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  "type": "article",
  "title": "दिल्ली प्रदर्शन मामले में शीर्ष अदालत में नोकझोंक, माइक विवाद पर भिड़े वकील",
  "summary": "दिल्ली में विरोध प्रदर्शन स्थलों और कारोबार को नुकसान के मामले में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के तंज पर अदालत में गरमागरम बहस छिड़ गई। शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी समूह का धरना स्थल पर स्थायी अधिकार नहीं हो सकता।",
  "content": "देश की शीर्ष अदालत में दिल्ली के धरना स्थलों और प्रदर्शनों से आम जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभाव से जुड़ी याचिकाओं पर चल रही सुनवाई के दौरान मंगलवार को तीखी नोकझोंक देखने को मिली। जब कारोबारियों का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी अपनी दलीलें पेश कर रहे थे और विपक्षी वकीलों ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की, तभी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की एक टिप्पणी ने माहौल को अचानक गरमा दिया। मेहता ने रोहतगी से कहा कि गनीमत है कि आपका माइक नहीं छीना गया। इस पर अदालत में उपस्थित कई वरिष्ठ वकीलों ने कड़ा ऐतराज जताया और वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने सॉलिसिटर जनरल को उनके संवैधानिक पद की मर्यादा तक का स्मरण कराया।\n\nमाइक प्रकरण की पृष्ठभूमि और अदालत कक्ष में तीखी बहस\nसॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की इस टिप्पणी का सीधा संदर्भ इसी प्रकरण की एक पूर्व सुनवाई से जुड़ा था। उस दौरान याचिकाकर्ताओं की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन के साथ माइक छीने जाने की कथित घटना घटी थी, जिसके उपरांत उन्होंने स्वयं को इस पूरे मामले की सुनवाई से अलग कर लिया था। मंगलवार को जब दूसरी ओर के वकीलों ने मुकुल रोहतगी की दलीलों के बीच बोलने का प्रयास किया, तो मेहता ने इसी पुरानी घटना का उल्लेख छेड़ दिया।\n\nकुछ ही क्षणों बाद जब विपक्षी पक्ष से पुनः बात रखने की कोशिश हुई, तो मेहता ने नाराजगी व्यक्त करते हुए सवाल किया कि क्या वे बिना किसी चीख-पुकार के अपनी दलील जारी रख सकते हैं। इसके साथ ही उन्होंने तंज भरे लहजे में यह भी जोड़ दिया कि वे पूरी तरह सुरक्षित हैं क्योंकि उनका माइक एक महफूज दूरी पर रखा है और उसे कोई छीन नहीं सकता। इस बात पर मेनका गुरुस्वामी के साथ वरिष्ठ अधिवक्ता अरुंधति काटजू ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। मेनका गुरुस्वामी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मेहता एक संवैधानिक दायित्व संभाल रहे हैं, इसलिए उन्हें अपने पद की गरिमा के अनुरूप ही आचरण करना चाहिए। इसके बाद अदालत कक्ष में मौजूद अधिवक्ताओं के बीच काफी देर तक गरमागरम बहस चली।\n\nधरना स्थलों पर किसी एक का एकाधिकार नहीं: शीर्ष अदालत\nइस पूरे मामले पर विचार चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ कर रही थी। यह मामला दिल्ली में अक्टूबर महीने के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद दायर याचिकाओं से जुड़ा हुआ था। पीठ ने सार्वजनिक स्थलों पर आंदोलन के अधिकार और नागरिकों की सुविधा के बीच संतुलन का मुद्दा बेहद स्पष्ट किया।\n\nपीठ ने दो टूक कहा कि कोई भी संगठन या प्रदर्शनकारी गुट किसी तय प्रदर्शन स्थल पर हमेशा के लिए काबिज होकर नहीं बैठ सकता। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि यदि कोई एक समूह किसी जगह पर अनिश्चितकाल तक धरना देकर बैठ जाएगा, तो फिर किसान, मजदूर, ट्रेड यूनियन और बेघर नागरिकों को अपनी आवाज उठाने का स्थान कहां मिलेगा। पीठ ने रेखांकित किया कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराना प्रत्येक नागरिक का बुनियादी संवैधानिक अधिकार है, परंतु इसका यह अर्थ कतई नहीं निकाला जा सकता कि कोई विशेष समूह पूरे प्रदर्शन स्थल पर अपना स्थायी अधिकार जमा ले और बाकी वर्गों को वंचित कर दे।