दक्षिण के मंदिरों के गलियारों से घुटन और ताजमहल पर मुग्धता, 1959 में वास्तुकला पर बोले थे जवाहरलाल नेहरू पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी द्वारा जवाहरलाल नेहरू के एक पुराने बयान का हवाला दिए जाने के बाद ऐतिहासिक टिप्पणियों पर चर्चा तेज हो गई है। 1959 में दिए भाषण में नेहरू ने दक्षिण भारत के मंदिरों और ताजमहल पर अपनी निजी राय जाहिर की थी। पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एजी नूरानी मेमोरियल लेक्चर के दौरान एजी नूरानी की चर्चित पुस्तक The RSS: A Menace to India का उल्लेख करते हुए देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की एक ऐतिहासिक टिप्पणी को सार्वजनिक पटल पर दोहराया। अपने उस पुराने वक्तव्य में जवाहरलाल नेहरू ने रेखांकित किया था कि भारत के अस्तित्व और सामाजिक ताने-बाने के लिए साम्यवाद की तुलना में हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता कहीं अधिक गंभीर खतरा प्रस्तुत करती है। हामिद अंसारी के इस संबोधन के सामने आने के बाद समूचे राजनीतिक गलियारे में एक नई बहस छिड़ गई, जिसमें नेहरू के दृष्टिकोण और हिंदू परंपराओं को लेकर उनके व्यक्तिगत विचारों का बारीकी से मूल्यांकन किया जाने लगा है। हालांकि, हिंदू समाज और उसके सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर नेहरू के विचारों की परिधि केवल इस एकल बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि इतिहास के पन्नों में उनके कई ऐसे व्याख्यान दर्ज हैं जो उनकी जटिल वैचारिक प्राथमिकताओं को उजागर करते हैं। विशेष रूप से वर्ष 1959 में वास्तुकला के एक मंच पर बोलते हुए देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने दक्षिण भारत के विख्यात मंदिरों और आगरा स्थित ताजमहल की तुलनात्मक समीक्षा की थी। इस संबोधन में उन्होंने भारतीय स्थापत्य कला के इन दो भिन्न शिखरों को देखने के अपने व्यक्तिगत नजरिए को साझा किया था, जो आज भी विचारकों और इतिहासकारों के बीच गहन विमर्श का विषय बना हुआ है। 17 मार्च 1959 का व्याख्यान और मंदिरों पर असहजता तारीख 17 मार्च 1959 की थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली में ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सोसाइटी द्वारा आयोजित ललित कला अकादमी के आर्किटेक्चर सेमिनार को संबोधित किया था। इस औपचारिक संगोष्ठी का मुख्य विषय पूरी तरह से वास्तुकला और स्थापत्य शैलियों के तकनीकी व सौंदर्यपरक पक्षों पर केंद्रित था। इसी संगोष्ठी के दौरान तत्कालीन सांस्कृतिक मामलों के मंत्री हुमायूं कबीर ने अपने वक्तव्य में दक्षिण भारत के भव्य ऐतिहासिक मंदिरों तथा मुगलकालीन स्मारक ताजमहल का विशेष रूप से उल्लेख किया था। हुमायूं कबीर के तर्कों को आगे बढ़ाते हुए जवाहरलाल नेहरू ने दोनों संरचनाओं पर अपनी बेबाक राय रखी। उन्होंने खुले दिल से यह स्वीकार किया कि दक्षिण भारत के मंदिर बेहद सुंदर और भव्य हैं। लेकिन इस कलात्मक प्रशंसा के ठीक बाद उन्होंने यह जोड़कर सबको चौंका दिया कि अपनी अद्वितीय सुंदरता के बावजूद इनमें से कुछ मंदिर उन्हें आकर्षित करने के बजाय दूर धकेलते हैं। नेहरू ने इस आंतरिक असहजता की मुख्य वजह उन ऐतिहासिक मंदिरों के भीतर बने गहरे और अंधेरे गलियारों को बताया। उनके व्यक्तिगत अनुभव के अनुसार, ऐसे संकीर्ण और बंद स्थान उन पर एक किस्म का भारी दबाव बनाते थे और उनकी चेतना व आंतरिक भावना को ऊपर उठने से रोकते थे। नेहरू ने अपने इस भाषण