आवारा श्वान विवाद के बीच इतिहास, नस्लों और महात्मा गांधी के रुख पर गहरी पड़ताल सड़कों पर कुत्तों की मौजूदगी और आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर छिड़ी तीखी बहस के बीच श्वान-मानव संबंधों के ऐतिहासिक सफर, गाइड डॉग की भूमिका और 1926 में दिए गए महात्मा गांधी के व्यावहारिक विचारों पर रोशनी डाली गई है। सार्वजनिक स्थलों, कॉलोनियों और इंटरनेट के मंचों पर इन दिनों कुत्तों को लेकर निरंतर टकराव की स्थिति बनी हुई है। रिहायशी बस्तियों में घूमने वाले आवारा श्वानों को खाना खिलाने, उनके अधिकारों की रक्षा करने और उनकी देखभाल करने वाले पशु प्रेमी एक पाले में खड़े दिखाई देते हैं। ठीक इसके सामने वे नागरिक खड़े हैं जो सुरक्षा, रास्तों पर गंदगी और बच्चों व बुजुर्गों पर होने वाले हमलों को लेकर लगातार चिंता जता रहे हैं। उनका सीधा सवाल है कि सार्वजनिक पार्कों और गलियों में बेरोकटोक घूमने वाले इन जीवों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं, खौफ और काटने की घटनाओं की जवाबदेही किसकी है। यह विवाद अब मात्र सोशल मीडिया पर चलने वाली तीखी प्रतिक्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की शीर्ष अदालतों, स्थानीय नगर निगमों और मोहल्लों की सड़कों पर होने वाले रोजमर्रा के झगड़ों में बदल चुका है। देश की राजधानी दिल्ली समेत कई महानगरों और छोटे कस्बों में यह टकराव आए दिन हिंसक झड़प और कानूनी मुकदमों का कारण बन रहा है। एक तरफ इंसानी जान और नागरिकों की सामान्य दिनचर्या की सुरक्षा है, तो दूसरी तरफ बेजुबान जीवों के प्रति मानवीय संवेदना और सह-अस्तित्व की पुरानी परंपरा। इस जटिल सामाजिक समस्या को केवल दो गुटों के आपसी मतभेद के रूप में नहीं समझा जा सकता। इसके लिए मनुष्य और श्वान के हजारों वर्षों पुराने साझे इतिहास, उनकी विविध नस्लों की कार्यक्षमता और समाज में उनके स्थान को गहराई से समझना जरूरी है। वरिष्ठ लेखक, पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार पुष्परंजन की हालिया शोधपरक कृति 'मेरा मुन्नू' इसी विस्तृत परिप्रेक्ष्य को सामने लाती है, जो महज पशु प्रेम की दास्तान न होकर दोनों प्रजातियों के भावनात्मक और ऐतिहासिक विकास को दर्ज करती है। मानव सभ्यता और श्वान का सह-अस्तित्व इंसान और कुत्ते का आपसी बंधन दुनिया के सबसे पुराने और अनूठे संबंधों में गिना जाता है। यह रिश्ता केवल एक मालिक और पालतू जीव के बीच का व्यावसायिक समीकरण नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों के लिए उनका घरेलू श्वान घर का एक अभिन्न सदस्य, सुख-दुख का सच्चा साथी और जीवन के अकेलेपन को दूर करने वाला सबसे विश्वसनीय सहारा बन जाता है। इस जीव के चले जाने के बाद घरों में जो खालीपन पैदा होता है, उसे किसी अन्य चीज से भरना संभव नहीं होता। सभ्यता के विकास क्रम में यह पड़ताल बेहद दिलचस्प है कि कब और किन विशेष परिस्थितियों में एक जंगली शिकारी जीव मानव बस्तियों के नजदीक आया, उसने इंसानों की सुरक्षा और सहयोग का जिम्मा संभाला और समय के साथ दोनों के बीच अटूट विश्वास की नींव पड़ी। कुत्तों की दुनिया में नस्लों की विविधता उनकी शारीरिक और मानसिक विशेषताओं को दर्शाती है। जर्मन शेफर्ड, लैब्राडोर, गोल्डन रिट्रीवर, बीगल और बुलडॉग जैसी जानी-मानी विदेशी नस्लें अपनी खास खूबियों के कारण पूरी दुनिया में पहचानी जाती हैं। जर्मन शेफर्ड और बुलडॉग जैसी नस्लें अपनी सजगता, शारीरिक ताकत और चौकसी के कारण पुलिस और सैन्य बलों के सुरक्षा कार्यों में तैनात की जाती हैं। वहीं लैब्राडोर और बीगल अपनी अद्भुत घ्राण शक्ति (सूंघने की क्षमता) के चलते मादक