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  "title": "वाइब रिव्यू (2026): कुणाल खेमू और स्पर्श श्रीवास्तव की मजेदार केमिस्ट्री के बावजूद कमजोर स्क्रीनप्ले से बिखरी फिल्म",
  "summary": "कुणाल खेमू के निर्देशन में बनी फिल्म 'वाइब' पहले हिस्से में हंसी और रोमांच का बढ़िया माहौल बनाती है, लेकिन मध्यांतर के बाद लड़खड़ाती कहानी और लचर स्क्रीनप्ले के चलते प्रभाव खो देती है।",
  "content": "कुणाल खेमू के निर्देशन में तैयार हुई फिल्म 'वाइब' का यह विस्तृत 'वाइब रिव्यू' उन सभी पहलुओं की पड़ताल करता है जो इसे पहले हिस्से में मनोरंजक और दूसरे हिस्से में कमजोर बनाते हैं। बतौर निर्देशक अपनी दूसरी सिनेमाई प्रस्तुति में कुणाल खेमू ने एक्शन, सस्पेंस, याराना, देशभक्ति और परिस्थितिजन्य हास्य का एक अनूठा संगम रचने का प्रयास किया है। कुणाल खेमू, स्पर्श श्रीवास्तव और प्रीति जिंटा जैसे कलाकारों से सजी इस कहानी की शुरुआत बेहद तेज गति और चुटीले संवादों के साथ दर्शकों को कुर्सी से बांधे रखती है। हालांकि, मध्यांतर के बाद उलझाव भरी पटकथा और बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले शुरुआती उत्साह को ठंडा कर देता है, जिससे यह रचना कुल मिलाकर एक औसत दर्जे की थ्रिलर कॉमेडी बनकर सिमट जाती है।\n\nकहानी का ताना बाना और आतंकवाद का संकट\nपूरी पटकथा हार्दिक के चरित्र के इर्द गिर्द घूमती है, जिसकी भूमिका खुद कुणाल खेमू ने निभाई है। हार्दिक नशामुक्ति केंद्र से बाहर निकलने के बाद अपने जीवन को एक नई और सकारात्मक दिशा देने के लिए संघर्ष कर रहा होता है। उसके इस सफर में उसका सबसे पक्का दोस्त भागीरथ उर्फ बग्स, जिसे स्पर्श श्रीवास्तव ने जीवंत किया है, कंधे से कंधा मिलाकर साथ देता है। बग्स के सहयोग से हार्दिक को एक आईटी फर्म में नौकरी हासिल होती है, जिससे दोनों को लगता है कि जिंदगी अब पटरी पर आ जाएगी। तभी अचानक एक बड़ा मोड़ आता है जब पूरे मुल्क पर एक बड़े आतंकवादी हमले का साया मंडराने लगता है।\n\nअनजाने में ही सही, हार्दिक और बग्स दोनों सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इस गहरे संकट के बीचों बीच फंस जाते हैं। इसी महत्वपूर्ण मोड़ पर कहानी में मैडम एच का प्रवेश होता है, जिनका किरदार प्रीति जिंटा ने निभाया है। मैडम एच के नेतृत्व में यह दोनों साधारण युवा एक बेहद गोपनीय और जानलेवा सुरक्षा मिशन का हिस्सा बन जाते हैं। इंटरवल तक कथा बेहद दिलचस्प, चुस्त और मनोरंजक अंदाज में आगे बढ़ती है। दोनों दोस्तों के बीच की तीखी नोकझोंक, सिचुएशनल कॉमेडी और हल्के फुल्के रोमांचक तत्व सिनेमाघर में बैठे दर्शकों का पूरा ध्यान स्क्रीन पर बनाए रखते हैं। अफसोस की बात यह है कि मध्यांतर के बाद की कहानी उस निरंतर रफ्तार और ऊर्जावान वाइब को संभाल कर रखने में पूरी तरह विफल साबित होती है।