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  "type": "article",
  "title": "5 दशक पुराने ज़मीन विवाद पर गौहाटी हाईकोर्ट का फैसला, 30 साल लंबे कब्ज़े के आधार पर तरुबाला साहा का मालिकाना हक बरकरार",
  "summary": "गौहाटी हाईकोर्ट ने 1975 में खरीदी गई 4 बीघा ज़मीन के मालिकाना हक पर महिला के पक्ष में निर्णय दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि नाबालिगों के हिस्से की बिक्री कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण थी, परंतु परिजनों द्वारा कानूनी कदम उठाने में 30 वर्ष से अधिक की देरी के कारण महिला का कब्ज़ा वैध रहेगा।",
  "content": "असम के एक दशकों पुराने भूमि विवाद में ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए गौहाटी हाईकोर्ट ने तरुबाला साहा नामक महिला खरीदार के मालिकाना हक को सही ठहराया है। यह मामला वर्ष 1975 में पंजीकृत एक बिक्री विलेख से जुड़ा हुआ है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यद्यपि एक बड़ा भाई अपने नाबालिग भाई-बहनों का कानूनी संरक्षक बने बिना उनकी संपत्ति नहीं बेच सकता, लेकिन यदि खरीदार तीन दशकों से अधिक समय से उस भूमि पर निर्बाध रूप से काबिज है, तो इतनी लंबी अवधि के बाद बिक्री को चुनौती नहीं दी जा सकती। न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराना की पीठ ने 24 अगस्त 2026 को इस महत्वपूर्ण याचिका का निपटारा करते हुए निचली अदालतों के फैसलों को बरकरार रखा।\n\nवर्ष 1975 के भूमि सौदे की पृष्ठभूमि\nविवाद की शुरुआत 4 बीघा, 2 कठ्ठा और 10 लेचा क्षेत्रफल वाली एक कृषि भूमि से हुई थी। यह संपत्ति मूल रूप से याद अली नाम के व्यक्ति की थी। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके बड़े बेटे नागर अली ने 18 फरवरी 1975 को पंजीकृत बिक्री विलेख संख्या 2913/75 के माध्यम से पूरी ज़मीन तरुबाला साहा को बेच दी। इस बिक्री पत्र में नागर अली ने अपने स्वयं के एक-पांचवें हिस्से के साथ-साथ अपने चार नाबालिग भाई-बहनों के अधिकारों का भी सौदा कर दिया था।\n\nभूमि की खरीद के बाद तरुबाला साहा का नाम आधिकारिक राजस्व अभिलेखों में दर्ज हो गया। उन्होंने इस ज़मीन पर स्वयं खेती करने के बजाय बटाईदारों के माध्यम से फसल उगाना शुरू किया। महिला का दावा था कि वह खरीद के दिन से ही लगातार ज़मीन के उपयोग और नियंत्रण में थीं। हालांकि वर्ष 2008 के आते-आते इस संपत्ति को लेकर विवाद गहरा गया।\n\nवर्ष 2008 में बेदखली का आरोप और कानूनी संघर्ष\nतरुबाला साहा का आरोप था कि 15 फरवरी 2008 को याद अली के अन्य बच्चों, जो अब बालिग हो चुके थे, ने उन्हें जबरन ज़मीन से बेदखल कर दिया और वहां अपने मकान बना लिए। इसके विरोध में महिला ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने 1975 के बिक्री विलेख की वैधता को चुनौती दी।\n\nप्रतिवादियों का तर्क था कि नागर अली उनके गार्जियन यानी कानूनी संरक्षक नहीं थे और न ही किसी अदालत ने उन्हें ऐसा अधिकार दिया था। इस आधार पर उन्होंने दावा किया कि नागर अली को अपने चार नाबालिग भाई-बहनों के हिस्से की संपत्ति बेचने का कोई विधिक अधिकार नहीं था, इसलिए 1975 का वह सौदा पूरी तरह से अमान्य था और ज़मीन का मालिकाना हक वापस उनके पास होना चाहिए।\n\nनिचली अदालतों का निर्णय और पहली अपील\nमामले की सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट ने तरुबाला साहा के पक्ष में अपना फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि तरुबाला साहा लंबे समय से संपत्ति पर काबिज थीं, इसलिए उन्हें ज़मीन का कब्ज़ा वापस सौंपा जाना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने प्रतिवादियों के मालिकाना हक के दावे को खारिज कर दिया।\n\nइसके बाद प्रतिवादियों ने प्रथम अपीलीय अदालत में याचिका दायर की। प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए यह माना कि 1975 की बिक्री विलेख केवल नागर अली के स्वयं के एक-पांचवें हिस्से तक ही कानूनी रूप से वैध थी, जबकि नाबालिगों के चार-पांचवें हिस्से के लिए यह अमान्य थी। फिर भी, लंबे समय के कब्ज़े और याचिका दायर करने में हुई अत्यधिक देरी को ध्यान में रखते हुए महिला के पक्ष में फैसला बरकरार रखा गया।