आजमगढ़ के रानी की सराय में मूर्तिकारों का हुनर, फोन की तस्वीर देखकर मिट्टी में ढाल रहे जीवंत प्रतिमाएं आजमगढ़ के रानी की सराय बाजार में कोलकाता और महाराष्ट्र के कारीगर स्मार्टफोन की तस्वीरों को देखकर मां दुर्गा की सजीव मूर्तियां गढ़ रहे हैं। पांच हजार से एक लाख रुपये तक बिकने वाली इन प्रतिमाओं की मांग पड़ोसी जिलों में भी खूब है। शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा का उल्लास शुरू होते ही आजमगढ़ के शहरी और देहाती इलाकों में उत्सव का अनूठा माहौल नजर आने लगता है। त्योहार के आगमन के साथ ही चारों तरफ भव्य और कलात्मक पूजा पंडालों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इन विशाल पंडालों में विधि-विधान से स्थापित होने वाली मां दुर्गा की दिव्य और आकर्षक प्रतिमाएं हर साल श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र बनती हैं। रानी की सराय बना मूर्तिकला का सबसे बड़ा केंद्र जिले भर के पूजा पंडालों में स्थापित होने वाली इन मनमोहक प्रतिमाओं का निर्माण आजमगढ़ के बेहद प्रसिद्ध बाजार रानी की सराय में किया जाता है। मूर्तियों के सबसे बड़े बाजार के रूप में पहचानी जाने वाली इस जगह पर इन दिनों दिन-रात भारी चहल-पहल देखने को मिल रही है। इस बाजार की सबसे खास बात यह है कि यहां स्थानीय कलाकारों के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों से आए कुशल कारीगर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। प्रतिमाओं के निर्माण में जुटे ये हुनरमंद कारीगर मिट्टी, पुआल, बांस और प्राकृतिक रंगों के अद्भुत तालमेल से ऐसी मूर्तियां तैयार करते हैं कि श्रद्धालु उन्हें देखते ही रह जाते हैं। दुकानों और कार्यशालाओं में कतारबद्ध सजी ये मूर्तियां पहली ही नजर में भक्तों को आकर्षित कर लेती हैं। उत्सव के कई महीने पहले से ही पश्चिम बंगाल के कोलकाता और महाराष्ट्र से आए दिग्गज मूर्तिकार आजमगढ़ के इस बाजार में डेरा जमा लेते हैं और दिन-रात एक कर प्रतिमाओं को भव्य आकार देने में जुट जाते हैं। कोलकाता की पारंपरिक नक्काशी और महाराष्ट्र की आधुनिक शैली कोलकाता से आए कलाकार पारंपरिक बंगाली शैली, तीखे नैन-नक्श और बारीक नक्काशी के लिए जाने जाते हैं। वहीं महाराष्ट्र से ताल्लुक रखने वाले मूर्तिकार प्रतिमाओं को समकालीन भव्यता, शारीरिक गठन और आकर्षक रंगों की छटा देने में पारंगत हैं। दो अलग-अलग सांस्कृतिक धाराओं और कला शैलियों का यह संगम रानी की सराय में तैयार होने वाली हर मूर्ति को सजीव और अलौकिक बना देता है। यहां की कलाकारी की ख्याति केवल आजमगढ़ जिले तक ही सीमित नहीं है। पूर्वांचल के सीमावर्ती जिलों जैसे मऊ, जौनपुर, गाजीपुर और बलिया से पूजा समितियों के पदाधिकारी कई महीने पहले ही रानी की सराय पहुंचकर अपनी पसंदीदा प्रतिमाओं की अग्रिम बुकिंग करवा लेते हैं। हर समिति की कोशिश यही रहती है कि उनके इलाके के पंडाल में स्थापित होने वाली प्रतिमा सबसे अनूठी और भव्य दिखाई दे। स्मार्टफोन की तस्वीर देखकर हूबहू ढाल रहे स्वरूप