\n\nव्यापारियों को 2000 करोड़ का नुकसान और सुरक्षा पाबंदियों पर सवाल\nव्यापारियों का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत के समक्ष यह दावा पेश किया कि लगातार जारी धरनों और प्रदर्शनों के कारण कारोबार को लगभग 2000 करोड़ रुपए के भारी राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा है। उन्होंने विस्तार से बताया कि रामलीला मैदान के इर्द-गिर्द राजधानी के कई प्रमुख व्यापारिक केंद्र और थोक बाजार स्थित हैं, जहां लाखों नागरिक निवास करते हैं तथा हजारों व्यापारी, मजदूर और स्थानीय दुकानदार अपनी दैनिक रोजी-रोटी के लिए इन्हीं बाजारों पर निर्भर रहते हैं।\n\nरोहतगी ने पीठ को बताया कि त्योहारी सीजन में इस प्रकार के विरोध प्रदर्शनों के कारण बिक्री पूरी तरह ठप हो गई, जिसका सीधा असर केवल बड़े कारोबारियों पर ही नहीं, बल्कि सामान ढोने वाले टेंपो चालकों, ठेले वालों और दैनिक मजदूरी करने वाले श्रमिकों पर भी पड़ा है। इस बिंदु पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए कहा कि क्या व्यापार में आई इस मंदी और नुकसान के लिए पूरी तरह प्रदर्शनकारियों को ही कसूरवार ठहराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अक्सर प्रशासन द्वारा लगाई जाने वाली बैरिकेडिंग, रास्तों की नाकेबंदी और सुरक्षा पाबंदियां भी सामान्य जनजीवन और व्यापारिक गतिविधियों को गंभीर रूप से बाधित करती हैं।\n\nसंसद मार्च, अनिश्चितकालीन धरने और प्रदर्शन के अधिकार का दायरा\nबहस को आगे बढ़ाते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रशासन की ओर से दलील दी कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अनियंत्रित भीड़ को बिना वैध मंजूरी के संसद की ओर कूच करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने पूर्व उदाहरण प्रस्तुत करते हुए जुलाई माह में कॉक्रोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा आयोजित प्रदर्शन का हवाला दिया। मेहता ने दावा किया कि उस दौरान केवल एक दिन के धरने की औपचारिक अनुमति ली गई थी, किंतु प्रदर्शनकारी लगातार 17 दिनों तक सड़क पर डटे रहे।\n\nमेहता ने जोर देकर कहा कि संसद भवन देश की सर्वोच्च संप्रभुता का प्रतीक है, इसलिए संसद या सुप्रीम कोर्ट जैसी संवेदनशील संस्थाओं के बाहर बिना पूर्व अनुमति के किसी भी प्रदर्शन की अनुमति देना सुरक्षा व्यवस्था के लिए घातक हो सकता है। इसके विपरीत, वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने नागरिकों के अधिकारों की वकालत करते हुए सवाल किया कि यदि रामलीला मैदान और जंतर-मंतर जैसे पारंपरिक और चिन्हित धरना स्थलों पर भी प्रदर्शन करने को लेकर आपत्तियां खड़ी की जाने लगेंगी, तो आम जनता अपनी बुनियादी मांगों और असंतोष को व्यक्त करने के लिए आखिर कहां जाएगी। इसके साथ ही प्रदर्शन स्थलों पर पुलिस प्रशासन द्वारा निगरानी और नागरिकों की निजता के मसले पर भी अदालत में चर्चा हुई।\n\nइसका आप पर असर\nयह अदालती सुनवाई राजधानी दिल्ली में धरना-प्रदर्शनों की सीमा और आम नागरिकों के दैनिक आवागमन तथा व्यापारिक गतिविधियों के संतुलन को तय करती है।\n\n• राष्ट्रीय स्तर पर: सार्वजनिक स्थलों पर धरने के अधिकार को लेकर अदालती रुख स्पष्ट करता है कि किसी एक समूह का प्रदर्शन स्थल पर एकाधिकार नहीं हो सकता। इससे देश भर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकारों और आम जनजीवन की स्वतंत्रता के बीच कानूनी संतुलन तय होगा।