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  "type": "article",
  "title": "सेंट्रल विस्टा के तहत शास्त्री और कृषि भवन खाली होने से बंदरों के सामने खड़ा हुआ आशियाने का संकट",
  "summary": "सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास योजना के तहत लुटियंस दिल्ली के शास्त्री भवन और कृषि भवन को खाली कर कर्तव्य भवन-4 और कर्तव्य भवन-5 के निर्माण की तैयारी शुरू हो चुकी है, जिससे दशकों से इन परिसरों में बसे सैकड़ों बंदरों के विस्थापन और मानव-वन्यजीव टकराव का नया संकट पैदा हो गया है।",
  "content": "देश के प्रशासनिक केंद्र लुटियंस दिल्ली में दशकों से सत्ता और नीति निर्माण के प्रतीक रहे दो ऐतिहासिक भवनों, शास्त्री भवन और कृषि भवन को पूरी तरह खाली करने का काम तेज गति से चल रहा है। इन दोनों परिसरों में वर्षों तक केंद्र सरकार के कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों के दफ्तर संचालित हुए, जहां देश की दिशा तय करने वाली योजनाएं बनीं, फाइलों का आवागमन हुआ और अधिकारियों, कर्मचारियों, पत्रकारों तथा आम नागरिकों की लगातार मौजूदगी रही। अब सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के अगले महत्वपूर्ण चरण को अमलीजामा पहनाने के लिए इन दोनों पुराने ढांचों को ध्वस्त किया जाएगा। इनकी जगह अत्याधुनिक प्रशासनिक परिसरों कर्तव्य भवन-4 और कर्तव्य भवन-5 का निर्माण होना तय हुआ है। मंत्रालयों का यह स्थानांतरण प्रशासनिक स्तर पर जितनी बड़ी हलचल पैदा कर रहा है, उतनी ही गंभीर पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय चिंता इन विशाल परिसरों के पेड़ों, मुंडेरों और छतों पर पीढ़ियों से बसेरा जमाए सैकड़ों बंदरों के अस्तित्व को लेकर सामने आ रही है।\n\nप्रशासनिक इतिहास और साझा सहअस्तित्व की अनूठी दास्तान\nशास्त्री भवन और कृषि भवन केवल ईंट-पत्थर और कंक्रीट से बने सरकारी दफ्तर नहीं रहे हैं, बल्कि उन्होंने स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक विकास का पूरा सफर करीब से देखा है। कृषि भवन का निर्माण लगभग 1957 में हुआ था, जो आने वाले वर्षों में देश में खाद्य सुरक्षा और हरित क्रांति से जुड़ी तमाम रणनीतियों का मुख्य गवाह बना। इसके कुछ ही समय बाद 1960 के दशक में शास्त्री भवन तैयार हुआ, जिसने शिक्षा, कानून और न्याय, संस्कृति तथा सूचना एवं प्रसारण जैसे बुनियादी क्षेत्रों के कामकाज का संचालन किया। जब स्वतंत्र भारत अपनी प्रशासनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए नई व्यवस्थाएं और इमारतें खड़ी कर रहा था, तब इन परिसरों में लगे घने पेड़ और खुली जगहें वन्यजीवों, विशेषकर बंदरों के लिए भी एक प्राकृतिक आश्रय बनती चली गईं।\n\nबीते छह दशकों में इन दोनों सरकारी परिसरों में इंसानों और बंदरों के बीच एक अनकहा, सहज सहअस्तित्व विकसित हो चुका था। एक तरफ गलियारों और कमरों में सरकारी अफसर, क्लर्क और आगंतुक अपनी फाइलों और बैठकों में व्यस्त रहते थे, तो दूसरी तरफ खिड़कियों की छज्जों, बालकनियों, मुंडेरों और विशाल पेड़ों की शाखाओं पर बंदरों के झुंड अपनी नियमित दिनचर्या बिताते थे। दोपहर के भोजन के समय जब सरकारी कर्मचारी अपने टिफिन बॉक्स खोलते, तो अक्सर बंदर भी आसपास मंडराते दिखाई देते थे। इंसान और बंदरों का यह रोजमर्रा का साथ नई दिल्ली के सत्ता गलियारों की एक अनूठी और जीवंत पहचान बन गया था, जहां सरकारी गंभीरता के बीच प्रकृति का यह रूप रोज देखा जाता था।