ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान के चार चरण और बिगड़ती हवा के बीच लगने वाली बंदिशें नोएडा में एक्यूआई 303 दर्ज होने के साथ ही प्रदूषण रोकथाम की आपात व्यवस्था सक्रिय हो गई है। जानिए ग्रैप के चारों चरण किस प्रकार लागू होते हैं और किन गतिविधियों पर रोक लगाई जाती है। सर्दियों की शुरुआत के साथ ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हवा का स्तर लगातार बिगड़ने लगा है, जिससे निपटने के लिए प्रशासनिक स्तर पर आपात योजनाएं सक्रिय की जा रही हैं। शनिवार को केवल नोएडा का वायु गुणवत्ता सूचकांक 303 मापा गया, जो बेहद चिंताजनक माना जाता है। हवा की सेहत जांचने वाले पैमानों के अनुसार इस दौरान पीएम 2.5 की सघनता 222 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर जबकि पीएम 10 का स्तर 269 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज हुआ। इन बिगड़ते आंकड़ों के बीच नागरिकों से प्रदूषण बढ़ाने वाले निजी वाहनों के उपयोग से बचने का अनुरोध किया गया है। प्रदूषण पर काबू पाने का आपात तंत्र राष्ट्रीय राजधानी और आसपास के इलाकों में जहरीली धुंध पर नियंत्रण के उद्देश्य से पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वर्ष 2017 में पहली बार इस सिलसिलेवार आपातकालीन व्यवस्था को अधिसूचित किया था। इसे ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान या संक्षेप में ग्रैप कहा जाता है। यह मूल रूप से वायु प्रदूषण की गंभीरता के अनुरूप तैयार की गई सख्त बंदिशों की एक नियमावली है। जैसे-जैसे हवा में महीन कणों का घनत्व बढ़ता है, पाबंदियों का दायरा भी उसी अनुपात में व्यापक और कड़ा होता जाता है ताकि वातावरण में अतिरिक्त धुआं और धूल मिलने से रोका जा सके। वर्तमान समय में इस पूरी कार्ययोजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग संभालता है। यह आयोग मौसम की गतिविधियों और वायु गुणवत्ता के आंकड़ों का सतत आकलन करने के लिए दो प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों की मदद लेता है। इनमें भारतीय मौसम विज्ञान विभाग तथा भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान शामिल हैं। जब वायु गुणवत्ता सूचकांक तय पैमानों को पार कर जाता है या मौसम संबंधी पूर्वानुमान यह संकेत देते हैं कि आने वाले दिनों में मौसमी दशाएं बिगड़ने वाली हैं, तब आयोग परिस्थितियों के अनुसार उचित चरण की पाबंदियां प्रभावी करने का निर्देश जारी करता है। शुरुआती स्तर पर लागू होने वाले नियम वायु प्रदूषण की तीव्रता और संकट को ध्यान में रखते हुए इस व्यवस्था को कुल चार चरणों में विभाजित किया गया है। पहला चरण तब प्रभाव में आता है जब वायु गुणवत्ता सूचकांक 201 से 300 के दायरे में पहुंच जाता है, जिसे खराब श्रेणी माना गया है। हवा की गुणवत्ता गिरते ही निर्माण और ध्वस्तीकरण से जुड़ी सभी साइटों पर उड़ने वाली धूल को दबाने के कड़े उपाय अनिवार्य कर दिए जाते हैं। कचरे को खुले में जलाने पर पूरी तरह रोक लगा दी जाती है और मलबे के परिवहन पर भी नजर रखी जाती है। इसके साथ ही नगर निगम और स्थानीय निकाय सड़कों पर पानी का नियमित छिड़काव तेज कर देते हैं ताकि वाहनों की आवाजाही से धूल न उड़े। 10 से 15 साल पुरानी पेट्रोल और डीजल गाड़ियों पर निगरानी सख्त कर दी जाती है और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माने की कार्रवाई होती है। प्रशासनिक स्तर पर नागरिकों को निजी वाहनों के स्थान पर सार्वजनिक परिवहन साधनों का अधिक से अधिक उपयोग करने की सलाह दी जाती है। दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने भी शुक्रवार को लोगों से अपील की कि ग्रैप का पहला चरण लागू रहने के दौरान वे धुआं छोड़ने वाले वाहनों को सड़कों पर लाने से बचें। हवा अधिक दूषित होने पर द्वितीय चरण की पाबंदियां जब वायु गुणवत्ता सूचकांक 301 से 400 के मध्य पहुंच जाता है, तब स्थिति को बहुत खराब माना जाता है और दूसरा चरण सक्रिय हो जाता है। इस स्थिति में सबसे प्रमुख कदम डीजल जनरेटर सेटों के संचालन पर प्रतिबंध लगाना होता है, यद्यपि आवश्यक सेवाओं और आपातकालीन स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों