अश्लील सामग्री पर सरकार का कड़ा प्रहार: दो साल में 50 प्लेटफॉर्म ब्लॉक, नए नियमों से सोशल मीडिया की बढ़ी जिम्मेदारी केंद्र सरकार ने डिजिटल स्पेस को सुरक्षित बनाने के लिए पिछले दो वर्षों में 50 प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके साथ ही सोशल मीडिया कंपनियों के लिए नियम सख्त करते हुए आपत्तिजनक सामग्री को हटाने की समय सीमा घटाकर महज तीन घंटे कर दी गई है। भारत सरकार ने देश में डिजिटल स्पेस को स्वच्छ और सुरक्षित बनाने के लिए एक व्यापक अभियान छेड़ दिया है। इंटरनेट पर तेजी से फैल रही अश्लीलता, बाल यौन शोषण सामग्री और हानिकारक डिजिटल सामग्री पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार ने पिछले दो वर्षों के भीतर पचास से अधिक OTT प्लेटफॉर्म्स को भारत में पूरी तरह से ब्लॉक या डिसेबल कर दिया है। इस बड़ी कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य इंटरनेट को एक ओपन, सुरक्षित, भरोसेमंद और पूरी तरह से जवाबदेह माध्यम बनाना है। सरकार का यह कदम विशेष रूप से बच्चों और युवाओं के लिए एक सुरक्षित डिजिटल माहौल तैयार करने की दिशा में उठाया गया है, ताकि वे बिना किसी खतरे के इंटरनेट का लाभ उठा सकें। संसद में मंत्रियों ने स्पष्ट किया सरकार का रुख इस पूरी कार्रवाई और भविष्य की नीतियों की विस्तृत जानकारी केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बाईस जुलाई दो हजार छब्बीस को लोकसभा में एक लिखित जवाब के माध्यम से देश के सामने रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इंटरनेट की पहुंच बढ़ने के साथ ही नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन ने भी सदन को अवगत कराया कि आपत्तिजनक, अश्लील और समाज पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाली सामग्री परोसने वाले OTT प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ निरंतर और सख्त कार्रवाई की जा रही है। सरकार अब किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है और लगातार निगरानी तंत्र को मजबूत किया जा रहा है। कड़े कानूनों के तहत हुई प्लेटफॉर्म्स की तालाबंदी पिछले चौबीस महीनों में जिन पचास OTT प्लेटफॉर्म्स को ब्लॉक किया गया है, वे लगातार चेतावनियों के बावजूद अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री का प्रसारण कर रहे थे। सरकार के अनुसार, यह सख्त कार्रवाई मुख्य रूप से दो कड़े कानूनों के तहत की गई है। इनमें पहला है भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा दो सौ चौरानवे, जो सार्वजनिक रूप से अश्लील कृत्यों या गानों को रोकने के लिए लागू की जाती है। इसके अलावा महिलाओं के अशोभनीय प्रतिनिधित्व (प्रतिषेध) अधिनियम, उन्नीस सौ छियासी का भी सख्ती से इस्तेमाल किया गया है, ताकि डिजिटल मंचों पर महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले कंटेंट को तुरंत रोका जा सके। सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आम जनता या एजेंसियों से कोई भी पुख्ता शिकायत मिलने पर संबंधित OTT प्लेटफॉर्म और अन्य इंटरमीडियरी कंपनियों के खिलाफ बिना किसी देरी के नियमित रूप से दंडात्मक कार्रवाई की जाती है। गैरकानूनी सामग्री हटाने के लिए अब सिर्फ तीन घंटे का समय डिजिटल दुनिया में कोई भी आपत्तिजनक वीडियो या तस्वीर कुछ ही मिनटों में वायरल हो सकती है, इसलिए सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों के लिए नियमों को पहले से कहीं अधिक सख्त कर दिया है। हाल ही में किए गए कड़े संशोधनों के बाद, अब यदि किसी भी अदालत या सरकारी संस्था की ओर से कोई आदेश जारी होता है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को गैरकानूनी कंटेंट को हर हाल में तीन घंटे के भीतर हटाना होगा। पहले इस काम के लिए कंपनियों को छत्तीस घंटे तक का लंबा समय मिलता था, जिससे सामग्री के वायरल होने का खतरा बना रहता था। इसके साथ ही, आम यूजर्स की सामान्य शिकायतों के निपटारे