बिना जानकारी बेंच से केस हटाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, रजिस्ट्री और सरकारी वकील की कार्यशैली पर सवाल सुप्रीम कोर्ट ने सीएपीएफ से जुड़े अवमानना केस को संबंधित बेंच को सूचित किए बिना हटाने और सरकारी वकील के मेंशनिंग के तरीके पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने इसे सिस्टम की पारदर्शिता के खिलाफ बताते हुए अगली सुनवाई 15 अक्टूबर तय की है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की लिस्टिंग में प्रक्रियागत गड़बड़ी को लेकर शीर्ष अदालत में कड़ा रुख देखने को मिला है। निर्धारित बेंच को पूर्व सूचना दिए बिना केस को अचानक दैनिक कॉज लिस्ट से हटाए जाने के कदम पर संबंधित जजों ने गहरा ऐतराज जताया। अदालत ने न्यायिक प्रशासन और रजिस्ट्री के इस रवैये को कार्यप्रणाली की निष्पक्षता के खिलाफ माना। इसके साथ ही बिना विपक्षी पक्षकारों को सूचित किए सीधे चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) के सामने मामले को मेंशन करने की सरकारी वकील की कार्यशैली पर भी गंभीर टिप्पणियां की गईं। निर्धारित सुनवाई से ठीक पहले कॉज लिस्ट से गायब हुआ मामला विवाद की शुरुआत उस वक्त हुई जब यह मामला जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल चंद्रुकर की नियमित पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था। अदालत कक्ष में संबंधित पक्षों के अधिवक्ता पूरी कानूनी तैयारी के साथ उपस्थित थे। सुनवाई शुरू होने से ऐन पहले इस केस को अचानक कॉज लिस्ट से बाहर कर दिया गया। सबसे हैरान करने वाला पहलू यह रहा कि जिस नियमित बेंच को सुनवाई करनी थी, उसे इस बदलाव के संदर्भ में कोई औपचारिक जानकारी तक नहीं दी गई। इस प्रशासनिक कदम पर पीठ ने फौरन संज्ञान लिया और रजिस्ट्री के अधिकारियों से औपचारिक स्पष्टीकरण तलब कर लिया। पीठ का स्पष्ट कहना था कि जब कोई वाद किसी तय बेंच के समक्ष लग चुका हो, तो जजों की सहमति अथवा संज्ञान के बगैर फाइलों को इधर-उधर स्थानांतरित करने का अधिकार किसी के पास नहीं है। बाद में देर शाम अदालत के आधिकारिक पोर्टल पर एक नोटिस जारी हुआ, जिसके जरिए जानकारी दी गई कि इस मामले को विशेष पीठ के समक्ष भेजा गया है। सीक्रेट मेंशनिंग और बैकडोर प्रक्रिया पर जजों की तीखी टिप्पणी अगले चरण में जब यह प्रकरण जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की विशेष पीठ के समक्ष आया, तो रजिस्ट्री की ओर से रखे गए पक्ष ने पूरी स्थिति को स्पष्ट किया। रजिस्ट्री ने पीठ को अवगत कराया कि सरकारी पक्ष के वकील ने सीजेआई के समक्ष इस प्रकरण को विशेष रूप से उठाया था। सरकारी पक्ष का तर्क था कि इस मामले का सीधा संबंध उस मूल कानून की संवैधानिक वैधता से है, जिस पर विशेष पीठ पहले से विचार कर रही है। विशेष पीठ ने इस बात पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई कि विरोधी पक्षकारों को जानकारी दिए बिना यह प्रक्रिया क्यों पूरी की गई। जजों ने सवाल उठाया कि जब नियमित बेंच कार्यरत थी, तब उस पीठ को अंधेरे में रखकर इस तरह का कदम उठाना उचित नहीं था। अदालत ने दो टूक शब्दों में रेखांकित किया कि पिछले दरवाजे से बेंच बदलने जैसी गतिविधियां समूची अदालती व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। अवमानना याचिका और मूल कानून के टकराव पर 15 अक्टूबर को सुनवाई यह कानूनी खींचतान दरअसल सीएपीएफ मामले में दायर अवमानना याचिका और उससे जुड़े मुख्य कानून की संवैधानिकता के बीच का टकराव है। विशेष बेंच उन याचिकाओं पर गौर कर रही है, जिनका निष्कर्ष अवमानना कार्यवाही की दिशा तय करेगा। इसी कारण दोनों कार्यवाहियों को एक ही मंच पर लाने की प्रशासनिक कवायद की गई थी। रजिस्ट्री के स्पष्टीकरण और अधिवक्ताओं के तर्कों का संज्ञान