को इससे छूट प्रदान की जाती है। होटल, रेस्तरां और ढाबों में खुले तौर पर कोयले अथवा लकड़ी का उपयोग करके चलने वाले तंदूर पर रोक लगा दी जाती है ताकि धुएं के स्थानीय स्रोतों को बंद किया जा सके। निजी वाहनों के उपयोग को हतोत्साहित करने के लिए पार्किंग स्थलों पर लगने वाले शुल्क में बढ़ोतरी कर दी जाती है। इससे लोग कारों के बजाय सार्वजनिक साधनों की ओर रुख करने के लिए प्रेरित होते हैं। इस दौरान यात्रियों की सुविधा के लिए दिल्ली मेट्रो और सीएनजी तथा इलेक्ट्रिक बसों के फेरों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की जाती है ताकि लोग सुगमता से यात्रा कर सकें और सड़कों पर व्यक्तिगत वाहनों की भीड़ कम हो। गंभीर श्रेणी में निर्माण कार्यों और वाहनों पर रोक जब प्रदूषण का स्तर 401 से 450 के बेहद खतरनाक पैमाने को छू लेता है, तो तीसरा चरण लागू किया जाता है जिसे गंभीर श्रेणी के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इस अवस्था में राष्ट्रीय सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और बेहद जरूरी सार्वजनिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को छोड़कर सामान्य निर्माण और ध्वस्तीकरण की सभी गतिविधियों पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी जाती है। धूल पैदा करने वाली गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से ठप कर दिया जाता है। यातायात क्षेत्र में प्रदूषण कम करने के लिए कड़े प्रतिबंध लगाए जाते हैं। इसके तहत दिल्ली और पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बीएस-III मानक वाली पेट्रोल और बीएस-IV मानक वाली डीजल चार पहिया गाड़ियों के चलने पर रोक लगा दी जाती है। बच्चों को जहरीली हवा से बचाने के उद्देश्य से प्राथमिक कक्षाओं के स्कूलों को बंद करने का निर्देश भी इसी तीसरे चरण के अंतर्गत अमल में लाया जाता है। आपातकाल की चरम स्थिति और चौथा चरण वायु गुणवत्ता सूचकांक के 450 के आंकड़े से ऊपर जाते ही स्थिति को बेहद गंभीर या आपातकाल मानकर चौथा चरण लागू किया जाता है। यह प्रदूषण का सबसे विकट रूप होता है, जिसमें दिल्ली की सीमाओं पर गैर-जरूरी मालवाहक ट्रकों का प्रवेश पूरी तरह रोक दिया जाता है, केवल आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं वाले वाहनों को ही आने की अनुमति मिलती है। सभी स्कूलों और कॉलेजों को भौतिक रूप से बंद करके कक्षाओं को ऑनलाइन संचालित करने का निर्णय लिया जाता है। सरकारी विभागों के साथ-साथ निजी संस्थानों को भी अपने 50 प्रतिशत कर्मचारियों को घर से काम करने की अनुमति देने का आदेश दिया जा सकता है। स्थिति नियंत्रण से बाहर होने पर प्रशासन सड़कों पर वाहनों की संख्या आधी करने के लिए ऑड-ईवन योजना जैसे आपातकालीन कदम भी उठा सकता है। स्वास्थ्य पर प्रभाव और सांसों का संकट वायु गुणवत्ता सूचकांक जैसे ही 201 की सीमा पार करता है, सामान्य नागरिकों के लिए भी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां शुरू होने लगती हैं। विशेष रूप से फेफड़ों और हृदय रोग से पीड़ित व्यक्तियों के लिए 201 से 300 का स्तर भी काफी नुकसानदेह सिद्ध होता है। जब यह सूचकांक 301 से अधिक हो जाता है, तो यह एक प्रकार की स्वास्थ्य आपात स्थिति बन जाती है। हवा में मौजूद पीएम 2.5 यानी 2.5 माइक्रोमीटर से छोटे कण सबसे अधिक जानलेवा होते हैं क्योंकि सांस के रास्ते ये सीधे फेफड़ों में गहराई तक जाकर रक्त प्रवाह में मिल जाते हैं। पर्यावरण मंत्री सिरसा ने भी वर्तमान हालात पर टिप्पणी करते हुए कहा, "स्थिति अच्छी नहीं है।" इसका आप पर असर बढ़ते वायु प्रदूषण और ग्रैप पाबंदियों के लागू होने से दिल्ली-एनसीआर के नागरिकों के दैनिक जीवन, आवागमन और बच्चों की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ेगा। • राष्ट्रीय स्तर पर: प्रदूषण नियंत्रण के कड़े नियमों के कारण अंतरराज्यीय परिवहन और निर्माण सामग्री की आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है। गैर-जरूरी मालवाहक ट्रकों की आवाजाही पर रोक लगने से व्यापारिक गतिविधियों की लागत में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। • दिल्ली-एनसीआर