पदार्थों, विस्फोटकों और आपदाओं में दबे जीवित व्यक्तियों की तलाश के खोजी अभियानों में अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। कई अन्य नस्लें अपने शांत, धैर्यवान और बच्चों के साथ घुल-मिल जाने वाले मिलनसार स्वभाव के लिए पारिवारिक घरों की पसंद बनती हैं। विदेशी नस्लों के ग्लैमर के बीच भारत की प्राचीन देशी नस्ल, जिसे इंडियन पैरियाह के नाम से जाना जाता है, विशेष महत्व रखती है। ये देशी श्वान सदियों से भारतीय उपमहाद्वीप की कठोर जलवायु, मौसमी बदलावों और स्थानीय परिवेश के अनुरूप प्राकृतिक रूप से विकसित हुए हैं। इनका रोग प्रतिरोधक तंत्र बेहद मजबूत होता है, इनकी देखरेख में न्यूनतम संसाधन लगते हैं और विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहने की इनकी जीवटता व अनुकूलन क्षमता किसी भी विदेशी नस्ल की तुलना में कहीं अधिक टिकाऊ साबित होती है। गाइड डॉग: सेवा, विश्वास और सामाजिक उपयोगिता मनुष्य और श्वान के परस्पर सहयोग का सबसे उत्कृष्ट और प्रेरक रूप दृष्टिबाधित व्यक्तियों की सहायता करने वाले गाइड डॉग्स के रूप में देखने को मिलता है। प्रथम विश्वयुद्ध के भयानक दौर के बाद जब बड़ी संख्या में सैनिक अपनी आंखों की रोशनी गंवा बैठे, तब जर्मनी में दृष्टिबाधित सैनिकों के पुनर्वास और स्वतंत्र जीवन के लिए कुत्तों को विशेष रूप से प्रशिक्षित करने की औपचारिक योजना तैयार की गई। इसी कड़ी में वर्ष 1916 में जर्मनी के ओल्डेनबर्ग शहर में दृष्टिबाधित लोगों के लिए दुनिया का पहला गाइड डॉग स्कूल स्थापित किया गया था। इस ऐतिहासिक पहल के बाद इन प्रशिक्षित श्वानों ने दृष्टिबाधित नागरिकों को व्यस्त सड़कों, घुमावदार रास्तों, गड्ढों और भौतिक बाधाओं से पूरी तरह सुरक्षित निकालने का अद्भुत कार्य शुरू किया। आज विश्व के अनेक विकसित देशों में यह व्यवस्था दृष्टिबाधित इंसानों को बिना किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर रहे स्वाभिमान और पूर्ण आजादी के साथ घूमने-फिरने की ताकत देती है। यह उदाहरण दिखाता है कि जब इंसान और पशु के बीच विश्वास को वैज्ञानिक प्रशिक्षण और संवेदनशील दृष्टि दी जाती है, तो वह समाज की सबसे बड़ी शारीरिक बाधाओं को भी पार कर सकता है। 1926 में आवारा और हिंसक श्वानों पर महात्मा गांधी का विचार श्वान विवाद के विमर्श में सबसे विचारोत्तेजक और अप्रत्याशित पहलू महात्मा गांधी का वह दृष्टिकोण है, जो उन्होंने वर्ष 1926 में प्रकट किया था। महात्मा गांधी को पूरे विश्व में सत्य, अहिंसा, करुणा और समस्त जीवों के प्रति दया का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में आज के माहौल में यह तथ्य कई लोगों को स्तब्ध कर सकता है कि बापू ने आवारा और असाध्य रूप से हिंसक अथवा पागल हो चुके कुत्तों को समाप्त करने का सैद्धांतिक समर्थन किया था। वर्ष 1926 में इस विषय पर अपनी राय रखते हुए गांधीजी ने स्पष्ट किया था कि यदि कोई कुत्ता समाज और आम जनता के लिए अत्यंत गंभीर व जानलेवा खतरा बन चुका हो, और उसे नियंत्रित करने, बांधने, अलग रखने या उसके रोग का उपचार करने का कोई भी व्यावहारिक रास्ता शेष न बचा हो, तो ऐसी स्थिति में उस पशु की अंतहीन पीड़ा और समाज पर मंडराते खतरे को देखते हुए उसका वध करना अनुचित नहीं है। गांधीजी के चिंतन में अहिंसा का तात्पर्य केवल हर परिस्थिति में किसी देह को किसी भी हाल में जीवित बनाए रखना नहीं था। उनके अनुसार अहिंसा में व्यापक जनहित, सामाजिक जिम्मेदारी और उस असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिलाना भी शामिल था, जिसका कोई तार्किक समाधान उपलब्ध न हो। गांधीजी का यह ऐतिहासिक रुख आज के