\n• दिल्ली में: रामलीला मैदान और जंतर-मंतर के आसपास रहने वाले स्थानीय निवासियों और दुकानदारों को लगातार धरनों व बैरिकेडिंग से होने वाली परेशानी पर अदालत का संज्ञान राहत दे सकता है। कारोबारी गतिविधियों और यातायात में लगने वाले जाम से आम नागरिकों को भविष्य में सुगम आवागमन मिल सकेगा।\n• व्यापारियों और श्रमिकों के लिए: त्योहारों और सामान्य दिनों में बाजारों के रास्ते खुले रहने से छोटे दुकानदारों, मजदूरों और टेंपो चालकों की दैनिक रोजी-रोटी सुरक्षित रहेगी। इससे प्रदर्शनों के नाम पर होने वाले करोड़ों के व्यापारिक नुकसान पर रोक लगाने के नियम स्पष्ट हो सकेंगे।\n• प्रदर्शनकारी संगठनों के लिए: किसी भी सामाजिक या राजनीतिक संगठन को निर्धारित समय और अनुमति के दायरे में ही अपनी आवाज उठानी होगी। बिना मंजूरी संसद या सुप्रीम कोर्ट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की ओर मार्च करने पर प्रशासनिक रोक का सामना करना पड़ेगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nदिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हुए धरने और उससे जुड़े सार्वजनिक व्यवधान के बाद व्यापारियों और नागरिकों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था।\n\n• धरना प्रदर्शन और व्यापारिक नुकसान: अक्टूबर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद स्थानीय बाजारों में भारी जाम और बंदी देखी गई। व्यापारियों ने राजस्व क्षति का हवाला देते हुए अदालत से उचित नियमन की गुहार लगाई थी।\n• अदालत कक्ष में पुराना विवाद: सुनवाई के दौरान पूर्व में याचिकाकर्ताओं के वकील गोपाल शंकरनारायणन का कथित तौर पर माइक छीना गया था, जिसके बाद उन्होंने केस छोड़ दिया था। उसी पुराने वाकये पर तुषार मेहता के तंज कसने से अदालत में ताजा तीखी बहस शुरू हो गई।\n• अनिश्चितकालीन कब्जे की प्रवृत्ति: प्रशासन ने कॉक्रोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा 1 दिन की अनुमति लेकर 17 दिन तक धरना देने जैसे उदाहरण रखकर प्रदर्शनों के दुरुपयोग की बात रखी। इस पर शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थलों पर किसी का स्थायी कब्जा स्वीकार्य नहीं है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुप्रीम कोर्ट में किस बात को लेकर वकीलों के बीच बहस छिड़ गई?\nसुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुकुल रोहतगी पर तंज कसते हुए कहा कि गनीमत है उनका माइक नहीं छीना गया, जिस पर मेनका गुरुस्वामी सहित अन्य वकीलों ने कड़ी आपत्ति जताई।\n\n2. तुषार मेहता की 'माइक छीनने' वाली टिप्पणी का क्या संदर्भ था?\nइसी मामले की पिछली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन के साथ कथित तौर पर माइक छीने जाने की घटना हुई थी, जिसके बाद उन्होंने मामले से खुद को अलग कर लिया था।\n\n3. प्रदर्शन स्थलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने क्या टिप्पणी की?\nचीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि कोई भी समूह किसी प्रदर्शन स्थल पर स्थायी रूप से कब्जा नहीं कर सकता, क्योंकि अन्य संगठनों और वर्गों को भी वहां अपनी आवाज उठाने का समान अधिकार है।\n\n4. व्यापारियों की ओर से अदालत में कितने नुकसान का दावा किया गया?\nवरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत को बताया कि लगातार होने वाले प्रदर्शनों और जाम के कारण व्यापारियों को लगभग 2000 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हुआ है।\n\n5. प्रशासन ने बिना अनुमति संसद मार्च पर क्या दलील दी?\nसॉलिसिटर जनरल ने कहा कि संसद देश की संप्रभुता का प्रतीक है और बिना पूर्व अनुमति के वहां या सुप्रीम कोर्ट के बाहर भीड़ को मार्च करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।",
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