\n\nध्वस्तीकरण के बाद विस्थापन और संघर्ष का मंडराता खतरा\nजनवरी के महीने में जब पहली बार इन दोनों भवनों को गिराकर नई इमारतों के निर्माण की योजना सार्वजनिक हुई थी, तभी वन्यजीव प्रेमियों और स्थानीय निवासियों के मन में बंदरों के भविष्य को लेकर सवाल उठे थे। अब जब वास्तव में कार्यालयों से फाइलें, रिकॉर्ड्स, कंप्यूटर और फर्नीचर ट्रकों में भरकर नए स्थानों पर भेजे जा रहे हैं, तो यह चिंता बेहद गंभीर वास्तविकता बनकर सामने आ गई है। इंसानों और दफ्तरों के लिए जगह बदलना एक प्रशासनिक प्रक्रिया हो सकती है, जिसके लिए नए कमरे, वाहन और साजो-सामान उपलब्ध करा दिए जाते हैं, लेकिन जानवरों के लिए अपना ठिकाना खोना जीवन की पूरी व्यवस्था तहस-नहस हो जाने जैसा होता है।\n\nबंदरों के किसी इलाके में टिके रहने का आधार वहां के पुराने पेड़, प्राकृतिक छाया, पानी के स्रोत, भोजन की नियमित उपलब्धता और वर्षों में बनी उनकी क्षेत्रीय दिनचर्या होती है। जब भारी मशीनों से इन इमारतों को तोड़ा जाएगा और आसपास के पेड़ों को काटा या छांटा जाएगा, तो बंदरों का यह परिचित संसार अचानक पूरी तरह बिखर जाएगा। आश्रय और भोजन छिन जाने के बाद बंदरों के ये बड़े-बड़े झुंड पास के पार्कों, लुटियंस जोन की मुख्य सड़कों, इंडिया गेट के आसपास के खुले क्षेत्रों और पास की आवासीय कॉलोनियों का रुख करने के लिए मजबूर होंगे। ऐसी स्थिति में सड़कों पर दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ेगा और रिहायशी कॉलोनियों में इंसानों तथा बंदरों के बीच टकराव की गंभीर घटनाएं बढ़ सकती हैं।\n\nअसोला-भाटी का पिछला अनुभव और पुनर्वास की वास्तविक चुनौतियां\nराष्ट्रीय राजधानी में बंदरों की बढ़ती आबादी और उनके प्रबंधन को लेकर पहले भी कई प्रयास किए जा चुके हैं। दिल्ली नगर निगम और नई दिल्ली नगरपालिका परिषद जैसे स्थानीय नागरिक निकायों को बंदरों को पकड़ने और उन्हें शहर से दूर भेजने की कानूनी और प्रशासनिक जिम्मेदारी दी गई है। पूर्व के अभियानों के दौरान पकड़े गए बंदरों को दक्षिणी दिल्ली के बाहरी इलाके में स्थित असोला-भाटी वन्यजीव अभयारण्य में स्थानांतरित किया जाता रहा है। हालांकि, यह अनुभव पूरी तरह सफल या स्थाई समाधान साबित नहीं हुआ है। कई मौकों पर यह देखा गया है कि प्राकृतिक अभयारण्य में पर्याप्त भोजन और पानी की कमी होने पर बंदर या तो भागकर दोबारा शहरी इलाकों में लौट आते हैं, या फिर जिस जगह से बंदरों को हटाया जाता है, वहां अन्य क्षेत्रों के नए झुंड आकर कब्जा जमा लेते हैं।\n\nअसोला-भाटी वन्यजीव अभयारण्य पर पहले से ही शहर भर से लाए गए हजारों बंदरों का भारी दबाव है। ऐसे में शास्त्री भवन और कृषि भवन जैसे बड़े और सघन परिसरों से निकलने वाले सैकड़ों बंदरों को बिना किसी वैज्ञानिक तैयारी के वहां छोड़ देना न तो अभयारण्य के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सही होगा और न ही बंदरों के लिए। नगर निकायों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल बंदरों को पिंजरों में पकड़कर कहीं और छोड़ देने की नहीं है, बल्कि एक ऐसा प्राकृतिक वातावरण तैयार करने की है जहां उन्हें भरपूर भोजन और स्वच्छ पानी मिले, ताकि वे दोबारा भूखे रहकर मानव बस्तियों की ओर रुख न करें।