आजमगढ़ के रानी की सराय में मूर्तिकार ने बनाई शिव-पार्वती की संयुक्त प्रतिमा, नवरात्रि पंडालों में पहली बार दिखेगा यह रूप आजमगढ़ के रानी की सराय में मूर्तिकार अमरजीत सिंह पटेल ने इंस्टाग्राम से प्रेरणा लेकर भगवान शिव और माता पार्वती की एक अनोखी संयुक्त प्रतिमा तैयार की है। लगभग 50000 रुपये की लागत और 15 दिनों से अधिक के परिश्रम से बनी यह प्रतिमा दुर्गा पूजा पंडाल में आकर्षण का केंद्र बनेगी। शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व के करीब आते ही विभिन्न इलाकों में तैयारियां काफी तेज हो गई हैं। आजमगढ़ जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में दुर्गा पूजा के अवसर पर सजने वाले भव्य पंडालों के लिए मूर्तियों के निर्माण का काम पूरे जोर-शोर से चल रहा है। इसी सिलसिले में जिले के रानी की सराय क्षेत्र में स्थित एक मूर्ति निर्माण कार्यशाला से एक बेहद खास और भव्य प्रतिमा सामने आई है, जो इन दिनों क्षेत्र के लोगों के बीच भारी कौतूहल और आकर्षण की वजह बनी हुई है। इस शिल्पकृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें एक ही विग्रह के भीतर भगवान शिव और माता पार्वती के दोनों स्वरूपों को एक साथ बेहद कलात्मक ढंग से साकार किया गया है, जिसके दर्शन करने वाले इसे अद्भुत और मनमोहक मान रहे हैं। स्थानीय और बंगाल के हुनरमंद कारीगरों की साझा मेहनत इस अनूठी प्रतिमा को आकार देने वाले मूर्तिकार अमरजीत सिंह पटेल के अनुसार, उनकी कार्यशाला में स्थानीय कारीगरों के अलावा पश्चिम बंगाल और कोलकाता से आए विशेष रूप से हुनरमंद कारीगर भी दिन-रात काम में जुटे हुए हैं। इस कार्यशाला में पंडाल आयोजकों और आम भक्तों की पसंद व जरूरतों के हिसाब से विभिन्न प्रकार की मूर्तियां गढ़ी जा रही हैं। लोग जैसी डिजाइन या भाव-भंगिमा की मांग करते हैं, कारीगर अपनी बारीकी से हूबहू उसी तरह की प्रतिमाएं बनाकर तैयार कर देते हैं। इस बार की प्रदर्शनी में सबसे ज्यादा सुर्खियां यही संयुक्त स्वरूप बटोर रहा है, जिसमें एक ही देह में देवाधिदेव महादेव और जगतजननी मां पार्वती के दोनों आलौकिक रूपों का संगम देखने को मिलता है। अमरजीत सिंह पटेल ने स्पष्ट किया कि आजमगढ़ जनपद में दुर्गा पूजा आयोजनों के इतिहास में इस प्रकार का शिल्प विग्रह पहली बार आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए किसी पंडाल में स्थापित किया जाएगा। इस कलाकृति को इस भव्य रूप तक पहुंचाने में स्थानीय कलाकारों के अथक श्रम, निष्ठा और कलात्मक कौशल का बहुत बड़ा योगदान रहा है। डिजिटल मंच से मिली प्रेरणा और पारंपरिक निर्माण शैली इस असाधारण प्रतिमा की परिकल्पना के संदर्भ में बताते हुए मूर्तिकार ने साझा किया कि उन्हें इस विशेष डिजाइन का विचार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम से मिला था। इंस्टाग्राम पर एक रचनात्मक प्रारूप देखने के बाद उन्होंने इसे मिट्टी और पुआल के माध्यम से