प्रहार रिव्यू (2026): 26/11 के इंसाफ की लंबी कानूनी जंग और राजकुमार राव की सधी हुई अदाकारी अविनाश अरुण के निर्देशन में बनी 'प्रहार' मुंबई 26/11 हमलों के बाद अजमल कसाब को सजा दिलाने वाले वकील उज्ज्वल निकम की जटिल अदालती लड़ाई को संजीदगी से पर्दे पर उतारती है। सिनेमाघरों में रिलीज हुई यह नई बायोग्राफिकल फिल्म कानून की चौखट पर लड़ी जाने वाली सबसे जटिल लड़ाइयों में से एक को सामने लाती है, और हमारा प्रहार रिव्यू (2026) इसके हर मजबूत और कमजोर पहलू की बारीकी से पड़ताल करता है। 26 नवंबर 2008 को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर हुए कायराना हमलों के बाद पूरे देश में गम और गुस्से का माहौल था। आम तौर पर सिनेमा में ऐसे हमलों के एक्शन, कमांडो ऑपरेशन और गोलियों की तड़तड़ाहट पर ज्यादा जोर दिया जाता है, लेकिन यह फिल्म उस रास्ते से हटकर एक बिल्कुल अलग दिशा पकड़ती है। यह कहानी गोलियों के थमने के बाद शुरू होती है, जब देश की न्याय प्रणाली को यह साबित करना था कि भारत एक लोकतांत्रिक और कानून का सम्मान करने वाला मुल्क है, जहां सबसे खूंखार गुनहगार को भी कानूनी दायरे में रखकर ही सजा दी जाती है। इस पूरे केंद्र बिंदु में विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वल निकम की भूमिका सबसे अहम रही, जिसे इस फिल्म में बहुत गहराई से दिखाया गया है। बंद कमरों की जिरह और इंसाफ का कठिन सफर फिल्म का मुख्य ताना-बाना 26/11 हमले के इकलौते जिंदा पकड़े गए आतंकवादी अजमल कसाब के मुकदमे के इर्द-गिर्द बुना गया है। हमलों के खौफनाक मंजर के बाद विशेष सरकारी वकील के तौर पर उज्ज्वल निकम को यह बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जाती है कि वे अदालत में बिना किसी भावनात्मक भटकाव के पुख्ता सबूतों के आधार पर कसाब का गुनाह साबित करें। कहानी इस बात को बहुत स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है कि जनभावनाओं में बहने के बजाय अदालत केवल ठोस साक्ष्यों, बयानों और कानूनी तर्कों को मान्यता देती है। इस कानूनी प्रक्रिया में कसाब की तरफ से पैरवी कर रहे बचाव पक्ष के वकील अब्बास काजमी और उज्ज्वल निकम के बीच की अदालती नोकझोंक फिल्म की असली रीढ़ बनकर उभरती है। दोनों वकीलों के बीच की बहसें दर्शकों को यह समझाती हैं कि एक हाई-प्रोफाइल मुकदमे को निष्पक्ष रूप से चलाना कितना पेचीदा काम होता है। अदालती कार्यवाही के साथ-साथ पटकथा में निकम की निजी जिंदगी के तनाव को भी शामिल किया गया है। खासकर उनके बेटे अनिकेत के साथ उनके खिंचे हुए रिश्ते को दर्शाने की कोशिश की गई है, जिससे यह पता चलता है कि देश के सबसे बड़े केस में दिन-रात जुटे रहने की कीमत एक इंसान को अपने परिवार में किस तरह चुकानी पड़ती है। हालांकि, यह पारिवारिक सबप्लॉट कई जगह मुख्य अदालती मुद्दे से दर्शकों का ध्यान भटका देता है और फिल्म की लय को धीमा करता है। राजकुमार राव और ललित प्रभाकर का जबरदस्त अभिनय अभिनय के मोर्चे पर राजकुमार राव ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे किसी भी चुनौतीपूर्ण और असल जिंदगी के किरदार में जान फूंकने का हुनर रखते हैं। उज्ज्वल निकम के किरदार में उन्होंने कोर्ट के भीतर की संजीदगी, आत्मविश्वास और शांत आक्रामकता को बहुत ही सलीके से उतारा है। उनके तीखे संवाद और कानूनी जिरह के दौरान उनका ठहराव काफी असरदार लगता है। कुछ दृश्यों में उनका लहजा थोड़ा असामान्य जरूर महसूस होता है, लेकिन उनका समग्र प्रदर्शन पूरी कहानी को एक बेहद ठोस धरातल प्रदान करता है। फिल्म का सबसे चौंकाने वाला और सिहरन