धान की फसल को बर्बाद होने से कैसे बचाएं, कृषि विशेषज्ञ ने बताए प्रमुख रोगों के लक्षण और अचूक समाधान धान में बालियां आने के दौरान लगने वाली फफूंद और जीवाणु जनित बीमारियों से भारी नुकसान हो सकता है। जानिए फसलों को सुरक्षित रखने के रासायनिक और जैविक उपाय। खरीफ सीजन में मानसूनी नमी के बीच धान की फसलों पर कई गंभीर संक्रामक बीमारियों का खतरा मंडराने लगता है। बालियां बाहर आने की नाजुक अवस्था में पौधों पर फफूंद और बैक्टीरिया का हमला उपज को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। बोकारो कृषि विभाग में पदस्थ आत्मा परियोजना निदेशक सविता जोजो ने धान के प्रमुख रोगों, उनके शुरुआती लक्षणों और समय रहते किए जाने वाले नियंत्रण उपायों की विस्तृत जानकारी दी है, जिससे अन्नदाता नुकसान से बचकर भरपूर पैदावार हासिल कर सकते हैं। भूरा धब्बा रोग के लक्षण और बीजोपचार की विधि धान के खेतों में फफूंद की वजह से भूरा धब्बा रोग तेजी से फैलता है। प्रारंभिक दौर में पौधों की हरी पत्तियों की सतह पर महीन कत्थई या भूरे चकत्ते उभरते हैं। अनुकूल वातावरण मिलने पर ये दाग आकार में बड़े होकर आपस में मिल जाते हैं और पूरी पत्ती को अपनी चपेट में ले लेते हैं। संक्रमण बहुत गहरा होने पर समूची पत्तियां झुलसकर सूख जाती हैं, जिससे दूर से देखने पर पूरा खेत आग से जला हुआ प्रतीत होता है। पत्तियों के नष्ट होने से पौधों में भोजन बनाने की क्षमता खत्म होने लगती है। इस बीमारी से बचाव के लिए किसानों को प्रमाणित और प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्मों की बुवाई करनी चाहिए। बुवाई से पहले बीजों का शोधन करना बेहद कारगर कदम साबित होता है। फफूंदनाशक दवा बेबीस्टीन को 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के अनुपात में मिलाकर उपचारित करने की सलाह दी जाती है। इस प्रक्रिया से मिट्टी और बीज में मौजूद हानिकारक फंगल तत्वों का खात्मा हो जाता है और अंकुरण के बाद शुरुआती अवस्था में रोग का प्रकोप काफी हद तक घट जाता है। झोंका रोग की पहचान और बालियों पर इसका घातक असर धान में झोंका यानी ब्लास्ट बीमारी भी फंगस के कारण जन्म लेती है। इसका सबसे स्पष्ट लक्षण पत्तियों पर आंख अथवा तैरती नाव के आकार के विशिष्ट धब्बों के रूप में नजर आता है। जैसे-जैसे संक्रमण गंभीर रूप लेता है, पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती हैं। इस रोग का सर्वाधिक विनाशकारी प्रभाव बालियों के बाहर निकलने के समय देखने को मिलता है। जब फफूंद तने के ऊपरी हिस्से और बाली के जोड़ यानी गर्दन तक पहुंच जाती है, तो वहां काला घेरा या गांठ बन जाती है। गर्दन पर गांठ बनने के कारण पोषक तत्वों का प्रवाह पूरी तरह बाधित हो जाता है। इसके चलते बालियों के भीतर दाने नहीं भर पाते और वे खोखली रह जाती हैं। कई बार कमजोर होकर पूरी की पूरी बाली नीचे टूटकर गिर जाती है, जिससे कुल पैदावार में भारी गिरावट दर्ज की जाती है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए भी 2 ग्राम बेबीस्टीन प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोधन करना आवश्यक है। साथ ही स्थानीय जलवायु और भूमि की प्रकृति के अनुसार रोगरोधी बीजों का ही चयन करना फायदेमंद रहता है। जीवाणु झुलसा का खतरा और जल निकासी का महत्व जीवाणु झुलसा एक बेहद आक्रामक बैक्टीरियल रोग है, जो धान के पौधों को तेजी से सूखा देता है। इसकी शुरुआती पहचान पत्तियों के ऊपरी सिरों से शुरू होती है, जहां