में: स्थानीय निवासियों को निजी वाहनों की जगह मेट्रो और बसों का सहारा लेना होगा क्योंकि पार्किंग शुल्क और पुरानी गाड़ियों पर पाबंदियां बढ़ेंगी। गंभीर स्थिति होने पर प्राथमिक स्कूलों की छुट्टी या ऑनलाइन पढ़ाई और दफ्तरों में 50 प्रतिशत वर्क फ्रॉम होम का नियम लागू हो सकता है। • स्वास्थ्य सुरक्षा: हवा में पीएम 2.5 का स्तर बढ़ने से सांस और दिल के मरीजों को घरों में रहने और बाहर निकलने पर मास्क लगाने की सख्त जरूरत है। सुबह और शाम के समय टहलने वाले लोगों को भी खुली हवा में कसरत करने से बचना चाहिए। • गाड़ी मालिकों के लिए: 10 से 15 साल पुराने वाहनों तथा बीएस-III पेट्रोल व बीएस-IV डीजल गाड़ियों पर तीसरे चरण में रोक लग जाएगी। वाहन चालकों को भारी जुर्माने से बचने के लिए प्रदूषण जांच प्रमाण पत्र अपडेट रखना होगा और नियमों का पालन करना होगा। ऐसा क्यों हुआ सर्दियों के आगमन के साथ ही मौसमी बदलाव और क्षेत्रीय गतिविधियों के संयोजन से दिल्ली-एनसीआर में जहरीले धुएं का निर्माण होता है। हवा की धीमी गति और तापमान में गिरावट के कारण वायुमंडल में प्रदूषक कण जमीन की सतह के करीब ही जमा होकर रह जाते हैं। • मौसमी और मौसमीय दशाएं: सर्दियों में हवा की रफ्तार काफी धीमी हो जाती है और तापमान गिरने से वायुमंडलीय दबाव प्रदूषक तत्वों को ऊपर नहीं उठने देता। इसके चलते गाड़ियों का धुआं, धूल और स्थानीय उत्सर्जन क्षेत्र के ऊपर एक घनी चादर की तरह जम जाते हैं। • वाहनों और निर्माण का उत्सर्जन: राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लाखों वाहनों की दैनिक आवाजाही और भारी निर्माण गतिविधियां लगातार पीएम 2.5 और पीएम 10 कणों को वातावरण में छोड़ती हैं। सामान्य दिनों में हवा इन कणों को बिखेर देती है, लेकिन प्रतिकूल मौसम में यह सांद्रता खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है। • वैज्ञानिक निगरानी और पूर्वानुमान: मौसम विभाग और उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के आंकड़ों के आधार पर सीएक्यूएम समय रहते पाबंदियां तय करता है। पूर्व चेतावनी मिलने पर संबंधित चरण लागू कर दिया जाता है ताकि हवा को आपातकालीन स्तर तक पहुंचने से रोका जा सके। सवाल-जवाब 1. ग्रैप क्या है और इसे सबसे पहले कब लागू किया गया था? ग्रैप यानी ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान वायु प्रदूषण से निपटने की एक आपात कार्ययोजना है, जिसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पहली बार 2017 में अधिसूचित किया था। 2. नोएडा में हालिया वायु गुणवत्ता सूचकांक कितना दर्ज किया गया है? नोएडा में लाइव वायु गुणवत्ता सूचकांक 303 दर्ज किया गया, जो बहुत खराब श्रेणी में आता है। 3. ग्रैप की विभिन्न पाबंदियों को लागू करने का आदेश कौन देता है? वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग मौसम विभाग और उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के आंकड़ों और पूर्वानुमानों की निगरानी करके इसे लागू करता है। 4. ग्रैप के दूसरे चरण में किन गतिविधियों पर रोक लगाई जाती है? दूसरे चरण में आवश्यक सेवाओं को छोड़कर डीजल जनरेटर के संचालन और होटलों व ढाबों में कोयले-लकड़ी के तंदूर के उपयोग पर पाबंदी लग जाती है। 5. तीसरे चरण के तहत कौन-से वाहनों के संचालन पर प्रतिबंध लगता है? तीसरे चरण में दिल्ली-एनसीआर में बीएस-III पेट्रोल और बीएस-IV डीजल चार पहिया वाहनों के चलने पर रोक लगा दी जाती है। 6. चौथा चरण लागू होने पर दफ्तरों और स्कूलों के लिए क्या निर्देश होते हैं? चौथे चरण में स्कूल-कॉलेज बंद कर ऑनलाइन पढ़ाई कराई जाती है और दफ्तरों में 50 प्रतिशत कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम दिया जा सकता है। 7. पीएम 2.5 कण मानव स्वास्थ्य के लिए इतने खतरनाक क्यों होते हैं? पीएम 2.5 कण 2.5 माइक्रोमीटर से भी छोटे होते हैं, जो सांस के माध्यम से सीधे फेफड़ों में पहुंचकर रक्त प्रवाह में घुल जाते हैं। https://trendkia.com/national/delhi-ncr-men-pradushana-niyntrana-ke-chara-charana-aura-graded-response-action-plan-ke-tahata-lagane-vali-bndishen-51287 TrendKia — Har trend, sabse pehle.