में कहा था "Mr. Humayun Kabir referred to the great temples of the South and Taj Mahal. Well, they are very beautiful and some of the temples of the South, however, repel me in spite of their beauty. I just cannot stand them, why I do not know, I cannot explain that, but they are oppressive, they suppress my spirit. They do not allow me to rise, they keep me down, dark corridors. I like the sun and air, not dark corridors…" नेहरू के इन मूल शब्दों से स्पष्ट झलकता है कि वे खुली धूप, स्वच्छ हवा और विशाल खुलेपन को प्राथमिकता देते थे, जबकि प्राचीन मंदिरों के भीतर की छायादार और रहस्यमयी संरचनाएं उन्हें एक प्रकार का मानसिक घुटन भरा अहसास कराती थीं। ताजमहल की प्रशंसा और दृष्टि का विरोधाभास मंदिरों के संकरे गलियारों पर अपनी असहजता प्रकट करने के तुरंत बाद जवाहरलाल नेहरू ने उसी संबोधन में ताजमहल की खुलकर सराहना की। ताजमहल के सौंदर्य का विश्लेषण करते हुए उन्होंने इसे दुनिया भर की सबसे खूबसूरत कलाकृतियों में से एक करार दिया। नेहरू का मानना था कि सफेद संगमरमर की इस विशाल इमारत का दीदार करना मानवीय दृष्टि और आत्मा दोनों को असीम आनंद तथा ताजगी से भर देता है। नेहरू ने ताजमहल के संदर्भ में कहा था "The Taj Mahal is, of course, one of the most beautiful things anywhere and it is a delight to the eye and to the spirit to see it." यह ऐतिहासिक अभिलेख Selected Works of Jawaharlal Nehru और नेहरू आर्काइव में सुरक्षित भाषणों के आधिकारिक संग्रह में दर्ज है। इस तुलना ने समय के साथ एक गंभीर वैचारिक द्वंद्व को जन्म दिया। आलोचकों और समाजशास्त्रियों ने रेखांकित किया कि जहां एक ओर ताजमहल मूलतः एक मकबरा अथवा कब्र है, वहीं दूसरी ओर दक्षिण के मंदिर करोड़ों हिंदू धर्मावलंबियों की गहरी आस्था, साधना और आत्मा की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति के जीवंत केंद्र हैं। ऐसे में यह सवाल बार-बार उठाया जाता रहा है कि क्या मंदिरों के प्रति उनकी नापसंदगी केवल वास्तुकला के बंद गलियारों तक सीमित थी, या फिर इसके मूल में हिंदू धर्म और उसकी पारंपरिक उपासना पद्धतियों के प्रति उनकी एक अंतर्निहित दूरी भी काम कर रही थी। 1929 के लाहौर अधिवेशन से 1950 के दशक तक का वैचारिक सफर जवाहरलाल नेहरू के इस आंतरिक द्वंद्व की जड़ें उनके राजनीतिक जीवन के आरंभिक दौर में भी देखी जा सकती हैं। वर्ष 1929 में कांग्रेस के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन के दौरान उन्होंने अपनी धार्मिक पहचान को लेकर एक अत्यंत चर्चित टिप्पणी की थी। उस समय नेहरू ने स्पष्ट रूप से कहा था "I was born a Hindu but I do not know how far I am justified in calling myself one or in speaking on behalf of Hindus." यानी वे जन्मना हिंदू परिवार में पैदा होने की सच्चाई को तो स्वीकार करते थे, किंतु खुद को एक पारंपरिक हिंदू कहने अथवा हिंदू समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने के अधिकार को लेकर उनके मन में गहरा संशय था। यह आत्म-स्वीकारोक्ति दर्शाती है कि वे किसी भी संप्रदाय की रूढ़िवादिता में स्वयं को बांधने से बचते थे। समय के साथ उनके इस रुख में कई अन्य आयाम जुड़े। वर्ष 1953 में उन्होंने भारतीय हिंदू समाज के भीतर जड़ जमा चुकी जाति व्यवस्था, सामाजिक ऊंच-नीच और संकीर्ण सामाजिक व्यवहार की सार्वजनिक रूप से तीखी आलोचना की थी। इसके ठीक अगले वर्ष, यानी 