भारत का सबसे घातक परमाणु ब्रह्मास्त्र, केवल 20 मिनट में दुनिया के पांचवें हिस्से को तबाह करने की ताकत भारत के स्वदेशी मिसाइल कार्यक्रम ने कई दशकों के प्रतिबंधों और तकनीकी बाधाओं को पार करते हुए ऐसी अंतरमहाद्वीपीय क्षमता हासिल कर ली है, जो दुनिया के बड़े हिस्से को अपनी जद में रखती है। भारतीय रक्षा अनुसंधान का इतिहास वर्ष 1983 से अपनी नई उड़ान भरता है, जब देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम यानी आईजीएमडीपी की कमान सौंपी थी। उस समय वैश्विक राजनीति का सीधा नियम यह हुआ करता था कि जिसके पास सामरिक शक्ति है, वही दुनिया पर राज करेगा। अंतरिक्ष और मिसाइल निर्माण से जुड़ी आधुनिक तकनीकें न तो कोई राष्ट्र धन के बल पर बेचता था और न ही कूटनीतिक मित्रता के तहत साझा करता था। भारत को तकनीकी रूप से कमजोर बनाए रखने के लिए अमेरिका और पश्चिमी देशों ने मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रीजीम के तहत कड़े प्रतिबंधों का पहरा बिठा रखा था, ताकि देश कभी लंबी दूरी की मारक क्षमता वाली मिसाइलें विकसित न कर सके। अग्नि-टीडी से हुई थी शुरुआत वैज्ञानिक डॉ. कलाम और उनके सहयोगियों ने इन तमाम बाधाओं को एक बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार किया। वर्ष 1989 में जब अग्नि का पहला परीक्षण किया गया, तो वह कोई अंतिम रूप से युद्ध के लिए तैयार हथियार नहीं था, बल्कि एक टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर यानी अग्नि-टीडी था। इस प्रयोग का मुख्य उद्देश्य यह जांचना था कि क्या भारत ऐसा रॉकेट बनाने में सक्षम है जो अंतरिक्ष में जाकर पुनः पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करे और अत्यधिक घर्षण के कारण जलकर नष्ट न हो जाए। यह दो चरणों वाला रॉकेट था, जिसके पहले चरण में एसएलवी-3 स्पेस रॉकेट का सॉलिड फ्यूल मोटर और दूसरे चरण में पृथ्वी मिसाइल का लिक्विड इंजन लगाया गया था। जब इस मिसाइल ने एक हजार किलोमीटर की दूरी तय करके अपने लक्ष्य पर सटीक निशाना साधा, तो पूरी दुनिया हैरान रह गई और इसके तुरंत बाद पश्चिमी देशों ने भारत पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए। प्रतिबंधों के बीच आत्मनिर्भरता की राह वर्ष 1989 के इस सफल परीक्षण के बाद लगभग पूरी दुनिया ने भारत के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए और कंप्यूटर चिप्स, विशेष मैरेजिंग स्टील, रिंग लेजर जायरोस्कोप तथा कार्बन कंपोजिट जैसे सैकड़ों संवेदनशील पुर्जों की आपूर्ति रोक दी गई। हालांकि, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने इन अड़चनों को एक नए अवसर में बदल दिया। डीआरडीओ ने देश के शीर्ष शिक्षण संस्थानों, आईआईटी और निजी उद्योगों को इस महत्वाकांक्षी अभियान से जोड़ लिया। जो मैरेजिंग स्टील आयात के जरिए नहीं मिल सका, उसे स्वदेशी प्रयोगशालाओं में ही तैयार किया गया। जब अमेरिकी कंपनियों ने विशेष कार्बन फाइबर देने से इनकार कर दिया, तो उसे देश की ही फैक्टरियों में बना लिया गया, जिससे भारत के मिसाइल परिवार की नींव मजबूत हुई। अग्नि-1 से मिली सामरिक मजबूती वर्ष 1999 के करगिल युद्ध के दौरान भारत को एक ऐसी मिसाइल की आवश्यकता महसूस हुई जो पड़ोसी देशों की हरकतों का तुरंत जवाब दे सके। महज तीन वर्ष के भीतर ही भारत ने अग्नि-1 के रूप में इस जरूरत को पूरा कर लिया और 25 जनवरी 2002 को इसका पहला परीक्षण संपन्न हुआ। यह लगभग पंद्रह मीटर लंबी, बारह टन वजनी और सिंगल-स्टेज सॉलिड फ्यूल से चलने वाली मिसाइल थी, जो सात सौ से नौ सौ किलोमीटर तक मार करने में सक्षम थी। इसके उन्नत संस्करण की मारक क्षमता बारह सौ किलोमीटर तक पहुंच गई और यह एक हजार किलोग्राम का परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम थी। वर्ष 2007 में इसे सेना की सामरिक बल कमान में शामिल कर लिया गया। अग्नि-2 और चीन तक पहुंच पाकिस्तान के साथ-साथ चीन से मिलने वाली रणनीतिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए भारत को अधिक दूरी तक मार करने वाले हथियारों की आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य के साथ डीआरडीओ ने अग्नि-2 परियोजना पर कार्य आरंभ किया और 11 अप्रैल 1999 को इसका पहला सफल परीक्षण किया गया। इक्कीस मीटर लंबी और सोलह टन वजनी यह दो चरणों वाली मिसाइल एक हजार किलोग्राम तक के पेलोड को पच्चीस सौ किलोमीटर की दूरी तक ले जा सकती है। इसमें विशेष कार्बन-कार्बन कंपोजिट हीट शील्ड का प्रयोग किया गया है, जो वापसी के समय तीन हजार डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान को आसानी से सहन कर सकती है। वर्ष 2004 में सेना का हिस्सा बनने के बाद इसने चीन के महत्वपूर्ण सैन्य अड्डों को अपनी रेंज में ले लिया। अग्नि-3 और पेनेट्रेशन एड्स की खूबी चीन के अंदरूनी इलाकों तक भारी परमाणु हथियार पहुंचाने के लिए भारत को और अधिक शक्तिशाली प्रणाली की जरूरत थी, जिसके तहत 9 जुलाई 2006 को अग्नि-3 का पूर्ण परीक्षण किया गया। दो चरणों वाले सॉलिड फ्यूल पर आधारित यह मिसाइल सत्रह मीटर लंबी और पचास टन वजनी थी, जो दो हजार से पच्चीस सौ किलोग्राम का वॉरहेड पैंतीस सौ से पांच हजार किलोमीटर दूर तक पहुंचा सकती थी। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसमें मौजूद पेनेट्रेशन एड्स और डमी डिकॉय हैं, जो दुश्मन के मिसाइल डिफेंस सिस्टम को भ्रमित कर देते हैं ताकि असली हथियार बिना किसी बाधा के अपने लक्ष्य को नष्ट कर सके। अग्नि-4 और अग्नि-5 का दबदबा अग्नि-4 ने भारतीय मिसाइल तकनीक में एक बड़ा बदलाव लाते हुए इसे भारी-भरकम धातुओं से निकालकर हल्के कंपोजिट मटेरियल में तब्दील कर दिया। पंद्रह नवंबर 2011 को परखी गई यह मिसाइल एक हजार किलोग्राम पेलोड के साथ चार हजार किलोमीटर तक मार कर सकती है और इसे वर्ष 2015 में सेना में शामिल किया गया। इसके बाद 19 अप्रैल 2012 को तीन चरणों वाली अग्नि-5 का सफल परीक्षण हुआ, जो पांच हजार किलोमीटर से अधिक दूरी तक डेढ़ टन का परमाणु हथियार ले जा सकती है। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसका कैनिस्टर सिस्टम है, जिससे इसे देश के किसी भी कोने से कुछ ही मिनटों में लॉन्च किया जा सकता है और इसने बीजिंग से लेकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक को अपनी जद में ले लिया है। अग्नि-प्राइम का आधुनिक स्वरूप अटठाइस जून 2021 को भारत ने अपनी सबसे आधुनिक अगली पीढ़ी की मिसाइल अग्नि-प्राइम का परीक्षण किया, जो पुरानी अग्नि-1 और अग्नि-2 का उन्नत विकल्प है। एक हजार से दो हजार किलोमीटर की रेंज वाली यह मिसाइल कंपोजिट बॉडी और आधुनिक मार्गदर्शन तकनीक से लैस है तथा पुरानी प्रणालियों की तुलना में पचास प्रतिशत हल्की है। इसके आ जाने से देश की प्रतिक्रिया क्षमता कई गुना बढ़ गई है, जिससे किसी भी संभावित खतरे का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सकता है। इसका आप पर असर भारत के इस उन्नत मिसाइल कार्यक्रम का सीधा असर देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्थिरता पर पड़ता है, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर रक्षा संतुलन मजबूत होता है। • भारत में: देश के भीतर रक्षा उत्पादन और स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा मिलने से उच्च प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं। • रणनीतिक प्रभाव: लंबी दूरी की मिसाइलों के विकास से राष्ट्र की निवारक शक्ति मजबूत होती है, जिससे कूटनीतिक मोर्चे पर देश की स्थिति अधिक सुदृढ़ होती है। • औद्योगिक विकास: निजी कंपनियों और अनुसंधान संस्थानों की भागीदारी बढ़ने से देश के भीतर एयरोस्पेस और मैटेरियल साइंस के क्षेत्र में नवाचार को तेजी मिलती है। • सुरक्षा ढांचा: आधुनिक कैनिस्टर आधारित लॉन्च सिस्टम और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता से सशस्त्र बलों की ऑपरेशनल तैयारी और पुख्ता होती है। • अंतर्राष्ट्रीय स्थिति: आत्मनिर्भर रक्षा क्षमताओं के विस्तार से वैश्विक मंच पर भारत की तकनीकी और सामरिक आत्मनिर्भरता पुख्ता रूप से स्थापित होती है। सवाल-जवाब 1. भारत में एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम की शुरुआत कब हुई थी? इस कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 1983 में हुई थी जब इसकी कमान डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को सौंपी गई थी। 2. भारत का पहला अग्नि मिसाइल परीक्षण कब किया गया था? अग्नि का पहला टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर परीक्षण वर्ष 1989 में किया गया था। 3. अग्नि-1 मिसाइल का पहला सफल परीक्षण किस वर्ष हुआ था? अग्नि-1 मिसाइल का पहला परीक्षण 25 जनवरी 2002 को किया गया था। 4. अग्नि-5 मिसाइल की मारक क्षमता कितनी है? अग्नि-5 मिसाइल पांच हजार किलोमीटर से अधिक दूरी तक मार करने में सक्षम है। 5. अग्नि-प्राइम का परीक्षण कब किया गया था? अग्नि-प्राइम का परीक्षण 28 जून 2021 को किया गया था। 6. अग्नि मिसाइलों के विकास की जिम्मेदारी किस संगठन के पास है? इन मिसाइलों के विकास की मुख्य जिम्मेदारी रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ के पास है। https://trendkia.com/national/bharat-ka-sabse-ghatak-paramanu-brahmastra-keval-20-minat-me-duniya-ke-panchve-hisse-ko-tabah-karne-ki-takat-24662 TrendKia — Har trend, sabse pehle.