# चुनाव आयोग के सामने आम आदमी पार्टी के खातों का खुलासा, एक साल में 68 फीसदी लुढ़का चंदा

> वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान आम आदमी पार्टी का घोषित चंदा घटकर 12.10 करोड़ रुपये रह गया, जिसमें दो बड़े दानदाताओं का हिस्सा 83 प्रतिशत से अधिक रहा।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-09-29 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/chunava-ayoga-ke-samane-aap-ke-khaton-ka-khulasa-eka-sala-men-68-phisadi-lurhaka-chnda-40004 · **Language:** Hindi
**Tags:** आम आदमी पार्टी, चुनाव आयोग, राजनीतिक चंदा, अरविंद केजरीवाल, ट्राइडेंट लिमिटेड, इलेक्टोरल ट्रस्ट

वित्त वर्ष 2025-26 के चुनावी चंदे के आधिकारिक आंकड़ों ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। निर्वाचन आयोग को सौंपी गई ताजा जानकारी के अनुसार, अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाले दल को पूरे वित्तीय वर्ष में कुल 12.10 करोड़ रुपये की धनराशि दान स्वरूप प्राप्त हुई। यह आंकड़ा पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में भारी गिरावट को दर्शाता है, जब संगठन ने 38.10 करोड़ रुपये का संग्रह दर्ज कराया था। केवल बारह महीनों के भीतर चंदे की कुल राशि में लगभग 68 प्रतिशत की यह कमी पार्टी के चुनावी और संगठनात्मक खर्चों के लिहाज से एक बड़ा बदलाव मानी जा रही है।

## प्रूडेंट और ट्राइडेंट के बूते टिका कुल चंदे का बड़ा हिस्सा
पार्टी की ओर से चुनाव आयोग में दर्ज कराई गई दानदाताओं की सूची में कुल 1,202 प्रविष्टियां शामिल हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि इस पूरी सूची में प्राप्त कुल राशि का करीब 83 प्रतिशत केवल दो प्रमुख संस्थाओं के माध्यम से आया। प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट तथा ट्राइडेंट लिमिटेड दोनों ने दल को 5-5 करोड़ रुपये का योगदान दिया, जिससे अकेले इन दो स्रोतों से 10 करोड़ रुपये की भारी रकम जुटाई गई।

ट्राइडेंट लिमिटेड का यह दान विशेष रूप से चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि इस औद्योगिक प्रतिष्ठान की नींव राजिंदर गुप्ता ने रखी थी, जो आम आदमी पार्टी की ओर से राज्यसभा सदस्य बने थे। कंपनी की तरफ से 5 करोड़ रुपये का चेक 9 जनवरी 2026 को जारी किया गया था। चेक जारी होने के समय गुप्ता संगठन के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे, किंतु आगे चलकर अप्रैल 2026 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली थी।

## शीर्ष नेताओं और अन्य हस्तियों का व्यक्तिगत योगदान
संगठन के प्रमुख चेहरों ने भी अपने स्तर पर पार्टी कोष में व्यक्तिगत सहयोग प्रदान किया। पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पूरे वर्ष के दौरान 10-10 हजार रुपये की तीन किस्तों में कुल 30 हजार रुपये का अंशदान दिया। इसी क्रम में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी ने प्रति माह 3,500 रुपये की दर से 12 किस्तों में 42 हजार रुपये की राशि संगठन को समर्पित की।

नेताओं में सबसे बड़ा व्यक्तिगत सहयोग पंजाब प्रदेश अध्यक्ष अमन अरोड़ा की ओर से दर्ज किया गया, जिन्होंने 10-10 हजार रुपये के 12 भुगतानों के जरिए कुल 1.20 लाख रुपये का योगदान दिया। दानदाताओं की इस विस्तृत सूची में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के वर्तमान सह-संयोजक अशुतोष रांका का नाम भी रेखांकित किया गया है। रांका ने सीजेपी की बागडोर संभालने से पूर्व आम आदमी पार्टी को 21,100 रुपये की सहयोग राशि प्रदान की थी।

## तीन वर्षों के उतार-चढ़ाव और क्षेत्रीय समीकरण
पिछले तीन वित्तीय वर्षों के चुनावी खातों पर नजर डालें तो आम आदमी पार्टी के कोष संग्रह में लगातार भारी उतार-चढ़ाव दर्ज हुआ है। वर्ष 2023-24 में संगठन को 11.06 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। इसके अगले साल यानी 2024-25 में यह राशि अप्रत्याशित उछाल के साथ 38.10 करोड़ रुपये के स्तर तक जा पहुंची थी, जो अब 2025-26 में पुनः फिसलकर 12.10 करोड़ रुपये पर सिमट गई है।

फंडिंग में कमी का यह रुख केवल एक दल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियों के वित्तीय दस्तावेजों में भी साफ दिखाई दिया है। उदाहरण के तौर पर, तेलुगु देशम पार्टी (TDP) का वार्षिक चंदा 2024-25 के 83.03 करोड़ रुपये के मुकाबले घटकर 2025-26 में 58.25 करोड़ रुपये रह गया। वहीं वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के चंदे में और भी नाटकीय गिरावट आई, जहां पार्टी ने 2024-25 के 140.04 करोड़ रुपये के संग्रह की तुलना में 2025-26 में मात्र 24.31 करोड़ रुपये प्राप्त होने की घोषणा की। दूसरी ओर, ओडिशा की बीजू जनता दल (BJD) ने अपनी नवीनतम फाइलिंग में 20 हजार रुपये से ऊपर के किसी भी दान की घोषणा नहीं की, जबकि पिछले साल दल ने इस श्रेणी में 60 करोड़ रुपये की आमदनी दिखाई थी।

