# इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा एनएसए निरस्त करने के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय जाएगी उत्तर प्रदेश सरकार

> उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है जिसमें नोएडा डीएम मेधा रूपम द्वारा छात्र पर लगाए गए NSA को रद्द कर 5 लाख रुपये मुआवजे का आदेश दिया गया था।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-09-09 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/allahabad-uchcha-nyayalaya-dvara-nsa-nirasta-karane-ke-phaisale-ke-khilapha-uchchatama-nyayalaya-jaegi-uttar-pradesh-sarakara-30284 · **Language:** Hindi
**Tags:** उत्तर प्रदेश, सुप्रीम कोर्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट, मेधा रूपम, एनएसए, तुषार मेहता, सूर्यकांत

उत्तर प्रदेश सरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने जा रही है, जिसमें नोएडा की जिला मजिस्ट्रेट (DM) मेधा रूपम द्वारा एक छात्र पर लगाए गए एनएसए (NSA) के तहत हिरासत आदेश को रद्द कर दिया गया था। भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय के समक्ष सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के इस कदम की जानकारी दी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में प्रशासनिक कार्रवाई को अनुचित बताते हुए पीड़ित छात्र को आर्थिक राहत प्रदान करने और दोषी अधिकारी के वेतन से मुआवजा वसूलने का आदेश जारी किया था।

 

## इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला और मुआवजे का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा क्षेत्र में मजदूरों के आंदोलन से जुड़े एक छात्र को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिए जाने के जिला प्रशासन के आदेश को निरस्त कर दिया था। अदालत ने अपने आदेश में बेहद सख्त रुख अपनाते हुए टिप्पणी की थी कि जिला मजिस्ट्रेट ने बिना पर्याप्त विवेक का इस्तेमाल किए और बिना सोचे-समझे यह हिरासत का आदेश पारित कर दिया था। उच्च न्यायालय ने छात्र के अधिकारों के हनन पर चिंता व्यक्त करते हुए राज्य प्रशासन को निर्देश दिया था कि पीड़ित छात्र को 5 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि मुआवजे की यह रकम किसी सरकारी कोष से देने के बजाय नोएडा की डीएम मेधा रूपम के मासिक वेतन से काटी जानी चाहिए।

 

## सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आई चर्चा

यह पूरा मामला बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में उस समय चर्चा में आया जब प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ एक अन्य याचिका पर सुनवाई कर रही थी। वह मामला ग्रेटर नोएडा के एक छात्र को CJP द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के संबंध में भेजे गए कारण बताओ नोटिस से जुड़ा हुआ था। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नोटिस जारी किए जाने पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने याद दिलाया कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही छात्र प्रदर्शनों में शामिल होने वाले युवाओं के खिलाफ दंडात्मक या दमनकारी कार्रवाई पर स्पष्ट रोक लगा चुका है, तो फिर स्थानीय प्रशासन की ओर से इस तरह का नोटिस जारी करने का क्या औचित्य था।

 

## नोटिस पर प्रशासनिक सफाई और राज्य सरकार का रुख

चीफ जस्टिस की टिप्पणियों के बाद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के सामने स्थिति साफ की। उन्होंने कहा कि मीडिया और अन्य माध्यमों में इस नोटिस को लेकर नोएडा की डीएम से सवाल पूछे जा रहे हैं और भ्रम की स्थिति बनी हुई है। सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि संबंधित कारण बताओ नोटिस नोएडा की जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी नहीं किया गया था, बल्कि यह कार्रवाई ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट के स्तर पर की गई थी। इसी संवाद के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस चर्चित फैसले का संदर्भ दिया जिसमें नोएडा डीएम के एनएसए आदेश को रद्द कर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को अवगत कराया कि उत्तर प्रदेश सरकार हाईकोर्ट के इस आदेश से सहमत नहीं है और इसे चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करेगी।