इस प्रसिद्ध बाजार की सबसे आधुनिक विशेषता कस्टमाइज्ड प्रतिमाओं का निर्माण है। आज के दौर में पूजा आयोजक सोशल मीडिया और इंटरनेट से अपनी पसंद की प्रतिमाओं की तस्वीरें फोन में लेकर कारीगरों के पास पहुंचते हैं। अनुभवी मूर्तिकार मोबाइल स्क्रीन पर दिखी तस्वीर का बारीकी से अध्ययन करते हैं और मिट्टी में बिल्कुल वैसा ही रूप उतार देते हैं। चेहरे के कोमल भावों से लेकर वस्त्रों की सलवटों और आभूषणों की बनावट तक में कोई अंतर नजर नहीं आता। दुर्गा पूजा से छठ महापर्व तक लगातार जारी रहेगी रौनक रानी की सराय के बाजार की यह गहमागहमी केवल नवरात्र या विजयादशमी तक ही सीमित नहीं रहती। दुर्गा पूजा का विसर्जन संपन्न होते ही कारीगर तुरंत दीपावली के पूजन के लिए मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाएं गढ़ने में लग जाते हैं। इसके बाद लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा के लिए भी विशेष मूर्तियों और पूजन सामग्री की तैयारी शुरू हो जाती है। इस प्रकार दुर्गा पूजा से लेकर छठ तक लगभग दो महीने यह पूरा बाजार खरीदारों, आयोजकों और कारीगरों की भीड़ से गुलजार रहता है। हर बजट में उपलब्ध, पांच हजार से एक लाख रुपये तक के विकल्प कीमतों के लिहाज से भी आजमगढ़ का यह बाजार हर वर्ग के आयोजकों के बजट में बैठता है। व्यक्तिगत पूजा या छोटे स्तर के पंडालों के लिए पांच हजार रुपये की शुरुआती कीमत में सुंदर प्रतिमाएं उपलब्ध हैं। दूसरी ओर, विशाल स्तर पर आयोजन करने वाली समितियों के लिए एक लाख रुपये तक की भव्य और विशालकाय प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। मूर्तियों के आकार, ऊंचाई, मिट्टी की गुणवत्ता और आभूषणों की सजावट के आधार पर दाम तय किए जाते हैं, जिससे हर ग्राहक अपनी पसंद और सामर्थ्य के अनुसार खरीदारी कर पाता है। इसका आप पर असर आजमगढ़ के रानी की सराय बाजार में मूर्तियों की व्यापक रेंज और कस्टमाइज्ड विकल्प मिलने से पूर्वांचल भर की पूजा समितियों और आम परिवारों को मनपसंद प्रतिमाएं उपलब्ध हो रही हैं। • पूर्वांचल के पूजा आयोजकों के लिए: पूजा समितियों को अपनी पसंद के अनुसार फोन से फोटो दिखाकर विशेष प्रतिमाएं बनवाने की सुविधा मिल रही है। समितियों को कोलकाता जाने की जरूरत नहीं पड़ती और वे आजमगढ़ के रानी की सराय में ही अपनी तय थीम के अनुसार अग्रिम बुकिंग करा सकती हैं। • आजमगढ़ और आसपास के जिलों में: मऊ, जौनपुर, गाजीपुर और बलिया के आयोजकों को पांच हजार से एक लाख रुपये के बजट में विविध विकल्प मिल रहे हैं। इससे छोटे और बड़े दोनों स्तर के आयोजक अपनी वित्तीय क्षमता के आधार पर समय रहते प्रतिमाएं चुन सकते हैं। • स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए: दुर्गा पूजा से लेकर छठ तक चलने वाले दो महीने के इस दौर से स्थानीय बाजार और कारीगरों को बड़ा आर्थिक सहारा मिलता है। विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों के संगम से स्थानीय स्तर पर मूर्ति निर्माण का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। • आम