## इसका आप पर असर
राजनीतिक दलों के चंदे के आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि चुनावी फंडिंग व्यवस्था में बड़े कारपोरेट घरानों और ट्रस्टों का प्रभाव कितना गहरा बना हुआ है।

- **पारदर्शिता की स्थिति:** चुनाव आयोग को दी जाने वाली अनिवार्य रिपोर्ट आम नागरिकों को यह जानने का अवसर देती है कि राजनीतिक दलों की तिजोरी में पैसा कहां से आ रहा है। मतदाता इन विवरणों के आधार पर दलों और बड़े उद्योगपतियों के संबंधों का निष्पक्ष विश्लेषण कर सकते हैं।
- **चुनावी खर्चों पर असर:** चंदे में भारी कमी आने से राजनीतिक दलों को अपने जमीनी अभियानों और मीडिया प्रचार में कटौती करनी पड़ सकती है। सीमित संसाधनों के चलते क्षेत्रीय संगठनों को अपने चुनावी प्रबंधन की रणनीतियां बदलनी होंगी।
- **संस्थागत दान का वर्चस्व:** कुल चंदे का बड़ा हिस्सा मुट्ठी भर बड़े कॉर्पोरेट और ट्रस्ट स्रोतों से आने के कारण छोटे दानदाताओं की हिस्सेदारी बेहद सीमित रह जाती है। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि आम जनता के छोटे सहयोग की तुलना में बड़ी संस्थाओं पर दलों की निर्भरता अधिक है।
- **क्षेत्रीय राजनीति पर प्रभाव:** कई प्रमुख क्षेत्रीय दलों के चंदे में एक साथ आई गिरावट राज्यों के आगामी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। धन की उपलब्धता सीधे तौर पर दलों की संगठनात्मक क्षमता और शक्ति प्रदर्शन को तय करती है।

## ऐसा क्यों हुआ
राजनीतिक दलों की सालाना फंडिंग में आए इस बड़े बदलाव के पीछे कॉर्पोरेट दान के बदलते रुझान, कानूनी फाइलिंग की शर्तें और चुनावी चक्रों का प्रभाव मुख्य कारण रहे हैं।

- **चुनावी चक्र का उतार-चढ़ाव:** आम तौर पर जिस वर्ष बड़े आम चुनाव या प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होते हैं, राजनीतिक दलों को कॉर्पोरेट घरानों से अधिक चंदा मिलता है। गैर-चुनावी वर्षों में दानदाता संस्थाएं अपने आवंटन को सीमित कर देती हैं, जिससे संग्रह में भारी गिरावट दर्ज होती है।
- **कॉर्पोरेट प्राथमिकताओं में बदलाव:** प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट और ट्राइडेंट जैसे बड़े स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण अगर एक या दो दाता अपनी रणनीति बदलते हैं, तो कुल आंकड़े पर सीधा असर पड़ता है। नेताओं के दल बदलने और नए राजनीतिक समीकरणों का असर भी कॉर्पोरेट सहयोग पर दिखाई देता है।
- **पारदर्शिता नियमों की बाध्यता:** जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत 20 हजार रुपये से अधिक के सभी दानों की घोषणा निर्वाचन आयोग में करना अनिवार्य होता है। कई दल कानूनी जांच और सार्वजनिक चर्चा से बचने के लिए भी बड़े दानों के प्रारूप में बदलाव करते हैं।
- **क्षेत्रीय दलों में व्यापक मंदी:** केवल एक दल ही नहीं, बल्कि कई राज्यों के क्षेत्रीय दलों के चंदे में समान रूप से गिरावट दर्ज की गई है। यह दर्शाता है कि उद्योग जगत का राजनीतिक चंदा व्यापक स्तर पर पुनर्गठित हुआ है।

## सवाल-जवाब

### 1. वित्त वर्ष 2025-26 में आम आदमी पार्टी को कुल कितना चंदा मिला?
निर्वाचन आयोग को दी गई रिपोर्ट के अनुसार पार्टी को इस वित्तीय वर्ष में कुल 12.10 करोड़ रुपये का चंदा प्राप्त हुआ।

### 2. पिछले साल के मुकाबले चंदे में कितने प्रतिशत की गिरावट आई है?
2024-25 में घोषित 38.10 करोड़ रुपये की तुलना में इस वर्ष चंदे में लगभग 68 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

### 3. पार्टी को सबसे बड़ा चंदा किन संस्थाओं ने दिया?
प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट और ट्राइडेंट लिमिटेड ने 5-5 करोड़ रुपये का योगदान दिया, जो कुल घोषित चंदे का लगभग 83 प्रतिशत है।

### 4. अरविंद केजरीवाल ने पार्टी कोष में कितना व्यक्तिगत योगदान दिया?
पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 10-10 हजार रुपये की तीन अलग-अलग किस्तों में कुल 30 हजार रुपये का चंदा दिया।

### 5. क्या अन्य क्षेत्रीय दलों के चंदे में भी कमी दर्ज हुई है?
हां, टीडीपी का चंदा घटकर 58.25 करोड़ रुपये और वाईएसआरसीपी का चंदा घटकर 24.31 करोड़ रुपये रह गया, जबकि बीजेडी ने 20 हजार से ऊपर का कोई दान दर्ज नहीं किया।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._