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  "title": "अकादमिक शिखर से वैश्विक कूटनीति तक: जानिए अजीत डोभाल और एस जयशंकर की पढ़ाई और सफर की पूरी कहानी",
  "summary": "भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर की रणनीतिक जुगलबंदी देश की बाहरी सुरक्षा और वैश्विक कूटनीति को मजबूती प्रदान कर रही है, जानिए इनके शानदार शैक्षणिक सफर के बारे में।",
  "content": "वैश्विक पटल पर भारत की कूटनीतिक स्थिति को सुदृढ़ बनाए रखने में देश के दो सबसे अनुभवी और रणनीतिक चेहरों की भूमिका बेहद अहम रही है। जब भी देश के सामने कोई कूटनीतिक उलझन या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील मामला खड़ा होता है, तो देश और दुनिया की नजरें इन दोनों दिग्गजों पर टिक जाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर की जोड़ी एक अभेद्य दीवार की तरह काम करती है। हाल ही में आयोजित हुए ब्रिक्स सम्मेलन से ठीक पहले अजीत डोभाल की चीन यात्रा इसका एक ताजा उदाहरण थी, जिसका उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों में जमी बर्फ को पिघलाना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के पक्ष को सुगमता से आगे बढ़ाना था। इन दोनों अधिकारियों का आपसी तालमेल देश की रक्षा नीति और विदेश नीति को एक साथ जोड़कर नई ऊंचाइयों पर ले जाता है।\n\n \n\nदेश के सुरक्षा प्रहरी अजीत डोभाल की शिक्षा और शुरुआती सफर\n\nराष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के सबसे बड़े रणनीतिकारों में से एक माने जाते हैं। उनके इस शानदार सफर की शुरुआत राजस्थान के अजमेर मिलिट्री स्कूल से हुई थी, जिसे पहले किंग जॉर्ज रॉयल इंडियन मिलिट्री स्कूल के नाम से जाना जाता था। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा आगरा विश्वविद्यालय (जिसे अब डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है) से पूरी की। उन्होंने साल 1967 में अर्थशास्त्र में अपनी MA की डिग्री हासिल की और वे अपनी कक्षा के टॉपर रहे। इसके बाद उन्होंने UPSC की सिविल सेवा परीक्षा पास की और साल 1968 में केरल कैडर के एक IPS अधिकारी के रूप में अपने प्रशासनिक सफर की शुरुआत की।\n\n \n\nखुफिया ऑपरेशन्स से लेकर एनएसए प्रमुख बनने तक का सफर\n\nप्रशासनिक सेवा में कदम रखने के बाद डोभाल की असाधारण क्षमताओं को देखते हुए उन्हें विशेष सुरक्षा अभियानों की जिम्मेदारी दी गई। साल 1972 में वे देश की अग्रणी खुफिया एजेंसियों, IB और RAW का हिस्सा बन गए। अपने करियर के दौरान उन्होंने कई सालों तक बेहद कठिन और संवेदनशील परिस्थितियों में अंडरकवर एजेंट के रूप में काम किया। उनके इन साहसिक कारनामों के कारण उन्हें अनौपचारिक रूप से 'भारत का जेम्स बॉन्ड' भी कहा जाता है। वे साल 2004 से 2005 तक IB के निदेशक के पद पर तैनात रहे। देश की सुरक्षा व्यवस्था को आधुनिक और मजबूत बनाने के उद्देश्य से मई 2014 में उन्हें भारत का पांचवां NSA नियुक्त किया गया, और तब से वे लगातार देश की सुरक्षा रणनीति का सफल नेतृत्व कर रहे हैं।\n\n \n\nअकादमिक स्तर पर बेहद मजबूत हैं विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर\n\nसुरक्षा मोर्चे पर डोभाल के अभूतपूर्व योगदान के समानांतर ही डॉ. सुब्रह्मण्यम जयशंकर वैश्विक मंच पर भारत की कूटनीति का बेहतरीन नेतृत्व करते हैं। दिल्ली में पले-बढ़े जयशंकर ने अपनी शुरुआती स्कूली शिक्षा एयर फोर्स स्कूल, सुब्रतो पार्क से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज में दाखिला लिया और वहां से केमिस्ट्री में BSc की डिग्री पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने JNU का रुख किया। JNU से उन्होंने राजनीति विज्ञान में MA, MPhil और इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय संबंध में PhD की उच्च उपाधि हासिल की, जिससे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मामलों में उनकी अकादमिक समझ बेहद मजबूत हो गई।\n\n \n\nराजनयिक सेवा से केंद्रीय कैबिनेट तक का शानदार सफर\n\nडॉ. जयशंकर का राजनयिक सफर साल 1977 में IFS में चयन के साथ शुरू हुआ था। लगभग चार दशकों से अधिक के अपने कार्यकाल में उन्होंने दुनिया के विभिन्न देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। वे साल 2007 से 2009 तक सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त रहे। इसके बाद उन्होंने चेक गणराज्य, चीन (साल 2009 से 2013) और USA (साल 2013 से 2015) में भारत के राजदूत के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। देश की विदेश नीति पर उनकी मजबूत पकड़ को देखते हुए उन्हें जनवरी 2015 से जनवरी 2018 तक भारत का विदेश सचिव बनाया गया। इसके बाद मई 2019 में उन्हें देश का विदेश मंत्री नियुक्त किया गया। वर्तमान में वे गुजरात राज्य से राज्यसभा सांसद के रूप में संसद सदस्य हैं।