\n\nशहरीकरण की दौड़ में जैव विविधता के संरक्षण की दरकार\nशास्त्री भवन और कृषि भवन को खाली कराए जाने से उत्पन्न हुआ यह संकट दरअसल आधुनिक शहरी नियोजन और वन्यजीव संरक्षण के बीच की गहरी खाई को उजागर करता है। जब भी किसी महानगर में विकास परियोजनाएं शुरू होती हैं, पुरानी इमारतों को तोड़कर बहुमंजिला कांच और स्टील के ढांचे बनाए जाते हैं, तब अक्सर उन परिसरों के दशकों पुराने वृक्षों और उन पर आश्रित पक्षियों तथा जानवरों की जरूरतों को औपचारिक फाइलों में नजरअंदाज कर दिया जाता है। आधुनिक सुविधाओं से लैस कर्तव्य भवन-4 और कर्तव्य भवन-5 के निर्माण से प्रशासनिक कार्यप्रणाली भले ही हाईटेक हो जाए, लेकिन इस बदलाव के कारण दशकों पुराना एक जीवंत प्राकृतिक ताना-बाना पूरी तरह नष्ट होने की कगार पर है।\n\nपर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि निर्माण कार्य और विध्वंस शुरू होने से पूर्व नगर निकायों, वन विभाग और परियोजना संचालकों को मिलकर एक व्यापक और समग्र रणनीति तैयार करनी चाहिए। इस योजना के तहत पहले शास्त्री भवन और कृषि भवन में रहने वाले बंदरों की सटीक गणना की जानी चाहिए, उनके व्यवहार और आवागमन के रास्तों का अध्ययन किया जाना चाहिए और उनके लिए एक सुरक्षित, व्यवस्थित और मानवीय पुनर्वास योजना लागू की जानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो मध्य दिल्ली का यह प्रशासनिक बदलाव आसपास के पूरे इलाके के लिए एक लंबे मानव-पशु संघर्ष का कारण बन सकता है।\n\nइसका आप पर असर\nशास्त्री भवन और कृषि भवन के खाली होने और तोड़े जाने से मध्य दिल्ली के रिहायशी और कामकाजी इलाकों में बंदरों का फैलाव बढ़ने की सीधी संभावना है।\n\n• राष्ट्रीय स्तर पर: सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत मंत्रालयों के नए भवनों में जाने से केंद्र सरकार के प्रशासनिक कामकाज में आधुनिक तकनीक और तेजी आएगी। आम जनता से जुड़े नीतिगत मामलों और फाइलों के निपटारे के लिए नए कार्यालयों में बेहतर नागरिक सुविधाएं मिलने की उम्मीद है।\n• दिल्ली और लुटियंस जोन में: शास्त्री और कृषि भवन के सैकड़ों बंदरों का ठिकाना उजड़ने से वे आसपास के पार्कों, इंडिया गेट के लॉन और लुटियंस जोन की आवासीय कॉलोनियों में फैल सकते हैं। इसके चलते लुटियंस दिल्ली में रहने वाले निवासियों, पैदल चलने वालों और वाहन चालकों को बंदरों के हमलों और सड़क हादसों के प्रति अधिक सतर्क रहना होगा।\n• नगर निकायों और प्रशासन के लिए: नई दिल्ली नगरपालिका परिषद और दिल्ली नगर निगम पर बंदरों को व्यवस्थित तरीके से पकड़ने और उनके सुरक्षित पुनर्वास का भारी दबाव बनेगा। नगर निकायों को असोला-भाटी वन्यजीव अभयारण्य में भोजन और पानी के पर्याप्त प्रबंध करने होंगे ताकि बंदर दोबारा शहर की कॉलोनियों का रुख न करें।\n• पर्यावरण और शहरी नियोजन में: महानगरों में बड़े पैमाने पर होने वाले ढांचागत पुनर्विकास के दौरान अब शहरी वन्यजीवों और पेड़ों के संरक्षण को डीपीआर का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा। यदि विकास परियोजनाओं में जैव विविधता का ध्यान नहीं रखा गया तो भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बड़े पैमाने पर बढ़ सकती हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसेंट्रल विस्टा परियोजना के विस्तार के तहत आजादी के बाद बनी पुरानी और जर्जर इमारतों की जगह आधुनिक बहुमंजिला दफ्तर बनाने के निर्णय के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है।