# द पैराडाइज रिव्यू (2026): नानी का दमदार अभिनय भी नहीं बचा पाया कमजोर स्क्रीनप्ले और बेहिसाब हिंसा वाली कहानी को

> श्रीकांत ओडेला के निर्देशन में बनी फिल्म 'द पैराडाइज' में नानी और सोनाली कुलकर्णी ने बेहतरीन अदाकारी दिखाई है, मगर बेहिसाब खून-खराबा और लड़खड़ाता स्क्रीनप्ले पूरी गति बिगाड़ देता है।

**Type:** article · **Category:** मूवी रिव्यू · **Published:** 2026-09-25 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/movie-review/the-paradise-review-2026-nani-ka-damadara-abhinaya-bhi-nahin-bacha-paya-kamajora-skrinaple-aura-behisaba-hinsa-vali-kahani-ko-38591 · **Language:** Hindi
**Tags:** द पैराडाइज रिव्यू, नानी, श्रीकांत ओडेला, सोनाली कुलकर्णी, मोहन बाबू, राघव जुयाल, कयादू लोहार, अनिरुद्ध रविचंदर

तेलुगु सिनेमा में पारिवारिक और संजीदा किरदारों से अलग हटकर अपनी एक आक्रामक एक्शन छवि गढ़ने की नानी की कोशिशों के बीच यह 'द पैराडाइज' रिव्यू (2026) उनकी इस नई यात्रा का पूरा लेखा-जोखा सामने रखता है। निर्देशक श्रीकांत ओडेला के साथ नानी की यह बड़े बजट की पेशकश 24 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। कहानी उत्पीड़न, सामाजिक वर्चस्व, कड़वे अतीत और बदले की आग के इर्द-गिर्द घूमती है। निर्माण का पैमाना बेहद भव्य है और नानी ने अपने किरदार में जान फूंकने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है, लेकिन क्या एक लचर पटकथा और अत्यधिक खून-खराबे के बीच यह फिल्म दर्शकों के दिल को छू पाती है, इस पर नजर डालना जरूरी है।

## 1980 के दशक की पृष्ठभूमि और सावरी समुदाय का नरकीय जीवन
फिल्म की कहानी 1980 के दशक के दौरान सिकंदराबाद के एक काल्पनिक उपनगर में गढ़ी गई है, जिसे व्यंग्यात्मक ढंग से 'पैराडाइज' नाम दिया गया है। नाम भले ही स्वर्ग की याद दिलाए, मगर इस बस्ती की हकीकत किसी भयानक नरक से भी बदतर दिखाई गई है। यहाँ रहने वाला सावरी समुदाय बुनियादी मानवीय अधिकारों और सम्मान के लिए तरस रहा है। भोजन, वस्त्र और सुरक्षित आश्रय जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं के अभाव में यह पूरा समुदाय पीढ़ियों से गुलामी और बेगार के जाल में फंसा हुआ है।

इस पूरे इलाके पर मलिक का खौफनाक राज चलता है। क्रूर और ताकतवर मलिक का किरदार मोहन बाबू ने निभाया है, जो इस समुदाय को न सिर्फ आर्थिक रूप से कंगाल करता है और उनका शारीरिक उत्पीड़न करता है, बल्कि उनकी आत्म-पहचान और स्वाभिमान को भी कुचल कर रख देता है। व्यवस्थागत अत्याचार और क्रूरता के ऐसे माहौल में आम इंसानों का जीना दूभर हो चुका है।

## जदल का संघर्ष और मां-बेटे का कड़वा अतीत
इसी शोषित बस्ती से जदल का जन्म होता है, जिसका किरदार नानी ने निभाया है। जदल का बचपन भयानक अत्याचारों और जेल की सलाखों के पीछे बीता है। जेल में वर्षों गुजारने के कारण उसके मन में अपनी मां शमक्का के प्रति गहरी नफरत बैठ चुकी है। शमक्का का किरदार सोनाली कुलकर्णी ने निभाया है, जिसे भुखमरी से बचने और अपने बेटे का पेट भरने के लिए देह व्यापार के गंदे दलदल में धकेल दिया गया था।

सालों की सजा काटकर जब जदल जेल से रिहा होकर अपनी पुरानी बस्ती लौटता है, तो उसका इरादा अपनी मां से दूरी बनाए रखने का होता है। मगर हालात उसे शांत नहीं रहने देते। जब वह अपनी ही आंखों के सामने पूरी बस्ती के बीच अपनी मां का सार्वजनिक अपमान होते देखता है, तो वर्षों से दबा हुआ उसका आक्रोश एक खूनी बदले की शक्ल अख्तियार कर लेता है।

