धान की खेती में पानी का सटीक स्तर बताएगा प्लास्टिक पाइप का देसी इंडिकेटर, जहानाबाद कृषि विज्ञान केंद्र के एक्सपर्ट ने दिया तरीका धान के खेतों में बेवजह पटवन रोकने और जलस्तर नापने के लिए 35 सेंटीमीटर लंबे प्लास्टिक पाइप से बना सिंचाई मॉनिटरिंग इंडिकेटर बेहद कारगर साबित हो रहा है। जहानाबाद कृषि विज्ञान केंद्र गंधार के कृषि यंत्र एक्सपर्ट इंजीनियर जितेंद्र कुमार के अनुसार, इससे किसान 20 से 25 प्रतिशत पानी बचा सकते हैं और पैदावार 20 प्रतिशत तक बढ़ा सकते हैं। बिहार में बड़े पैमाने पर की जाने वाली धान की खेती में पानी का सही प्रबंधन फसल की पैदावार तय करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खरीफ सीजन के दौरान धान की रोपाई के करीब तीन महीने पूरे होने को हैं, और ऐसे में कई खेतों में पौधों से कलियां निकलने लगी हैं। जिन फसलों में समय से कलियां आ चुकी हैं, उनकी कटाई अक्टूबर के अंत तक पूरी की जाएगी। चार महीने से अधिक समय में पककर तैयार होने वाली इस फसल में बीज के अंकुरण से लेकर कटाई तक पानी की भारी खपत होती है। आंकड़ों के अनुसार, मात्र एक किलो धान का बीज तैयार करने में लगभग 3000 लीटर पानी खर्च हो जाता है। अक्सर भूजल या सिंचाई जल की कमी के कारण धान की फसल पर गंभीर प्रतिकूल असर पड़ता है। कम पानी में बेहतर पैदावार के लिए सिंचाई मॉनिटरिंग इंडिकेटर जल संकट की चुनौतियों से निपटने और सीमित पानी में भी धान की भरपूर फसल लेने के लिए खेतों में एक विशेष कृषि यंत्र लगाया जा सकता है, जिसे सिंचाई मॉनिटरिंग इंडिकेटर कहा जाता है। यह सरल उपकरण धान के खेत की मिट्टी के भीतर नमी और जलस्तर की वास्तविक स्थिति को दर्शाता है। जहानाबाद स्थित कृषि विज्ञान केंद्र गंधार में पदस्थापित कृषि यंत्र एक्सपर्ट इंजीनियर जितेंद्र कुमार ने बताया कि इस यंत्र को किसान स्वयं बहुत ही आसानी से तैयार कर सकते हैं। इसे अपनाकर किसान न केवल सिंचाई में लगने वाले पानी की बर्बादी रोक सकते हैं, बल्कि अपनी फसल से बेहतर उत्पादन भी सुनिश्चित कर सकते हैं। घर पर कैसे तैयार करें 35 सेंटीमीटर का यह पाइप इंडिकेटर इस देसी मॉनिटरिंग डिवाइस को बनाने की प्रक्रिया बेहद सरल है और इसके लिए बाजार से किसी महंगे उपकरण की आवश्यकता नहीं होती। इसके निर्माण के लिए 35 सेंटीमीटर ऊंचाई और 4 इंच मोटाई वाला एक सामान्य प्लास्टिक पाइप लिया जाता है। पाइप के निचले 20 सेंटीमीटर के हिस्से में छोटे-छोटे छिद्र यानी छेद बनाए जाते हैं। इसके बाद इस छिद्रयुक्त 20 सेंटीमीटर वाले हिस्से को धान के खेत में जमीन के अंदर ऐसी जगह धंसा दिया जाता है, जहां किसान की नजर आसानी से पड़ सके। पाइप का शेष 15 सेंटीमीटर बिना छिद्र वाला हिस्सा जमीन की सतह से ऊपर खुला रहता है। जमीन में गाड़ने के बाद पाइप के अंदर की मिट्टी को बाहर निकालकर अलग कर दिया जाता है। ऐसा करने से पाइप के भीतर एक खोखली जगह बन जाती है, जिसमें जमीन के अंदर मौजूद पानी छिद्रों के रास्ते रिसकर जमा होता है। इसी पानी को देखकर यह स्पष्ट पता चल जाता है कि खेत की मिट्टी में नीचे कितनी गहराई तक पानी उपलब्ध है। खेत में पटवन का सही समय निर्धारित करने में मदद इंजीनियर जितेंद्र कुमार के अनुसार, जब तक खेत की सतह पर पानी का स्तर 4 सेंटीमीटर ऊपर बना रहता है, तब तक सिंचाई की कोई चिंता नहीं होती। वास्तविक समस्या तब खड़ी होती है जब खेत की ऊपरी सतह से पानी पूरी तरह सूख जाता है। ऐसे में किसान यह मान लेते हैं कि खेत को तुरंत पानी की जरूरत है और वे फौरन पटवन शुरू कर देते हैं, भले ही पौधों की जड़ों में पर्याप्त नमी मौजूद हो। यहीं पर यह सिंचाई मॉनिटरिंग इंडिकेटर किसानों के काम आता है। पाइप में बने छिद्रों के जरिए किसान यह आसानी से देख पाते हैं कि जमीन के अंदर पानी किस स्तर तक मौजूद है। जब तक जड़ों के आसपास का जलस्तर सुरक्षित दायरे में रहता है, तब तक दोबारा पानी देने की जरूरत नहीं पड़ती। किसान केवल उसी समय पटवन करते हैं जब पाइप के भीतर पानी का स्तर आवश्यक न्यूनतम सीमा से नीचे चला जाता है। 