उस मूल सवाल का जवाब तलाशने में महत्वपूर्ण संदर्भ देता है कि बेजुबान जीवों के प्रति दया भाव और आम नागरिकों की सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन की रेखा कहां खींची जानी चाहिए। पशु क्रूरता का स्याह पहलू और मौजूदा भारतीय परिप्रेक्ष्य मानव इतिहास में कुत्तों के साथ इंसान का व्यवहार हमेशा करुणा और आदर का नहीं रहा है। कई स्थानों पर अपने ही साथी जीव के प्रति मनुष्य की घोर संवेदनहीनता और क्रूरता सामने आती रही है। इसका एक वीभत्स और संगठित रूप पड़ोसी देश पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के कुछ ग्रामीण इलाकों में होने वाली कुत्तों की खूनी लड़ाइयों के रूप में देखा जाता है। वहां बुली कुट्टा जैसी बेहद भारी-भरकम, आक्रामक और ताकतवर नस्लों को अखाड़ों में एक-दूसरे के खिलाफ जानलेवा मुकाबलों में उतारा जाता है। इन मुकाबलों में भारी रकम का सट्टा लगाया जाता है और समाज के सामंती तबके में इसे झूठी मर्दानगी व पारिवारिक प्रतिष्ठा के प्रदर्शन से जोड़ दिया जाता है। कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद लचर पुलिस व्यवस्था और निगरानी की कमी के चलते यह हिंसक खेल बेरोकटोक जारी रहता है। जिस जीव को वफादारी का प्रतीक माना गया, उसे केवल कुछ पलों के तमाशे और अवैध कमाई के लिए लहूलुहान कर देना मानवीय संवेदना के पतन को दर्शाता है। भारत में वर्तमान समय में छिड़ा विवाद भी इसी दोतरफा यथार्थ के बीच संतुलन साधने की मांग करता है। नगरों में आवारा कुत्तों द्वारा बच्चों, कामकाजी महिलाओं, रात में चलने वाले राहगीरों और बुजुर्गों पर जानलेवा हमले, रेबीज का खतरा, सार्वजनिक पार्कों में गंदगी और लोगों में बढ़ता भय कोई काल्पनिक शिकायतें नहीं हैं। ये वास्तविक नागरिक समस्याएं हैं जिन्हें महज कुछ पशु विरोधियों की संकीर्ण सोच कहकर नकारा नहीं जा सकता। वहीं दूसरी तरफ, इन जीवों को क्रूरतापूर्वक मारना, उन्हें भूखा रखना या उनके प्रति हिंसा भड़काना भी किसी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकती। समाधान अंध-विरोध या अंधी वकालत में नहीं, बल्कि कड़े वैज्ञानिक प्रबंधन, व्यवस्थित नसबंदी, टीकाकरण और गांधीजी द्वारा रेखांकित व्यावहारिक करुणा के संतुलित रास्ते पर चलने में ही निहित है। इसका आप पर असर सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों की अनियंत्रित आबादी और नागरिकों के बीच बढ़ते विवाद का सीधा असर आम जनता की दैनिक सुरक्षा और शहरी जीवन पर पड़ता है। • भारत में: देश भर के शहरों और कस्बों में मॉर्निंग वॉक करने वाले नागरिकों, बच्चों और वृद्धों की आवाजाही पर सीधा प्रभाव पड़ता है। नगर निकायों द्वारा नसबंदी और रेबीज टीकाकरण कार्यक्रमों में ढिलाई के कारण सार्वजनिक पार्कों और सड़कों पर दुर्घटनाओं का जोखिम बना रहता है। • आवासीय कॉलोनियों में: अपार्टमेंट्स और रिहायशी सोसायटियों में पालतू और आवारा श्वानों को खाना खिलाने को लेकर पड़ोसियों के बीच कानूनी और सामाजिक टकराव बढ़ रहा है। निवासियों को स्थानीय नियमों, श्वान प्रबंधन दिशानिर्देशों और बच्चों की सुरक्षा को लेकर विशेष सतर्कता बरतनी पड़ रही है। • पशु प्रेमियों के लिए: बेसहारा पशुओं को आहार देने वाले नागरिकों को अब सामाजिक विरोध और कानूनी जवाबदेही का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें निर्धारित फीडिंग पॉइंट्स और पशु कल्याण नियमों का पालन करते हुए ही सेवा कार्य करने की जरूरत है। • सार्वजनिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर: रेबीज संक्रमण और श्वान दंश के बढ़ते मामलों से सरकारी अस्पतालों पर दबाव बढ़ता है। नागरिकों