## व्यक्तिगत रंजिश से लेकर पूरे समुदाय की मुक्ति तक की जंग
अपनी अंधेरी और घुटन भरी जिंदगी के बीच जदल की मुलाकात एक मासूम लड़की से होती है, जिसका किरदार कयादू लोहार ने निभाया है। यह मुलाकात उसके जीवन में आशा की एक नई किरण जगाती प्रतीत होती है। हालांकि, जदल के भीतर बदले का जुनून ठंडा नहीं पड़ता और वह अपने मिशन की शुरुआत मलिक के सनकी बेटे विक्रम का सिर कलम करके करता है। विक्रम की भूमिका राघव जुयाल ने निभाई है।

इस दुस्साहसिक घटना के बाद सत्ता के नशे में चूर मलिक सावरी समुदाय को पूरी तरह खत्म करने की ठान लेता है। यहीं से कहानी एक नया मोड़ लेती है, जहाँ जदल का यह निजी प्रतिशोध पूरे सावरी समुदाय के आत्मसम्मान, अधिकारों और सामूहिक आजादी की महालड़ाई में तब्दील हो जाता है। क्या जदल अपने लोगों को मलिक की बर्बर दासता से मुक्त करा पाएगा और इस नारकीय बस्ती को सचमुच एक 'पैराडाइज' बना पाएगा, यही इस फिल्म का मूल कथानक है।

## कलाकारों का अभिनय: नानी की मेहनत और अन्य किरदारों की सीमाएं
अभिनय की कसौटी पर देखें तो नानी इस पूरी फिल्म की सबसे मजबूत रीढ़ साबित होते हैं। जदल के किरदार में उन्होंने अपने अभिनय का शिखर दिखाया है। उनकी आंखों में धधकता गुस्सा, सीने में दबा वर्षों का दर्द और शरीर पर दर्ज जुल्म की दास्तान हर एक फ्रेम में साफ दिखाई देती है। एक्शन दृश्यों में उनकी ऊर्जा कमाल की है, वहीं अपनी मां के साथ के भावनात्मक दृश्यों में वह दर्शकों को भीतर तक झकझोर देते हैं।

सोनाली कुलकर्णी ने एक बार फिर अपनी जबरदस्त अदाकारी का लोहा मनवाया है। शमक्का के रूप में उनकी लाचारी और दर्द पर्दे पर जीवंत हो उठता है। नानी और सोनाली कुलकर्णी के बीच के दृश्य फिल्म को वह भावनात्मक आधार देते हैं, जिसकी बाकी स्क्रिप्ट में भारी कमी नजर आती है।

दूसरी तरफ, प्रतिपक्षी भूमिकाओं में फिल्म मात खा जाती है। मलिक की भूमिका में मोहन बाबू कागजी तौर पर एक बेहद ताकतवर खलनायक नजर आते हैं, लेकिन स्क्रीन पर उनका किरदार उस तरह की दहशत या रूह कंपा देने वाला दबदबा कायम नहीं कर पाता, जिसकी इतने बड़े पैमाने की कहानी में दरकार थी। इसके चलते नायक और खलनायक के बीच का टकराव काफी फीका पड़ जाता है।

विक्रम के रूप में राघव जुयाल ने एक क्रूर और सनकी बेटे का अंदाज पेश करने की कोशिश तो की है, लेकिन लेखन की खामियों के चलते उनका किरदार गंभीर लगने की बजाय कई जगहों पर हास्यास्पद और जोकर जैसा महसूस होता है। खौफ पैदा करने के बजाय उनका व्यवहार दर्शकों को चिढ़ाने लगता है। वहीं अभिनेत्री कयादू लोहार के पास कहानी में करने के लिए कोई ठोस काम नहीं है; उनका इस्तेमाल केवल मुख्य नायक के दिल में बदलाव लाने और कुछ गानों तक ही सीमित रह गया है।

## श्रीकांत ओडेला का निर्देशन और कमजोर पटकथा का संकट
निर्देशक श्रीकांत ओडेला ने सावरी समुदाय की घोर बदहाली और पीड़ा को पर्दे पर उकेरने के लिए विस्तृत परिवेश तैयार किया है। मध्यांतर से पहले वह दर्शकों को भूख, गर्द, कीचड़ और खून से सने एक बेहद क्रूर संसार में ले जाने में सफल रहते हैं। इसके बावजूद, फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका सतही ट्रीटमेंट और लड़खड़ाता हुआ स्क्रीनप्ले साबित होता है।

