15 अगस्त 1947 की वह ऐतिहासिक सुबह जब लॉर्ड माउंटबेटन ने ली गवर्नर जनरल की शपथ और देश में गूंजा वंदे मातरम 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता के पहले दिन गवर्नमेंट हाउस में लॉर्ड माउंटबेटन के शपथ ग्रहण से लेकर कलकत्ता में शांति स्थापना और अखबारों की मुख्य सुर्खियों तक की पूरी ऐतिहासिक दास्तान। 15 अगस्त 1947 का सूर्योदय केवल एक नई तारीख का आगमन नहीं था, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में सदियों की गुलामी के अंत और एक स्वतंत्र राष्ट्र के उदय की उद्घोषणा था। वर्षों के लंबे संघर्ष, अनगिनत बलिदानों और स्वतंत्रता सेनानियों के अटूट संकल्प के बाद आजादी की वह पावन सुबह आई थी जिसका इंतजार करोड़ों भारतीय बेसब्री से कर रहे थे। 14 अगस्त की देर रात से ही देश के तमाम शहरों, गांवों और कस्बों में स्वतंत्रता का जश्न शुरू हो गया था। लोग अपने घरों से बाहर निकलकर सड़कों पर एकत्र हो रहे थे, दीप जला रहे थे और एक दूसरे को आजादी की बधाई दे रहे थे। परंतु इस व्यापक उल्लास के बीच कलकत्ता शहर में जो असाधारण परिवर्तन देखने को मिला, उसने पूरे देश को न केवल चौंका दिया बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द की एक अभूतपूर्व मिसाल भी पेश की। आजादी के महज 48 घंटे पहले तक जो कलकत्ता भीषण दंगों, आगजनी और हिंसा की चपेट में झुलस रहा था, वह 15 अगस्त की पहली किरण के साथ पूरी तरह शांत और संयमित नजर आ रहा था। कल तक जो हिंदू और मुस्लिम समुदाय एक दूसरे के खिलाफ हिंसा में लिप्त थे, वे आज एक दूसरे को गले लगाकर स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं दे रहे थे। कलकत्ता का चमत्कार और हैदरी मंजिल में महात्मा गांधी की उपस्थिति कलकत्ता में रातोंरात आए इस अकल्पनीय बदलाव और शांति का संपूर्ण श्रेय बेलियाघाटा स्थित हैदरी मंजिल में ठहरे महात्मा गांधी को दिया जा रहा था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और विभाजन की विभीषिका के बीच महात्मा गांधी ने हिंसा रोकने के लिए अपने प्रयासों को केंद्रित कर दिया था। जिस हैदरी मंजिल को कुछ दिनों पहले तक लोग तनाव, भय और अनिश्चितता का केंद्र मानते थे, वही इमारत 15 अगस्त की सुबह एक पवित्र स्थल के रूप में परिवर्तित हो चुकी थी। भोर की पहली किरण फूटते ही हजारों की संख्या में नागरिक महात्मा गांधी के दर्शन करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए हैदरी मंजिल के बाहर एकत्र होने लगे थे। भीड़ इतनी विशाल थी कि अधिकांश लोगों को दूर से ही बापू की एक झलक पाकर वापस लौटना पड़ रहा था। महात्मा गांधी की मौन उपस्थिति, उनके उपवास और निरंतर प्रयासों ने कलकत्ता के नागरिकों के दिलों को परिवर्तित कर दिया था। जब पूरा देश आजादी का राष्ट्रीय उत्सव मना रहा था, उस समय कलकत्ता से आई हिंदू मुस्लिम भाईचारे की इस सुखद खबर ने भारतवासियों की खुशियों को कई गुना बढ़ा दिया था। गवर्नमेंट हाउस में लॉर्ड माउंटबेटन का ऐतिहासिक शपथ ग्रहण समारोह 15 अगस्त 1947 की सुबह का पहला औपचारिक और संवैधानिक कार्यक्रम भारत के नए गवर्नर जनरल का शपथ ग्रहण समारोह था। ब्रिटिश भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन अब आजाद भारत के प्रथम गवर्नर जनरल के रूप में अपनी नई जिम्मेदारी संभालने जा रहे थे। यह महत्वपूर्ण कार्यक्रम राजधानी दिल्ली स्थित गवर्नमेंट हाउस के भव्य दरबार हॉल में आयोजित किया गया था। उल्लेखनीय है कि यही गवर्नमेंट हाउस 14 अगस्त की मध्यरात्रि तक ब्रिटिश वायसराय का आधिकारिक आवास हुआ करता था, जिसे बाद में स्वतंत्र भारत के राष्ट्रपति भवन के रूप में पहचान मिली। इस ऐतिहासिक अवसर के