\n\nअभिनय का स्तर और कलाकारों की जुगलबंदी\nअभिनय के मोर्चे पर कुणाल खेमू ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे हिंदी सिनेमा के सबसे अनदेखे मगर सबसे भरोसेमंद कलाकारों में से एक हैं। चाहे वह हास्य का सटीक टाइमिंग हो, भावुक क्षण हों या फिर एक्शन के तेज दृश्य, कुणाल ने अपने किरदार में शत प्रतिशत समर्पण दिखाया है। इस प्रोजेक्ट की सबसे खास बात यह रही कि निर्देशक और मुख्य नायक की दोहरी जिम्मेदारी संभालने के बावजूद कुणाल ने अपने साथी कलाकारों को उभरने की पूरी आजादी दी। 'मिसिंग लेडीज' से पहचान बनाने वाले स्पर्श श्रीवास्तव ने बग्स के रूप में असाधारण काम किया है। कुणाल और स्पर्श के बीच की ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री और आपसी तालमेल पूरी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आता है।\n\nडेब्यूटेंट वंशिका धीर, जिन्होंने करीना का किरदार अदा किया है, अपने पहले ही प्रयास में भरपूर आत्मविश्वास के साथ पेश आई हैं और एक होनहार चेहरे के रूप में उभरती हैं। दूसरी ओर, लंबे अंतराल के बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर रही प्रीति जिंटा मैडम एच की भूमिका में दर्शकों को निराश करती हैं। कुछ दृश्यों में उनका अभिनय बहुत ज्यादा लाउड और अस्वाभाविक महसूस होता है, जो फिल्म के मिजाज से मेल नहीं खाता। भोजपुरी सिनेमा के जाने माने सितारे दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' और अनुभवी चरित्र अभिनेता यशपाल शर्मा ने अपनी संक्षिप्त भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है। इसके अलावा पटकथा में कुछ मनोरंजक सरप्राइज कैमियो भी शामिल किए गए हैं जो बीच बीच में ताजगी लाते हैं।\n\nनिर्देशन और कमजोर लेखन का गणित\nएक निर्देशक के रूप में कुणाल खेमू भारतीय कमर्शियल सिनेमा के दर्शकों की नब्ज अच्छी तरह पहचानते हैं। उन्होंने मनोरंजन के लिहाज से एक्शन, देशभक्ति की भावना, ड्रामा और ठहाकों का मसाला झोंकने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। इसके बावजूद निर्देशन की सबसे कमजोर कड़ी फिल्म का लेखन साबित होती है। पहले हाफ में जहां हंसी और रोमांच का संतुलित मिश्रण देखने को मिलता है, वहीं सेकंड हाफ शुरू होते ही हास्य पूरी तरह गायब हो जाता है। घटनाओं को बेवजह खींचा गया है और क्लाइमैक्स तक पहुंचते पहुंचते इतनी सारी बातें एक साथ घटित होने लगती हैं कि फिल्म एक अनसुलझा रायता बन जाती है, जिससे दर्शक मुख्य विषय से भटक जाते हैं।\n\nतकनीकी पक्ष: सिनेमैटोग्राफी और संगीत\nतकनीकी पहलू की बात करें तो सिनेमैटोग्राफी एक ठेठ मनोरंजक बॉलीवुड फिल्म की आत्मा से भलीभांति मेल खाती है। एक्शन के दृश्यों को काफी बड़े पैमाने पर और गतिशीलता के साथ कैमरे में कैद किया गया है। आईटी दफ्तर की बनावट से लेकर गुप्त मिशन के हाई ऑक्टेन दृश्यों तक, कैमरावर्क साफ सुथरा और आकर्षक नजर आता है। रोशनी और रंगों का चयन फिल्म के चुलबुले और जीवंत टोन को मजबूती प्रदान करता है। विजुअल अपील के मामले में यह प्रस्तुति दर्शकों को निराश नहीं करती।