लेने के पश्चात अदालत ने इस अवमानना मामले को मूल कानून की वैधता को चुनौती देने वाली मुख्य याचिका के साथ संबद्ध कर दिया है। अब इस पूरे प्रकरण से जुड़े कानूनी बिंदुओं पर अगली विस्तृत सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी। इसका आप पर असर यह घटनाक्रम देश की शीर्ष अदालत में वादों की निष्पक्ष लिस्टिंग और वादियों के कानूनी अधिकारों से सीधा जुड़ा है। • मुकदमों की निष्पक्षता: किसी भी पक्षकार को बताए बिना बैकडोर से बेंच बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। इससे आम नागरिकों और कर्मचारियों को यह भरोसा मिलता है कि उनके केस निष्पक्ष व्यवस्था के तहत ही सुने जाएंगे। • सीएपीएफ कर्मियों का भविष्य: अर्धसैनिक बलों से जुड़े इस केस में शामिल कर्मियों को अब 15 अक्टूबर तक अंतिम निर्णय का इंतजार करना होगा। इस तारीख को होने वाली सुनवाई से अवमानना और मुख्य कानून दोनों के कानूनी बिंदु स्पष्ट होंगे। • वकीलों के लिए नियम: केस मेंशन करने के दौरान विपक्षी पक्षकार को पूर्व सूचना देना अनिवार्य रूप से सुनिश्चित होगा। यदि किसी अधिवक्ता द्वारा एकतरफा मेंशनिंग की जाती है, तो अदालत उस पर सख्त रुख अख्तियार करेगी। • प्रशासनिक जवाबदेही: शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री को जजों की जानकारी के बिना फाइलें हटाने से रोका जा सकेगा। इससे अदालती कार्यप्रणाली में प्रशासनिक मनमानी पर प्रभावी अंकुश लगेगा। ऐसा क्यों हुआ यह स्थिति तब उत्पन्न हुई जब एक नियमित बेंच के समक्ष सूचीबद्ध केस को प्रशासनिक तौर पर हटाकर विशेष बेंच को भेजने की प्रक्रिया में निर्धारित बेंच और विपक्षी पक्षकारों को सूचित नहीं किया गया। • सीक्रेट मेंशनिंग की वजह: सरकारी वकील ने विपक्षी पक्षकारों को सूचित किए बिना सीजेआई के सामने केस का मेंशन किया था। सरकारी पक्ष का तर्क था कि केस का संबंध उस मुख्य कानून से है जिसकी जांच विशेष बेंच पहले से कर रही है। • जजों की नाराजगी का आधार: जिस नियमित पीठ के सामने केस सूचीबद्ध था, उसे हटाए जाने की कोई पूर्व जानकारी नहीं दी गई थी। कोर्ट ने इसे न्यायिक पारदर्शिता और तय अदालती नियमों का उल्लंघन माना। • कानूनी टकराव की स्थिति: अवमानना की कार्यवाही का सीधा जुड़ाव मुख्य कानून की संवैधानिक वैधता से है। इसी कारण दोनों को साथ सुनने का प्रशासनिक प्रयास किया गया, लेकिन उसकी प्रक्रिया में पारदर्शिता की भारी कमी रही। सवाल-जवाब 1. सुप्रीम कोर्ट में जजों की नाराजगी का मुख्य कारण क्या था? नियमित बेंच को बिना बताए और पक्षकारों को सूचित किए बिना सीएपीएफ से जुड़े केस को अचानक कॉज लिस्ट से हटा दिया गया था। 2. यह मामला मूल रूप से किन जजों की बेंच के सामने लगा था? यह केस जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल चंद्रुकर की नियमित बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए निर्धारित था। 3. सरकारी वकील ने सीधे सीजेआई के सामने मामला क्यों उठाया था? सरकारी वकील का तर्क था कि इस मामले का संबंध मुख्य कानून की वैधता से है, जिस पर पहले से एक विशेष बेंच विचार कर रही है। 4. मामले को किस विशेष बेंच के समक्ष भेजा गया है? इस प्रकरण को जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की विशेष पीठ के समक्ष ट्रांसफर किया गया है। 5. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई किस तारीख को तय की है? अदालत ने अवमानना याचिका को मुख्य कानून को चुनौती देने वाली याचिका के साथ संबद्ध करते हुए अगली सुनवाई 15 अक्टूबर तय की है। https://trendkia.com/national/bina-janakari-bencha-se-kesa-hatane-para-supreme-court-sakhta-registry-aura-sarakari-vakila-ki-karyashaili-para-savala-40294 TrendKia — Har trend, sabse pehle.