# मेघालय और नागालैंड के गांवों में लौटी बाजरे की खेती, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की सराहना

> प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में मेघालय और नागालैंड के गांवों में बाजरे की खेती की पुनरुत्थान गाथा साझा करते हुए कहा कि आधुनिक तरीकों और मूल्यवर्धन से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है।

**Type:** article · **Category:** नागालैंड · **Published:** 2026-10-29 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/nagaland/meghalaya-aur-nagaland-ke-gaon-mein-loti-bajre-ki-kheti-pm-modi-52765 · **Language:** Hindi
**Tags:** बाजरे की खेती, नरेंद्र मोदी, मन की बात, मेघालय, नागालैंड, श्री अन्न, कृषि विकास

पूर्वोत्तर के कई इलाकों में पारंपरिक बाजरे की खेती एक बार फिर रफ्तार पकड़ रही है। स्थानीय किसान और ग्रामीण आजीविका के नए अवसर पैदा करने के लिए आधुनिक कृषि पद्धतियों के साथ-साथ नए उत्पादों पर जोर दे रहे हैं। अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' की 139वीं कड़ी के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात का जिक्र किया।

 

## मेघालय के गांवों में नए उत्पादों की शुरुआत

मेघालय के पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले में, प्रधानमंत्री ने खंडुली गांव की दो महिलाओं के प्रयासों की विशेष सराहना की जिन्होंने बाजरे से मूल्य वर्धित उत्पाद तैयार किए हैं। उनकी इस पहल के कारण बाजरे का उपयोग केवल पारंपरिक भोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे कुकीज़, केक, मफिन और बेबी फूड जैसे उत्पाद भी बनने लगे हैं। इन उत्पादों के बाजार में आने से बिक्री में इजाफा हुआ और बाजरे की मांग में तेजी आई, जिससे किसानों को एक बार फिर से इस फसल की खेती करने का प्रोत्साहन मिला।

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 प्रधानमंत्री ने बताया कि स्थानीय खान-पान की संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान होने के बावजूद इस गांव में बाजरे की खेती कम हो गई थी। इसके अलावा, उन्होंने पश्चिम गारो हिल्स के सदोलपारा गांव के एक किसान चेक्जिग संगमा का उदाहरण भी दिया, जिन्होंने बाजरे की खेती के लिए आधुनिक तरीकों को अपनाया है। इस कदम से उनकी आमदनी में सुधार हुआ है और स्थानीय लोगों के बीच इस फसल के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है।

 

## नागालैंड में एक दशक बाद वापसी

दूसरी ओर, नागालैंड के कोहिमा जिले में स्थित केजोमा गांव के लोगों ने एक बार फिर बाजरे की खेती को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है। यहां एक दशक से अधिक समय से इस फसल की खेती बंद पड़ी थी। प्रधानमंत्री ने जानकारी दी कि इस गांव में साल 2024 में खेती की दोबारा शुरुआत हुई और इसके बाद साल 2025 में गांव का पहला बाजरा महोत्सव आयोजित किया गया। तब से लेकर अब तक इस क्षेत्र में बाजरे से बने उत्पादों की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।

 

## वैश्विक स्तर पर श्री अन्न का प्रसार

प्रधानमंत्री ने इन सभी विकास कार्यों को भारत की उस वैश्विक पहल से जोड़ा जिसके तहत बाजरे को 'श्री अन्न' के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि भारत के प्रयासों से साल 2023 को अंतर्राष्ट्रीय बाजरा वर्ष के रूप में मनाया गया था, जिसे दुनिया भर से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। इससे इस प्राचीन अनाज के सांस्कृतिक और पोषण संबंधी महत्व के बारे में लोगों की समझ और जागरूकता फिर से मजबूत हुई है।

 प्रधानमंत्री का मानना है कि मेघालय और नागालैंड के इन अनुभवों से यह साफ हो जाता है कि किस तरह युवा पीढ़ी पारंपरिक कृषि ज्ञान और उद्यमिता को आपस में जोड़कर स्थानीय विरासत को सुरक्षित रखते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दे सकती है।

## इसका आप पर असर
इस खबर का पूर्वोत्तर के किसानों और ग्रामीण उद्यमियों के दैनिक जीवन पर सीधा और सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

