बिश्केक एससीओ घोषणापत्र पर हस्ताक्षर के बाद भारत की मध्य पूर्व नीति और रणनीतिक स्वायत्तता की पड़ताल किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन 2026 में ईरान पर सैन्य हमलों की निंदा की गई. इस संयुक्त बयान पर भारत के हस्ताक्षर के बाद वैश्विक स्तर पर देश की संतुलित विदेश नीति पर नए सिरे से चर्चा शुरू हो गई है. किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन 2026 के दौरान पारित बिश्केक घोषणापत्र पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सहित सदस्य देशों के प्रमुखों ने हस्ताक्षर किए हैं. इस संयुक्त घोषणापत्र में ईरान के भूभाग पर किए गए सैन्य हमलों की कड़े शब्दों में निंदा दोहराई गई है. दस्तावेज में स्पष्ट रूप से कहा गया कि इन सैन्य कार्रवाइयों के कारण निर्दोष नागरिकों की जान गई है और वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान पहुंचा है. इस बहुपक्षीय मंच से सामने आए वक्तव्य के बाद अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा छिड़ गई है कि क्या ईरान, अमेरिका और इजरायल के संदर्भ में भारत का पारंपरिक रुख किसी नई दिशा में मुड़ रहा है. एससीओ का बिश्केक घोषणापत्र और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में उठा सवाल बिश्केक में जारी किए गए एससीओ घोषणापत्र में यद्यपि सीधे तौर पर अमेरिका या इजरायल का नाम अंकित नहीं किया गया है, लेकिन इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि ईरान के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाइयां अंतरराष्ट्रीय कानून का प्रत्यक्ष उल्लंघन हैं. घोषणापत्र में इस बात पर जोर दिया गया कि ऐसी एकतरफा सैन्य गतिविधियां संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मूलभूत सिद्धांतों का हनन करती हैं और वैश्विक शांति, सुरक्षा व क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर संकट उत्पन्न करती हैं. इस तरह के कड़े बयान पर भारत की सहमति बनने से विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित हुआ है, क्योंकि भारत ऐतिहासिक रूप से किसी एक गुट के आक्रामक वक्तव्यों से दूरी बनाए रखने की नीति पर चलता रहा है. इसके साथ ही भारत के एक तरफ ईरान के साथ गहरे ऐतिहासिक संबंध हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका तथा इजरायल के साथ भी रणनीतिक साझेदारी काफी मजबूत है. भारत की पारंपरिक विदेश नीति और पश्चिम एशिया में संतुलन की परंपरा अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत की विदेश नीति दशकों से एक सधे और संतुलित ढांचे पर संचालित होती आई है. ईरान के साथ भारत के रिश्ते केवल आधुनिक कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक संबंध रहे हैं. रणनीतिक दृष्टि से ईरान में स्थित चाबहार पोर्ट भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों तक सीधा व्यापारिक मार्ग प्रदान करता है. दूसरी ओर, भारत ने अमेरिका और इजरायल के साथ भी रक्षा, उन्नत तकनीक, आतंकवाद विरोधी अभियानों और द्विपक्षीय व्यापार के क्षेत्रों में अत्यधिक प्रगाढ़ संबंध स्थापित किए हैं. जब भी पश्चिम एशिया में तनाव या संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है, तो भारत सीधे तौर पर किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करने से बचता है. भारत हमेशा संयम बरतने, पक्षों के बीच कूटनीतिक संवाद स्थापित करने और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर देता रहा है. फरवरी 2026 से अब तक के कूटनीतिक घटनाक्रम का पूरा विवरण फरवरी 2026 में जब अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के विभिन्न ठिकानों पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमले शुरू किए गए, तब भारत ने अपने इसी संतुलित दृष्टिकोण का परिचय दिया था. भारत के विदेश मंत्रालय ने 