# द वन रिव्यू (2026): लोककथा और हॉरर के घालमेल में उलझी सिद्धार्थ मल्होत्रा की कहानी

> दीपक कुमार मिश्रा के निर्देशन में बनी 'द वन' छठ पूजा, रहस्यमयी जंगल और लोककथाओं को जोड़ती है, लेकिन कमजोर पटकथा और सपाट अभिनय के कारण यह प्रयोग बड़े पर्दे पर बिखर जाता है।

**Type:** article · **Category:** मूवी रिव्यू · **Published:** 2026-09-25 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/movie-review/the-vvaan-review-2026-lokakatha-aura-horara-ke-ghalamela-men-ulajhi-sidharth-malhotra-ki-kahani-38553 · **Language:** Hindi
**Tags:** द वन रिव्यू, सिद्धार्थ मल्होत्रा, तमन्ना भाटिया, सुनील ग्रोवर, दीपक कुमार मिश्रा, छठ पूजा फिल्म, बॉलीवुड मूवी रिव्यू, हॉरर कॉमेडी

हाल के समय में भारतीय सिनेमा के मुख्य प्रवाह में देसी लोककथाओं, अंचल विशेष की मान्यताओं और अलौकिक शक्तियों के इर्द-गिर्द कहानियां बुनने का चलन लगातार मजबूत हुआ है। इसी कड़ी में निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा और लेखक अरुणाभ कुमार एक ताजा सिनेमैटिक प्रयोग के साथ दर्शकों के सामने उपस्थित हुए हैं, जिसका नाम 'द वन' है। इस द वन रिव्यू (2026) के माध्यम से यह समझने का प्रयास करेंगे कि आस्था, क्षेत्रीय परिवेश और मिथकों का यह संगम पर्दे पर कितना प्रभावी साबित हुआ है। कागजी स्तर पर यह कहानी बेहद अनूठी नजर आती है, जहां बिहार का पारंपरिक ताना-बाना, छठ पर्व की गहरी श्रद्धा, पुराने राजघरानों के रहस्य और हॉरर-कॉमेडी का पुट एक साथ दिखाई देते हैं। हालांकि, जब इन तमाम तत्वों को एक पूर्ण फीचर फिल्म में पिरोने की बारी आती है, तो यह कई प्रयोगों के भारी बोझ तले दबती हुई महसूस होती है।

कथानक का मुख्य केंद्र मुंबई शहर में रहने वाला ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) है। ऋषि आधुनिक विचारों वाला, पढ़ा-लिखा और हर बात को व्यावहारिक दृष्टिकोण से तौलने वाला शहरी युवक है। वह पिछले छह सालों से अपने पैतृक गांव देवांचल के संपर्क से पूरी तरह दूर रहा है। अपनी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ उसकी पारिवारिक जिंदगी सामान्य गति से चल रही है, परंतु उनके दांपत्य जीवन में एक सूनापन भी है। दरअसल, छह वर्ष पूर्व ममता के दर्दनाक मिसकैरेज ने दोनों के दिलों पर गहरा जख्म छोड़ा था, जिससे वे अब तक पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं। कहानी एक महत्वपूर्ण मोड़ पर तब पहुंचती है जब लोकपर्व छठ का आगमन होता है। ममता की प्रबल मनोकामना और आस्था उन्हें देवांचल लौटने पर विवश कर देती है। वहीं दूसरी ओर, ऋषि के मन में इस यात्रा को लेकर कोई धार्मिक भाव नहीं है, बल्कि उसका एकमात्र इरादा गांव जाकर अपनी पुश्तैनी जमीन का सौदा करना और उसे बेचना है।

## देवांचल का रहस्य और देव वन का भय
देवांचल गांव की सीमा से सटा हुआ एक सघन, विशाल और डरावना जंगल फैला हुआ है, जिसे स्थानीय लोग 'देव वन' कहकर पुकारते हैं। इस वन को लेकर गांव वालों के बीच यह अटल धारणा बैठी हुई है कि सूर्यास्त के बाद वहां कदम रखना सीधे अपनी जान को जोखिम में डालना है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, स्वयं वन की अधिष्ठात्री देवी उस घने जंगल का संरक्षण करती हैं। ऐतिहासिक राजा विक्रमादित्य के वंशजों पर सदियों से इस दैवीय वन और उसकी परंपराओं की रक्षा की जिम्मेदारी चली आ रही है। तार्किक सोच का हिमायती ऋषि जब गांव पहुंचता है, तो वह इन पुरानी कथाओं और पाबंदियों को महज दकियानूसी सोच और अंधविश्वास मानकर सिरे से खारिज कर देता है।

