# एक साथ चुनाव पर संसदीय समिति से नहीं मिलेंगे देश के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने खारिज की चर्चा

> संयुक्त संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट के जजों के बीच एक साथ चुनाव संबंधी विधेयकों पर प्रस्तावित चर्चा की अटकलों को शीर्ष अदालत प्रशासन ने सिरे से नकार दिया है।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-10-01 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/chief-justice-of-india-aura-dusare-jajon-ke-bicha-one-nation-one-election-para-nahin-ho-rahi-koi-baithaka-supreme-court-ne-kiya-sa-41487 · **Language:** Hindi
**Tags:** सुप्रीम कोर्ट, कपिल सिब्बल, चीफ जस्टिस, एक साथ चुनाव, संयुक्त संसदीय समिति, संवैधानिक सुधार

देश भर में एक साथ चुनाव कराने से जुड़े प्रस्तावित मसौदे पर सुप्रीम कोर्ट के रुख को लेकर चल रहे विवाद पर विराम लग गया है। सर्वोच्च अदालत के प्रशासन ने औपचारिक तौर पर स्पष्ट किया है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश या अन्य किसी न्यायाधीश की संयुक्त संसदीय समिति के साथ ऐसी कोई बैठक तय नहीं है। इस स्पष्टीकरण के आने से पहले इस तरह के संवाद को लेकर कानूनी और राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस छिड़ गई थी।

## कपिल सिब्बल ने उठाए थे बैठक के औचित्य पर सवाल
इस पूरे मामले की शुरुआत उस समय हुई जब वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए एक दावा पेश किया। उन्होंने कहा था कि एक साथ चुनाव कराने की रूपरेखा तैयार कर रही संसद की संयुक्त समिति आगामी 6 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों से विचार-विमर्श करने की योजना बना रही है। सिब्बल ने प्रस्तावित वार्ता को पूरी तरह अभूतपूर्व बताते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया था।

वरिष्ठ वकील ने इस कदम को न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान में निहित शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ बताया। उन्होंने तर्क दिया कि संसद की समिति जिन विधायी मसौदों की जांच कर रही है, वे भविष्य में कानून का रूप लेने के बाद न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकते हैं। ऐसे में कानून बनने से पूर्व ही जजों के साथ इस तरह का संवाद स्थापित करना कानूनी परंपराओं के अनुकूल नहीं है।

## जांच के दायरे में आए दोनों प्रमुख विधेयक
संबंधित संसदीय समिति दरअसल संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की बारीकियों का अध्ययन कर रही है। इन दोनों विधेयकों का प्राथमिक उद्देश्य पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ आयोजित कराने का कानूनी ढांचा तैयार करना है। कपिल सिब्बल का कहना था कि जब समिति ने अभी अपनी अंतिम रिपोर्ट भी तैयार नहीं की है, तब शीर्ष अदालत के जजों को मसौदे की शर्तों की जानकारी देने के नाम पर समय मांगना समझ से परे है।

उन्होंने यह सवाल भी उठाया था कि क्या अदालत ने ऐसे किसी आमंत्रण को स्वीकार किया था, जबकि यह मसला देश की संवैधानिक व्यवस्था और शासन प्रणाली के बुनियादी ढांचे से गहराई से जुड़ा हुआ है।

## प्रशासन के बयान से अटकलों का पटाक्षेप
वरिष्ठ अधिवक्ता की आपत्तियों के सामने आने के फौरन बाद सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने स्थिति को पूरी तरह साफ कर दिया। प्रशासनिक अधिकारियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुख्य न्यायाधीश अथवा सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों के साथ संयुक्त संसदीय समिति की कोई बैठक आयोजित नहीं की जा रही है। इस खंडन के बाद उन सभी कयासों पर पूर्ण विराम लग गया है जिनमें न्यायपालिका और संसदीय समिति के बीच औपचारिक विचार-विमर्श होने की बात कही जा रही थी।

