# इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एमबीबीएस में बुजुर्गों के लिए 1 प्रतिशत आरक्षण की मांग को किया खारिज

> इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नीट के माध्यम से एमबीबीएस और अन्य मेडिकल कोर्स में वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक प्रतिशत कोटा या आरक्षण मांगने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के नीतिगत मामलों पर विधायिका या सरकार को विचार करना चाहिए।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-10-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/allahabad-high-court-ne-mbbs-mein-senior-citizens-ke-liye-1-percent-reservation-ki-maang-ko-kharij-kiya-50032 · **Language:** Hindi
**Tags:** इलाहाबाद हाई कोर्ट, नीट प्रवेश, एमबीबीएस आरक्षण, मेडिकल कोर्सेस, वरिष्ठ नागरिक, अशोक बहार, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी

**इलाहाबाद हाई कोर्ट** ने हाल ही में दिए अपने एक फैसले में सिंगल जज के आदेश को सही ठहराते हुए नीट के जरिए एमबीबीएस और अन्य मेडिकल पाठ्यकमों में प्रवेश के लिए पात्र वरिष्ठ नागरिकों के वास्ते एक प्रतिशत आरक्षण या विशेष कोटा देने की याचिका को नामंजूर कर दिया है। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने अशोक बहार की तरफ से दायर की गई विशेष अपील का निपटारा करते हुए यह टिप्पणी की कि प्रस्तावित आरक्षण के संबंध में संबंधित विधायिका या सरकार को विचार करना चाहिए।

 

## आरक्षण को लेकर कोई कानूनी प्रावधान नहीं
 सुनवाई के दौरान बेंच ने यह बात साफ तौर पर कही कि इस तरह के किसी भी प्रस्तावित आरक्षण के लिए वर्तमान में कोई प्रावधान मौजूद नहीं है और याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन में ऐसा कोई भी कानूनी अधिकार शामिल नहीं था जिसके आधार पर रिट ऑफ मैंडेमस जारी करने की आवश्यकता पड़े। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि एमबीबीएस और अन्य मेडिकल कोर्स में दाखिले के मामले में पात्र बुजुर्गों के लिए आरक्षण की मांग करने वाला अभ्यावेदन किसी भी ऐसे अधिकार पर आधारित नहीं है।

 

## अशोक बहार ने दाखिल की थी विशेष अर्जी
 अशोक बहार ने अदालत में अर्जी दाखिल करते हुए यह मांग रखी थी कि अधिकारियों को उनके अभ्यावेदन पर विचार करने का निर्देश दिया जाए। साथ ही नीट के माध्यम से एमबीबीएस और अन्य मेडिकल कोर्सेज में दाखिले के लिए योग्य सीनियर सिटिजन्स के वास्ते एक प्रतिशत रिजर्वेशन या विशेष कोटा निर्धारित करने के लिए उचित नीतिगत फैसला लिया जाए। उनकी यह भी मांग थी कि अधिकारियों को 23 जून, 2026 के उनके लंबित अभ्यावेदन पर एक निश्चित समय सीमा के भीतर एक तर्कपूर्ण और बोलने वाला आदेश पारित करके फैसला सुनाने का निर्देश दिया जाए।

 इससे पहले सिंगल जज ने इस आधार पर रिट याचिका को खारिज कर दिया था कि यह पूरा मामला नीतिगत दायरे से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई रिट ऑफ मैंडेमस को जारी करने से साफ इंकार कर दिया गया था। उसी आदेश को चुनौती देते हुए, बहार ने मौजूदा इंट्रा-कोर्ट अपील का रुख किया था।

 

## एनटीए केवल परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था
 नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के वकील ने डिवीजन बेंच के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए बताया कि एनटीए केवल एक परीक्षा कराने वाली संस्था है और एमबीबीएस कोर्स में दाखिले की प्रक्रिया मौजूदा कानूनों तथा नीतियों के अनुसार ही संचालित होती है। बेंच को यह भी बताया गया कि वर्तमान स्थिति में अपीलकर्ता द्वारा जैसी मांग की जा रही है, वैसा कोई भी प्रावधान अस्तित्व में नहीं है। यह पूरा मामला वैसे भी संबंधित विधायिका या फिर सरकार के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आता है। बेंच ने अपने फैसले में आगे जिक्र किया कि याचिकाकर्ता का अभ्यावेदन कोई कानूनी अभ्यावेदन नहीं था, बल्कि इसे केवल मैंडेमस की मांग करने वाली रिट याचिका को सुनवाई योग्य बनाए रखने के लिए जरूरी शर्तों को पूरा करने के उद्देश्य से पेश किया गया था।

