बहराइच में गेहूं के डंठल से गढ़े गए लक्ष्मी-गणेश, पर्यावरण संरक्षण के साथ महिलाओं को मिला रोजगार बहराइच में गेहूं के डंठल से खास इको-फ्रेंडली लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं बनाई जा रही हैं, जो समय के साथ और चमकती हैं। इस अनूठी पहल से लगभग 80 महिलाओं और जेल के कैदियों को आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिल रहा है। त्योहारी सीजन में उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से पर्यावरण संरक्षण और हुनर की एक खास मिसाल सामने आई है। दीपावली की तैयारियों के बीच बाजार में पारंपरिक सजावट और मूर्तियों के बीच प्राकृतिक संसाधनों से तैयार कलाकृतियों ने खरीदारों का ध्यान खींचा है। एक जिला एक उत्पाद योजना से प्रेरित इस पहल के तहत गेहूं के डंठल का इस्तेमाल करके भगवान गणेश और मां लक्ष्मी की आकर्षक छवियां तैयार की जा रही हैं। यह पर्यावरण अनुकूल उत्पाद न केवल टिकाऊ है, बल्कि उत्सव के बाजार में अपनी अलग पहचान बना रहा है। सालों साल बरकरार रहती है चमक और मजबूती इस हस्तशिल्प से जुड़े कलाकार गोपाल गुप्ता के अनुसार, खेतों से मिलने वाले गेहूं के डंठल से दीवार पर सजाने वाली कलाकृतियां, तस्वीरें और मोमेंटो बनाए जा रहे हैं। इन उत्पादों की सबसे बड़ी विशेषता उनका लंबा जीवनकाल है। ये कलाकृतियां जल्दी खराब नहीं होतीं और अत्यधिक टिकाऊ मानी जाती हैं। सबसे रोचक पहलू यह है कि जैसे-जैसे समय बीतता है, इन डंठलों की प्राकृतिक चमक कम होने के बजाय और अधिक निखरने लगती है। यही वजह है कि स्थानीय स्तर से लेकर देश के कई अन्य राज्यों तक इनकी भारी मांग देखने को मिल रही है। खेतों से ड्राइंग रूम तक का सफर इन तस्वीरों को तैयार करने की तकनीक बेहद बारीक और धैर्य से भरी है। सबसे पहले खेतों से गेहूं की कटाई के बाद खास तौर पर उपयुक्त डंठलों को एकत्र करके लाया जाता है। कार्यशाला में लाकर इन डंठलों की सघन सफाई की जाती है, ताकि धूल या गंदगी पूरी तरह हट जाए। इसके बाद फोटो फ्रेम के आधार पर डिजाइन की ड्राफ्टिंग और खाका तैयार किया जाता है। कुशल कारीगर एक-एक डंठल को डिजाइन के अनुरूप व्यवस्थित तरीके से चिपकाते हैं। इस बारीक प्रक्रिया में करीब दो से ढाई दिन की निरंतर मेहनत लगती है, जिसके बाद एक पूरी कलाकृति या मोमेंटो का रूप सामने आता है। आकार, कस्टमाइजेशन और बाजार में कीमत खरीदारों की रुचि और प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर इन कलाकृतियों को विभिन्न पैमानों में ढाला जा रहा है। वर्तमान में जो प्रमुख मॉडल सबसे अधिक लोकप्रिय हो रहा है, उसका आकार 17×23 इंच रखा गया है। बाजार में इस मानक साइज की कीमत 2,000 रुपये से लेकर 2,500 रुपये के बीच तय की गई है। त्योहार के मद्देनजर लोगों में इन कलाकृतियों को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। इसके साथ ही ग्राहकों की विशेष मांग के अनुसार छोटे और बड़े साइज में भी इन कलाकृतियों को कस्टमाइज करने की पूरी सुविधा दी जा रही है। महिलाओं और जेल के कैदियों को मिल रहा रोजगार यह पहल केवल कला और पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक बदलाव का बड़ा माध्यम बन चुकी है। लगभग 80 स्थानीय महिलाएं इस काम से सीधे जुड़कर नियमित आय अर्जित कर रही हैं और आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं। इसके साथ ही बहराइच जिला कारागार में बंद महिला और पुरुष कैदियों को भी इस कला का विधिवत प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसका मकसद कैदियों को हुनरमंद बनाकर समाज की मुख्यधारा में लौटने का अवसर प्रदान करना है। गोपाल गुप्ता की टीम अब तक देश के विभिन्न राज्यों में 500 से 1,000 लोगों को इस विधा का प्रशिक्षण दे चुकी है और यह प्रशिक्षण कार्य लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है। इसका आप पर असर त्योहारों पर पर्यावरण अनुकूल सजावट अपनाने के साथ-साथ यह कला ग्रामीण हुनर और हस्तशिल्प को सीधे सहारा देती है। • भारत में: खरीदार पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना टिकाऊ और प्राकृतिक सजावटी कलाकृतियां अपने घरों के लिए चुन सकते हैं। यह पारंपरिक कारीगरी को बढ़ावा देने के साथ प्लास्टिक और केमिकल युक्त उत्पादों का बेहतरीन विकल्प प्रदान करता है। • बहराइच में: स्थानीय महिलाओं और जेल के बंदियों को निरंतर काम और आय का जरिया मिल रहा है। इससे लगभग 80 परिवारों को सीधे आर्थिक मदद पहुंच रही है और जेल से रिहा होने वाले कैदियों के लिए सम्मानजनक रोजगार की राह आसान हो रही है। • कला प्रेमियों के लिए: कम रखरखाव में सालों-साल चलने वाली ऐसी कलाकृति मिल रही है जिसकी चमक समय बीतने के साथ बढ़ती है। इसे 2,000 से 2,500 रुपये के बजट में अपनी पसंद के आकार के अनुसार कस्टमाइज भी कराया जा सकता है। • कारीगरों के लिए: कृषि अपशिष्ट का रचनात्मक इस्तेमाल होने से हस्तशिल्पियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर बाजार और आमदनी के नए अवसर खुले हैं। अलग-अलग राज्यों के प्रशिक्षित युवाओं को अपने क्षेत्र में काम शुरू करने की प्रेरणा मिल रही है। ऐसा क्यों हुआ यह नवाचार कृषि अवशेषों के रचनात्मक समाधान, पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की बढ़ती जरूरत और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन के प्रयासों से विकसित हुआ है। • कच्चे माल का सदुपयोग: फसल कटाई के बाद खेतों में बचे गेहूं के डंठल आसानी से उपलब्ध होते हैं। कारीगरों ने इस प्राकृतिक संसाधन को फेंकने या नष्ट करने के बजाय कलाकृति के मुख्य माध्यम के रूप में इस्तेमाल करने की तकनीक विकसित की। • इको-फ्रेंडली उत्पादों की मांग: त्योहारों के दौरान प्लास्टिक और हानिकारक रंगों से बनी सजावट के खिलाफ बढ़ती जागरूकता ने प्राकृतिक कलाकृतियों का बाजार तैयार किया। गेहूं के डंठल की प्राकृतिक चमक और टिकाऊपन ने इसे एक आदर्श सामग्री बना दिया। • कौशल विकास और पुनर्वास की योजना: ग्रामीण महिलाओं और जेल के कैदियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए। इस संगठित प्रयास के चलते एक छोटा स्टार्टअप सामाजिक उद्यम में बदल गया और राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाने लगा। सवाल-जवाब 1. गेहूं के डंठल से बनी इन मूर्तियों की मुख्य विशेषता क्या है? ये मूर्तियां बेहद टिकाऊ हैं, जल्दी खराब नहीं होतीं और समय बीतने के साथ इनकी प्राकृतिक चमक और अधिक निखरती जाती है। 2. एक प्रतिमा तैयार करने में कितना समय लगता है? डंठलों की सफाई, डिजाइन की ड्राफ्टिंग और एक-एक डंठल को चिपकाने में करीब दो से ढाई दिन की कड़ी मेहनत लगती है। 3. 17×23 इंच के मुख्य मॉडल की कीमत कितनी है? इस 17×23 इंच आकार वाली प्रतिमा की कीमत 2,000 से 2,500 रुपये के बीच रखी गई है। 4. क्या इन कलाकृतियों को मनपसंद साइज में कस्टमाइज कराया जा सकता है? हां, ग्राहकों की मांग के अनुसार इन्हें छोटे या बड़े आकारों में कस्टमाइज करने की सुविधा उपलब्ध है। 5. इस पहल से कितने लोगों को रोजगार और प्रशिक्षण मिला है? लगभग 80 महिलाएं इससे सीधे जुड़कर काम कर रही हैं, जबकि 500 से 1,000 लोगों को विभिन्न राज्यों में प्रशिक्षित किया जा चुका है। 6. क्या जेल के कैदियों को भी इस काम में शामिल किया गया है? हां, जिला कारागार के महिला और पुरुष कैदियों को इसका प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि वे मुख्यधारा से जुड़ सकें। प्रेरणा और सबक यह पहल दर्शाती है कि कैसे साधारण प्राकृतिक संसाधनों और लगन के बल पर पर्यावरण और समाज दोनों के लिए सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। • साधारण चीजों में मूल्य देखना: खेतों में व्यर्थ समझे जाने वाले गेहूं के डंठल को आकर्षक कला में बदलकर साबित किया गया कि रचनात्मक दृष्टि से हर संसाधन कीमती बन सकता है। • सामुदायिक सशक्तिकरण को प्राथमिकता: किसी हुनर को सिर्फ अपने तक सीमित रखने के बजाय 80 महिलाओं और जेल के कैदियों को सिखाकर आत्मनिर्भरता का दायरा बढ़ाया गया। • कड़ी मेहनत और धैर्य की ताकत: एक फ्रेम तैयार करने में दो से ढाई दिन का समय देकर कारीगरों ने दर्शाया कि गुणवत्ता और बारीकी से ही बाजार में स्थाई पहचान बनती है। • ज्ञान बांटने से विस्तार: टीम ने 500 से 1,000 लोगों को प्रशिक्षित करके यह दिखाया कि हुनर बांटने से सामाजिक प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। https://trendkia.com/national/bahraich-men-gehun-ke-dnthala-se-garhe-gae-lakshmi-ganesh-paryavarana-snrakshana-ke-satha-mahilaon-ko-mila-rojagara-56897 TrendKia — Har trend, sabse pehle.