पैदा करने वाला पहलू ललित प्रभाकर का काम है। अजमल कसाब के रूप में उनका रूपांतरण दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है। उनके चेहरे के भाव, भीतर की घबराहट, हिंसक मानसिकता और क्रूरता उस भयानक दौर की कड़वी यादों को फिर से ताजा कर देती है। प्रभाकर ने इस नकारात्मक किरदार की मनोदशा को बिना किसी अतिशयोक्ति के बहुत ही डरावने ढंग से निभाया है। सहायक कलाकारों में सिकंदर खेर और जयदीप अहलावत अपनी संक्षिप्त भूमिकाओं में भी पूरी छाप छोड़ते हैं, जबकि वामिका गब्बी और ऋत्विक साहोरे ने अपने सीमित स्क्रीन समय में भी कहानी को मजबूती दी है। अविनाश अरुण का संवेदनशील निर्देशन निर्देशक अविनाश अरुण का काम इस पूरे कोर्टरूम ड्रामे की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने सीएसटी रेलवे स्टेशन पर हुए कत्लेआम को जिस संवेदनशीलता से फिल्माया है, वह दृश्य दिल को दहला देने वाला है। उस पूरी त्रासदी को एक छोटी बच्ची की आंखों से दिखाना, जिसने उस हमले में अपनी मां को खो दिया था, फिल्म को एक गहरा भावनात्मक स्तर देता है। निर्देशक ने कानूनी बहसों की जटिलता और मानवीय दर्द के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाए रखा है। हालांकि, कुछ अदालती बहसें जरूरत से ज्यादा खिंची हुई महसूस होती हैं और मध्यांतर से ठीक पहले फिल्म की गति कुछ धीमी पड़ जाती है, लेकिन इसके बावजूद निर्देशक कहानी पर अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देते। संगीत, बैकग्राउंड स्कोर और तकनीकी पहलू फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर इसके गंभीर और तनावपूर्ण माहौल को पूरा समर्थन देते हैं। बैकग्राउंड में बजने वाली धीमी और भारी धुनें दर्शकों को लगातार उस मानसिक दबाव का अहसास कराती हैं, जिससे उस वक्त पूरी जांच एजेंसी, कानूनी टीम और देश गुजर रहा था। संगीत कहीं भी कहानी की गति में रुकावट नहीं बनता, बल्कि कोर्टरूम की बहसों और हमलों के फ्लैशबैक दृश्यों के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। कमियां और अंतिम फैसला फिल्म पूरी तरह से दोषमुक्त नहीं है। इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसकी लंबी रफ्तार है, जहां कुछ अदालती दृश्य और संवाद अनावश्यक रूप से लंबे खिंचते हैं। इसके अलावा, उज्ज्वल निकम और उनके बेटे के बीच का तनावपूर्ण पारिवारिक प्रसंग पटकथा को कई बार कमजोर करता है और मुख्य मुकदमे से ध्यान हटाता है। विषय वस्तु बेहद गंभीर और भारी होने के कारण यह फिल्म हर तरह के सामान्य दर्शकों के लिए हल्की-फुल्की नहीं है। इन गिनी-चुनी खामियों के बावजूद, 'प्रहार' एक ऐसी फिल्म है जो सिनेमाघर से निकलने के बाद भी आपके जेहन में बनी रहती है। यह याद दिलाती है कि किसी आतंकी हमले के बाद न्याय की राह कितनी लंबी, धैर्यपूर्ण और कठिन होती है। गंभीर, तार्किक और सच्ची घटनाओं पर आधारित कानूनी ड्रामे के शौकीनों के लिए यह एक देखने लायक फिल्म है। इस फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार दिए जाते हैं। इसका आप पर असर यह फिल्म सिनेमा प्रेमियों और गंभीर अदालती मामलों में रुचि रखने वाले दर्शकों को न्याय प्रणाली की जमीनी हकीकत समझाती है। • सिनेमा प्रेमियों के लिए: अगर आप तेज रफ्तार एक्शन के बजाय गंभीर अदालती बहस और बारीक पटकथा पसंद करते हैं, तो यह फिल्म आपको पसंद आएगी। इसमें गोलीबारी से ज्यादा जोर कानूनी दांव-पेचों और सबूत जुटाने की प्रक्रिया पर दिया गया है। • पारिवारिक दर्शकों के लिए: फिल्म का विषय काफी गंभीर और भावनात्मक रूप से भारी है, इसलिए यह