दोनों किनारों से नीचे की ओर पीलापन और सूखापन बढ़ता जाता है। खास बात यह है कि प्रारंभिक चरण में पत्ती का मध्य भाग हरा और अप्रभावित बना रहता है। संक्रमण फैलते ही पौधे की अधिकांश पत्तियां सूखकर बेजान हो जाती हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण का चक्र पूरी तरह टूट जाता है और बालियों में दाने नहीं बन पाते। खेत में इस जीवाणु जनित रोग के लक्षण दिखाई देते ही तुरंत अतिरिक्त पानी की निकासी कर देनी चाहिए। जलभराव बैक्टीरिया को पनपने में मदद करता है। इसके अलावा, रोगग्रस्त खेत में नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों का छिड़काव बिल्कुल रोक देना चाहिए, क्योंकि यूरिया का अत्यधिक उपयोग इस बीमारी को और ज्यादा भड़का देता है। सीता और टाचूग जैसी धान की संवेदनशील प्रजातियों को बोने से बचना चाहिए, क्योंकि इनमें जीवाणु झुलसा का हमला सबसे अधिक देखा गया है। इस रोग की रोकथाम के लिए बिचड़े की रोपाई से पूर्व स्ट्रेप्टोसाइक्लीन के 1 ग्राम पाउडर को 5 लीटर पानी में घोलकर पौधों की जड़ों को करीब 2 घंटे तक डुबोकर रखना चाहिए। खड़ी फसल में बीमारी दिखने पर स्ट्रेप्टोसाइक्लीन दवा की 30 ग्राम मात्रा को प्रति हेक्टेयर क्षेत्र के हिसाब से पानी में मिलाकर छिड़कने का सुझाव दिया गया है। वहीं, प्रकोप की शुरुआती अवस्था में ही कोसाइड फफूंदनाशक को 2 से 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से पौधों पर स्प्रे किया जा सकता है। आवरण शीथ ब्लाइट और आभासी कंड से बचाव के तरीके धान में आवरण शीथ ब्लाइट का प्रकोप सामान्यतः बालियों के बाहर आने की अवस्था में स्पष्ट होता है। इसमें बालियों को ढंकने वाले पर्ण आवरण पर हल्के बादामी और कत्थई रंग के अनियमित धब्बे बन जाते हैं। बीमारी के तीव्र होने पर बालियां पर्ण के आवरण में ही फंसी रह जाती हैं या केवल आंशिक रूप से ही बाहर निकल पाती हैं। नतीजतन, बालियों में दानों का भराव अधूरा रह जाता है और भूसी या खखरी की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है, जिससे उपज सीधे तौर पर घट जाती है। शीथ ब्लाइट के नियंत्रण हेतु बालियां निकलते समय क्लोरोथैलोनिल 75% WP अथवा कॉपर हाइड्रॉक्साइड 35% मेटैलिक कॉपर युक्त कोसाइड 2000 रसायन का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। बेहतर और पुख्ता नतीजों के लिए पहले स्प्रे के करीब 15 दिनों के अंतराल पर दूसरा छिड़काव दोहराना जरूरी माना गया है। दूसरी ओर, आभासी कंड रोग का असर सीधे धान के दानों पर दिखाई देता है। इस बीमारी में बालियों के स्वस्थ दाने बड़े आकार के मखमली हरे रंग के गोल पिंडों में तब्दील हो जाते हैं, जो बाद में सूखकर काले पाउडर जैसे दिखने लगते हैं। यह रोग दानों को फफूंद के बीजाणु समूह में बदल देता है, जिससे पूरी फसल नष्ट हो सकती है। इस बीमारी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील मानी जाने वाली PHB-71 किस्म को लगाने से किसानों को परहेज करना चाहिए। खेत में आभासी कंड से ग्रसित बालियां नजर आते ही उन्हें सावधानीपूर्वक काटकर बाहर निकालें और नष्ट कर दें ताकि बीजाणु हवा से दूसरे पौधों तक न पहुंचें। बालियां निकलते समय कवच 75% WP दवा की 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से अथवा हेक्साकोनाजोल 0.1% का घोल तैयार करके छिड़काव किया जा सकता है। समयबद्ध निगरानी और उचित रसायनों का संतुलित उपयोग ही धान की फसल को बर्बादी से बचा सकता है। इसका आप पर असर धान की फसलों