धान में पारंपरिक खाद बनाम नैनो उर्वरक: इफ्को विशेषज्ञ सत्यरूपम कुमार ने समझाया सही समय और उपयोग का नियम धान की खेती में अंधाधुंध नाइट्रोजन डालने से फसल गिरने का खतरा बढ़ता है, इसलिए इफ्को के क्षेत्रीय प्रबंधक सत्यरूपम कुमार ने नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के संतुलित प्रयोग का तरीका साझा किया है। धान के खेतों में उर्वरकों के चयन को लेकर किसान अक्सर दुविधा में रहते हैं कि पारंपरिक बोरे वाली खाद का रुख करें या आधुनिक नैनो यूरिया और नैनो डीएपी अपनाएं। फसलों को कब कौन सा पोषक तत्व चाहिए, किस चरण में छिड़काव असरदार साबित होता है और जरूरत से ज्यादा यूरिया खेत की सेहत कैसे बिगाड़ सकता है, इन तमाम व्यावहारिक पहलुओं पर इफ्को के क्षेत्रीय प्रबंधक एवं कृषि विशेषज्ञ सत्यरूपम कुमार ने विस्तार से मार्गदर्शन दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल खाद का प्रकार बदलने से बात नहीं बनती, बल्कि पोषण का संतुलन साधना ही पैदावार और पौधे की मजबूती तय करता है। फसल गिरने का खतरा और नाइट्रोजन का असंतुलन धान उत्पादकों के सामने एक गंभीर चुनौती तेज हवाओं के दौरान पौधों का जमीन पर आ गिरना होती है। सत्यरूपम कुमार के अनुसार, जब खेतों में आवश्यकता से अधिक मात्रा में नाइट्रोजन वाली खाद उड़ेल दी जाती है, तो पौधों की ऊपरी बढ़वार असामान्य रूप से तेज हो जाती है। तना कमजोर रहने से तेज झोंकों में फसल के धराशायी होने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। इसका सीधा असर उपज की मात्रा और दानों की गुणवत्ता पर पड़ता है, जिससे किसानों को सीधा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। इसी वजह से उर्वरक की सही मात्रा और उसके इस्तेमाल का सटीक समय तय करना सबसे अहम कड़ी बन जाता है। शुरुआती दौर में बोरी वाली खाद और बाद में नैनो यूरिया का छिड़काव फसल की अलग-अलग अवस्थाओं के अनुसार खाद की योजना समझाई गई है। धान की शुरुआती बढ़वार के समय जरूरत के मुताबिक पारंपरिक बोरे वाली खाद दी जा सकती है, जबकि फसल के अगले चरणों में पत्तियों पर नैनो यूरिया का छिड़काव एक कारगर विकल्प बनता है। नैनो यूरिया का घोल बनाने का अनुपात 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी तय किया गया है। इस तरल घोल का छिड़काव सीधे पत्तियों पर किया जाता है, जिससे पौधों को तुरंत आवश्यक नाइट्रोजन मिल जाती है। विशेषज्ञ ने आगाह किया कि अक्सर बंपर पैदावार के लालच में किसान जरूरत से ज्यादा बोरी वाली यूरिया खेतों में बिखेर देते हैं। यह असंतुलित बढ़वार कराकर फसल गिरने की आशंका को जन्म देता है। हालांकि केवल खाद ही नहीं, बल्कि खेत में भरा पानी, धान की किस्म, मौसमी हालात और अन्य पोषक तत्वों का संतुलन भी पौधों के खड़े रहने की क्षमता को प्रभावित करते हैं। इसलिए अंधाधुंध खाद डालने के बजाय संपूर्ण उर्वरक प्रबंधन पर ध्यान देना जरूरी है। नैनो डीएपी: बीज उपचार से लेकर पत्तियों पर छिड़काव तक की तकनीक फास्फोरस तत्व की आपूर्ति के लिए नैनो डीएपी का उपयोग दो अलग-अलग स्तरों पर किया जा सकता है। सत्यरूपम कुमार ने बताया कि नैनो डीएपी बीज उपचार के लिए भी मुफीद है। इसके लिए प्रति किलोग्राम बीज पर 5 मिलीलीटर नैनो डीएपी की दर से उपचार किया जाता है। उपचार पूरा होने के करीब आधे घंटे बाद बीजों को खेत में बो देना चाहिए, क्योंकि फास्फोरस जड़ों के विस्तार और शुरुआती विकास का मुख्य आधार है। इसके बाद, जब धान की रोपाई को लगभग 35 से 40 दिन बीत जाएं, तब नैनो डीएपी का दूसरा इस्तेमाल पत्तियों पर छिड़काव के रूप में करने की सलाह दी गई है। इसके लिए भी 5 मिलीलीटर नैनो डीएपी को एक लीटर पानी में घोलकर पौधों पर छिड़का जाता है। पत्तियों के जरिए पोषक तत्वों को सीधे सोखने की यह प्रक्रिया तभी प्रभावी होती है जब छिड़काव सही विधि और निर्धारित समय पर किया जाए। रोहतास के खेतों में पोषक तत्वों का सटीक प्रबंधन रोहतास के संदर्भ में सत्यरूपम कुमार ने जोर देकर कहा कि ज्यादा खाद डाल देने भर से भरपूर फसल की गारंटी नहीं मिलती। उर्वरक का