## इसका आप पर असर
सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्टीकरण से संवैधानिक संस्थाओं के बीच कार्यक्षेत्र और मर्यादा की सीमाएं पूरी तरह स्पष्ट बनी रहेंगी।

- **न्यायिक निष्पक्षता:** प्रस्तावित कानूनों पर न्यायिक जांच की स्वतंत्रता पूरी तरह सुरक्षित रहेगी। यदि यह कानून बनता है और नागरिक या राजनीतिक दल इसे अदालत में चुनौती देते हैं, तो न्यायाधीश बिना किसी पूर्व पूर्वाग्रह के स्वतंत्र फैसला सुना सकेंगे।
- **संसदीय जवाबदेही:** कानून निर्माण की प्रक्रिया में संसद की सर्वोच्चता और प्रक्रियात्मक नियम बरकरार रहेंगे। समिति को अपनी सिफारिशें संसद के पटल पर ही रखनी होंगी, जिससे जनता के प्रति विधायी जवाबदेही तय होगी।
- **संवैधानिक मर्यादा:** कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के संतुलन पर किसी तरह का संशय नहीं रहेगा। नागरिकों का यह भरोसा मजबूत होगा कि अदालतें कानून बनने से पहले गोपनीय विमर्श में शामिल नहीं होतीं।
- **लोकतांत्रिक प्रक्रिया:** देश में एक साथ चुनाव के संवेदनशील मुद्दे पर खुली और पारदर्शी बहस को बढ़ावा मिलेगा। किसी भी सुधार को लागू करने से पहले सभी आपत्तियां सार्वजनिक मंचों और संसद में दर्ज कराई जा सकेंगी।

## ऐसा क्यों हुआ
यह स्पष्टीकरण वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में संयुक्त संसदीय समिति और मुख्य न्यायाधीश के बीच बैठक तय होने का दावा करने के बाद जारी किया गया।

- **कपिल सिब्बल के दावे:** वरिष्ठ वकील ने आरोप लगाया था कि एक साथ चुनाव पर विचार कर रही जेपीसी 6 अक्टूबर को सीजेआई और अन्य जजों से मिलने वाली है। उन्होंने इस प्रस्तावित कदम को असंवैधानिक और शक्तियों के बंटवारे के खिलाफ करार दिया था।
- **हितों के टकराव की आशंका:** सिब्बल का तर्क था कि चूंकि यह समिति संविधान संशोधन विधेयकों की पड़ताल कर रही है, जिन्हें भविष्य में सर्वोच्च अदालत में ही चुनौती दी जाएगी, इसलिए जजों के साथ बैठक अनुचित है।
- **प्रशासनिक खंडन की जरूरत:** न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर किसी भी तरह का संदेह पैदा न हो, इसलिए सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने तुरंत आगे आकर स्पष्ट किया कि ऐसी कोई बैठक निर्धारित नहीं है।

## सवाल-जवाब

### 1. क्या सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एक साथ चुनाव पर जेपीसी से मिलने वाले हैं?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने साफ तौर पर स्पष्ट किया है कि मुख्य न्यायाधीश या अन्य जजों की ऐसी कोई बैठक नहीं हो रही है।

### 2. इस प्रस्तावित बैठक पर सवाल किसने उठाए थे?
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बैठक की बात कहते हुए इसे असंवैधानिक बताया था।

### 3. कपिल सिब्बल ने बैठक की क्या तारीख बताई थी?
कपिल सिब्बल ने दावा किया था कि यह बैठक 6 अक्टूबर को होने वाली है।

### 4. संसदीय समिति किन विधेयकों की जांच कर रही है?
समिति संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की जांच कर रही है।

### 5. सिब्बल ने इस बैठक का विरोध किस आधार पर किया था?
उन्होंने कहा कि प्रस्तावित संशोधन भविष्य में कानून बनने के बाद सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के दायरे में आ सकते हैं, इसलिए ऐसी बैठक शक्तियों के बंटवारे के खिलाफ है।

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