 1. अवध क्षेत्र में सरसों के सूखे डंठल को किस नाम से जाना जाता है? सुल्तानपुर और अवध क्षेत्र में इसे स्थानीय भाषा में पिंजी या सरसों का डंडा कहा जाता है। 2. सरसों के डंठल से बनी झाड़ू बाजार में किस दाम पर बिकती है? सरसों के डंठल से बनी सफाई झाड़ू स्थानीय बाजार में 25 से 30 रुपये प्रति झाड़ू के हिसाब से बिकती है। 3. टटिया बनाने के लिए सरसों के साथ किस पौधे के डंठल मिलाए जाते हैं? टटिया बनाने के लिए सरसों के डंठल के साथ अरहर के डंठल का मिश्रण उपयोग किया जाता है। 4. एक तैयार टटिया की बाजार में अनुमानित कीमत कितनी होती है? सरसों और अरहर के डंठल से तैयार एक टटिया की बाजार कीमत लगभग 1000 रुपये तक हो सकती है। 5. ईंट भट्ठों पर सरसों के डंठल का क्या उपयोग होता है? ईंट भट्ठों में इसका इस्तेमाल ईंट पकाने के लिए कोयले को शीघ्र आग पकड़ने और लपक देने के लिए किया जाता है। 6. ईंट भट्ठों के लिए मड़े हुए सरसों के डंठल का बाजार भाव क्या है? मड़ाई किए गए और टुकड़ों में कटे सरसों के डंठल की कीमत लगभग 800 रुपये प्रति कुंतल तक होती है। 7. सरसों के डंठल से जैविक खाद कितने समय में तैयार हो जाती है? गड्ढे में 3 इंच मिट्टी और पानी से ढकने के बाद 2 से 3 महीने में सरसों के डंठल सड़कर जैविक खाद बन जाते हैं। https://trendkia.com/money/sarason-ki-marai-ke-bada-bache-sukhe-dnthala-se-kisana-kama-sakate-hain-atirikta-munapha-janie-5-upayogi-tarike-35214 TrendKia — Har trend, sabse pehle.