तभी एक अप्रत्याशित घटनाक्रम जन्म लेता है। गांव का एक सांड शाम के अंधेरे में भटकते हुए प्रतिबंधित देव वन की सीमा के भीतर घुस जाता है। उसे जंगल से बाहर निकालने और बचाने के फेर में ऋषि बिना किसी हिचक या परिणाम की परवाह किए उस रहस्यमयी जंगल में प्रवेश कर जाता है। यहीं से कथानक में अलौकिक और सुपरनैचुरल घटनाओं का सिलसिला आरंभ होना चाहिए था। लेकिन अफसोस की बात यह है कि जिस मोड़ पर रहस्य की परतें खुलकर दर्शकों को रोमांच से भर देनी चाहिए थीं, वहां कहानी अनावश्यक जटिलताओं में उलझने लगती है। पटकथा में एक साथ कई सूत्र जोड़ने की कोशिश की जाती है, जिनमें राजा का छिपा हुआ गुप्त वंश, वन देवी की पौराणिक गाथा, एक जादुई सुरक्षा कवच, चमत्कारी पायल, अदृश्य बुरी शक्तियों का साया, ग्रामीणों के बीच चलने वाली आंतरिक राजनीति और पैतृक जमीन के मालिकाना हक का विवाद शामिल हैं। हर थोड़ी देर में कहानी में नया कोण जोड़ा जाता है, मगर कोई भी सिरा संतोषजनक मुकाम तक नहीं पहुंच पाता।

## अभिनय का स्तर और मुख्य कलाकारों की मौजूदगी
फिल्म में कलाकारों के प्रदर्शन का स्तर काफी असमान और असंतोषजनक रहा है। मुख्य भूमिका में ऋषि का किरदार निभा रहे सिद्धार्थ मल्होत्रा का काम फिल्म का सबसे कमजोर पहलू साबित होता है। इस पात्र का दायरा काफी बड़ा था, जिसे शुरू में एक अविश्वासी और वैज्ञानिक सोच रखने वाले शख्स के रूप में दिखाया गया है, जो धीरे-धीरे रहस्यमयी घटनाओं का साक्षी बनकर डर, संशय और अंततः विश्वास के दौर से गुजरता है। इस तरह के आंतरिक रूपांतरण को जीवंत करने के लिए चेहरे पर जिन सूक्ष्म भावों की आवश्यकता थी, वे सिद्धार्थ के अभिनय में नजर नहीं आते। उनका भाव-प्रदर्शन अधिकांश दृश्यों में पूरी तरह सपाट बना रहता है। उनकी संवाद अदायगी में भी ग्रामीण माहौल और स्थानीय भाषा के अनुरूप अपनापन महसूस नहीं होता। संवादों को भीतर से आत्मसात करने के बजाय वे उन्हें रटे हुए वाक्यों की तरह बोलते दिखते हैं, जिससे वे गांव की माटी से जुड़े व्यक्ति की जगह कुछ समय के लिए शूटिंग करने पहुंचे किसी शहरी मॉडल जैसे दिखाई पड़ते हैं।

ममता की भूमिका में तमन्ना भाटिया का स्क्रीन प्रजेंस बेहद आकर्षक और गरिमामय है। पारंपरिक परिधानों में सजी तमन्ना विशेष रूप से छठ पूजा के पावन दृश्यों में आंखों को सुकून पहुंचाती हैं। किंतु पटकथा में उनके किरदार को केवल नायक की सहायक पत्नी के सांचे में बांधकर रखा गया है, जिसके चलते उन्हें अपनी अभिनय क्षमता को खुलकर दर्शाने का कोई वास्तविक अवसर नहीं मिल पाता। वहीं दूसरी ओर, मुख्य खलनायक दीपक की भूमिका में सुनील ग्रोवर नजर आते हैं। हास्य विधा के मंझे हुए कलाकार सुनील ग्रोवर ने एक क्रूर और गंभीर प्रतिपक्षी के तौर पर पूरी ईमानदारी से काम किया है और कई दृश्यों में उनका खौफ भी दिखता है। इसके बावजूद, दर्शकों के मानस पटल पर उनकी स्थापित कॉमिक छवि इतनी गहरी है कि उन्हें हाथ में धारदार हथियार थामे बेरहमी से मारकाट और हिंसा करते देखना सहज नहीं लगता।