\n\n \n\nरक्षा और कूटनीति का एक अनूठा और अटूट गठबंधन\n\nअजीत डोभाल और एस जयशंकर की यह जुगलबंदी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के संप्रभु हितों की रक्षा करने में बेहद कारगर साबित हुई है। जहां एक तरफ डॉ. एस जयशंकर वैश्विक मंचों पर पश्चिमी देशों के किसी भी दबाव के सामने झुके बिना भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की मुखर पैरवी करते हैं, वहीं दूसरी तरफ अजीत डोभाल आंतरिक और सीमाई सुरक्षा से जुड़ी हर साजिश को नाकाम करने के लिए एक मजबूत सुरक्षा ढांचा तैयार रखते हैं। चाहे सीमा पार से आने वाली सुरक्षा चुनौतियों का मुकाबला करना हो या फिर विभिन्न वैश्विक तनावों के बीच देश के आर्थिक और रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखना हो, इन दोनों दिग्गजों के नेतृत्व ने साबित किया है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और गहरे रणनीतिक कौशल से देश को कूटनीतिक और रक्षात्मक मोर्चों पर हमेशा सुरक्षित और शीर्ष पर रखा जा सकता है।\n\nइसका आप पर असर\nअजीत डोभाल और डॉ. एस जयशंकर की उच्च शैक्षणिक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि देश के सामान्य नागरिकों को राष्ट्रीय नीतियों के सफल कार्यान्वयन के प्रति आश्वस्त करती है।\n\n• प्रशासनिक मजबूती पर भरोसा: देश के नीति-निर्माण की कमान अत्यधिक शिक्षित और अनुभवी हाथों में होने से प्रशासनिक स्थिरता बनी रहती है। इससे नागरिकों को सरकार की दीर्घकालिक रणनीतियों पर अधिक विश्वास होता है।\n\n• सुरक्षित माहौल की गारंटी: मजबूत सुरक्षा तंत्र और प्रभावी विदेशी नीति के समन्वय से सीमाओं पर शांति बनी रहती है। इसका सीधा अनुकूल प्रभाव देश के आर्थिक निवेश और आंतरिक व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ता है।\n\n• वैश्विक स्तर पर मान-सम्मान: विदेशों में रहने या यात्रा करने वाले भारतीय नागरिकों को एक मजबूत और स्वतंत्र विदेश नीति का सीधा लाभ मिलता है। वैश्विक मंचों पर देश की बढ़ती धाक से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रवासियों की प्रतिष्ठा और सुरक्षा मजबूत होती है।\n\n• विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा: प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ाई कर देश के शीर्ष स्तर तक पहुंचने की यह प्रेरक यात्रा देश के युवाओं के लिए एक मार्गदर्शक का काम करती है। यह उन्हें राष्ट्र निर्माण में योगदान देने के लिए उच्च शिक्षा की ओर प्रेरित करती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nभारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति और कूटनीतिक समन्वय के पीछे एक सुनियोजित और एकीकृत रणनीति काम कर रही है, जो रक्षा और कूटनीति के बीच के अंतर को समाप्त करती है।\n\n• एकीकृत सुरक्षा ढांचा: आधुनिक वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए रक्षा और विदेश नीति का समानांतर चलना आवश्यक हो गया है। सरकार ने सैन्य खुफिया रणनीतियों और कूटनीतिक संवाद को आपस में जोड़कर एक व्यापक रक्षा रणनीति तैयार की है।\n\n• तनाव कम करने का प्रयास: ब्रिक्स जैसे बड़े वैश्विक सम्मेलनों के सुचारू आयोजन के लिए द्विपक्षीय गतिरोधों को दूर करना आवश्यक था। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए कूटनीतिक और रक्षा वार्ताकारों को संयुक्त रूप से सक्रिय किया गया।\n\n• दबाव मुक्त कूटनीति की मांग: वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच भारत को अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखनी थी। इसके लिए गहरे कूटनीतिक ज्ञान और सैन्य सूझबूझ की समन्वित जरूरत थी, जो इन दोनों दिग्गजों के साथ आने से पूरी हुई।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. अजीत डोभाल ने अपनी उच्च शिक्षा कहां से पूरी की और उनकी मुख्य डिग्री क्या है?\nअजीत डोभाल ने साल 1967 में आगरा विश्वविद्यालय (अब डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय) से अर्थशास्त्र (इकोनॉमिक्स) में एमए (MA) की डिग्री पूरी की थी, जिसमें वे टॉपर रहे थे।\n\n2. डॉ. एस जयशंकर की उच्च शैक्षणिक योग्यताएं क्या हैं?\nडॉ. एस जयशंकर ने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज से केमिस्ट्री में बीएससी (BSc) किया है और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से राजनीति विज्ञान में एमए, एमफिल तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध में पीएचडी (PhD) की उपाधि ली है।\n\n3. अजीत डोभाल को 'भारत का जेम्स बॉन्ड' क्यों कहा जाता है?\nअजीत डोभाल ने देश की खुफिया एजेंसियों (IB और RAW) के साथ जुड़कर कई वर्षों तक अत्यंत चुनौतीपूर्ण और खतरनाक माहौल में अंडरकवर ऑपरेशन्स किए थे, जिसके कारण उन्हें यह उपनाम दिया गया।\n\n4. डॉ. एस जयशंकर भारत के विदेश मंत्री बनने से पहले किन महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर रह चुके हैं?\nडॉ. एस जयशंकर साल 1977 बैच के आईएफएस (IFS) अधिकारी रहे हैं और वे सिंगापुर में उच्चायुक्त, इसके अलावा चीन, अमेरिका और चेक गणराज्य में भारत के राजदूत तथा देश के विदेश सचिव की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं।\n\n5. अजीत डोभाल ने किस वर्ष और किस कैडर से अपने आईपीएस (IPS) करियर की शुरुआत की थी?\nअजीत डोभाल ने साल 1968 में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद केरल कैडर से एक आईपीएस (IPS) अधिकारी के रूप में अपनी सेवा शुरू की थी।",
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  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-09-27",
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