1954 में, उन्होंने हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसे दक्षिणपंथी संगठनों की राजनीतिक विचारधारा पर कड़े प्रहार किए थे। फिर 1959 में दक्षिण भारतीय मंदिरों की वास्तुकला पर उनकी व्यक्तिगत असहजता सामने आई। सम्मान और आलोचना के बीच संतुलन की पड़ताल हालांकि नेहरू के विचारों का अध्ययन करने वाले विद्वान यह भी याद दिलाते हैं कि उनके सभी बयान नकारात्मक आलोचना तक सीमित नहीं थे। वर्ष 1955 में दिए गए अपने बयानों में उन्होंने हिंदू धर्म की दार्शनिक विरासत सहित भारत में मौजूद सभी धर्मों के प्रति गहरे सम्मान और सह-अस्तित्व की आवश्यकता पर पुरजोर बल दिया था। उन्होंने अनेक अवसरों पर भारतीय संस्कृति की प्राचीन निरंतरता और उसकी सहिष्णुता की प्रशंसा भी की। इसके बावजूद, जब उनके विभिन्न कालखंडों के बयानों को एक साथ रखकर देखा जाता है, तो यह तथ्य उभरता है कि वे हिंदू धर्म की ऐतिहासिक समृद्धि और दार्शनिक ऊंचाई को स्वीकार करने के साथ-साथ उसकी सामाजिक कुरीतियों, जातिवादी ढांचों और रूढ़िवादी प्रवृत्तियों पर लगातार प्रहार करते रहे। आलोचकों की दृष्टि में उनका यह रुख एक असंतुलित दृष्टिकोण का आभास कराता है, जहां वे पश्चिमी आधुनिकता, वैज्ञानिक सोच और खुलेपन की कसौटी पर भारतीय परंपराओं को कसते थे। दूसरी ओर, उनके समर्थकों का मानना है कि 1959 के वास्तुकला संबंधी भाषण को किसी धार्मिक पूर्वाग्रह से जोड़कर देखना अनुचित है, क्योंकि वहां वे केवल प्रकाश, धूप और स्थापत्य संरचना के मानवीय मन पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव की बात कर रहे थे, न कि किसी पंथ की धार्मिक वैधता की। इसका आप पर असर इस ऐतिहासिक और वैचारिक विमर्श का आम नागरिकों पर प्रत्यक्ष प्रभाव इतिहास, वास्तुकला और राजनीतिक बहसों को समझने के दृष्टिकोण पर पड़ता है। • इतिहास के विद्यार्थियों के लिए: यह प्रसंग ऐतिहासिक दस्तावेजों और राजनेताओं के भाषणों को उनके मूल संदर्भ में समझने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इससे विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को प्राथमिक स्रोतों जैसे Selected Works of Jawaharlal Nehru की निष्पक्ष समीक्षा करने का अवसर मिलता है। • सांस्कृतिक विमर्श में: भारतीय स्मारकों और मंदिरों के संरक्षण और उनकी स्थापत्य व्याख्या को लेकर नए दृष्टिकोण सामने आते हैं। आम नागरिक यह समझ सकते हैं कि किस तरह वास्तुकला के व्यक्तिगत अनुभव को राजनीतिक बहसों का हिस्सा बनाया जाता है। • राजनीतिक समझ के स्तर पर: पुराने बयानों के आधार पर वर्तमान में गढ़े जा रहे आख्यानों को तार्किक रूप से परखने में मदद मिलती है। पाठक किसी भी नेता की विचारधारा को केवल एकतरफा बयानों के बजाय उनके समग्र कृतित्व और भाषणों के आधार पर तौल सकते हैं। • सार्वजनिक बहस के संदर्भ में: यह चर्चा स्पष्ट करती है कि पूर्व नेताओं के बयानों को उद्धृत करते समय तत्कालीन समय और मंच का ध्यान रखना कितना आवश्यक है। इससे समाज में अनावश्यक ध्रुवीकरण के बजाय बौद्धिक विमर्श को बढ़ावा मिल सकता है। ऐसा क्यों हुआ जवाहरलाल नेहरू के पुराने बयानों पर यह ताजा विवाद तब शुरू हुआ जब पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एक स्मृति व्याख्यान में उनके एक ऐतिहासिक उद्धरण का उल्लेख किया। इस भाषण के बाद राजनीतिक गलियारों में नेहरू के दृष्टिकोण और हिंदू समाज व संस्कृति के प्रति उनके नजरिए को लेकर पुरानी बहसों को दोबारा हवा मिल गई। • हामिद अंसारी