बच्चों के मनोरंजन के लिहाज से उपयुक्त नहीं है। इसमें 26/11 के हमलों से जुड़े संवेदनशील और विचलित करने वाले दृश्य शामिल हैं। • कलाकारों के प्रशंसकों के लिए: राजकुमार राव और ललित प्रभाकर के अभिनय के प्रशंसक इस फिल्म को मिस न करें। खासकर कसाब के रूप में ललित प्रभाकर का रूपांतरण उनके करियर का एक बेहद साहसिक काम है। • टिकट और समय की योजना: फिल्म की गति मध्यांतर से पहले थोड़ी धीमी होती है और अदालती दृश्य लंबे हैं। इसलिए थिएटर जाने से पहले ढाई घंटे से अधिक समय का धैर्यपूर्ण मानसिक मन बनाकर जाएं। ऐसा क्यों हुआ यह फिल्म 26/11 के मुंबई हमलों के बाद जिंदा पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब के ऐतिहासिक मुकदमे को पर्दे पर दर्ज करने के उद्देश्य से बनाई गई है। देश की कानूनी व्यवस्था ने पूरी दुनिया के सामने यह साबित किया था कि भारत विधि के शासन पर चलने वाला राष्ट्र है। • मुकदमे का ऐतिहासिक संदर्भ: 26/11 हमलों के बाद विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वल निकम को यह सुनिश्चित करने का जिम्मा मिला था कि कसाब को बिना किसी कानूनी चूक के कानूनन सजा मिले। निर्देशक अविनाश अरुण ने इसी अदालती संघर्ष और सबूतों की कड़ियों को एक विस्तृत सिनेमाई रूप दिया है। • कानूनी पेचीदगियां और चुनौतियां: देश में जन आक्रोश बहुत ज्यादा था, लेकिन अदालत में केवल ठोस सबूतों और बयानों के आधार पर ही फैसला हो सकता था। कसाब के बचाव पक्ष के वकील अब्बास काजमी के साथ चली लंबी जिरह को दिखाना इस फिल्म के निर्माण का मुख्य उद्देश्य रहा। • व्यक्तिगत त्याग की दास्तान: इस केस के दौरान सरकारी वकील पर भारी मानसिक और सुरक्षा दबाव था, जिसका असर उनके परिवार और बेटे अनिकेत के साथ उनके रिश्तों पर पड़ा। फिल्ममेकर ने इस अनकही निजी लड़ाई को भी जनता के सामने लाने का प्रयास किया। सवाल-जवाब 1. क्या 'प्रहार' फिल्म सिनेमाघरों में देखने लायक है? हां, अगर आपको गंभीर, तथ्यात्मक और बेहतरीन अभिनय से सजे कोर्टरूम ड्रामे पसंद हैं, तो 'प्रहार' निश्चित रूप से देखने लायक है। 2. 'प्रहार' जैसी अन्य कौन सी फिल्में हैं? 'प्रहार' की तरह गंभीर कानूनी और आतंकी मामलों पर बनी फिल्मों में 'शाहिद', 'द अटैक्स ऑफ 26/11' और 'सेक्शन 375' शामिल हैं। 3. फिल्म में मुख्य भूमिकाएं किसने निभाई हैं? फिल्म में राजकुमार राव ने उज्ज्वल निकम और ललित प्रभाकर ने अजमल कसाब की भूमिका निभाई है, जबकि जयदीप अहलावत और सिकंदर खेर सहायक किरदारों में हैं। 4. फिल्म 'प्रहार' को कितनी रेटिंग मिली है? इस फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार की रेटिंग दी गई है। 5. फिल्म का निर्देशन किसने किया है? इस फिल्म का निर्देशन अविनाश अरुण ने किया है, जिन्होंने सीएसटी हमले और अदालती बहसों को बहुत संवेदनशीलता से दर्शाया है। 6. फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है? इसकी गति कुछ जगहों पर काफी धीमी है और निकम के पारिवारिक प्रसंग मुख्य अदालती केस से दर्शकों का ध्यान भटकाते हैं। रिव्यू फ़िल्म: प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्जवल निकम रेटिंग: 3.5/5 निर्देशक: अविनाश अरुण कलाकार: राजकुमार राव, वामिका गब्बी, जयदीप अहलावत, सिकंदर खेर, आशीष विद्यार्थी, ललित प्रभाकर और अन्य शैली: कोर्टरूम ड्रामा अवधि: 140 मिनट रिलीज़: 16 अक्टूबर 2026 भाषा: हिंदी https://trendkia.com/movie-review/prahaar-rivyu-2026-26-11-ke-insapha-ki-lnbi-kanuni-jnga-aura-rajkummar-rao-ki-sadhi-hui-adakari-47998 TrendKia — Har trend, sabse pehle.