28 फरवरी 2026 को आधिकारिक बयान जारी कर ईरान तथा संपूर्ण खाड़ी क्षेत्र की परिस्थितियों पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त की थी. विदेश मंत्रालय ने सभी संबंधित पक्षों से अत्यधिक संयम बरतने, ऐसे किसी भी कदम से बचने जो तनाव को बढ़ा सकता हो, तथा नागरिकों की जीवन रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का आह्वान किया था. भारत ने यह स्पष्ट किया था कि किसी भी विवाद का स्थायी समाधान केवल बातचीत और कूटनीति के माध्यम से ही निकाला जा सकता है, तथा सभी राष्ट्रों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किया जाना अनिवार्य है. उस समय भारत ने अपने बयान में किसी भी देश का नाम लेकर सीधी निंदा करने से परहेज किया था. इसके पश्चात मार्च 2026 में भी भारत की यही नीति देखने को मिली. जब खाड़ी देशों पर ईरान की ओर से किए गए जवाबी हमलों पर चर्चा हुई, तो भारत ने संयम की अपील का समर्थन किया, परंतु द्विपक्षीय स्तर पर ईरान के विरुद्ध हमलों पर कोई आक्रामक या एकतरफा प्रतिक्रिया नहीं दी. यदि इससे पिछले वर्ष यानी 2025 के घटनाक्रम को देखा जाए, तो जब इजरायल ने ईरान पर सैन्य हमले किए थे, तब शुरुआती दौर में भारत एससीओ के उन बयानों का हिस्सा नहीं बना था जिनमें इजरायल की सीधी आलोचना की गई थी. हालांकि, बाद में सितंबर 2025 में चीन के तियानजिन शहर में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान जारी संयुक्त घोषणापत्र में भारत शामिल हुआ था, जिसमें अमेरिका और इजरायल द्वारा की गई सैन्य कार्रवाइयों पर चिंता जताई गई थी. क्या भारत ने बदली अपनी नीति? विशेषज्ञों का विश्लेषणात्मक आकलन कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, एससीओ के मंच से ईरान हमलों की निंदा में शामिल होने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि भारत ने अपनी विदेश नीति में कोई अचानक बदलाव या यू-टर्न लिया है. बहुपक्षीय सम्मेलनों में आम सहमति से जारी घोषणापत्रों की अपनी एक अलग कूटनीतिक व्यवस्था होती है. शंघाई सहयोग संगठन में रूस और चीन जैसी प्रमुख महाशक्तियां शामिल हैं और ईरान भी इस संगठन का पूर्णकालिक सदस्य बन चुका है. ऐसे बहुपक्षीय मंच पर जब सभी सदस्य देश किसी साझा क्षेत्रीय चिंता पर सहमति व्यक्त करते हैं, तो भारत के लिए उस सामूहिक वक्तव्य का हिस्सा बनना एक सामान्य प्रक्रिया है. महत्वपूर्ण बात यह है कि बहुपक्षीय घोषणापत्रों में शामिल होने के बावजूद भारत द्विपक्षीय स्तर पर अपने स्वतंत्र और संतुलित संबंधों को प्रभावित नहीं होने देता. बिश्केक शिखर सम्मेलन के दौरान ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से अलग से द्विपक्षीय मुलाकात की. इस बैठक में दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय व्यापार को गति देने, चाबहार पोर्ट के विकास और क्षेत्र में शांति बहाली पर गंभीर चर्चा हुई. विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि एससीओ घोषणापत्र में शामिल होने से भारत के अमेरिका या इजरायल के साथ संबंधों पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि तीनों ही देशों के साथ भारत के रिश्ते आपसी रणनीतिक हितों पर टिके हैं. राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता का सिद्धांत ईरान, अमेरिका और मध्य पूर्व को लेकर भारत की प्राथमिकताएं पूरी तरह से अपने राष्ट्रीय हितों से प्रेरित हैं. खाड़ी देशों में वर्तमान में करोड़ों भारतीय नागरिक कार्यरत हैं, जिनकी सुरक्षा और आजीविका भारत के लिए अत्यंत संवेदनशील विषय है. इसके अतिरिक्त, यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में सैन्य संघर्ष के कारण समुद्री व्यापारिक मार्ग बाधित होता है, तो इससे भारत की कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति पर सीधा विपरीत प्रभाव पड़ सकता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान होने की आशंका रहती है. चाबहार बंदरगाह परियोजना को सुचारू रूप से आगे बढ़ाना भी भारत की प्राथमिकता में शामिल है. इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांत पर मजबूती से कायम है. रणनीतिक स्वायत्तता का तात्पर्य यह है कि जहां अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों और बहुपक्षीय स्थिरता का प्रश्न हो, वहां भारत विश्व शांति के पक्ष में अपनी आवाज उठाता है, लेकिन जहां राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों का कल्याण सामने आए, वहां अत्यंत सावधानी और संतुलन के साथ फैसले लेता है. मध्य पूर्व में चल रहे लंबे संकट के बीच भारत किसी सैन्य या राजनीतिक खेमे में बंधने के बजाय एक निष्पक्ष, शांतिप्रिय और संवाद-समर्थक राष्ट्र की भूमिका निभा रहा है, और बिश्केक घोषणापत्र में भारत की भागीदारी इसी निरंतर नीति का स्वाभाविक विस्तार है. इसका आप पर असर पश्चिम एशिया के घटनाक्रम और कूटनीतिक बयानों का भारत के आम नागरिकों और अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ता है. • भारत में: कच्चे तेल और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा बनी रहने से घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में स्थिरता की संभावना मजबूत होती है. इससे आम उपभोक्ताओं को महंगाई के झटके से राहत मिलने की उम्मीद रहती है. • मध्य पूर्व में: खाड़ी देशों में रहने और काम करने वाले करोड़ों भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा तथा रोजगार पर संकट की आशंका कम होती है. उनके द्वारा भारत भेजे जाने वाले धन से उनके परिवारों को आर्थिक संबल मिलता रहता है. • व्यापार और अर्थव्यवस्था: चाबहार पोर्ट परियोजना सुचारू रूप से चलने से मध्य एशिया तक भारतीय सामानों का निर्यात सुगम होगा. इससे भारतीय कारोबारियों को नए बाजार मिलेंगे और परिवहन लागत में कमी आएगी. • नागरिक सुरक्षा: कूटनीतिक संवाद और संयम पर जोर दिए जाने से क्षेत्र में फंसे भारतीय छात्रों और पेशेवरों की सुरक्षित वापसी तथा नियमित विमान सेवाओं के संचालन में मदद मिलती है. सवाल-जवाब 1. बिश्केक एससीओ शिखर सम्मेलन 2026 में ईरान पर क्या बयान जारी हुआ? एससीओ शिखर सम्मेलन के बिश्केक घोषणापत्र में ईरान के भूभाग पर हुए सैन्य हमलों की कड़े शब्दों में निंदा की गई और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया गया. 2. क्या भारत ने अमेरिका या इजरायल का नाम लेकर निंदा की है? नहीं, एससीओ घोषणापत्र में बिना किसी देश का नाम लिए सैन्य हमलों की निंदा की गई और भारत ने द्विपक्षीय स्तर पर भी किसी देश का नाम नहीं लिया है. 3. क्या इस कदम से भारत की विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव आया है? विशेषज्ञों के अनुसार यह नीति में बदलाव नहीं है, बल्कि भारत एससीओ जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सर्वसम्मति से बने बयानों में शामिल होने की परंपरा का पालन करता है. 4. चाबहार पोर्ट भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? चाबहार पोर्ट ईरान में स्थित है और यह भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान तथा मध्य एशियाई देशों तक सीधा व्यापारिक मार्ग प्रदान करता है. 5. भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' नीति का क्या अर्थ है? रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ है कि भारत किसी सैन्य गुट में शामिल हुए बिना अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय शांति के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेता है. https://trendkia.com/national/bishkek-sco-declaration-para-hastakshara-ke-bada-india-ki-middle-east-niti-aura-rananitika-svayattata-ki-paratala-26288 TrendKia — Har trend, sabse pehle.