का संदर्भ: पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एजी नूरानी मेमोरियल लेक्चर में एजी नूरानी की पुस्तक The RSS: A Menace to India का हवाला देते हुए नेहरू के पुराने बयान को दोहराया था। उस बयान में नेहरू ने हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता को साम्यवाद से भी अधिक खतरनाक बताया था, जिससे तात्कालिक राजनीतिक प्रतिक्रियाएं शुरू हुईं। • 1959 का वास्तुकला भाषण: जब नेहरू के धार्मिक और सांस्कृतिक नजरिए पर सवाल उठे, तो 17 मार्च 1959 को दिल्ली में आयोजित ललित कला अकादमी के सेमिनार में दिया गया उनका भाषण फिर से चर्चा में आ गया। उस भाषण में उन्होंने दक्षिण के मंदिरों के अंधेरे गलियारों पर असहजता जताई थी और धूप-हवा को तरजीह देते हुए ताजमहल की भरपूर तारीफ की थी। • नेहरू का धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक दृष्टिकोण: इतिहासकार मानते हैं कि नेहरू स्वभाव से वैज्ञानिक सोच और खुलेपन के समर्थक थे, जिसके कारण वे बंद जगहों या रूढ़िवादी धार्मिक परंपराओं से असहज महसूस करते थे। 1929 के लाहौर अधिवेशन में भी उन्होंने स्वीकार किया था कि वे हिंदू पैदा हुए थे लेकिन हिंदुओं की ओर से बोलने को लेकर संशय में थे। • राजनीतिक विमर्श का ध्रुवीकरण: स्वतंत्र भारत के इतिहास में नेहरू की नीतियों और उनके वैचारिक रुख को लेकर पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार वैचारिक टकराव रहा है। वर्तमान में दोनों पक्षों द्वारा उनके पुराने अभिलेखों को अपनी-अपनी राजनीतिक लाइन के समर्थन में प्रस्तुत करने से यह मामला दोबारा गर्मा गया। सवाल-जवाब 1. हामिद अंसारी ने जवाहरलाल नेहरू के किस बयान का जिक्र किया था? हामिद अंसारी ने एजी नूरानी मेमोरियल लेक्चर में नेहरू के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने साम्यवाद की तुलना में हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता को देश के लिए बड़ा खतरा बताया था। 2. जवाहरलाल नेहरू ने 1959 में दक्षिण भारत के मंदिरों के बारे में क्या कहा था? 17 मार्च 1959 के भाषण में नेहरू ने स्वीकार किया था कि दक्षिण के मंदिर सुंदर हैं, लेकिन उनके अंधेरे गलियारे उन्हें आकर्षित नहीं करते और वहां वे घुटन महसूस करते हैं। 3. नेहरू ने उसी भाषण में ताजमहल की क्या प्रशंसा की थी? नेहरू ने ताजमहल को दुनिया की सबसे सुंदर कृतियों में से एक बताया था और कहा था कि उसे देखना आंखों और आत्मा दोनों को आनंद देता है। 4. नेहरू का 1959 का यह भाषण कहां और किस विषय पर दिया गया था? यह भाषण 17 मार्च 1959 को दिल्ली में ललित कला अकादमी द्वारा आयोजित ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सोसाइटी के आर्किटेक्चर सेमिनार में दिया गया था। 5. 1929 के लाहौर अधिवेशन में नेहरू ने अपनी धार्मिक पहचान पर क्या कहा था? लाहौर अधिवेशन में नेहरू ने कहा था कि वे हिंदू पैदा हुए थे, लेकिन उन्हें नहीं पता कि खुद को हिंदू कहने या हिंदुओं की तरफ से बोलने में वे कितने सही हैं। 6. क्या नेहरू ने कभी सभी धर्मों के सम्मान की बात की थी? हां, 1955 में दिए गए अपने बयानों में जवाहरलाल नेहरू ने हिंदू धर्म सहित भारत के सभी धर्मों के प्रति सम्मान और सौहार्द की आवश्यकता पर बल दिया था। https://trendkia.com/national/dakshina-ke-mndiron-ke-galiyaron-se-ghutana-aura-taj-mahal-para-mugdhata-1959-men-vastukala-para-bole-the-jawaharlal-nehru-37153 TrendKia — Har trend, sabse pehle.