\n\nफिल्म का संगीत सामान्य स्तर का है और लंबे समय तक याद रखने लायक नहीं बन पाता। हालांकि शीर्षक गीत 'वाइब' काफी सुरीला और आकर्षक है, जो सिनेमाघर से बाहर आने के बाद भी जेहन में गूंजता रहता है। यह गीत युवा ऊर्जा और कहानी के मूड को सही ढंग से अभिव्यक्त करता है। एक्शन और कॉमेडी दृश्यों में बैकग्राउंड स्कोर कुछ जान फूंकने का काम जरूर करता है, लेकिन गानों के संपूर्ण एल्बम के लिहाज से यह फिल्म और बेहतर संगीत की हकदार थी।\n\nबड़ी खामियां और अंतिम फैसला\nकुछ प्रमुख कमियां इस रचना को एक बेहतरीन थ्रिलर कॉमेडी की श्रेणी में पहुंचने से रोकती हैं\n\n• धीमा दूसरा हाफ: मध्यांतर के बाद फिल्म अपनी दिशा से भटक जाती है और स्क्रीनप्ले काफी सुस्त व ढीला पड़ जाता है।\n• हास्य का अभाव: दूसरे हिस्से में कहानी इतनी गंभीर और पेचीदा हो जाती है कि शुरुआती दौर की सहज हंसी पूरी तरह गायब हो जाती है।\n• लाउड किरदार: प्रीति जिंटा का किरदार सतही लिखा गया है और उनकी अदायगी काफी अस्वाभाविक लगती है।\n• असंतुलित क्लाइमैक्स: अंतिम पलों में देशभक्ति, रोमांच और बदले जैसे ढेर सारे तत्वों को जबरन एक साथ ठूंसने की कोशिश की गई है, जिससे अंत का असर फीका हो जाता है।\n\n'वाइब' टुकड़ों टुकड़ों में मनोरंजन परोसने वाली फिल्म है। यदि आप इसे देखने जाते हैं, तो पहला हिस्सा और कुणाल स्पर्श की जुगलबंदी निश्चित ही आपके चेहरे पर मुस्कान बिखेरेगी। मगर ढीला दूसरा हाफ और असंतुलित लेखन अनुभव को कमजोर कर देता है। इस फिल्म को न देखने पर भी कोई बहुत बड़ी सिनेमाई कृति छूटने का मलाल नहीं रहेगा। इस फिल्म को 5 में से 2 स्टार दिए जाते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nफिल्म 'वाइब' की इस समीक्षा से दर्शकों को टिकट खरीदने से पहले अपने समय और बजट का सही फैसला लेने में सीधी मदद मिलती है।\n\n• सिनेमा प्रेमियों के लिए: यदि आप कुणाल खेमू और स्पर्श श्रीवास्तव की कॉमिक टाइमिंग के शौकीन हैं तो केवल पहला हाफ आपको गुदगुदा सकता है। इसके बावजूद टिकट और पॉपकॉर्न पर पूरा खर्च करने से पहले ध्यान रखें कि दूसरा हिस्सा काफी निराश करता है।\n• ओटीटी दर्शकों के लिए: थिएटर जाने की जल्दबाजी के बजाय इस फिल्म के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आने की प्रतीक्षा करना ज्यादा किफायती सौदा रहेगा। घर पर बैठकर इसे देखने पर आप सुस्त दृश्यों को आसानी से आगे बढ़ा सकेंगे।\n• प्रीति जिंटा के प्रशंसकों के लिए: लंबे समय बाद अभिनेत्री की वापसी देखने जा रहे दर्शकों को अपनी उम्मीदें सीमित रखनी होंगी। कहानी में उनकी भूमिका कमजोर लिखी गई है जिससे उनके प्रशंसकों को निराशा हाथ लग सकती है।\n• वीकेंड मनोरंजन प्लान: परिवार या दोस्तों के साथ वीकेंड पर किसी मनोरंजक फिल्म का विचार बना रहे लोग पहले हाफ की हल्की फुल्की कॉमेडी का आनंद ले सकते हैं। हालांकि एक संपूर्ण और संतुष्टिदायक सिनेमाई अनुभव की आस लेकर न जाएं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह फिल्म पहले हिस्से में शानदार संभावना दिखाने के बाद भी एक यादगार थ्रिलर कॉमेडी में तब्दील होने से चूक गई, जिसके पीछे लेखन और टोन की भारी गड़बड़ी रही।