चयन खेत की मिट्टी की स्थिति, फसल की वर्तमान अवस्था और असल पोषण मांग के अनुरूप ही होना चाहिए। रोहतास क्षेत्र में धान के पौधों के गिरने की समस्या से बचाव के लिए नाइट्रोजन का सीमित और संतुलित इस्तेमाल, खेत से फालतू पानी की समय पर निकासी और खड़ी फसल की लगातार निगरानी बेहद आवश्यक है। किसानों को यह समझना होगा कि बोरे वाली खाद और नैनो उर्वरकों का तालमेल फसल की जरूरतों और कृषि वैज्ञानिकों की सिफारिशों पर टिका होना चाहिए। सही मात्रा और तय समय पर नैनो उत्पादों का इस्तेमाल अपनाकर किसान अपनी फसल को स्वस्थ रख सकते हैं और बेहतर उत्पादन सुनिश्चित कर सकते हैं। इसका आप पर असर संतुलित उर्वरक प्रबंधन और नैनो खादों के सटीक उपयोग से किसान फसल को गिरने से बचाकर अपनी पैदावार सुरक्षित रख सकते हैं। • भारत में: धान उत्पादक किसान पारंपरिक यूरिया की अंधाधुंध खपत घटाकर नैनो उर्वरकों का सही समय पर इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे खाद पर होने वाला अतिरिक्त खर्च बचेगा और मिट्टी तथा पौधों की गुणवत्ता बनी रहेगी। • रोहतास में: स्थानीय किसान तेज हवाओं में धान की फसल गिरने की गंभीर समस्या पर लगाम लगा सकते हैं। अत्यधिक नाइट्रोजन पर रोक लगाकर और जल निकासी सुधारकर पैदावार के नुकसान से बचा जा सकता है। • बीज उपचार के लिए: बुवाई से पहले प्रति किलो बीज को 5 मिलीलीटर नैनो डीएपी से उपचारित करना जरूरी है। उपचार के 30 मिनट बाद बुवाई करने से पौधों की जड़ें शुरू से ही मजबूत विकसित होंगी। • छिड़काव की तैयारी: रोपाई के 35 से 40 दिन बाद 5 मिलीलीटर नैनो उत्पाद प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जाना चाहिए। सही समय पर पत्तियों पर घोल देने से पौधे तेजी से पोषक तत्व ग्रहण करते हैं। ऐसा क्यों हुआ धान की फसलों का खेतों में गिरना और उर्वरकों के चयन को लेकर भ्रम मुख्य रूप से जरूरत से ज्यादा रासायनिक नाइट्रोजन के इस्तेमाल और सही तकनीकी जानकारी के अभाव की वजह से पैदा हुआ है। • अत्यधिक नाइट्रोजन का दुष्प्रभाव: खेतों में जरूरत से ज्यादा यूरिया बिखेरने से धान के पौधों की ऊपरी बढ़वार असंतुलित हो जाती है। इसके चलते पौधे के तने कमजोर रह जाते हैं और तेज हवा चलने पर वे जमीन पर गिर जाते हैं। • पोषक तत्वों की चरणबद्ध जरूरत: पौधे को शुरुआती अवस्था में जड़ों के विकास के लिए फास्फोरस और बाद के चरणों में सीमित नाइट्रोजन की दरकार होती है। इस समय चक्र को समझे बिना केवल एक ही प्रकार की खाद डालते रहने से असंतुलन बना रहता है। • खेत और मौसम की परिस्थितियां: खेतों में जलभराव, विशेष फसल किस्में और हवा का दबाव फसल गिरने के जोखिम को बढ़ा देते हैं। जल निकासी और संतुलित उर्वरक के अभाव में यह समस्या और गंभीर रूप ले लेती है। सवाल-जवाब 1. धान की फसल में ज्यादा यूरिया डालने से क्या नुकसान होता है? अधिक नाइट्रोजन डालने से पौधों की बढ़वार असंतुलित हो जाती है और तने कमजोर होने से तेज हवा में फसल के जमीन पर गिरने का खतरा बढ़ जाता है। 2. नैनो यूरिया का छिड़काव किस अनुपात में करना चाहिए? 5 मिलीलीटर नैनो यूरिया को एक लीटर पानी में घोलकर फसल की पत्तियों पर छिड़काव किया जाता है। 3. नैनो डीएपी से बीज उपचार कैसे किया जाता है? एक किलोग्राम बीज के उपचार के लिए 5 मिलीलीटर नैनो डीएपी का उपयोग किया जाता है और उपचार के लगभग आधे घंटे बाद बुवाई की जाती है। 4. धान में नैनो डीएपी का पत्तियों पर छिड़काव कब करना चाहिए? धान की रोपाई के लगभग 35 से 40 दिन बाद 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के घोल का पत्तियों पर छिड़काव करने की सलाह दी जाती है। 5. धान की फसल को गिरने से बचाने के लिए क्या उपाय जरूरी हैं? नाइट्रोजन का संतुलित उपयोग, खेत से अतिरिक्त पानी की निकासी, सही मात्रा में पोषक तत्व और नियमित निगरानी आवश्यक है। https://trendkia.com/national/dhana-men-parnparika-khada-banama-naino-urvaraka-iffco-visheshajna-satyaroopam-kumar-ne-samajhaya-sahi-samaya-aura-upayoga-ka-niya-45314 TrendKia — Har trend, sabse pehle.