की समय सीमा को भी बहत्तर घंटे से घटाकर सीधे छत्तीस घंटे कर दिया गया है। वहीं, जो मामले बेहद संवेदनशील प्रकृति के हैं, उनके लिए यह समय सीमा चौबीस घंटे से कम करके महज दो घंटे तय कर दी गई है। डीपफेक और निजी तस्वीरों पर जीरो टॉलरेंस की नीति आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल के बीच सरकार ने यह बिल्कुल साफ कर दिया है कि चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मैटेरियल (CSAM), एआई जनरेटेड डीपफेक, किसी भी तरह के पोर्नोग्राफिक कंटेंट और बिना सहमति के साझा की गई निजी तस्वीरों (NCII) के मामलों में बिल्कुल जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाएगी। अब सोशल मीडिया कंपनियों को ऐसी शिकायतें मिलते ही तत्काल प्रभाव से कार्रवाई करनी होगी। यदि किसी प्लेटफॉर्म को न्यूडिटी, मॉर्फ्ड फोटो या किसी व्यक्ति की निजी तस्वीरों से जुड़ी कोई भी शिकायत प्राप्त होती है, तो उसे अधिकतम दो घंटे के भीतर उस कंटेंट को हटाने या ब्लॉक करने के लिए तकनीकी कदम उठाने होंगे। इसके अलावा, अब यह भी अनिवार्य कर दिया गया है कि एआई की मदद से तैयार किए गए डीपफेक और सिंथेटिक मीडिया कंटेंट पर स्पष्ट रूप से लेबल लगाया जाए और भविष्य की जांच के लिए उसका मेटाडेटा सुरक्षित रखा जाए। बच्चों की ऑनलाइन प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा पर विशेष ध्यान सरकार का मानना है कि इंटरनेट पर सबसे बड़ा खतरा मासूम बच्चों को है। इसलिए उनकी ऑनलाइन सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, दो हजार तेईस के तहत कई अहम प्रावधान लागू किए गए हैं। इन नए नियमों के मुताबिक, अब किसी भी प्लेटफॉर्म को बच्चों का डिजिटल डेटा प्रोसेस करने से पहले उनके माता-पिता की स्पष्ट सहमति लेना अनिवार्य होगा। सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि इंटरनेट पर बच्चों की ऑनलाइन ट्रैकिंग पर अब पूरी तरह से रोक रहेगी। टेक कंपनियां अब बच्चों की बिहेवियर मॉनिटरिंग नहीं कर सकेंगी, यानी उनकी आदतों का डिजिटल प्रोफाइल नहीं बनाया जा सकेगा। इसके परिणामस्वरूप, बच्चों को टारगेटेड विज्ञापन भी नहीं दिखाए जा सकेंगे, जो अक्सर उन्हें गुमराह करते हैं या गलत उत्पाद खरीदने के लिए प्रेरित करते हैं। युवाओं में बढ़ती डिजिटल लत और मानसिक स्वास्थ्य का संकट ऑनलाइन खतरों में सिर्फ अश्लीलता ही नहीं, बल्कि गेमिंग की लत भी शामिल है। इसी को देखते हुए सरकार ने ऑनलाइन गेमिंग (प्रमोशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, दो हजार पच्चीस को युवाओं में तेजी से बढ़ती डिजिटल लत और इसके कारण होने वाले ऑनलाइन वित्तीय नुकसान को रोकने की दिशा में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक कदम बताया है। हाल ही में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण दो हजार पच्चीस-छब्बीस के आंकड़ों में भी इस बात पर गहरी चिंता जताई गई है कि पंद्रह से उनतीस वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में डिजिटल एडिक्शन अब एक बेहद गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती का रूप ले चुका है। इस लत का सीधा और गहरा असर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। इंटरनेट पर साइबर बुलिंग के मामलों में भारी बढ़ोतरी देखी जा रही है, और साथ ही युवा वर्ग में ऑनलाइन जुए के कारण भारी वित्तीय नुकसान और कर्ज में डूबने का खतरा भी लगातार बढ़ रहा है। साइबर जागरूकता के लिए बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण अभियान इन सभी डिजिटल चुनौतियों से निपटने के लिए केवल कानून ही काफी नहीं हैं, बल्कि जनता को जागरूक करना भी उतना ही जरूरी है। सरकार ने संसद को बताया कि सूचना सुरक्षा शिक्षा और जागरूकता (ISEA) परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर काम किया जा रहा है। अब तक देश भर में छह हजार छह सौ पचास साइबर जागरूकता कार्यशालाएं सफलतापूर्वक आयोजित की जा चुकी हैं। इन महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में ग्यारह लाख सैंतीस हजार से अधिक नागरिकों ने हिस्सा लिया है। इस अभियान को जमीनी स्तर तक ले जाने के लिए स्कूलों, कॉलेजों, शिक्षकों, पुलिस बल, सरकारी कर्मचारियों और आम नागरिकों के लिए साइबर सुरक्षा से जुड़े विशेष पोस्टर, विस्तृत वीडियो, हैंडबुक और ब्रोशर तैयार किए गए हैं। यहां तक कि छोटे बच्चों को साइबर खतरों के बारे में आसानी से समझाने के लिए कार्टून स्टोरी भी विकसित की गई हैं। इस पूरी मुहिम में CERT-In, शिक्षा मंत्रालय, CBSE और NCERT जैसी प्रमुख संस्थाएं भी लगातार साइबर सुरक्षा और डिजिटल शिष्टाचार को लेकर व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चला रही हैं। नियम तोड़ने वाले प्लेटफॉर्म्स से छिनेगी कानूनी सुरक्षा सरकार ने सभी टेक कंपनियों और डिजिटल मंचों को कड़ी चेतावनी देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई भी सोशल मीडिया या डिजिटल प्लेटफॉर्म आईटी नियमों का पूरी ईमानदारी से पालन नहीं करता है, तो उसे आईटी एक्ट की धारा उनासी के तहत मिलने वाली ‘सेफ हार्बर’ की कानूनी सुरक्षा से हाथ धोना पड़ेगा। सेफ हार्बर हटने का सीधा मतलब यह है कि प्लेटफॉर्म पर मौजूद किसी भी गैरकानूनी सामग्री के लिए वह कंपनी खुद कानूनी रूप से जिम्मेदार मानी जाएगी और उसके खिलाफ सीधे तौर पर अदालत में दंडात्मक कार्रवाई की जा सकेगी। केंद्र सरकार का दृढ़ता से मानना है कि आज की डिजिटल दुनिया में तेजी से बढ़ते साइबर अपराध, अश्लील और भ्रामक कंटेंट, डीपफेक के खतरे और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को देखते हुए यह सख्ती समय की मांग है। आने वाले समय में इन सभी नियमों के जमीनी स्तर पर पालन को सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र को और अधिक मजबूत किया जाएगा, ताकि इंटरनेट का पूरा इकोसिस्टम देश के हर नागरिक के लिए पूरी तरह से सुरक्षित और उपयोगी बन सके। इसका आप पर असर • भारत में: आम इंटरनेट यूजर्स और खासकर बच्चों के लिए ऑनलाइन स्पेस अधिक सुरक्षित होगा, क्योंकि आपत्तिजनक कंटेंट और डीपफेक अब तेजी से हटाए जाएंगे। • भारत में: सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही बढ़ेगी, जिससे यूजर्स की शिकायतों का निपटारा 72 घंटे के बजाय अब 36 घंटे में हो सकेगा। सवाल-जवाब 1. पिछले दो वर्षों में सरकार ने कितने OTT प्लेटफॉर्म्स को ब्लॉक किया है? सरकार ने अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री का प्रसारण करने के कारण पिछले दो वर्षों में 50 OTT प्लेटफॉर्म्स को ब्लॉक किया है। 2. गैरकानूनी सामग्री हटाने के लिए सोशल मीडिया कंपनियों को अब कितना समय मिलेगा? नए नियमों के तहत, सरकारी या अदालती आदेश मिलने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को गैरकानूनी सामग्री अधिकतम 3 घंटे के भीतर हटानी होगी। 3. संवेदनशील मामलों में कंटेंट हटाने की समय सीमा क्या है? डीपफेक, न्यूडिटी या बिना सहमति साझा की गई निजी तस्वीरों जैसे संवेदनशील मामलों में कंटेंट को सिर्फ 2 घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य कर दिया गया है। 4. डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट का बच्चों पर क्या असर होगा? इस एक्ट के तहत बच्चों की ऑनलाइन ट्रैकिंग, बिहेवियर मॉनिटरिंग और उन्हें टारगेटेड विज्ञापन दिखाने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। 5. अगर कोई सोशल मीडिया कंपनी इन नियमों का पालन नहीं करती है, तो क्या होगा? नियम तोड़ने पर प्लेटफॉर्म को आईटी एक्ट की धारा 79 के तहत मिलने वाली 'सेफ हार्बर' की कानूनी सुरक्षा नहीं मिलेगी और उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। https://trendkia.com/national/ashlila-samagri-para-sarakara-ka-kara-prahara-do-sala-men-50-pletaphorma-bloka-nae-niyamon-se-social-media-ki-barhi-jimmedari-9859 TrendKia — Har trend, sabse pehle.