## हास्य के प्रयास और निर्देशन की सीमाएं
फिल्म में वीपी नामक किरदार में मनीष पॉल ने अपनी जानी-पहचानी शैली में वन-लाइनर्स के सहारे दर्शकों को गुदगुदाने की चेष्टा की है। लेकिन मनीष पॉल और सुलभा आर्या से जुड़े हास्य प्रसंग इतने बचकाने और बेतुके ढंग से जबरन ठूंसे गए हैं कि वे मनोरंजन करने के बजाय सिरदर्द का सबब बन जाते हैं। कुछ दृश्यों का स्तर तो इतना फूहड़ हो जाता है कि सिनेमाघर में बैठे दर्शकों को असहजता महसूस होने लगती है।

जमीनी और सजीव वेब सीरीज का सफल निर्देशन कर चुके दीपक कुमार मिश्रा से सिनेमा प्रेमियों को भारी अपेक्षाएं थीं। उनके निर्देशन की बात की जाए, तो वे कुछ चुनिंदा हिस्सों में अपनी छाप अवश्य छोड़ते हैं, जैसे जंगल के भीतर एक रहस्यमयी और डरावना वातावरण तैयार करना अथवा अपने परिचित अंदाज वाले हल्के-फुल्के संवाद शामिल करना। युवाओं के रुझान को ध्यान में रखते हुए कुछ लोकप्रिय संदर्भ भी डाले गए हैं। सूर्यास्त के बाद आंखों पर पट्टी बांधकर देव वन में प्रवेश करने की विचित्र रस्म और अंधेरी ताकतों की अवधारणा रोचक है, परंतु जब इन बिखरे हुए तत्वों को जोड़कर एक ठोस सिनेमाई रूप देने की बात आती है, तो निर्देशन का सिरा कमजोर पड़ जाता है।

## तार्किकता की कमी और जल्दबाजी में निपटाया गया अंत
पटकथा में बुनियादी तार्किकता का भारी अभाव साफ झलकता है। उदाहरण के लिए, पूरे देवांचल गांव को इस बात की जानकारी है कि राजा विक्रमादित्य का एक गुप्त वारिस इसी गांव में कहीं रहता है, लेकिन हैरत की बात यह है कि किसी को उसकी सही पहचान का पता नहीं होता। फिल्म इस पहेली का कोई तार्किक आधार या स्पष्टीकरण पेश नहीं कर पाती। इसके अतिरिक्त, कहानी का एक बड़ा हिस्सा चमत्कारी शक्तियों से युक्त एक दिव्य पायल की तलाश पर केंद्रित है। सामान्य समझ कहती है कि इतनी बहुमूल्य और दैवीय वस्तु किसी बेहद गुप्त, दुर्गम या सुरक्षित स्थान पर छिपाई गई होगी, परंतु फिल्म में यह पवित्र पायल एक साधारण जगह पर इतनी आसानी से बरामद हो जाती है कि उसके पीछे रची गई खोज और संघर्ष की पूरी पृष्ठभूमि निरर्थक लगने लगती है।

फिल्म का अंतिम आधा घंटा यानी इसका क्लाइमैक्स भी घोर निराशा पैदा करता है। इसे बेहद जल्दबाजी में निपटाया गया प्रतीत होता है, जिससे न तो वांछित रोमांच उभर पाता है और न ही कहानी के फैले हुए धागे कायदे से सिमट पाते हैं। लोककथा और आधुनिक सोच के इस टकराव को यदि एक कसी हुई पटकथा और संवेदनशील अभिनय का सहारा मिलता, तो परिणाम कहीं बेहतर हो सकता था।

## इसका आप पर असर
फिल्म 'द वन' देखने की योजना बना रहे सिनेप्रेमियों और टिकट खरीदारों के लिए यह समीक्षा समय और पैसे के सही फैसले में मददगार होगी।

- **दर्शकों के लिए:** यदि आप एक मनोरंजक और रहस्यमयी लोककथा आधारित थ्रिलर की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म अपनी कमजोर पटकथा से निराश कर सकती है। इसलिए सिनेमाघर में टिकट बुक करने से पहले अपनी अपेक्षाएं सीमित रखना बेहतर होगा।
- **कलाकारों के प्रशंसकों के लिए:** सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया के फैंस को यहां सीमित अभिनय देखने को मिलेगा। यदि आप दमदार डायलॉग और गहन ड्रामा देखना चाहते हैं, तो इसके ओटीटी रिलीज का इंतजार कर सकते हैं।
- **पारिवारिक दर्शकों के लिए:** छठ पूजा की भक्ति भावना के बीच कुछ दृश्य और कॉमेडी ट्रैक काफी फूहड़ स्तर के हैं। सपरिवार थिएटर जाने वाले दर्शकों को असहज स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
- **लोककथा प्रेमियों के लिए:** बिहार की पारंपरिक लोक मान्यताओं का विचार दिलचस्प है, परंतु तार्किकता की कमी इसे अधूरा बनाती है। मिथकों पर आधारित मजबूत सिनेमा देखने वालों के लिए यह एक सतही प्रयास साबित होगा।