 
> बेंच ने कहा कि हमारी यह राय है कि अपील करने वाला इस विषय को कार्यपालिका या विधायिका के समक्ष ले जा सकता है, जैसा भी मामला हो, लेकिन मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, मैंडेमस जारी करने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।
 अदालत ने इस बात को भी रेखांकित किया कि इन मेडिकल कोर्सेज में एडमिशन के वास्ते आयु सीमा कार्यपालिका या विधायिका द्वारा तय की जानी चाहिए या नहीं, यह फैसला उन्हें ही लेना है, जब तक कि इस संबंध में पहले से ही कोई नियम तय न हो। सिंगल जज के निर्णय में किसी भी तरह की त्रुटि न पाते हुए, डिवीजन बेंच ने इस अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

## इसका आप पर असर
इस फैसले का देश भर में चिकित्सा शिक्षा और नीतिगत मामलों पर सीधा असर पड़ता है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि प्रवेश नियमों में बदलाव अदालत के आदेश से नहीं बल्कि नीतिगत स्तर पर होने चाहिए।

- **भारत में:** मेडिकल कोर्सेज में प्रवेश चाहने वाले सभी उम्मीदवारों और बुजुर्गों के लिए यह साफ हो गया है कि आयु आधारित आरक्षण का कोई नया कोटा स्वतः लागू नहीं होगा।

- **उत्तर प्रदेश में:** इस राज्य से जुड़े इस कानूनी मामले के बाद यह तय हो गया है कि नीतिगत बदलावों के लिए केवल संबंधित सरकारों या विधायिका के समक्ष ही अपील की जा सकती है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह मामला इसलिए सामने आया क्योंकि एक याचिकाकर्ता ने मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में बुजुर्गों के लिए विशेष कोटे की मांग उठाई थी। इसके पीछे मुख्य कारण नीतिगत अभाव और कानूनी अधिकारों की अनुपस्थिति थी।

- **कानूनी स्थिति:** मौजूदा कानूनों और नियमों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए एमबीबीएस या अन्य मेडिकल प्रवेश में किसी भी प्रकार के 1 प्रतिशत आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है।

- **अदालत का दायरा:** अदालत ने स्पष्ट किया कि नीतिगत फैसले कार्यपालिका या विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और न्यायपालिका रिट ऑफ मैंडेमस के जरिए ऐसी नीतियां तय नहीं कर सकती।

- **एजेंसी की भूमिका:** नेशनल टेस्टिंग एजेंसी केवल परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था है जो स्थापित नियमों और कानूनों के दायरे में ही अपनी प्रक्रियाएं संचालित करती है।

## सवाल-जवाब

### 1. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किस याचिका को खारिज किया है?
हाई कोर्ट ने नीट के जरिए एमबीबीएस और अन्य मेडिकल कोर्स में वरिष्ठ नागरिकों के लिए 1% आरक्षण की मांग वाली याचिका को खारिज किया है।

### 2. यह मामला कोर्ट में किसने उठाया था?
यह विशेष अपील अशोक बहार द्वारा हाई कोर्ट में दायर की गई थी।

### 3. डिवीजन बेंच में किन न्यायाधीशों ने सुनवाई की?
यह फैसला जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच द्वारा सुनाया गया।

### 4. अदालत ने रिट ऑफ मैंडेमस जारी करने से क्यों मना किया?
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन में ऐसा कोई लागू करने योग्य कानूनी अधिकार शामिल नहीं था जिसके लिए रिट ऑफ मैंडेमस की आवश्यकता हो।

### 5. एनटीए ने अदालत में क्या पक्ष रखा?
एनटीए के वकील ने बताया कि एजेंसी केवल एक परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था है और मौजूदा नियमों के अनुसार ही काम करती है।

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