धरातल पर जीवंत रूप देने का पक्का इरादा कर लिया। इस कलाकृति को शुरू करने से लेकर अंतिम रूप देने तक 15 दिनों से भी अधिक का समय लगा। इसके साथ ही इस पूरी मूर्ति के निर्माण में लगभग 50000 रुपये का कुल खर्च आया है। प्रतिमा निर्माण की तकनीकी विधि और उपयोग की गई सामग्रियों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि आधुनिक डिजाइन होने के बावजूद निर्माण में पूरी तरह से सदियों पुरानी पारंपरिक पद्धतियों का ही पालन किया गया है। निर्माण के पहले चरण में पुआल की सहायता से प्रतिमा का मूल ढांचा तैयार किया गया, जिसके बाद उस पर काली मिट्टी की मजबूत परतें चढ़ाई गईं। ढांचे को मजबूती और आकार देने के पश्चात, सबसे अंतिम चरण में बारीक और चिकनी बालू मिट्टी का लेप लगाकर इसकी शानदार फिनिशिंग की गई। इस क्रमिक और जटिल प्रक्रिया के पूर्ण होने के उपरांत ही यह अलौकिक प्रतिमा अपने पूर्ण और सजीव स्वरूप में उभर कर सामने आई है। इसका आप पर असर त्योहारी सीजन में स्थानीय शिल्पकला और पूजा पंडालों की भव्यता में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। • पंडाल दर्शकों के लिए: आजमगढ़ के श्रद्धालुओं को इस बार दुर्गा पूजा में एक बिल्कुल नई और अद्भुत प्रतिमा देखने का मौका मिलेगा। जो लोग पारंपरिक उत्सवों में कलात्मक नवीनता पसंद करते हैं, उनके लिए यह पंडाल प्रमुख आकर्षण रहेगा। • स्थानीय कलाकारों के लिए: आधुनिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पारंपरिक कारीगरों के लिए नए विचारों और आजीविका का बड़ा जरिया बन रहे हैं। ग्रामीण और कस्बाई कारीगर अब डिजिटल डिजाइनों को अपनाकर अपनी आमदनी और पहचान दोनों बढ़ा सकते हैं। • त्योहारी अर्थव्यवस्था पर: पंडालों में इस तरह के विशेष शिल्पों के आने से स्थानीय स्तर पर पूजा समितियों का बजट और कारीगरों का पारिश्रमिक बढ़ रहा है। लगभग 50000 रुपये की लागत से बनी यह प्रतिमा दर्शाती है कि आयोजक अब विशिष्ट कलाकृतियों पर खर्च करने को तैयार हैं। • सांस्कृतिक पर्यटन पर: रानी की सराय क्षेत्र में इस अनूठी प्रतिमा के बनने से आसपास के कस्बों से भी लोग दर्शन और कला देखने पहुंचेंगे। इससे क्षेत्र के स्थानीय बाजारों और नवरात्रि के दौरान होने वाले कारोबार को गति मिलेगी। ऐसा क्यों हुआ यह पहल नवरात्रि और दुर्गा पूजा के आगामी उत्सव की तैयारियों के दौरान एक मूर्तिकार द्वारा रचनात्मक नवीनता लाने के उद्देश्य से शुरू हुई। डिजिटल प्रेरणा और पारंपरिक कला के मेल ने इस दुर्लभ विग्रह को संभव बनाया। • त्योहारी मांग और डिजिटल प्रेरणा: नवरात्रि के लिए मूर्तियों की सामान्य मांग के बीच मूर्तिकार ने इंस्टाग्राम पर शिव-पार्वती के इस विशिष्ट स्वरूप को देखा। उन्होंने सामान्य आकृतियों से हटकर कुछ अलग पेश करने के इरादे से इस डिजाइन को वास्तविक प्रतिमा में ढालने का फैसला किया। • विशेषज्ञ कारीगरों का समन्वय: ऐसी जटिल प्रतिमा का निर्माण केवल एक व्यक्ति के