- **ग्रामीण आय:** बाजरे से बनने वाले मूल्य वर्धित उत्पादों की मांग बढ़ने से किसानों और स्थानीय उद्यमियों की आमदनी में इजाफा होगा।
- **मेघालय में:** खंडुली और सदोलपारा जैसे गांवों के किसानों को कुकीज़ और बेबी फूड जैसे नए उत्पादों के जरिए बेहतर बाजार मिलेगा।
- **नागालैंड में:** केजोमा गांव के किसानों को बाजरे की खेती दोबारा शुरू होने और बाजरा महोत्सव के आयोजन से नए व्यावसायिक अवसर मिलेंगे।
- **पारंपरिक फसलें:** लोगों में पोषण संबंधी जागरूकता बढ़ने से पारंपरिक श्री अन्न की खेती को दीर्घावधि सुरक्षा मिलेगी।
- **युवा भागीदारी:** पूर्वोत्तर के युवाओं को आधुनिक कृषि तकनीकों और स्टार्टअप के जरिए कृषि क्षेत्र से जुड़ने की प्रेरणा मिलेगी।

## ऐसा क्यों हुआ
पारंपरिक बाजरे की खेती के पुनरुत्थान के पीछे स्थानीय समुदायों के सामूहिक प्रयास और सरकारी स्तर पर श्री अन्न को दिए जा रहे वैश्विक प्रोत्साहन मुख्य कारण हैं।

- **मूल्यवर्धन की पहल:** किसानों और महिला उद्यमियों द्वारा बाजरे से कुकीज़ और बेबी फूड जैसे उत्पाद तैयार करने से इसकी मांग में भारी तेजी आई।
- **सरकारी प्रोत्साहन:** अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष 2023 और मन की बात जैसे मंचों के जरिए बाजरे के पोषण संबंधी फायदों को बड़े पैमाने पर प्रचारित किया गया।
- **आधुनिक तकनीक अपनाना:** सदोलपारा और केजोमा जैसे गांवों में किसानों द्वारा आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने से बंद पड़ी खेती दोबारा शुरू हो सकी।

## सवाल-जवाब

### 1. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किस कार्यक्रम में पूर्वोत्तर में बाजरे की खेती का जिक्र किया?
प्रधानमंत्री ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम मन की बात की 139वीं कड़ी में इसका जिक्र किया।

### 2. मेघालय के किस जिले में महिलाओं ने बाजरे से उत्पाद बनाए हैं?
मेघालय के पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले के खंडुली गांव की महिलाओं ने बाजरे से मूल्य वर्धित उत्पाद तैयार किए हैं।

### 3. खंडुली गांव की महिलाओं ने बाजरे से कौन-से नए उत्पाद बनाए हैं?
उन्होंने बाजरे से कुकीज़, केक, मफिन और बेबी फूड जैसे उत्पाद तैयार किए हैं।

### 4. चेक्जिग संगमा कौन हैं और उन्होंने क्या किया है?
वह पश्चिम गारो हिल्स के सदोलपारा गांव के एक किसान हैं जिन्होंने बाजरे की खेती के लिए आधुनिक तरीकों को अपनाया है।

### 5. नागालैंड के किस गांव में एक दशक बाद बाजरे की खेती फिर से शुरू हुई?
नागालैंड के कोहिमा जिले के केजोमा गांव में एक दशक से अधिक समय के बाद बाजरे की खेती दोबारा शुरू की गई है।

### 6. केजोमा गांव में पहला बाजरा महोत्सव किस वर्ष आयोजित किया गया था?
केजोमा गांव में साल 2025 में पहला बाजरा महोत्सव आयोजित किया गया था।

### 7. भारत की किस पहल के तहत बाजरे को वैश्विक पहचान मिल रही है?
भारत की पहल पर साल 2023 को अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष के रूप में मनाया गया था, जिसके तहत बाजरे को श्री अन्न के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है।

## प्रेरणा और सबक
मेघालय और नागालैंड के किसानों की यह सफलता पारंपरिक विरासत को आधुनिकता से जोड़ने का एक बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करती है।

- **मूल्यवर्धन अपनाएं:** पारंपरिक फसलों को केवल कच्चा बेचने के बजाय उनसे जुड़े बेकरी उत्पाद और खाद्य सामग्रियां तैयार कर मुनाफा बढ़ाएं।
- **स्थानीय संसाधनों का उपयोग:** अपनी पुरानी कृषि परंपराओं और स्थानीय जलवायु का उपयोग कर टिकाऊ आजीविका के रास्ते तैयार करें।
- **सामुदायिक पहल:** केजोमा गांव की तरह मिलकर प्रयास करें ताकि बरसों से बंद पड़ी पारंपरिक और पौष्टिक फसलों की खेती को दोबारा जीवित किया जा सके।
- **युवा उद्यमिता:** युवा वर्ग आधुनिक तकनीकों को पारंपरिक ज्ञान के साथ मिलाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।

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