\n\nमुस्लिम कानून और समयसीमा पर हाईकोर्ट का विश्लेषण\nमामला गौहाटी हाईकोर्ट पहुंचा तो न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराना ने मोहम्मडन लॉ यानी मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के प्रावधानों का बारीकी से विश्लेषण किया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम कानून के तहत एक बड़ा भाई केवल अपने पारिवारिक रिश्ते के आधार पर अपने नाबालिग भाई-बहनों का प्राकृतिक या कानूनी गार्जियन नहीं बन जाता।\n\nअदालत ने कहा, \"नागर अली को उनके चार छोटे भाई-बहनों का अभिभावक मानकर ज़मीन बेचने की इजाजत नहीं दी जा सकती।\" इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के उस निष्कर्ष से सहमति जताई कि 4/5 हिस्से की बिक्री विलेख की शुरुआत में कानूनी त्रुटि थी।\n\n30 वर्षों के अनवरत कब्ज़े का साक्ष्य\nकानूनी त्रुटि के बावजूद हाईकोर्ट ने माना कि तरुबाला साहा लगभग 30 से 33 वर्षों तक उस ज़मीन पर बिना किसी रुकावट के काबिज रहीं। महिला ने अदालत में उन बटाईदारों (अधियार) की गवाही पेश की जो उनके लिए ज़मीन पर खेती करते थे। साक्ष्य देने वाले गवाहों (PW-1, PW-3 और PW-5) की जिरह के दौरान प्रतिवादी पक्ष उनकी गवाही को गलत साबित करने में विफल रहा।\n\nअदालत ने कहा कि चूंकि खरीदार ने साक्ष्यों के माध्यम से यह साबित कर दिया कि उसने खरीद के बाद से बटाईदारों के ज़रिए ज़मीन पर अपना कब्ज़ा बनाए रखा था और प्रतिवादियों ने वयस्क होने के बाद भी दशकों तक कोई कानूनी कदम नहीं उठाया, इसलिए अब इतने वर्षों बाद मालिकाना हक को चुनौती देकर महिला को बेदखल नहीं किया जा सकता। इस प्रकार हाईकोर्ट ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए अपील खारिज कर दी।\n\nइसका आप पर असर\nयह फैसला भारत में संपत्ति खरीदारों और विक्रेताओं दोनों के लिए कानूनी समयसीमा और कब्ज़े की अहमियत को स्पष्ट करता है।\n\n• भारत में: यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति पर 30 साल से अधिक समय तक लगातार बिना किसी कानूनी आपत्ति के काबिज रहता है, तो देरी से किए गए कानूनी दावों से खरीदार का बचाव हो सकता है। खरीदारों को नाबालिगों के हिस्से वाली ज़मीन खरीदते समय कोर्ट गार्जियन की मंजूरी अवश्य देखनी चाहिए।\n• असम में: राज्य में कृषि ज़मीन खरीदने वाले लोगों के लिए 'अधियार' यानी बटाईदारों की लिखित और मौखिक गवाही अदालत में कब्ज़ा साबित करने का एक मजबूत आधार मानी जाएगी। परिजनों द्वारा पुरानी रजिस्ट्रियों को दशकों बाद चुनौती देना अब आसान नहीं होगा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. गौहाटी हाईकोर्ट ने 1975 के ज़मीन सौदे पर क्या फैसला दिया?\nहाईकोर्ट ने महिला खरीदार तरुबाला साहा के मालिकाना हक को बरकरार रखा और 30 साल से अधिक समय तक निर्बाध कब्ज़ा होने के कारण परिजनों की चुनौती को खारिज कर दिया।\n\n2. क्या बड़ा भाई नाबालिग भाई-बहनों की संपत्ति बेच सकता है?\nमुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अनुसार, बड़ा भाई केवल रिश्ते के आधार पर नाबालिगों का कानूनी संरक्षक नहीं बनता और कोर्ट की अनुमति के बिना उनकी संपत्ति नहीं बेच सकता।\n\n3. महिला ने ज़मीन पर अपना कब्ज़ा अदालत में कैसे साबित किया?\nमहिला ने अदालत में राजस्व रिकॉर्ड और अपने बटाईदारों (अधियार) की गवाहियां पेश कीं, जो दशकों से उनके लिए उस ज़मीन पर खेती कर रहे थे।\n\n4. परिजनों का दावा अदालत में क्यों खारिज हुआ?\nपरिजनों ने बालिग होने के बाद भी 30 वर्षों से अधिक समय तक बिक्री को चुनौती नहीं दी, इसलिए अत्यधिक देरी के आधार पर उनका दावा खारिज कर दिया गया।",
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  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-08-31",
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    "गौहाटी हाईकोर्ट",
    "ज़मीन विवाद",
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    "संपत्ति कानून"
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