\n\n• सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास योजना: केंद्र सरकार के मंत्रालयों को एक एकीकृत, आधुनिक और ऊर्जा-कुशल परिसर में स्थानांतरित करने के लिए कृषि भवन और शास्त्री भवन को गिराकर कर्तव्य भवन-4 और कर्तव्य भवन-5 बनाने का निर्णय लिया गया है। करीब छह दशक पुराने इन भवनों की कार्यक्षमता और स्थान की कमी नए प्रशासनिक ढांचे के अनुकूल नहीं रह गई थी।\n• दशकों पुराना प्राकृतिक बसेरा: 1957 में कृषि भवन और 1960 के दशक में शास्त्री भवन के निर्माण के समय से ही इन परिसरों के बड़े छायादार पेड़ और खुले बरामदे बंदरों के लिए सुरक्षित प्राकृतिक ठिकाना बने हुए थे। लंबे समय तक इंसानों के साथ सहअस्तित्व और नियमित भोजन मिलने के कारण यहां बंदरों की कई पीढ़ियां बिना किसी व्यवधान के फलती-फूलती रहीं।\n• शहरीकरण में वन्यजीव योजना का अभाव: दिल्ली में बड़े पैमाने पर पुनर्विकास और निर्माण शुरू करते समय वन्यजीवों के पूर्व-पुनर्वास के लिए कोई स्थायी और वैज्ञानिक तंत्र पहले से स्थापित नहीं किया गया। पहले भी असोला-भाटी अभयारण्य में बंदरों को भेजे जाने के बावजूद भोजन और पानी की कमी के कारण वे लौटते रहे हैं, जिससे नए विस्थापन की योजना पर सवाल उठ रहे हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. शास्त्री भवन और कृषि भवन को क्यों खाली कराया जा रहा है?\nसेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत इन पुरानी इमारतों को गिराकर इनकी जगह कर्तव्य भवन-4 और कर्तव्य भवन-5 नामक नए प्रशासनिक परिसर बनाए जाने हैं।\n\n2. इन दोनों भवनों का निर्माण किस दौर में हुआ था?\nकृषि भवन का निर्माण लगभग 1957 में और शास्त्री भवन का निर्माण 1960 के दशक में स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए हुआ था।\n\n3. इमारतें खाली होने से बंदरों के सामने क्या संकट खड़ा हो गया है?\nदशकों से इन परिसरों के पेड़ों और छतों पर बसे सैकड़ों बंदरों का प्राकृतिक ठिकाना, छाया, पानी और भोजन का स्रोत छिन जाने से वे बेघर होने की कगार पर हैं।\n\n4. ठिकाना उजड़ने के बाद बंदरों के कहां जाने की आशंका है?\nभोजन और आश्रय की तलाश में बंदरों के झुंड आसपास के पार्कों, व्यस्त सड़कों और लुटियंस दिल्ली के नजदीकी आवासीय इलाकों की ओर रुख कर सकते हैं।\n\n5. दिल्ली में बंदरों को पकड़कर कहां स्थानांतरित किया जाता रहा है?\nदिल्ली नगर निगम और नई दिल्ली नगरपालिका परिषद द्वारा पकड़े गए बंदरों को दक्षिणी दिल्ली के असोला-भाटी वन्यजीव अभयारण्य में भेजा जाता रहा है।\n\n6. असोला-भाटी वन्यजीव अभयारण्य में बंदरों को भेजने में क्या व्यावहारिक समस्या आती है?\nवहां भोजन और पानी की कमी के चलते कई बार बंदर दोबारा शहरी इलाकों में लौट आते हैं या खाली हुए इलाकों पर दूसरे बंदरों का झुंड कब्जा कर लेता है।\n\n7. विशेषज्ञों के अनुसार निर्माण कार्य से पहले क्या कदम उठाए जाने चाहिए?\nविशेषज्ञों का मानना है कि इमारतों को तोड़ने से पहले बंदरों की सही गणना कर उनके लिए सुरक्षित, वैज्ञानिक और मानवीय पुनर्वास योजना तैयार की जानी चाहिए।",
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  "publishedAt": "2026-10-15",
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