## ऐसा क्यों हुआ
फिल्म 'द वन' के पर्दे पर कमजोर साबित होने के पीछे कई रचनात्मक और तकनीकी कारण रहे हैं, जिन्होंने एक अच्छे विचार को बिखरने पर मजबूर कर दिया।

- **अति-महत्वाकांक्षी पटकथा:** कहानी में एक साथ राजा विक्रमादित्य के वंश, वन देवी की पौराणिक कथा, जादुई पायल और अंधविश्वास जैसे तमाम कोणों को शामिल कर लिया गया। अत्यधिक उप-कहानियों के चलते मुख्य रहस्य किसी भी स्तर पर गहराई से स्थापित नहीं हो सका।
- **अभिनय में गहराई का अभाव:** मुख्य नायक के रूप में सिद्धार्थ मल्होत्रा शहरी तर्कवादी से अलौकिक शक्तियों के विश्वासी बनने का भावनात्मक सफर दिखाने में विफल रहे। उनके सपाट भावों और बेअसर संवाद अदायगी ने कहानी के भावनात्मक जुड़ाव को नुकसान पहुंचाया।
- **तार्किकता की अनदेखी:** गुप्त वंशज की अनसुलझी पहचान और जादुई सुरक्षा पायल का बेहद साधारण स्थान पर आसानी से मिल जाना कहानी की विश्वसनीयता को खत्म करता है। इन बुनियादी खामियों ने रहस्य और संघर्ष के महत्व को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
- **हास्य और विलेन की छवि में असंतुलन:** सुनील ग्रोवर की स्थापित कॉमिक पहचान उनके क्रूर विलेन के किरदार से तालमेल नहीं बिठा सकी। वहीं मनीष पॉल के बचकाने वन-लाइनर्स ने हॉरर और मिस्ट्री के गंभीर माहौल को लगातार बाधित किया।

## सवाल-जवाब

### 1. क्या 'द वन' फिल्म देखने लायक है?
यदि आप एक कसी हुई पटकथा और रोमांचक हॉरर-मिस्ट्री की तलाश में हैं, तो यह फिल्म निराश कर सकती है। कमजोर अभिनय और बेतुकी कॉमेडी के कारण सिनेमाघर जाने के बजाय इसके ओटीटी रिलीज का इंतजार करना ज्यादा व्यावहारिक होगा।

### 2. फिल्म 'द वन' की मुख्य कहानी किस विषय पर आधारित है?
यह फिल्म देवांचल गांव, छठ पूजा की आस्था और रहस्यमयी 'देव वन' से जुड़ी लोककथाओं के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां शहरी सोच वाला ऋषि अलौकिक परिस्थितियों में उलझ जाता है।

### 3. फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया का अभिनय कैसा है?
सिद्धार्थ मल्होत्रा का प्रदर्शन काफी सपाट और भावहीन रहा है, जिसमें ग्रामीण माहौल का जुड़ाव नहीं दिखता। तमन्ना भाटिया स्क्रीन पर खूबसूरत लगी हैं, परंतु पटकथा में उनके किरदार को काफी सीमित रखा गया है।

### 4. 'द वन' में विलेन की भूमिका किसने निभाई है?
फिल्म में हास्य अभिनेता सुनील ग्रोवर ने मुख्य विलेन दीपक का किरदार निभाया है, जिसमें वे क्रूर नजर आए हैं लेकिन उनकी कॉमिक छवि के कारण यह पूरी तरह सहज नहीं लगता।

### 5. 'द वन' जैसी कौन सी अन्य फिल्में लोककथाओं और रहस्य पर आधारित हैं?
'स्त्री', 'मुंज्या' और 'कांतारा' जैसी फिल्में भारतीय लोककथाओं और सुपरनैचुरल तत्वों को बेहद मजबूती और संतुलन के साथ पेश करने के लिए जानी जाती हैं।

## रिव्यू
**फ़िल्म:** द वन
**रेटिंग:** 2/5
**निर्देशक:** दीपक कुमार मिश्रा
**कलाकार:** सिद्धार्थ मल्होत्रा, तमन्ना भाटिया, सुनील ग्रोवर, मनीष पॉल, सुलभा आर्या, आनंदेश्वर द्विवेदी और अन्य
**शैली:** फैंटेसी माइथोलॉजी थ्रिलर
**अवधि:** 136 मिनट
**रिलीज़:** 25 सितंबर 2026
**भाषा:** हिंदी


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