## इसका आप पर असर
यह मामला प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण संकेत देता है।

- **भारत में:** यह मामला पूरे देश में सरकारी अधिकारियों द्वारा बिना सोचे-समझे कठोर कानूनों के इस्तेमाल पर अदालती सख्ती को रेखांकित करता है। नागरिकों को यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि गैर-कानूनी प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ अदालतें व्यक्तिगत जवाबदेही तय कर सकती हैं।

- **उत्तर प्रदेश में:** राज्य में प्रशासनिक तंत्र द्वारा एनएसए जैसी सख्त धाराओं के प्रयोग की प्रक्रिया अब और अधिक सतर्कता के दायरे में आएगी। इससे स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन करने वाले छात्रों और कार्यकर्ताओं को मनमाने प्रशासनिक ऐक्शन के खिलाफ कानूनी सुरक्षा मिलेगी।

- **सरकारी तंत्र पर प्रभाव:** जिला मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारियों को अब कोई भी आदेश पारित करने से पहले कानूनी पहलुओं का गहन विश्लेषण करना होगा। वेतन से मुआवजा वसूली का प्रावधान अफसरों को जल्दबाजी या दबाव में फैसले लेने से रोकेगा।

- **छात्रों और प्रदर्शनकारियों के अधिकार:** शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने वाले युवाओं पर दंडात्मक कार्रवाई के खिलाफ न्यायपालिका का रुख स्पष्ट हुआ है। इससे आम नागरिकों का कानूनी प्रक्रिया और न्यायिक व्यवस्था में भरोसा मजबूत होगा।

## ऐसा क्यों हुआ
यह कानूनी विवाद प्रशासनिक आदेश की वैधता, न्यायिक समीक्षा और कारण बताओ नोटिस जारी करने की प्रक्रिया से उत्पन्न हुआ है।

- **एनएसए आदेश रद्द होना:** इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि नोएडा डीएम ने एक मजदूर आंदोलन से जुड़े छात्र के खिलाफ बिना विवेक का सही इस्तेमाल किए एनएसए के तहत कार्रवाई की थी। इसी आधार पर कोर्ट ने आदेश रद्द कर अधिकारी के वेतन से 5 लाख रुपये मुआवजे का निर्देश दिया।

- **सुप्रीम कोर्ट में मामला उठना:** ग्रेटर नोएडा के एक अन्य छात्र को सीजेपी प्रदर्शन में शामिल होने पर कारण बताओ नोटिस भेजा गया था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा छात्रों पर दंडात्मक कार्रवाई पर रोक के बावजूद नोटिस भेजे जाने पर शीर्ष अदालत ने सवाल खड़े किए।

- **प्रशासनिक भूमिका पर सफाई:** सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि विवादित कारण बताओ नोटिस नोएडा डीएम ने नहीं बल्कि ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने जारी किया था। इसी चर्चा के दौरान राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का ऐलान किया।

## सवाल-जवाब

### 1. यूपी सरकार किस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा रही है?
यूपी सरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी जिसमें नोएडा डीएम के एनएसए आदेश को रद्द कर छात्र को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।

### 2. नोएडा डीएम मेधा रूपम पर कोर्ट ने क्या निर्देश दिया था?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि एनएसए रद्द होने पर पीड़ित छात्र को दिए जाने वाले 5 लाख रुपये के मुआवजे की राशि नोएडा डीएम मेधा रूपम के वेतन से वसूली जाए।

### 3. सुप्रीम कोर्ट में यह मामला किस दौरान उठा?
सुप्रीम कोर्ट में ग्रेटर नोएडा के एक छात्र को सीजेपी प्रदर्शन में भाग लेने पर जारी कारण बताओ नोटिस पर सुनवाई के दौरान यह मुद्दा सामने आया।

### 4. कारण बताओ नोटिस किसने जारी किया था?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट किया कि कारण बताओ नोटिस नोएडा डीएम ने नहीं, बल्कि ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने जारी किया था।

### 5. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने क्या सवाल पूछा?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सवाल उठाया कि जब अदालत छात्रों के प्रदर्शन में शामिल होने पर सख्त कार्रवाई पर रोक लगा चुकी है, तो फिर प्रशासन ने कारण बताओ नोटिस कैसे जारी किया।

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