चंबल के बीहड़ों से संसद भवन तक का सफर: फूलन देवी के संघर्ष और राजनीति की पूरी कहानी दस्यु सुंदरी से सांसद बनने तक का सफर तय करने वाली फूलन देवी की जिंदगी संघर्ष, अन्याय के खिलाफ बगावत और अंततः लोकतंत्र की मुख्यधारा से जुड़ने की एक असाधारण दास्तान है। इतिहास के पन्नों में 12 फरवरी 1983 का दिन एक बड़े नाटकीय मोड़ के रूप में दर्ज है, जब मध्य प्रदेश के भिंड जिले में भारी भीड़ और सशस्त्र सुरक्षाबलों के बीच एक युवा युवती ने महात्मा गांधी और देवी दुर्गा की तस्वीरों के सामने हथियार डालकर आत्मसमर्पण कर दिया था। खाकी वर्दी, माथे पर लाल पट्टी और लाल शॉल ओढ़े यह चेहरा कोई और नहीं बल्कि बैंडिट क्वीन के नाम से कुख्यात हो चुकी फूलन देवी का था, जिसने कुछ ही वर्षों में देश की राजनीति और अपराध जगत दोनों में हलचल मचा दी थी। बचपन का संघर्ष और अन्याय के खिलाफ पहली आवाज उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गोरहा का पुरवा गांव में 10 अगस्त 1963 को एक बेहद गरीब निषाद परिवार में जन्मी फूलन के जीवन में मुश्किलें शुरुआत से ही आ गई थीं। उनके पिता देवीदीन की पुश्तैनी जमीन पर उनके चाचा और चचेरे भाई मैयादीन ने गांव के सरपंच को रिश्वत खिलाकर कब्जा कर लिया था। जब महज 10 वर्ष की उम्र में फूलन ने अपनी परिवार की जमीन और एक नीम के पेड़ को कटने से बचाने की कोशिश की, तो दबंगों ने उनका जमकर विरोध किया और उन्हें बुरी तरह प्रताड़ित किया, जिसने उनके भीतर बगावत के बीज बो दिए थे। कम उम्र में विवाह और प्रताड़ना का दौर गरीबी और सामाजिक हालातों के दबाव के तले दबकर मात्र 11 साल की कच्ची उम्र में उनकी शादी पुत्तीलाल नाम के एक व्यक्ति से कर दी गई, जो उम्र में उनसे लगभग तीन गुना बड़ा था। ससुराल पहुंचने पर उन्हें लगातार शारीरिक, मानसिक और यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, जिसे लंबे समय तक सहन करने के बाद उन्होंने उस अन्यायपूर्ण रिश्ते को पूरी तरह ठुकरा दिया और अपने माता-पिता के घर वापस लौट आईं। अपहरण, विक्रम मल्लाह का साथ और बीहड़ की दुनिया गांव लौटने के बाद भी स्थानीय दबंगों और पुलिस की ज्यादतियां कम नहीं हुईं, और साल 1979 में बाबू गुज्जर के गिरोह ने उनका अपहरण कर लिया। उस दौरान बाबू गुज्जर ने उनके साथ कई बार दुष्कर्म किया, जिसका गिरोह के ही एक सदस्य विक्रम मल्लाह ने विरोध किया और बाबू गुज्जर को मौत के घाट उतारकर फूलन को अपनी सुरक्षा प्रदान की। विक्रम ने ही उन्हें हथियार चलाना सिखाया और दोनों के बीच प्रेम पनपा, जिसके बाद उन्होंने शोषितों के हक के नाम पर सवर्ण गांवों को निशाना बनाना शुरू किया, लेकिन यह दौर बहुत लंबा नहीं चल सका। बेहमई कांड और बदला लेने की वह खौफनाक घटना कहा जाता है कि वर्चस्व की इस खूनी जंग में ठाकुर समुदाय के डकैत श्री राम और लाला राम ने विक्रम मल्लाह की हत्या कर दी और फूलन को बंधक बनाकर बेहमई गांव ले गए। वहां उन्हें कई दिनों तक कैद में रखकर सामूहिक दुष्कर्म का शिकार बनाया गया। उस नरक से किसी तरह बाहर निकलने के बाद फूलन देवी ने अपना एक नया गिरोह तैयार किया और 14 फरवरी 1981 को वह अपने साथियों के साथ वापस उसी बेहमई गांव में आ गईं, जहां 20 से अधिक ठाकुर पुरुषों को एक कतार में खड़ा कर गोलियों से भून दिया गया। इस घटना ने उन्हें निचले तबके के बीच रॉबिन हुड और दुर्गा का स्वरूप बना दिया। जेल की सलाखों से लेकर राजनीति के शिखर तक साल 1983 में पुलिस के सामने सरेंडर करने के बाद उन्होंने बिना किसी ठोस फैसले के ग्वालियर और जबलपुर की जेलों में पूरे 11 साल गुजारे और अंततः 1994 में रिहा हुईं। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर लोकतांत्रिक सफर चुना और महिलाओं की रक्षा के लिए एकलव्य सेना की स्थापना की। हिंदू धर्म की जातियों में बंटी व्यवस्था से व्यथित होकर उन्होंने 15 फरवरी 1995 को नागपुर की दीक्षाभूमि में बौद्ध धर्म अपना लिया। साल 1996 में वह मिर्जापुर निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीतकर सीधे भारतीय संसद तक जा पहुंचीं। जीवन का अंत और विवादों से नाता उन्होंने अपनी आत्मकथा आई फूलन देवी भी लिखी जिसे दुनिया भर में पढ़ा गया, हालांकि शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन का उन्होंने कड़ा विरोध किया और लेखिका अरुंधति रॉय ने भी उस फिल्म पर उनके दर्द के व्यवसायीकरण का आरोप लगाया था। अंततः 25 जुलाई 2001 को नई दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास के बाहर शेर सिंह राणा और उसके साथियों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। इसका आप पर असर भारत में: यह ऐतिहासिक घटना और इसका राजनीतिक सफर देश की आपराधिक न्याय प्रणाली, जातिगत संघर्ष और राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के सामाजिक प्रभावों को रेखांकित करता है। उत्तर प्रदेश में: स्थानीय समुदायों और खासकर ग्रामीण इलाकों में इस तरह के पुराने दौर के सामाजिक संघर्ष और जातीय गतिशीलता का इतिहास आज भी राजनीतिक चर्चाओं और समीकरणों को प्रभावित करता है। सवाल-जवाब 1. फूलन देवी ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कब और कहां किया था? फूलन देवी ने 12 फरवरी 1983 को मध्य प्रदेश के भिंड जिले में पुलिस अधिकारियों के सामने हथियार डाले थे। 2. फूलन देवी का जन्म कब और कहां हुआ था? उन का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गोरहा का पुरवा गांव में हुआ था। 3. बेहमई कांड की घटना कब घटी थी? बेहमई कांड 14 फरवरी 1981 को हुआ था, जहां कई ठाकुर पुरुषों को गोली मारी गई थी। 4. फूलन देवी किस वर्ष लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंची थीं? वह 1996 में मिर्जापुर से चुनाव जीतकर भारतीय संसद की सदस्य बनी थीं। 5. फूलन देवी की हत्या किसने और कब की थी? उनकी हत्या 25 जुलाई 2001 को नई दिल्ली में शेर सिंह राणा और उसके साथियों द्वारा की गई थी। https://trendkia.com/national/chnbala-ke-biharon-se-snsada-bhavana-taka-ka-saphara-phulana-devi-ke-sngharsha-aura-rajaniti-ki-puri-kahani-15527 TrendKia — Har trend, sabse pehle.