कहानी में मौजूद सामाजिक संदेश और रिश्तों की गहराई पर भरोसा जताने के बजाय निर्देशक ने अत्यधिक और बीभत्स हिंसा को कहानी आगे बढ़ाने का जरिया बना लिया है। गर्भवती महिलाओं, बेबस बच्चों और लाचार बुजुर्गों पर दिखाए गए बर्बर जुल्म के दृश्य इतने वीभत्स हैं कि दर्शक कहानी से जुड़ने के बजाय असहज और विचलित महसूस करने लगते हैं। इसके अलावा, एक्शन दृश्यों को जिस तरह अवास्तविक और अतिरंजित बनाया गया है, वह निर्देशक के वास्तविक माहौल रचने के प्रयासों पर पानी फेर देता है।

## तकनीकी पक्ष: बेहतरीन माहौल लेकिन 'केजीएफ' की छाया
तकनीकी मोर्चे पर 'पैराडाइज' की स्लम बस्ती का भव्य सेट, लगातार बरसता पानी, कीचड़ और डार्क सिनेमैटोग्राफी बेहद प्रामाणिक अहसास कराते हैं। मेकअप और कॉस्ट्यूम विभाग ने किरदारों के हुलिए को बिल्कुल यथार्थवादी बनाए रखने में शानदार काम किया है।

हालांकि, यह डार्क बैकग्राउंड, लगातार बारिश, झुग्गी-झोपड़ियों और खदानों जैसा स्याह माहौल तथा मां-बेटे के बीच का गहरा भावनात्मक कोण दर्शकों को बार-बार 'केजीएफ' जैसी फिल्मों के दृश्यों की याद दिलाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वही पुरानी मसीहा वाली घिसी-पिटी कहानी एक नए कलेवर में दोहराई जा रही है।

## अनिरुद्ध का बैकग्राउंड स्कोर और लंबी अवधि की खामियां
इस बिखरी हुई और कमजोर पटकथा के लिए अनिरुद्ध रविचंदर का संगीत एक लाइफ-सपोर्ट सिस्टम की तरह काम करता है। उनका बैकग्राउंड स्कोर एक्शन दृश्यों में जबर्दस्त जान फूंक देता है। जब-जब पटकथा अपनी रफ्तार खोती है, अनिरुद्ध का संगीत उसमें भरपूर ऊर्जा भर देता है, और भावनात्मक दृश्यों में भी उनका संगीत गहरा प्रभाव छोड़ता है।

फिल्म की दूसरी बड़ी खामी इसका लगभग तीन घंटे का अत्यधिक लंबा रनिंग टाइम है। मध्यांतर के बाद दूसरा हाफ बुरी तरह खिंचता है और अपनी मूल दिशा से भटक जाता है। मां-बेटे का वह नाजुक रिश्ता, जिसे फिल्म की आत्मा होना चाहिए था, कई महत्वपूर्ण जगहों पर अचानक गायब हो जाता है और फिर बिना किसी ठोस आधार के दोबारा सामने आ जाता है। एक सशक्त खलनायक की अनुपस्थिति और बिना वजह का खूनी मंजर इस बड़े प्रयास को साधारण बना देता है।

## इसका आप पर असर
फिल्म प्रेमियों और एक्शन सिनेमा के प्रशंसकों के लिए यह फिल्म अपनी भव्यता के साथ-साथ कुछ चेतावनियां भी लेकर आती है।

- **सिनेमा प्रेमियों के लिए:** यदि आप नानी के गहन अभिनय और अनिरुद्ध रविचंदर के धमाकेदार बैकग्राउंड स्कोर के शौकीन हैं, तो यह फिल्म आपको कुछ बेहतरीन क्षण प्रदान करती है। हालांकि, कमजोर पटकथा और धीमी गति के कारण यह एक संपूर्ण संतोषजनक अनुभव नहीं बन पाती।
- **संवेदनशील दर्शकों के लिए:** फिल्म में गर्भवती महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर क्रूरता के बेहद ग्राफिक और वीभत्स दृश्य शामिल किए गए हैं। ऐसे दर्शक जो अत्यधिक खून-खराबे और हिंसक दृश्यों से विचलित होते हैं, उन्हें इस फिल्म से दूरी बनाए रखने की सलाह दी जाती है।
- **पारिवारिक दर्शकों के लिए:** नानी की पुरानी पारिवारिक फिल्मों की उम्मीद रखने वाले परिवारों के लिए यह फिल्म बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। कहानी का अंधकारमय माहौल और अस्वाभाविक हिंसा इसे केवल वयस्कों के देखने योग्य बनाती है।
- **फिल्म के समय प्रबंधन पर:** लगभग तीन घंटे की लंबी अवधि के कारण सिनेमाघर जाने से पहले समय का ध्यान रखना आवश्यक है। दूसरा हाफ काफी खिंचता है, इसलिए दर्शकों को धैर्य रखने की जरूरत होगी।

