35 साल तक जंगलों में खौफ फैलाने वाले पूर्व नक्सलियों ने थामा तिरंगा, बालाघाट के गांवों में गूंजे देशभक्ति के नारे बालाघाट में करीब 35 वर्षों तक सक्रिय रहे पूर्व नक्सलियों ने पुलिस की तिरंगा यात्रा में शामिल होकर राष्ट्रीय ध्वज फहराया और संविधान में अपनी आस्था जताई। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर से ठीक पहले एक एतिहासिक और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला है। करीब 35 वर्षों तक बालाघाट के घने जंगलों में हिंसक गतिविधियों का संचालन करने वाले पूर्व नक्सलियों ने अब हथियार छोड़कर भारत के संविधान और राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में अपनी पूर्ण आस्था जताई है। बालाघाट पुलिस प्रशासन की एक अनूठी पहल के तहत, मुख्यधारा में लौट चुके इन पूर्व नक्सलियों को उन्हीं सुदूर आदिवासी इलाकों में ले जाया गया जहाँ कभी उनका खौफ बना रहता था। हाथों में राष्ट्रीय ध्वज थामे इन पूर्व नक्सलियों ने सुरक्षा बलों के साथ मिलकर न केवल तिरंगे को सैल्यूट किया, बल्कि राष्ट्रगान जन-गण-मन गाकर देश की संवैधानिक व्यवस्था के प्रति अपना विश्वास भी प्रकट किया। खौफ के गढ़ में देशभक्ति के नारों की गूंज स्वतंत्रता दिवस के मद्देनजर जिले भर में देशभक्ति का वातावरण निर्मित किया जा रहा है। इसी क्रम में बालाघाट पुलिस द्वारा आयोजित विशेष तिरंगा यात्रा शहर से रवाना होकर बोदालहरा मार्ग से गुजरी। यह यात्रा पूर्व नक्सली दीपक उर्फ सुधाकर उइके के पैतृक गांव पहुंची और इसके पश्चात हर्राटोला गांव में अंतिम कार्यक्रम के साथ संपन्न हुई। इस यात्रा में बालाघाट रेंज के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) ललित शाक्यवार, उप महानिरीक्षक (डीआईजी) विनीत कुमार जैन तथा पुलिस अधीक्षक (एसपी) आदित्य मिश्रा विशेष रूप से मौजूद रहे। जिन वादियों में कभी गोलियों की आवाजें गूंजती थीं, वहां इस यात्रा के दौरान "भारत मां की जय" और "अमर शहीदों की जय" के नारे गूंज उठे। वर्षों से यह दुष्प्रचार सुनने वाले ग्रामीणों के लिए यह एक अचंभित करने वाला क्षण था, जिन्हें नक्सली अक्सर यह सिखाते थे कि देश की व्यवस्था ने उन्हें हाशिए पर रखा है और सुरक्षा बल आदिवासियों के विरोधी हैं। जब ग्रामीणों ने पूर्व नक्सलियों को सुरक्षा बलों के अधिकारियों के साथ मुस्कुराते हुए और तिरंगा फहराते देखा, तो उनका वर्षों पुराना भ्रम टूट गया और शासन प्रणाली के प्रति उनका विश्वास दृढ़ हुआ। दहशत के अतीत से बाहर निकलते ग्रामीण और पंचायतें इस बदलाव का महत्व समझने के लिए अतीत की परिस्थितियों पर ध्यान देना आवश्यक है। नक्सल प्रभावित दड़कसा गांव के पूर्व सरपंच ने उस दौर को याद करते हुए बताया कि पहले गांवों में स्वतंत्रता दिवस अथवा गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराना असंभव जैसा था। 15 अगस्त और 26 जनवरी से पूर्व नक्सली गांव के सरपंचों को कड़ी धमकियां दिया करते थे कि यदि पंचायत भवन में तिरंगा फहराया गया तो परिणाम गंभीर होंगे। नक्सली ग्रामीणों से कहते थे कि देश को मिली आजादी झूठी है और भारत का संविधान केवल शोषक वर्ग के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया है। वे ग्रामीणों को स्वतंत्रता दिवस का बहिष्कार करने और विरोध स्वरूप काला झंडा फहराने का निर्देश देते थे तथा स्वयं भी काले झंडे फहराया करते थे। हालांकि, समय बीतने के साथ जैसे-जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की तैनाती और आवाजाही बढ़ी, सरपंचों ने नक्सलियों की खोखली धमकियों से डरना छोड़ दिया और बिना किसी भय के राष्ट्रीय ध्वज फहराना आरंभ कर दिया। पुनर्वास, शिक्षा और संवैधानिक मार्ग पर बल कार्यक्रम के दौरान मुख्यधारा से जुड़े पूर्व नक्सली सोढ़ी ने ग्रामीणों तथा बच्चों को संबोधित करते हुए अपने अनुभव साझा किए। सोढ़ी ने कहा, "पुनर्वास नीति के तहत मुख्यधारा से जुड़ने के बाद हमें एक नई जिंदगी मिली है।" उन्होंने वहां उपस्थित बच्चों को देखकर खुशी व्यक्त की और कहा कि बच्चे ही हमारे देश का भविष्य हैं। उन्होंने समाज की प्रगति के लिए शिक्षा को अनिवार्य बताते हुए कहा कि केवल शिक्षा