लिए दरबार हॉल को विशेष रूप से सजाया गया था। सुबह लगभग 9:00 बजे कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ चांदी की तुरहियों की गूंज और शंखनाद के साथ हुआ। यह एक ऐसा क्षण था जब ब्रिटिश सत्ता के सबसे बड़े केंद्र में भारतीय परंपरा की पवित्र ध्वनियां गूंज रही थीं। समारोह की शुरुआत के साथ ही भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश सर हरिलाल जयकिशन दास कानिया दरबार हॉल में प्रविष्ट हुए। उनके पश्चात लॉर्ड माउंटबेटन गरिमामय उपस्थिति के साथ मंच की ओर बढ़े और मुख्य न्यायाधीश के समक्ष शपथ ग्रहण के लिए खड़े हुए। लॉर्ड माउंटबेटन ने पवित्र बाइबल पर हाथ रखकर उसे चूमा और आजाद भारत के पहले गवर्नर जनरल के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ ली। इस प्रकार सदियों से चले आ रहे औपनिवेशिक शासन के आधिकारिक हस्तांतरण की प्रक्रिया संपन्न हुई। काउंसिल हाउस में पहली बार लहराया अशोक चक्र अंकित तिरंगा गवर्नमेंट हाउस में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह के समापन के बाद सुबह लगभग 10:30 बजे काउंसिल हाउस में स्वतंत्र भारत की पहली सरकारी सभा का आयोजन हुआ। यह स्थान आज के संसद भवन परिसर के रूप में जाना जाता है। इस समारोह की सबसे बड़ी ऐतिहासिक महत्ता यह थी कि यहां पहली बार भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अशोक चक्र से सुशोभित तिरंगे को आधिकारिक तौर पर फहराया जाना था। स्वतंत्र भारत की पहली मंत्रिपरिषद के सदस्य, नव नियुक्त कैबिनेट मंत्री और शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी इस गरिमामय क्षण के गवाह बनने के लिए उपस्थित थे। इसके साथ ही काउंसिल बिल्डिंग के बाहर हजारों की संख्या में आम नागरिक अपने देश का ध्वज फहराते हुए देखने के लिए एकत्र हुए थे। शेड्यूल के अनुसार स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ समारोह स्थल पर पहुंचे। जैसे ही काउंसिल हॉल के भीतर पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया, वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें गर्व से नम हो गईं। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि 15 अगस्त 1947 तक स्वतंत्र भारत के आधिकारिक राष्ट्रगान पर अंतिम निर्णय नहीं हो सका था। ऐसे में संपूर्ण रायसीना हिल्स का क्षेत्र देशभक्ति के अमर गीत वंदे मातरम के गूंजते नारों से जीवंत हो उठा। हर तरफ भारत माता की जय और वंदे मातरम की गूंज सुनाई दे रही थी। इंडिया गेट पर विशाल जनसैलाब और आसमान में खिला अद्भुत इंद्रधनुष काउंसिल हाउस के औपचारिक कार्यक्रम के उपरांत शाम के समय इंडिया गेट के विशाल मैदान में आम जनता के लिए एक वृहद ध्वजारोहण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। शाम को ठीक 4:30 बजे स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जैसे ही इंडिया गेट के सामने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को फहराया, वहां मौजूद लाखों लोगों का जनसैलाब खुशी से झूम उठा। जैसे ही तिरंगा दिल्ली के आसमान में लहराने लगा, ठीक उसी समय प्रकृति ने भी इस ऐतिहासिक क्षण को अद्भुत सौगात दी। आकाश में एक बेहद खूबसूरत और स्पष्ट इंद्रधनुष उभर आया। बादलों की ओट से निकली सूर्य की किरणों और इंद्रधनुषी छटा ने इंडिया गेट के दृश्य को अलौकिक बना दिया। ध्वजारोहण के साथ इंद्रधनुष का यह मेल स्वतंत्रता दिवस की प्रथम संध्या की स्मृतियों में सदा के लिए अमर हो गया। देशभर के प्रमुख अखबारों की पहली खबर और ऐतिहासिक सुर्खियां 15 अगस्त 1947 की सुबह जब देशभर में समाचार पत्र लोगों के घरों तक पहुंचे, तो सभी प्रमुख अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर भारत की आजादी का ही समाचार छाया हुआ था। देश के अलग अलग हिस्सों से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने इस ऐतिहासिक घटना को अपनी-अपनी मुख्य सुर्खियों में प्रमुखता से स्थान दिया। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स ने अपने प्रथम पृष्ठ पर हेडलाइन छापी थी: 'इंडिया इंडिपेंडेंट ब्रिटिश रूल एंड्स' यानी भारत स्वतंत्र, ब्रिटिश शासन का अंत। वहीं प्रतिष्ठित अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी मुख्य हेडलाइन बनाई थी: 'बर्थ ऑफ इंडियाज फ्रीडम' यानी भारत की स्वतंत्रता का जन्म। कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले प्रमुख समाचार पत्र द स्टेट्समैन ने अपने मुख्य पृष्ठ पर हेडलाइन दी थी: 'टू डोमिनियंस आर बॉर्न' यानी दो प्रभुत्वशाली राष्ट्रों का जन्म। इसके अतिरिक्त दिल्ली से प्रकाशित होने वाले प्रमुख हिंदी समाचार पत्र हिंदुस्तान ने एक बेहद भावुक और काव्यात्मक हेडलाइन के साथ समाचार प्रकाशित किया था: 'शताब्दियों की दासता के बाद, भारत में स्वतंत्रता की मंगल प्रभात'। इन ऐतिहासिक समाचार पत्रों के मुख्य पृष्ठों और उनमें छपी खबरों ने करोड़ों भारतीयों के हृदय को गर्व से भर दिया था और आजादी के उस पावन अवसर पर हर नागरिक के रोंगटे खुशी और गर्व से खड़े हो गए थे। इसका आप पर असर भारत में: यह ऐतिहासिक विवरण हमें याद दिलाता है कि देश की स्वतंत्रता और सांप्रदायिक सद्भाव कितने बड़े बलिदानों और प्रयासों के बाद हासिल हुए थे। दिल्ली और कोलकाता में: रायसीना हिल्स, इंडिया गेट और बेलियाघाटा जैसी ऐतिहासिक जगहों से जुड़ी ये घटनाएं राष्ट्रीय धरोहर और नागरिक चेतना को समझने में मदद करती हैं। सवाल-जवाब 1. 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल कौन बने? लॉर्ड माउंटबेटन ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल के रूप में शपथ ली थी। 2. लॉर्ड माउंटबेटन को पद की शपथ किसने दिलाई थी? भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश सर हरिलाल जयकिशन दास कानिया ने लॉर्ड माउंटबेटन को गवर्नर जनरल पद की शपथ दिलाई। 3. 15 अगस्त 1947 की सुबह कलकत्ता में क्या बदलाव देखा गया? आजादी से दो दिन पहले तक दंगों से झुलस रहा कलकत्ता 15 अगस्त की सुबह पूरी तरह शांत हो गया और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल देखने को मिली। 4. 15 अगस्त 1947 को महात्मा गांधी कहां मौजूद थे? महात्मा गांधी शांति स्थापित करने के उद्देश्य से कलकत्ता के बेलियाघाटा स्थित हैदरी मंजिल में ठहरे हुए थे। 5. काउंसिल हाउस में ध्वजारोहण के दौरान कौन सा नारा गूंज उठा? उस समय तक आधिकारिक राष्ट्रगान अंतिम रूप से तय न होने के कारण पूरा परिसर वंदे मातरम के नारों से गूंज उठा था। 6. इंडिया गेट पर शाम के कार्यक्रम के दौरान क्या प्राकृतिक दृश्य देखा गया? शाम 4:30 बजे जवाहरलाल नेहरू द्वारा तिरंगा फहराते ही आसमान में एक सुंदर इंद्रधनुष दिखाई दिया था। प्रेरणा और सबक प्रेरणादायी पाठ: • सद्भाव की ताकत: हिंसाग्रस्त माहौल को भी संवाद और अहिंसा के जरिए शांति में बदला जा सकता है। • संस्थानों का सम्मान: कठिन दौर में भी संवैधानिक व्यवस्था और नियम-कायदों का पालन मजबूत राष्ट्र की नींव रखता है। • एकता में शक्ति: साझा खुशी और राष्ट्रीय भावना बड़े से बड़े मतभेदों को मिटाने में सक्षम होती है। https://trendkia.com/national/15-august-1947-ki-vaha-aitihasika-subaha-jaba-lord-mountbatten-ne-li-governor-general-ki-shapatha-aura-desha-men-gunja-vande-matar-16867 TrendKia — Har trend, sabse pehle.