श्रद्धालुओं और खरीदारों के लिए: त्योहारों के दौरान केवल एक ही बाजार से दुर्गा पूजा, दीपावली और छठ की मूर्तियां आसानी से मिल जाती हैं। लोगों को अलग-अलग त्योहारों के लिए भटकना नहीं पड़ता और वे वाजिब दामों पर खरीदारी कर पाते हैं। ऐसा क्यों हुआ त्योहारों के दौरान आजमगढ़ के रानी की सराय में मूर्तियों की मांग और बाजार का विस्तार कारीगरों के तकनीकी कौशल, अंतरराज्यीय कला के संगम और आधुनिक डिजिटल प्राथमिकताओं की वजह से हुआ है। • अंतरराज्यीय कलाकारों की मौजूदगी: कोलकाता और महाराष्ट्र के अनुभवी कारीगर महीनों पहले आजमगढ़ आकर अपनी कार्यशालाएं स्थापित करते हैं। बंगाली पारंपरिक नक्काशी और मराठी आधुनिक रंगों के संयोजन ने इस बाजार को विशिष्ट पहचान दिलाई है। • डिजिटल संदर्भों और कस्टमाइजेशन का चलन: पूजा आयोजक अब इंटरनेट और सोशल मीडिया से अनोखे डिजाइन चुनकर लाते हैं। स्थानीय कलाकारों की फोटो देखकर हूबहू प्रतिमाएं तैयार करने की क्षमता ने मांग को तेजी से बढ़ाया है। • पड़ोसी जिलों से निरंतर मांग: मऊ, गाजीपुर, जौनपुर और बलिया की समितियां बेहतर और अलग दिखने वाली प्रतिमाओं के लिए रानी की सराय पर निर्भर हैं। हर समिति अपने पंडाल को अनोखा बनाने के लिए महीनों पहले अग्रिम बुकिंग कराती है। • लगातार चलने वाला त्योहारी चक्र: दुर्गा पूजा के तुरंत बाद दीपावली और उसके बाद छठ महापर्व आने से दो महीने तक काम जारी रहता है। इस निरंतर मांग के चलते कारीगर बड़े पैमाने पर निवेश और उत्पादन करते हैं। सवाल-जवाब 1. आजमगढ़ में मूर्तियों का सबसे बड़ा बाजार कहां लगता है? आजमगढ़ में मूर्तियों का प्रमुख और सबसे बड़ा बाजार रानी की सराय इलाके में लगता है, जहां त्योहारों के दौरान भारी भीड़ रहती है। 2. रानी की सराय में मूर्तियां बनाने के लिए कहां से कारीगर आते हैं? इस बाजार में पश्चिम बंगाल के कोलकाता और महाराष्ट्र से कुशल मूर्तिकार आकर मूर्तियां तैयार करते हैं। 3. लोग अपनी पसंद की मूर्तियां कैसे बनवा रहे हैं? लोग स्मार्टफोन में इंटरनेट या सोशल मीडिया से फोटो दिखाकर कारीगरों से बिल्कुल वैसी ही कस्टमाइज्ड मूर्तियां तैयार करवा रहे हैं। 4. रानी की सराय में मूर्तियों की कीमत क्या है? यहां मूर्तियों की शुरुआती कीमत पांच हजार रुपये है, जबकि विशालकाय और भव्य मूर्तियों की कीमत एक लाख रुपये तक जाती है। 5. आजमगढ़ के अलावा किन जिलों से लोग यहां मूर्तियां बुक कराने आते हैं? मऊ, जौनपुर, गाजीपुर और बलिया जैसे सीमावर्ती जिलों की पूजा समितियां यहां महीनों पहले आकर मूर्तियों की बुकिंग कराती हैं। 6. दुर्गा पूजा के बाद कारीगर कौन सी प्रतिमाएं बनाते हैं? दुर्गा पूजा समाप्त होने के बाद कारीगर दीपावली के लिए मां लक्ष्मी और भगवान गणेश तथा इसके बाद छठ पूजा के लिए प्रतिमाएं बनाते हैं। https://trendkia.com/national/azamgarh-ke-rani-ki-sarai-men-murtikaron-ka-hunara-phona-ki-tasvira-dekhakara-mitti-men-dhala-rahe-jivnta-pratimaen-42731 TrendKia — Har trend, sabse pehle.