## ऐसा क्यों हुआ
फिल्म के निर्माण, विषय वस्तु और दर्शकों के मिश्रित रिस्पॉन्स के पीछे कई अहम रचनात्मक व रणनीतिक कारण मौजूद हैं।

- **नानी की इमेज का बदलाव:** नानी पिछले कुछ समय से अपनी पारंपरिक पारिवारिक छवि से निकलकर एक मास एक्शन स्टार के रूप में खुद को स्थापित करने के प्रयास में जुटे हैं। इसी रणनीति के तहत उन्होंने निर्देशक श्रीकांत ओडेला के साथ इस खूनी और संजीदा विषय को चुना।
- **अति-हिंसा पर निर्भरता:** निर्देशक ने कहानी की सामाजिक व्यथा को दर्शाने के लिए भावनात्मक गहराई के बजाय अत्यधिक ग्राफिक हिंसा का सहारा लिया। इसके परिणामस्वरूप दर्शक किरदारों के दर्द से जुड़ने के बजाय स्क्रीन पर दिखाए जा रहे वीभत्स दृश्यों से विचलित हो जाते हैं।
- **लचर खलनायक और पटकथा:** मोहन बाबू और राघव जुयाल के किरदारों का लचर लेखन नानी के शक्तिशाली नायक के सामने जरूरी संतुलन पैदा नहीं कर सका। साथ ही, लगभग तीन घंटे की अवधि में मां-बेटे के मुख्य भावनात्मक संबंध को लगातार बनाए रखने में पटकथा विफल रही।

## सवाल-जवाब

### 1. क्या 'द पैराडाइज' देखने लायक है?
यदि आप नानी की दमदार एक्टिंग और अनिरुद्ध के ऊर्जावान बैकग्राउंड म्यूजिक के प्रशंसक हैं तो इसे देखा जा सकता है, मगर कमजोर पटकथा और अत्यधिक हिंसा के कारण यह एक औसत फिल्म बनकर रह जाती है।

### 2. फिल्म 'द पैराडाइज' किस फिल्म से मिलती-जुलती लगती है?
यह फिल्म अपने डार्क विजुअल्स, बारिश, कीचड़ भरे माहौल, खदान/झुग्गी जैसी पृष्ठभूमि और मां-बेटे के भावनात्मक एंगल के कारण काफी हद तक 'KGF' जैसी फिल्मों की याद दिलाती है।

### 3. फिल्म 'द पैराडाइज' के निर्देशक कौन हैं?
इस फिल्म का निर्देशन श्रीकांत ओडेला ने किया है।

### 4. फिल्म में मुख्य विलेन की भूमिका किसने निभाई है?
फिल्म में मुख्य विलेन मलिक की भूमिका मोहन बाबू ने निभाई है, जबकि उनके सनकी बेटे विक्रम के किरदार में राघव जुयाल नजर आए हैं।

### 5. फिल्म 'द पैराडाइज' की कहानी किस पृष्ठभूमि पर आधारित है?
यह कहानी 1980 के दशक में सिकंदराबाद के एक काल्पनिक उपनगर 'पैराडाइज' में शोषित सावरी समुदाय के संघर्ष और बदले पर आधारित है।

### 6. फिल्म 'द पैराडाइज' की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका कमजोर स्क्रीनप्ले, लगभग तीन घंटे की जरूरत से ज्यादा लंबी अवधि और बिना वजह दिखाई गई अत्यधिक खूनी हिंसा है।

## रिव्यू
**फ़िल्म:** द पैराडाइज
**रेटिंग:** 2/5
**निर्देशक:** श्रीकांत ओडेला
**कलाकार:** नानी, सोनाली कुलकर्णी, मोहन बाबू, राघव जुयाल, कयादू लोहार और अन्य
**शैली:** एक्शन पीरियड थ्रिलर
**अवधि:** 173 मिनट
**रिलीज़:** 24 सितंबर 2026
**भाषा:** हिंदी


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