को किसी भी हमले या खरोंच के तुरंत बाद चिकित्सकीय परामर्श और एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाने की सलाह दी जाती है। ऐसा क्यों हुआ यह सामाजिक टकराव मुख्य रूप से आवारा श्वानों की तेजी से बढ़ती संख्या, नागरिक सुरक्षा की अनदेखी और स्पष्ट नीतिगत क्रियान्वयन के अभाव के कारण उत्पन्न हुआ है। • सीधा कारण: आवासीय बस्तियों में बच्चों और वृद्धों पर आवारा श्वानों के जानलेवा हमलों और श्वान दंश की बढ़ती घटनाओं ने नागरिकों के मन में गहरा भय पैदा किया है। इसके चलते निवासियों और पशु प्रेमियों के बीच सड़कों से लेकर अदालतों तक सीधे टकराव शुरू हो गए हैं। • पृष्ठभूमि और स्थितियां: नगर निगमों द्वारा वैज्ञानिक तरीके से श्वान नसबंदी और टीकाकरण अभियानों का समय पर और प्रभावी संचालन न होना आबादी में बेतहाशा बढ़ोतरी का मुख्य कारण बना है। साथ ही रिहायशी इलाकों में खुले में बचा हुआ खाना फेंकने से श्वानों के झुंड आक्रामक रूप से उन क्षेत्रों पर अपना दावा जमाने लगते हैं। • ऐतिहासिक दृष्टिकोण: यह दुविधा नई नहीं है; वर्ष 1926 में स्वयं महात्मा गांधी ने अनियंत्रित और पागल हो चुके श्वानों द्वारा उत्पन्न खतरे को देखते हुए व्यावहारिक अहिंसा और समाज रक्षा का तर्क दिया था। अतीत के ये संदर्भ दिखाते हैं कि पशु करुणा और नागरिक सुरक्षा का संतुलन हमेशा से एक जटिल बहस रहा है। • आगे की दिशा: अब तक किसी एक पक्षीय समाधान पर पूर्ण सहमति नहीं बन पाई है और विभिन्न अदालतों में नियम स्पष्ट करने की प्रक्रिया चल रही है। आने वाले समय में सख्त स्थानीय नीतियां, तय फीडिंग स्पॉट्स और बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान ही इस टकराव को शांत कर सकते हैं। सवाल-जवाब 1. श्वान विवाद पर लिखी गई पुस्तक 'मेरा मुन्नू' के लेखक कौन हैं? इस शोधपरक पुस्तक के लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ पुष्परंजन हैं। 2. महात्मा गांधी ने 1926 में हिंसक और पागल श्वानों को लेकर क्या राय दी थी? गांधीजी का विचार था कि यदि कोई कुत्ता समाज के लिए जानलेवा खतरा बन जाए और उसे ठीक करने का कोई व्यावहारिक उपाय न हो, तो उसकी पीड़ा और खतरे को समाप्त करने के लिए उसका वध करना अनुचित नहीं है। 3. दुनिया का पहला गाइड डॉग स्कूल कब और कहां स्थापित किया गया था? प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वर्ष 1916 में जर्मनी के ओल्डेनबर्ग शहर में दृष्टिबाधित सैनिकों की मदद के लिए पहला गाइड डॉग स्कूल स्थापित किया गया था। 4. भारतीय देशी श्वान (इंडियन पैरियाह) की मुख्य विशेषताएं क्या हैं? ये देशी श्वान सदियों से स्थानीय जलवायु के अनुकूल विकसित हुए हैं, जिनमें अद्भुत रोग प्रतिरोधक क्षमता, कम देखभाल की आवश्यकता और विपरीत परिस्थितियों में जीने की जबरदस्त जीवटता होती है। 5. पाकिस्तान के ग्रामीण इलाकों में कुत्तों के साथ किस प्रकार की क्रूरता की परंपरा रही है? वहां बुली कुट्टा जैसी शक्तिशाली नस्लों को आपस में लड़ाकर खूनी मुकाबलों का आयोजन किया जाता है, जिस पर सट्टा लगाया जाता है और उसे झूठी प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता है। 6. पुलिस और खोजी अभियानों में आमतौर पर किन नस्लों का उपयोग किया जाता है? जर्मन शेफर्ड और बुलडॉग जैसी नस्लों को चौकसी व सुरक्षा के लिए, जबकि लैब्राडोर और बीगल को उनकी बेहतरीन सूंघने की क्षमता के कारण खोजी अभियानों में उपयोग किया जाता है। https://trendkia.com/national/avara-shvana-vivada-ke-bicha-itihasa-naslon-aura-mahatma-gandhi-ke-rukha-para-gahari-paratala-56610 TrendKia — Har trend, sabse pehle.