\n\n• असंतुलित पटकथा लेखन: फिल्म की सबसे बड़ी खामी इसका कमजोर और खिंचा हुआ स्क्रीनप्ले रहा। पहले हिस्से में हंसी का जो सहज प्रवाह स्थापित हुआ था, वह मध्यांतर के तुरंत बाद खत्म हो गया क्योंकि कहानी अचानक अत्यधिक गंभीर और उलझी हुई दिशा में मुड़ गई।\n• अति महत्वाकांक्षी जॉनर मिश्रण: निर्देशन के स्तर पर एक ही कहानी के भीतर हास्य, आतंकवाद, देशभक्ति, एक्शन और बदले की भावना को एक साथ भरने की कोशिश की गई। इतने सारे अलग अलग मूड को एक साथ साधने के चक्कर में पटकथा अपना मूल आकर्षण और संतुलन खो बैठी।\n• कमजोर चरित्र निर्माण: मैडम एच के मुख्य किरदार को गहराई देने के बजाय बहुत सतही और लाउड रखा गया। इससे प्रीति जिंटा जैसी अनुभवी कलाकार का अभिनय भी अस्वाभाविक और बनावटी बनकर रह गया, जिससे दृश्यों का असर कम हुआ।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. क्या 'वाइब' फिल्म देखने लायक है?\nयदि आप कुणाल खेमू और स्पर्श श्रीवास्तव की केमिस्ट्री के दीवाने हैं तो पहले हाफ के लिए इसे देखा जा सकता है, हालांकि कमजोर दूसरे हाफ के कारण यह कोई मास्टरपीस नहीं है।\n\n2. फिल्म 'वाइब' के निर्देशक कौन हैं?\nइस फिल्म का निर्देशन अभिनेता कुणाल खेमू ने किया है, और बतौर डायरेक्टर यह उनकी दूसरी फीचर फिल्म है।\n\n3. फिल्म 'वाइब' में मुख्य भूमिकाएं किन कलाकारों ने निभाई हैं?\nफिल्म में मुख्य भूमिकाएं कुणाल खेमू, स्पर्श श्रीवास्तव, प्रीति जिंटा, वंशिका धीर, दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' और यशपाल शर्मा ने निभाई हैं।\n\n4. फिल्म में प्रीति जिंटा का प्रदर्शन कैसा रहा?\nलंबे समय बाद वापसी कर रहीं प्रीति जिंटा मैडम एच के किरदार में निराश करती हैं और उनका अभिनय कुछ दृश्यों में काफी लाउड और बनावटी नजर आता है।\n\n5. समीक्षा के अनुसार फिल्म 'वाइब' को कितनी स्टार रेटिंग मिली है?\nफिल्म की समीक्षा में इसके टुकड़ों में मनोरंजन और कमजोर स्क्रीनप्ले को देखते हुए इसे 5 में से 2 स्टार दिए गए हैं।\n\n6. 'वाइब' जैसी कौन सी फिल्में देखी जा सकती हैं?\nकॉमेडी और अनपेक्षित थ्रिलर के मेल के लिए दर्शक कुणाल खेमू की पिछली कॉमेडी फिल्मों या स्पर्श श्रीवास्तव की 'मिसिंग लेडीज' देख सकते हैं।\n\nरिव्यू\nफ़िल्म: वाइब\nरेटिंग: 2/5\nनिर्देशक: कुणाल खेमू\nकलाकार: कुणाल खेमू, प्रीटी जिंटा, स्पर्श श्रीवास्तव, वंशिका धीर, यशपाल शर्मा, दिनेश लाल यादव न‍िरहुआ और अन्य\nशैली: कॉमेडी थ्रिलर\nअवधि: 145 मिनट\nरिलीज़: 18 सितंबर 2026\nभाषा: हिंदी",
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  "category": "मूवी रिव्यू",
  "publishedAt": "2026-09-24",
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