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  "type": "article",
  "title": "वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत के लिए ढाल बना घरेलू कोयला उत्पादन, सचिव विक्रम देव दत्त ने गिनाए आंकड़े",
  "summary": "अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन की कीमतों में भारी उछाल के बीच भारत का घरेलू कोयला उत्पादन बिजली आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में अहम साबित हुआ है। कोयला सचिव विक्रम देव दत्त के मुताबिक देश की 70 फीसदी से ज्यादा बिजली आज भी कोयले से बन रही है।",
  "content": "अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और गैस के बाजार में मचे घमासान के बीच भारत की मजबूत आंतरिक खनन व्यवस्था अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े रक्षा कवच के रूप में उभरी है। वैश्विक ईंधन दरों में आने वाले तेज उतार-चढ़ाव और आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं के बावजूद देश के भीतर कोयले का निरंतर उत्पादन बिजली तंत्र को निर्बाध गति प्रदान कर रहा है। गोवा के पणजी में माइनिंग फॉर फ्यूचर विषय पर आयोजित हितधारकों के एक विशेष सम्मेलन में कोयला सचिव विक्रम देव दत्त ने ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े इन अहम पहलुओं को विस्तार से रखा।\n\nअंतरराष्ट्रीय आपूर्ति में गतिरोध और बिजली ग्रिड की सुरक्षा\nपश्चिम एशिया के संघर्ष के चलते इस वर्ष फरवरी के अंतिम दिनों से तरल प्राकृतिक गैस यानी LNG और रसोई गैस LPG की वैश्विक आपूर्ति शृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति लड़खड़ाने से जहां कई देशों को भारी ऊर्जा किल्लत का सामना करना पड़ा, वहीं भारत में बिजली संयंत्रों और खदानों पर उपलब्ध कोयला भंडार ने हालात को बिगड़ने नहीं दिया। सरकार ने घरेलू स्रोतों के कुशल प्रबंधन के बूते देश भर में बिजली की निरंतर आपूर्ति बनाए रखी, जिसके लिए उद्योग जगत के त्वरित सहयोग की सराहना की गई।\n\nऊर्जा बाजारों के लिए आने वाला समय भी काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का आकलन है कि गैस बाजारों में आपूर्ति की यह तंगी वर्ष 2027 तक लगातार बनी रह सकती है। इसका सीधा असर कीमतों पर दिखाई दे रहा है, जहां एशियाई हाजिर LNG दूसरी तिमाही के दौरान औसतन 17.5 डॉलर प्रति MBtu के स्तर पर पहुंच गई। यह भाव बीते वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 45 प्रतिशत अधिक रहा, जो वैश्विक ऊर्जा बाजार के भारी वित्तीय दबाव को स्पष्ट करता है।\n\nआर्थिक स्थिरता का आधार बना घरेलू उत्पादन\nवैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतों में भारी उथल-पुथल के दौर में घरेलू कोयला उत्पादन सीधे तौर पर देश की वित्तीय मजबूती से जुड़ा हुआ है। विक्रम देव दत्त ने स्पष्ट किया कि देश के भीतर उत्पादित होने वाला प्रत्येक टन कोयला अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय झटकों और मूल्य वृद्धि से सुरक्षा प्रदान करता है। वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो दुनिया भर में कोयले की कुल खपत वर्ष 2026 में 8.94 अरब टन के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचने का अनुमान जताया गया है।\n\nभारत के अपने आंतरिक अनुमान भी यही दर्शाते हैं कि आगामी दशकों में औद्योगिकीकरण की गति बनाए रखने के लिए कोयले का उपयोग लगातार बढ़ेगा। नीति आयोग के अनुमानों के मुताबिक भारत में कोयले की कुल मांग वर्ष 2025 के लगभग 1.25 अरब टन से लगातार ऊपर की ओर अग्रसर है। मौजूदा नीतियों के क्रियान्वयन के आधार पर वर्ष 2050 तक देश की वार्षिक कोयला मांग 2.6 अरब टन के स्तर को भी पार कर सकती है।\n\nसख्त पर्यावरण लक्ष्यों के बावजूद टिकाऊ मांग\nजलवायु संरक्षण के कड़े लक्ष्यों और नेट-जीरो की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने के बावजूद कोयले पर देश की निर्भरता अचानक खत्म नहीं होने वाली है। नीति आयोग का मूल्यांकन बताता है कि नेट-जीरो के मार्ग पर मजबूती से आगे बढ़ने की स्थिति में भी देश की वार्षिक कोयला खपत 1.8 अरब टन से ऊपर बनी रहेगी। देश में बुनियादी ढांचे के लगातार होते विस्तार के कारण इस्पात, सीमेंट और ताप विद्युत क्षेत्र कोयले की सबसे ज्यादा खपत करने वाले तीन प्रमुख उद्योग बने हुए हैं।\n\nवर्ष 2025-26 के दौरान भारत ने कुल 1,041 मिलियन टन कोयले का रिकॉर्ड उत्पादन हासिल किया है। वर्तमान में देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सीधे तौर पर कोयला आधारित संयंत्रों से ही हासिल होता है। इसी भारी हिस्सेदारी के चलते ऊर्जा तंत्र में आपूर्ति की निरंतरता और खदानों की सुरक्षा को प्राथमिक नीतिगत महत्व दिया जा रहा है।\n\nपर्यावरण सुधार और स्थानीय समुदायों का कल्याण\nखनन कार्यों को टिकाऊ बनाने के लिए कोयला मंत्रालय कई आधुनिक तकनीकों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर एक साथ काम कर रहा है। पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखते हुए खदानों के वैज्ञानिक तरीके से बंद होने और उपयोग की गई भूमि के पुनरुद्धार पर विशेष बल दिया जा रहा है। इसका प्राथमिक लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि जिन क्षेत्रों में खनन कार्य पूरा हो चुका है, उन्हें केवल बंजर जमीन के रूप में न छोड़ा जाए।