बूते संभव नहीं था, इसलिए पश्चिम बंगाल और कोलकाता के हुनरमंद कारीगरों का सहयोग लिया गया। स्थानीय और बाहरी कारीगरों के संयुक्त कौशल ने इस मुश्किल डिजाइन को 15 दिनों में साकार कर दिया। • परंपरागत निर्माण तकनीक: आधुनिक अवधारणा होने के बावजूद मूर्ति को टिकाऊ और भव्य बनाने के लिए पारंपरिक सामग्रियों का ही सहारा लिया गया। पुआल के ढांचे पर काली मिट्टी की परतें और बालू मिट्टी की फिनिशिंग देकर इसे पंडाल में सुरक्षित रूप से प्रदर्शित करने योग्य बनाया गया। सवाल-जवाब 1. शिव-पार्वती की यह अनोखी प्रतिमा आजमगढ़ में कहां बनाई गई है? यह प्रतिमा आजमगढ़ जिले के रानी की सराय स्थित मूर्तिकार अमरजीत सिंह पटेल की कार्यशाला में तैयार की गई है। 2. इस प्रतिमा की मुख्य खासियत क्या है? इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक ही शरीर के भीतर भगवान शिव और माता पार्वती दोनों के दिव्य स्वरूपों को संयुक्त रूप से उकेरा गया है। 3. मूर्तिकार को इस डिजाइन की प्रेरणा कहां से मिली? मूर्तिकार अमरजीत सिंह पटेल को इस प्रतिमा का आइडिया सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर डिजाइन देखने के बाद मिला था। 4. इस प्रतिमा को बनाने में कितना समय और खर्च लगा? इस प्रतिमा को पूरी तरह तैयार करने में 15 दिनों से अधिक का समय लगा और इसमें लगभग 50000 रुपये की लागत आई है। 5. मूर्ति निर्माण में किन कारीगरों ने सहयोग किया है? स्थानीय कारीगरों के साथ-साथ पश्चिम बंगाल और कोलकाता से आए हुनरमंद कारीगरों ने मिलकर इसे तैयार किया है। 6. इस प्रतिमा को बनाने में किन सामग्रियों और पद्धतियों का उपयोग किया गया? पारंपरिक तरीके से पुआल का ढांचा बनाकर उस पर काली मिट्टी की परतें चढ़ाई गईं और अंत में बालू मिट्टी से बेहतरीन फिनिशिंग दी गई। प्रेरणा और सबक अमरजीत सिंह पटेल और उनकी टीम की यह पहल बताती है कि कैसे नई सोच और लगन से पारंपरिक हुनर को नया मुकाम दिया जा सकता है। • डिजिटल तकनीक का रचनात्मक उपयोग: सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक हुनर को नए विचार और डिजाइन देने का सशक्त माध्यम बन सकता है। एक मूर्तिकार ने इंस्टाग्राम से विचार लेकर अपनी सदियों पुरानी कला को नया विस्तार दिया। • साझा मेहनत और टीम वर्क: स्थानीय कलाकारों ने कोलकाता और पश्चिम बंगाल के कारीगरों के साथ मिलकर काम किया। विभिन्न क्षेत्रों के हुनरमंदों के एक साथ आने से किसी भी जटिल और अनूठे काम को समय पर पूरा किया जा सकता है। • परंपरा और प्रयोग का संतुलन: नए विचार को अपनाते हुए भी अपनी बुनियादी पद्धतियों को नहीं छोड़ा गया। पुआल, काली मिट्टी और बालू मिट्टी जैसी पारंपरिक निर्माण सामग्री पर भरोसा करके ही इस आधुनिक डिजाइन को टिकाऊ स्वरूप दिया गया। https://trendkia.com/national/azamgarh-ke-rani-ki-sarai-me-murtikar-ne-banayi-shiva-parvati-ki-sanyukt-pratima-37529 TrendKia — Har trend, sabse pehle.