20 से 25 प्रतिशत पानी की बचत और उपज में बढ़ोतरी इस प्रकार के सिंचाई इंडिकेटर को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक शोध किए जा चुके हैं। वैश्विक अध्ययनों के बाद भारत के कुछ चुनिंदा राज्यों में इसका उपयोग शुरू हुआ, और अब बिहार के जहानाबाद जिले के कृषि विज्ञान केंद्र में भी इसे व्यावहारिक तौर पर किसानों के बीच आजमाया जा रहा है। इस मॉनिटरिंग पाइप की मदद से जल स्तर पर नजर रखकर किसान 20 से 25 प्रतिशत तक बहुमूल्य पानी की बचत कर सकते हैं। इसके साथ ही, अनावश्यक जलभराव न होने और जड़ों को अनुकूल वातावरण मिलने से फसल की उपज क्षमता में भी 20 प्रतिशत तक का इजाफा दर्ज किया जा सकता है। पटवन का अंतराल और समय सीमा पूरी तरह से खेत की मिट्टी की प्रकृति पर निर्भर करती है। यदि खेत की मिट्टी रेतीली है, तो उसमें पानी तेजी से नीचे रिस जाता है, जिससे जल्दी-जल्दी सिंचाई करनी पड़ती है। इसके विपरीत, यदि खेत में चिकनी मिट्टी है, तो उसमें जल धारण क्षमता अधिक होने के कारण 12 से 15 दिनों के अंतराल पर भी सिंचाई की जा सकती है। इसका आप पर असर धान के खेतों में 35 सेमी के प्लास्टिक पाइप इंडिकेटर का इस्तेमाल करने से सिंचाई लागत और भूजल दोहन में भारी कमी आएगी। • भारत में: धान उत्पादक किसान रोपाई के बाद अनावश्यक सिंचाई से बचकर 20 से 25 प्रतिशत तक पानी बचा सकेंगे। इससे डीजल और बिजली पर होने वाले भारी खर्च में सीधी कटौती होगी। • बिहार में: जहानाबाद और आसपास के सूखा प्रभावित जिलों में किसान कम पानी में भी 20 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त कर सकेंगे। इससे अनियमित वर्षा के दौर में भी धान की तैयार फसल को सूखने से बचाया जा सकेगा। • बजट पर असर: चार इंच चौड़े और 35 सेमी लंबे सामान्य पीवीसी पाइप से यह यंत्र घर पर ही नाममात्र खर्च में तैयार हो जाता है। किसानों को महंगे इलेक्ट्रॉनिक सेंसर या मीटर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। • मिट्टी की स्थिति: रेतीली मिट्टी में बार-बार पटवन की जरूरत को समय रहते पहचाना जा सकेगा। चिकनी मिट्टी वाले खेतों में 12 से 15 दिनों तक बिना चिंता के सिंचाई रोकी जा सकेगी। ऐसा क्यों हुआ धान की खेती में अत्यधिक पानी की खपत और सतह सूखते ही किसानों द्वारा अनावश्यक सिंचाई करने की समस्या को दूर करने के लिए यह इंडिकेटर विकसित किया गया। एक किलो धान तैयार करने में 3000 लीटर पानी खर्च होने और गिरते भूजल स्तर के कारण इस कम लागत वाले विकल्प की जरूरत महसूस हुई। • अनावश्यक पटवन की आदत: खेत की ऊपरी मिट्टी सूखते ही किसान यह मान लेते हैं कि पौधे प्यासे हैं और पानी चला देते हैं। पाइप के जरिए अंदर का जलस्तर देखकर वे तभी सिंचाई करेंगे जब वास्तव में जड़ों को पानी की दरकार होगी। • अत्यधिक जल खपत: धान के एक किलो बीज को तैयार करने में लगभग 3000 लीटर पानी लगता है। भूजल संकट को देखते हुए शोधकर्ताओं ने ऐसा साधन ढूंढा जिससे पानी की बर्बादी रोकी जा सके। • वैश्विक शोध और प्रसार: इस विधि पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल शोध किए जाने के बाद इसे भारत के कई राज्यों में अपनाया गया। अब जहानाबाद का कृषि विज्ञान केंद्र गंधार इसे बिहार के किसानों तक पहुंचा रहा है। सवाल-जवाब 1. धान के खेत के लिए सिंचाई मॉनिटरिंग इंडिकेटर कैसे बनाया जाता है? इसके लिए 35 सेमी ऊंचा और 4 इंच मोटा प्लास्टिक पाइप लिया जाता है, जिसके निचले 20 सेमी हिस्से में छोटे छेद किए जाते हैं। 2. इस पाइप को खेत में कैसे स्थापित किया जाता है? पाइप के 20 सेमी छिद्रयुक्त हिस्से को जमीन में धंसाया जाता है और 15 सेमी हिस्सा ऊपर रखा जाता है, फिर पाइप के अंदर की मिट्टी निकाल दी जाती है। 3. इस तकनीक से पानी की कितनी बचत और उपज में कितनी बढ़ोतरी हो सकती है? इस इंडिकेटर के इस्तेमाल से 20 से 25 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है और फसल की उपज 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। 4. खेत में पटवन का अंतराल किस बात पर निर्भर करता है? सिंचाई का समय मिट्टी की प्रकृति पर निर्भर करता है, जहां रेतीली मिट्टी में जल्दी और चिकनी मिट्टी में 12 से 15 दिनों में पटवन किया जाता है। 5. एक किलो धान का बीज तैयार करने में कितना पानी खर्च होता है? कृषि विशेषज्ञों के अनुसार एक किलो धान का बीज तैयार करने में लगभग 3000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। 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