15 अगस्त से ठीक 8 दिन पहले की 3 घटनाएं: नए तिरंगे पर महात्मा गांधी की नाराजगी और मॉस्को में फहराया गया भारत का राष्ट्रध्वज 7 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता से आठ दिन पहले राष्ट्रध्वज में चरखे की जगह अशोक चक्र को शामिल करने पर महात्मा गांधी की गंभीर आपत्ति सामने आई थी, जबकि उसी दिन मॉस्को में नए तिरंगे को आधिकारिक तौर पर फहराया गया था। भारत को ब्रिटिश हुकूमत से आजादी मिलने में महज आठ दिन का समय बाकी था, लेकिन देश के माहौल में जश्न से ज्यादा अनहोनी का खौफ छाया हुआ था। 7 अगस्त 1947 का दिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज है, जब एक तरफ देश विभाजन और सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था, तो दूसरी तरफ राष्ट्रध्वज के स्वरूप को लेकर देश के भीतर और बाहर भारी हलचल मची हुई थी। इस एक ही दिन घटी तीन प्रमुख घटनाओं ने पूरे देश के राजनीतिक और सामाजिक वातावरण को झकझोर कर रख दिया था। राष्ट्रध्वज के नए स्वरूप पर महात्मा गांधी की सख्त आपत्ति 7 अगस्त 1947 की सुबह देश के प्रमुख समाचार पत्रों में महात्मा गांधी का एक बयान प्रकाशित हुआ, जिसने पूरे राष्ट्र का ध्यान खींच लिया। महात्मा गांधी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि स्वतंत्र भारत के राष्ट्रध्वज के मध्य में पारंपरिक चरखा नहीं होगा, तो वह उस ध्वज को नमन करने से इंकार कर देंगे। इस विवाद की शुरुआत एक दिन पहले यानी 6 अगस्त को हुई थी, जब महात्मा गांधी लाहौर के दौरे पर थे। वहां आयोजित एक बैठक के दौरान उन्हें नए राष्ट्रध्वज के स्वीकृत डिजाइन के बारे में जानकारी दी गई। उन्हें बताया गया कि संविधान सभा द्वारा तैयार किए गए नए तिरंगे से चरखे को हटा दिया गया है और उसकी जगह सम्राट अशोक के सिंह स्तंभ से लिए गए चक्र यानी अशोक चक्र को स्थान दिया गया है। यह सूचना मिलते ही महात्मा गांधी अत्यधिक व्यथित हो गए। बैठक समाप्त होने के बाद उन्होंने महादेव भाई को तुरंत एक प्रेस वक्तव्य जारी करने का निर्देश दिया। अपने बयान में गांधी जी ने कहा कि राष्ट्रध्वज की मूल अवधारणा सबसे पहले उन्होंने ही प्रस्तुत की थी और चरखे के बिना वे किसी भी राष्ट्रीय ध्वज की कल्पना नहीं कर सकते। महात्मा गांधी का विरोध केवल चरखे को हटाए जाने तक सीमित नहीं था। उन्होंने अशोक चक्र को शामिल किए जाने के ऐतिहासिक संदर्भ पर भी सवाल उठाए। उनका तर्क था कि सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाने से पहले व्यापक स्तर पर युद्ध और हिंसा की थी। ऐसे में एक हिंसक इतिहास से जुड़े प्रतीक को नए भारत के शांतिप्रिय राष्ट्रध्वज में शामिल करना अनुचित था। 7 अगस्त को समाचार पत्रों में यह विचार प्रमुखता से छपने के बाद देशभर में एक नई बहस छिड़ गई। समाज का एक वर्ग महात्मा गांधी के तर्कों का समर्थन कर रहा था, जबकि दूसरा वर्ग इसे उनके पारंपरिक विचारों का अतिवादी रूप मान रहा था। हालांकि, व्यापक विचार-विमर्श के बाद अंततः अशोक चक्र वाले तिरंगे को ही स्वतंत्र भारत के राष्ट्रध्वज के रूप में स्वीकार किया गया। भारत की धरती से पहले मॉस्को में फहराया गया नया तिरंगा जिस समय देश के भीतर राष्ट्रध्वज के स्वरूप पर बहस चल रही थी, उसी समय सोवियत संघ की राजधानी मॉस्को में एक ऐतिहासिक कूटनीतिक घटनाक्रम आकार ले रहा था। पंडित जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित को आजाद भारत की पहली राजदूत के रूप में सोवियत संघ में नियुक्त किया गया था और वे अपना पदभार ग्रहण करने के लिए मॉस्को पहुंची थीं। 7 अगस्त 1947 की सुबह लगभग छह बजे विजयलक्ष्मी पंडित का विमान मॉस्को हवाई अड्डे पर उतरा। उनके भव्य स्वागत के लिए सोवियत अधिकारियों ने अशोक चक्र से सुसज्जित भारत के नए राष्ट्रध्वज को आधिकारिक तौर पर फहराया। यह पहला अवसर था जब स्वतंत्र भारत का नया तिरंगा दुनिया के किसी भी हिस्से में आधिकारिक रूप से लहराया गया था। यह घटना भारतीय इतिहास का एक अनोखा विरोधाभास बन गई। एक तरफ जहां विदेश की धरती पर भारत के नए राष्ट्रध्वज को पूरे सम्मान के साथ आधिकारिक पहचान मिल रही थी, वहीं दूसरी तरफ भारत के भीतर महात्मा गांधी उस ध्वज को स्वीकार करने से मना कर रहे थे। इस स्थिति ने देश के राजनीतिक हलकों में गहरी बेचैनी पैदा कर दी थी। इसी घटनाक्रम के साथ महात्मा गांधी के उस पुराने बयान की भी चर्चा तेज हो गई, जो उन्होंने जुलाई 1947 के अंतिम सप्ताह में दिया था। 'सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय' के खंड-88 में दर्ज विवरण के अनुसार, गांधी जी ने भारतीय राष्ट्रध्वज के एक कोने में ब्रिटिश प्रतीक 'यूनियन जैक' को शामिल करने पर सहमति जताई थी। गांधी जी का मानना था कि यदि अंग्रेज स्वेच्छा से सत्ता सौंपकर भारत से जा रहे हैं, तो ध्वज के एक कोने में उनके प्रतीक को स्थान देने में कोई बुराई नहीं है। उन्होंने कहा था कि अंग्रेजों के प्रति शिष्टाचार दिखाना भारत के साथ विश्वासघात नहीं होगा। हालांकि, जब कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने उनके इस सुझाव को अस्वीकार कर दिया, तो गांधी जी ने इस बात पर दुख भी व्यक्त किया था कि नेतृत्व में उतनी उदारता नहीं दिख रही है। रावलपिंडी में दंगों का खौफ और पाकिस्तानी हिंदू महासभा का रुख एक तरफ जहां कूटनीति और प्रतीकों पर चर्चा चल रही थी, वहीं दूसरी तरफ पंजाब और सिंध के इलाकों में जमीनी हालात बेहद भयावह हो चुके थे। विभाजन की रेखाएं स्पष्ट होते ही रावलपिंडी और आसपास के क्षेत्रों में भीषण सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी। 7 अगस्त 1947 को रावलपिंडी में पाकिस्तानी हिंदू महासभा के नेताओं की एक आपातकालीन बैठक आयोजित की गई। इस बात की पुष्टि हो चुकी थी कि पंजाब का पश्चिमी हिस्सा और पूरा सिंध प्रांत नए बनने वाले देश पाकिस्तान का हिस्सा होंगे। इस घोषणा के बाद से ही हिंदू परिवारों और उनकी संपत्तियों को लगातार निशाना बनाया जा रहा था। अपनी सुरक्षा और अस्तित्व को लेकर चिंतित हिंदू महासभा के सदस्यों ने बिगड़े हालात के बीच शांति बनाए रखने और नए शासन तंत्र के साथ सामंजस्य स्थापित करने के विकल्पों पर चर्चा की। इस माहौल में समुदाय को हिंसा से बचाने के लिए मुस्लिम लीग के झंडे को स्वीकार करने जैसे व्यावहारिक और कड़े कदमों पर भी विचार किया गया, ताकि संक्रमण के इस दौर में लोगों की जान-माल की रक्षा की जा सके। इसका आप पर असर भारत में: यह ऐतिहासिक विवरण पाठकों को यह समझने में मदद करता है कि भारत के राष्ट्रध्वज और संवैधानिक प्रतीकों के चयन के पीछे गहन वैचारिक मंथन और लोकतांत्रिक मतभेद मौजूद थे। ऐतिहासिक सीख: यह दर्शाता है कि स्वतंत्रता के समय राष्ट्रीय प्रतीकों और प्राथमिकताओं को लेकर देश के शीर्ष नेताओं के बीच भी अलग-अलग दृष्टिकोण थे। सवाल-जवाब 1. 7 अगस्त 1947 को महात्मा गांधी नए राष्ट्रध्वज से क्यों नाराज थे? महात्मा गांधी इस बात से नाराज थे कि नए राष्ट्रध्वज के मध्य से चरखे को हटाकर अशोक चक्र रख दिया गया था। उनका मानना था कि चरखे के बिना तिरंगे की कल्पना अधूरी है। 2. भारत का नया तिरंगा सबसे पहले विदेश में कहां फहराया गया था? अशोक चक्र वाला नया तिरंगा सबसे पहले 7 अगस्त 1947 की सुबह सोवियत संघ की राजधानी मॉस्को के हवाई अड्डे पर फहराया गया था, जब राजदूत विजयलक्ष्मी पंडित वहां पहुंची थीं। 3. यूनियन जैक को लेकर महात्मा गांधी का क्या विचार था? गांधी जी का मानना था कि यदि अंग्रेज स्वेच्छा से भारत छोड़ रहे हैं, तो शिष्टाचार के रूप में भारतीय राष्ट्रध्वज के एक कोने में यूनियन जैक रखने में कोई बुराई नहीं थी। 4. 7 अगस्त 1947 को रावलपिंडी में क्या हालात थे? विभाजन की खबर के बाद रावलपिंडी में भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे, जहां अल्पसंख्यक हिंदू परिवारों और उनकी संपत्तियों को निशाना बनाया जा रहा था। https://trendkia.com/national/15-agasta-se-thika-8-dina-pahale-ki-3-ghatanaen-nae-tirnge-para-mahatma-gandhi-ki-narajagi-aura-moscow-men-phaharaya-gaya-india-ka-15121 TrendKia — Har trend, sabse pehle.