\n\nविक्रम देव दत्त ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि खनन संपन्न हो चुके क्षेत्रों को स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर जीवंत, हरे-भरे पर्यावास के रूप में पुनर्जीवित किया जाना चाहिए। पारिस्थितिकी बहाली के साथ-साथ स्थानीय आबादी के सामाजिक कल्याण और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को खनन नीतियों का अभिन्न अंग बनाया गया है ताकि विकास और प्रकृति के बीच बेहतर संतुलन बना रहे।\n\nइसका आप पर असर\nअंतरराष्ट्रीय ऊर्जा संकट और आयातित गैस की आसमान छूती कीमतों के बीच घरेलू कोयला उत्पादन भारत के आम नागरिकों और उद्योगों को बिजली कटौती व महंगे बिजली टैरिफ से बचाने में सीधी भूमिका निभा रहा है।\n\n• भारत में उपभोक्ताओं पर असर: घरेलू कोयले की मजबूत आपूर्ति के चलते बिजली उत्पादन की लागत नियंत्रित रहती है, जिससे आम परिवारों को बिजली की दरों में अचानक होने वाली भारी बढ़ोतरी का सामना नहीं करना पड़ता। ताप विद्युत संयंत्रों में पर्याप्त भंडार होने से गर्मियों और त्योहारों के दौरान देश भर में ब्लैकआउट का जोखिम काफी हद तक टल जाता है।\n• औद्योगिक उत्पादन और रोजगार: सीमेंट और स्टील जैसे बुनियादी उद्योगों को बिना रुकावट ईंधन मिलने से निर्माण लागत नियंत्रित रहती है। कारखानों में निर्बाध बिजली मिलने से विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन और रोजगार की गति बनी रहती है।\n• राष्ट्रीय आयात बिल: घरेलू स्तर पर 1,041 मिलियन टन कोयला तैयार होने से देश के कीमती विदेशी मुद्रा भंडार की बचत होती है। आयातित महंगे ईंधन पर निर्भरता कम होने से रुपया अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच अधिक स्थिर रहता है।\n• खनन प्रभावित क्षेत्रों के निवासी: वैज्ञानिक तरीके से खदानें बंद करने और भूमि बहाली की नई नीतियों से स्थानीय ग्रामीणों को बेहतर पर्यावरण और पुनर्वासित जमीन मिलेगी। बंजर इलाकों को हरित क्षेत्रों में बदलने से खनन क्षेत्रों में लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक स्थिरता बनी रहेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nअंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक तनावों और आपूर्ति में रुकावटों के कारण वैश्विक गैस बाजार में भारी महंगाई देखी गई, जिसके चलते भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए घरेलू कोयला उत्पादन पर भरोसा बढ़ाया।\n\n• पश्चिम एशिया संकट से पैदा हुआ व्यवधान: पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद फरवरी के अंत से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर LNG और LPG की आपूर्ति शृंखला बुरी तरह प्रभावित हो गई। इसके चलते एशियाई हाजिर LNG की दरें 45 प्रतिशत चढ़कर 17.5 डॉलर प्रति MBtu के स्तर पर पहुंच गईं।\n• बिजली संयंत्रों में पहले से मौजूद भंडार: अंतरराष्ट्रीय ईंधन आपूर्ति लड़खड़ाने पर भारत के खदानों और ताप विद्युत संयंत्रों में मौजूद भारी कोयला स्टॉक ने तत्काल सुरक्षा कवच की तरह काम किया। इस घरेलू उपलब्धता की वजह से ग्रिड को आयातित गैस की कमी के बावजूद निरंतर चलाया जा सका।\n• वैश्विक बाजार में लगातार तंगी: अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार गैस बाजारों में 2027 तक आपूर्ति का दबाव बना रहने का अनुमान है। इस दीर्घकालिक संकट को देखते हुए भारत ने आयातित ईंधनों के बदले घरेलू खनन क्षमता को 1,041 मिलियन टन तक पहुंचाकर अपनी निर्भरता को सुरक्षित किया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. भारत में बिजली बनाने में कोयले की कितनी हिस्सेदारी है?\nभारत के कुल बिजली उत्पादन में कोयले का योगदान 70 प्रतिशत से अधिक है।\n\n2. वर्ष 2025-26 में भारत ने कुल कितना कोयला उत्पादित किया?\nभारत ने वर्ष 2025-26 के दौरान कुल 1,041 मिलियन टन कोयले का उत्पादन किया।\n\n3. एशियाई हाजिर LNG की कीमतों में कितनी बढ़ोतरी दर्ज की गई?\nदूसरी तिमाही में एशियाई हाजिर LNG 45 प्रतिशत बढ़कर औसतन 17.5 डॉलर प्रति MBtu तक पहुंच गई।\n\n4. नीति आयोग के अनुसार 2050 तक भारत में कोयले की मांग कितनी हो सकती है?\nमौजूदा नीतियों के आधार पर नीति आयोग का अनुमान है कि 2050 तक कोयले की मांग 2.6 अरब टन से अधिक हो जाएगी।\n\n5. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक गैस बाजार कब तक तंग रहने की संभावना है?\nअंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार वैश्विक गैस बाजारों में 2027 तक तंगी बनी रहने का अनुमान है।\n\n6. भारत में कोयले की खपत करने वाले शीर्ष तीन उद्योग कौन से हैं?\nबिजली, इस्पात और सीमेंट भारत में कोयले की सबसे अधिक खपत करने वाले तीन प्रमुख क्षेत्र हैं।",
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