के माध्यम से ही सफलता के नए शिखरों को छुआ जा सकता है। सोढ़ी ने स्थानीय निवासियों को एक स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों या किसी भी अधिकार की लड़ाई के लिए हथियार उठाने अथवा हिंसा का मार्ग चुनने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। देश के संविधान और कानून के दायरे में रहकर किसी भी समस्या का शांतिपूर्ण समाधान निकाला जा सकता है। बालाघाट पुलिस की इस पहल का मुख्य उद्देश्य बच्चों तथा आम जनमानस में देशभक्ति की भावना को सुदृढ़ करना और समाज में लौटे पूर्व कैडरों एवं आम जनता के बीच आपसी सामंजस्य स्थापित करना था। सामाजिक समरसता और विचारधारा में परिवर्तन बालाघाट रेंज के आईजी ललित शाक्यवार ने इस आयोजन के संदर्भ में संवाददाताओं से बात करते हुए बताया कि सरेंडर कर चुके नक्सलियों की सोच और विचारधारा में सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल हथियार डालना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि ये लोग सामान्य नागरिकों के साथ सहज रूप से घुल-मिल सकें। इस प्रकार के आयोजनों का उद्देश्य पूर्व नक्सलियों तथा ग्रामीण जनता के बीच किसी भी प्रकार की दुर्भावना, हिचक या अविश्वास की भावना को पूरी तरह समाप्त करना है ताकि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित हो सके। इसका आप पर असर इस खबर का आम जनता पर प्रभाव: • भारत में: नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास नीतियों और सुरक्षा बलों के बढ़ते प्रभाव से राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत हो रही है तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था पर नागरिकों का भरोसा बढ़ा है। • बालाघाट (मध्य प्रदेश) में: दशकों से हिंसा और खौफ के साये में जीने वाले ग्रामीण क्षेत्रों में अब शांति, सुरक्षा और देशभक्ति का माहौल कायम हो रहा है, जिससे स्थानीय विकास की राह आसान होगी। सवाल-जवाब 1. बालाघाट में आयोजित तिरंगा यात्रा का मुख्य उद्देश्य क्या था? इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीणों और बच्चों में देशभक्ति का जज्बा जगाना तथा मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों और आम जनता के बीच बेहतर तालमेल और विश्वास स्थापित करना था। 2. इस तिरंगा यात्रा में कौन-कौन से वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शामिल थे? इस कार्यक्रम में बालाघाट रेंज के आईजी ललित शाक्यवार, डीआईजी विनीत कुमार जैन और एसपी आदित्य मिश्रा शामिल थे। 3. अतीत में स्वतंत्रता दिवस पर नक्सली ग्रामीणों पर क्या दबाव बनाते थे? अतीत में नक्सली सरपंचों को तिरंगा फहराने पर अंजाम भुगतने की धमकी देते थे और 15 अगस्त तथा 26 जनवरी को विरोध स्वरूप काला झंडा फहराने के लिए मजबूर करते थे। 4. मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सली सोढ़ी ने ग्रामीणों को क्या संदेश दिया? सोढ़ी ने कहा कि जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के लिए हथियार उठाने की जरूरत नहीं है तथा किसी भी समस्या का समाधान कानून और संविधान के दायरे में रहकर निकाला जा सकता है। 5. यह तिरंगा यात्रा किन-किन स्थानों से होकर गुजरी? यह यात्रा बालाघाट शहर से शुरू होकर बोदालहरा होते हुए पूर्व नक्सली दीपक उर्फ सुधाकर उइके के गांव पहुंची और अंत में हर्राटोला में समाप्त हुई। प्रेरणा और सबक प्रेरणादायक संदेश और मुख्य सबक: • संविधान और कानून पर भरोसा: किसी भी समस्या का स्थायी समाधान हिंसा के बजाय संवैधानिक और कानूनी दायरे में रहकर ही निकाला जा सकता है। • शिक्षा ही प्रगति की कुंजी: समाज और भावी पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए बच्चों का शिक्षित होना सबसे महत्वपूर्ण कदम है। • पुनर्वास और मुख्यधारा का महत्व: सही अवसर और पुनर्वास नीति मिलने पर हिंसा का मार्ग छोड़कर समाज के विकास में योगदान दिया जा सकता है। https://trendkia.com/national/35-sala-taka-jngalon-men-khaupha-phailane-vale-purva-naxalites-ne-thama-tirnga-balaghat-ke-ganvon-men-gunje-deshabhakti-ke-nare-16672 TrendKia — Har trend, sabse pehle.