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  "type": "article",
  "title": "धान की बालियों को खोखला कर रहा बैक्टीरियल पैनिकल ब्लाइट, मौसम के बदलाव से गहराया संकट",
  "summary": "तापमान बढ़ने और अधिक नमी के कारण धान की फसलों में बैक्टीरियल पैनिकल ब्लाइट का प्रकोप बढ़ रहा है, जिससे 75 प्रतिशत तक उपज बर्बाद हो सकती है। कृषि वैज्ञानिकों ने प्रमाणित बीज के इस्तेमाल और संतुलित उर्वरक प्रबंधन की सलाह दी है।",
  "content": "धान की फसल देश के करोड़ों किसानों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा की मुख्य रीढ़ मानी जाती है, परंतु जलवायु में आ रहे निरंतर बदलावों ने इस खेती पर संकट के बादल खड़े कर दिए हैं। अनियमित मानसून, बढ़ता तापमान और लंबे समय तक हवा में बनी रहने वाली नमी धान के खेतों में नए तरह के संक्रमणों को बुलावा दे रही है। इन दिनों धान की बालियों पर बैक्टीरियल पैनिकल ब्लाइट नाम की गंभीर बीमारी का साया मंडरा रहा है। इस संबंध में पूसा स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी के प्रोफेसर (डॉ.) एसके सिंह ने विस्तार से तकनीकी जानकारी साझा की है। उनके अनुसार, यह बीमारी सीधे धान की बालियों और बन रहे दानों को निशाना बनाती है, जिसके कारण दाने अंदर से भर ही नहीं पाते और पैदावार में भारी गिरावट देखने को मिलती है।\n\nसंक्रमण के पीछे का रोगाणु और इसके मुख्य लक्षण\nयह घातक बीमारी मुख्य रूप से Burkholderia glumae नामक खतरनाक जीवाणु के कारण फैलती है। जब वातावरण अधिक गर्म और नम होता है, तब इस बैक्टीरिया की सक्रियता कई गुना बढ़ जाती है। फसल में इसके प्रत्यक्ष लक्षण मुख्यतः फूल आने और बालियों में दाना भरने के नाजुक दौर में उभरकर सामने आते हैं। इस रोग की चपेट में आई बालियों के दाने कभी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते। दाने वजन में हल्के, आकार में सिकुड़े हुए और हल्के भूरे रंग के दिखने लगते हैं। पूरी की पूरी बाली दूर से झुलसी हुई नजर आती है तथा दानों में बांझपन पैदा हो जाता है। कई स्थितियों में पौधे की पत्ती की म्यान पर भी भूरापन छा जाता है। अक्सर किसान इसे साधारण फफूंद जनित रोग समझकर भ्रमित हो जाते हैं, जिससे इसकी सही पहचान करना काफी कठिन हो जाता है।\n\nबिहार, झारखंड और बंगाल में क्यों बढ़ा जोखिम?\nइस जीवाणु की सबसे खतरनाक बात यह है कि यह टोक्सोफ्लेविन (Toxoflavin) नाम का एक जहरीला तत्व तैयार करता है, जो पौधे की जीवित कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। इस रोग का फैलाव संक्रमित बीजों के अलावा बारिश की फुहारों और सिंचाई के पानी के जरिए एक खेत से दूसरे खेत में होता है। जब मौसम का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है और नमी का स्तर 80 प्रतिशत से अधिक हो जाता है, तब इस जीवाणु के पनपने के लिए सबसे आदर्श स्थिति बन जाती है। खरीफ सीजन के दौरान बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के इलाकों में ठीक ऐसा ही मौसम बना रहता है। खेतों में अत्यधिक समय तक जलजमाव और नमी बने रहने से रोग तेजी से फैलता है। विभिन्न कृषि शोधों में यह बात सामने आई है कि इस बीमारी के चलते किसानों को 5 से लेकर 75 प्रतिशत तक उपज का सीधा नुकसान झेलना पड़ सकता है।\n\nफसल को बचाने के सटीक उपाय और प्रबंधन\nकिसानों को अपनी फसल सुरक्षित रखने के लिए शुरुआत से ही प्रमाणित और रोगमुक्त बीजों का चयन करना चाहिए। बुवाई से पूर्व बीज शोधन करना अनिवार्य है ताकि शुरुआती संक्रमण को रोका जा सके। खेतों के भीतर उचित जल निकासी की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए और यूरिया का जरूरत से ज्यादा छिड़काव करने से बचना चाहिए। फसल चक्र को अपनाना और संक्रमित पौधों को तुरंत खेत से बाहर निकालना बेहद जरूरी है। जैविक नियंत्रण के तौर पर Bacillus subtilis और Pseudomonas fluorescens जैसे मित्र जीवाणु इस रोग की रोकथाम में काफी असरदार साबित होते हैं। रासायनिक उपचार में तांबे पर आधारित दवाएं बीमारी को कुछ हद तक सीमित कर सकती हैं। हालांकि किसी भी एंटीबायोटिक का छिड़काव बिना विशेषज्ञ की राय के नहीं करना चाहिए। फूल निकलने के समय किसान अपने खेतों का लगातार निरीक्षण करते रहें और लक्षण दिखते ही फौरन नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय से संपर्क साधें।