में समय रहते रोगों की पहचान और सही दवाओं के प्रयोग से पैदावार को नष्ट होने से बचाया जा सकता है। • भारत में: धान उत्पादक किसान बीजोपचार और समय पर फफूंदनाशक छिड़काव अपनाकर 25 से 40 प्रतिशत तक होने वाले संभावित उपज नुकसान को रोक सकते हैं। इससे बाजार में गुणवत्तापूर्ण धान की आपूर्ति बढ़ेगी और किसानों की शुद्ध आय में इजाफा होगा। • बोकारो में: स्थानीय किसान कृषि विभाग आत्मा के परामर्श के अनुसार दवाइयों की सटीक खुराक का प्रयोग करके अपनी खरीफ फसल को सुरक्षित रख सकते हैं। इससे जिले के किसानों को अनावश्यक रसायनों पर होने वाले अतिरिक्त खर्च से भी राहत मिलेगी। • लागत नियंत्रण: रोपाई से पहले बीजों का शोधन मात्र कुछ रुपयों में हो जाता है, जो बाद में हजारों रुपये की रासायनिक दवाओं के खर्च को बचा लेता है। किसान बेबीस्टीन जैसे सस्ते विकल्पों से शुरुआती सुरक्षा चक्र तैयार कर सकते हैं। • उर्वरक प्रबंधन: जीवाणु झुलसा दिखने पर यूरिया का प्रयोग तुरंत रोककर किसान अपनी फसल को जलने से बचा सकते हैं। संतुलित पोषक तत्वों के इस्तेमाल से फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। ऐसा क्यों हुआ मानसून के दौरान उच्च आर्द्रता, खेतों में जलजमाव और संक्रमित बीजों का उपयोग धान में विभिन्न फंगल व बैक्टीरियल बीमारियों के फैलने का मुख्य कारण बनता है। • अनुकूल मौसमी परिस्थितियां: लगातार मानसूनी बारिश और उच्च तापमान फफूंद के बीजाणुओं तथा जीवाणुओं को तेजी से पनपने के लिए आदर्श वातावरण उपलब्ध कराते हैं। वातावरण में अधिक नमी के चलते पत्तियों पर संक्रमण कुछ ही दिनों में पूरे खेत में फैल जाता है। • संवेदनशील किस्मों का चयन: सीता, टाचूग और PHB-71 जैसी प्रजातियों में विशिष्ट रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। ऐसे बीजों की बिना उपचार के बुवाई करने से रोग आसानी से जड़ पकड़ लेते हैं। • असंतुलित पोषण और जलजमाव: खेतों में आवश्यकता से अधिक पानी भरे रहने और अत्यधिक यूरिया डालने से पौधों के ऊतक कोमल हो जाते हैं। यह स्थिति बैक्टीरिया और फंगस के प्रवेश को बेहद आसान बना देती है। सवाल-जवाब 1. धान में भूरा धब्बा रोग की रोकथाम के लिए बीज उपचार कैसे करें? बीज बुवाई से पहले 2 ग्राम बेबीस्टीन प्रति किलोग्राम बीज की दर से मिलाकर उपचारित करना चाहिए, जिससे फफूंद जनित संक्रमण कम होता है। 2. झोंका रोग का सबसे गंभीर असर फसल पर कब दिखाई देता है? झोंका रोग का सबसे घातक असर बालियां निकलते समय दिखता है, जब बाली की गर्दन पर गांठ बनने से दानों का भराव रुक जाता है। 3. जीवाणु झुलसा दिखने पर कौन सी खाद का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए? इस रोग के लक्षण दिखते ही नाइट्रोजन युक्त खाद यानी यूरिया का इस्तेमाल तुरंत रोक देना चाहिए और खेत से अतिरिक्त पानी निकाल देना चाहिए। 4. आभासी कंड रोग से बचाव के लिए किस किस्म की बुवाई से बचना चाहिए? आभासी कंड के प्रति अत्यधिक संवेदनशील मानी जाने वाली PHB-71 किस्म को लगाने से बचने की सलाह दी जाती है। 5. शीथ ब्लाइट की रोकथाम के लिए किस दवा का छिड़काव करना चाहिए? बालियां निकलने के समय क्लोरोथैलोनिल 75% WP या कोसाइड 2000 का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए। https://trendkia.com/national/dhana-ki-phasala-ko-barbada-hone-se-kaise-bachaen-krishi-visheshajna-ne-batae-pramukha-rogon-ke-lakshana-aura-achuka-samadhana-35021 TrendKia — Har trend, sabse pehle.