\n\nइसका आप पर असर\nइस रोग के प्रसार से किसानों की फसल की गुणवत्ता और शुद्ध पैदावार पर सीधा वित्तीय असर पड़ने का खतरा पैदा हो गया है।\n\n• भारत में: धान उत्पादन प्रभावित होने से मंडियों में चावल की आवक और कीमतों पर असर पड़ सकता है। सभी धान उत्पादक किसानों को समय पर रोग प्रबंधन के उपाय अपनाने होंगे।\n• बिहार, झारखंड और बंगाल में: इन राज्यों में नमी और तापमान के अनुकूल होने के कारण किसानों को 5 से 75 प्रतिशत तक उपज का नुकसान उठाना पड़ सकता है। स्थानीय किसानों को तुरंत अपने खेतों की जल निकासी सुधारनी चाहिए और कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क साधना चाहिए।\n• बीज चयन पर असर: अप्रमाणित बीजों के इस्तेमाल से अगली फसल में भी रोग फैलने की भारी संभावना बनी रहेगी। किसानों को केवल प्रमाणित व उपचारित बीजों की खरीद ही सुनिश्चित करनी चाहिए।\n• लागत और उर्वरक खर्च: अंधाधुंध यूरिया के प्रयोग पर रोक लगाकर किसान अपनी अतिरिक्त लागत घटा सकते हैं। संतुलित पोषण और जैविक जीवाणुओं का प्रयोग करने से फसल की सुरक्षा बढ़ेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nमौसम में आ रहे बदलाव, ऊंचे तापमान और वायुमंडलीय नमी के चलते यह जीवाणु जनित बीमारी तेजी से फैल रही है। इसके मुख्य कारणों में रोगाणु का विषैला प्रभाव और संक्रामक माध्यमों की मौजूदगी शामिल है।\n\n• सीधा कारण: यह संक्रमण Burkholderia glumae जीवाणु द्वारा Toxoflavin नामक जहरीला पदार्थ उत्सर्जित करने से होता है, जो पौधे की कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। इसके प्रभाव से बालियों में दाने नहीं बन पाते और वे खोखले रह जाते हैं।\n• अनुकूल मौसमी दशाएं: 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक का तापमान और 80 प्रतिशत से ज्यादा नमी इस जीवाणु के प्रसार के लिए सबसे मुफीद माहौल तैयार करती है। बिहार, झारखंड और बंगाल में खरीफ मौसम के दौरान ऐसा ही मौसम बना रहता है।\n• प्रसार का जरिया: संक्रमित बीजों, सिंचाई के पानी और मानसूनी फुहारों के कारण यह जीवाणु एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचता है। खेतों में अत्यधिक जलभराव और यूरिया का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल इस बीमारी को और बढ़ावा देता है।\n• गलत पहचान की समस्या: इसके लक्षण फफूंद जनित रोगों जैसे दिखाई देने के कारण किसान सही समय पर उचित उपचार नहीं कर पाते हैं। सही पहचान न होने से खेत में संक्रमण को पनपने का पूरा मौका मिल जाता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. बैक्टीरियल पैनिकल ब्लाइट धान की फसल को कैसे नुकसान पहुंचाता है?\nयह रोग बालियों और दानों को सीधे संक्रमित करता है, जिससे दाने हल्के, सिकुड़े और भूरे हो जाते हैं और बाली में दाना नहीं भर पाता।\n\n2. इस बीमारी का मुख्य कारक कौन सा जीवाणु है?\nयह बीमारी Burkholderia glumae नामक जीवाणु से फैलती है, जो Toxoflavin नाम का विषैला तत्व बनाकर पौधे की कोशिकाओं को नष्ट करता है।\n\n3. इस रोग के लिए कौन सा मौसम सबसे अनुकूल होता है?\nजब तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक और वातावरण में नमी 80 प्रतिशत से ज्यादा होती है, तब यह रोग तेजी से पनपता है।\n\n4. इस बीमारी से धान की पैदावार में कितना नुकसान हो सकता है?\nकृषि शोधों के अनुसार, इस संक्रमण के चलते धान की उपज में 5 से 75 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है।\n\n5. किसान इस रोग की जैविक रोकथाम कैसे कर सकते हैं?\nजैविक नियंत्रण के लिए किसान Bacillus subtilis और Pseudomonas fluorescens जैसे लाभकारी मित्र जीवाणुओं का उपयोग कर सकते हैं।\n\n6. फसल में संदिग्ध लक्षण दिखने पर किसानों को क्या करना चाहिए?\nलक्षण दिखते ही किसानों को तुरंत अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों से संपर्क करना चाहिए।",
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  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-10-03",
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