डिजिटल मीडिया और लाइक्स की होड़ से न्यायपालिका की निष्पक्षता पर बढ़ता खतरा, जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने जताई चिंता सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया पर वायरल होती अधूरी जानकारी और लाइक्स पाने की होड़ निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया के लिए गंभीर खतरा बन रही है। अदालती कार्यवाहियों और न्यायिक प्रक्रिया पर डिजिटल दुनिया के बढ़ते प्रभाव को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत से एक बड़ी चेतावनी सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सोशल मीडिया पर फैलती भ्रामक जानकारियों, वायरल होती अधूरी क्लिप्स और ऑनलाइन लोकप्रियता की होड़ को न्यायपालिका की स्वायत्तता के लिए एक बड़ा संकट करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक डिजिटल दौर में गलत सूचनाएं बहुत तेजी से फैलती हैं, जिससे अदालतों के फैसलों और जजों की निष्पक्षता पर अनावश्यक जन दबाव निर्मित होने लगता है। संविधान के दायरे और डिजिटल मुकदमों का बढ़ता टकराव 5वें जस्टिस एचआर खन्ना मेमोरियल नेशनल सिम्पोजियम के अवसर पर 1 अगस्त को अपनी बात रखते हुए जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने डिजिटल मंचों पर जजों की होने वाली दैनिक आलोचना पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने भारतीय संविधान के प्रावधानों का हवाला देते हुए ध्यान दिलाया कि देश का संविधान अदालतों की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए विशेष व्यवस्था करता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 121 देश की संसद को भी किसी जज के आचरण पर चर्चा करने से रोकता है, ताकि न्यायपालिका बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक दबाव के स्वतंत्र रूप से काम कर सके। इसके ठीक विपरीत आज के डिजिटल दौर में इंटरनेट और सोशल नेटवर्क पर रोजाना जजों और उनकी कार्यशैली का मीडिया ट्रायल किया जाता है। जनमंचों पर कानूनी बारीकियों और साक्ष्यों को समझे बिना किसी मामले में फैसला पहले ही सुना दिया जाता है। अदालत में अंतिम फैसला आने से पहले ही किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष ठहराने की जनधारणा बना दी जाती है। जब अदालत सबूतों के आधार पर कोई विपरीत फैसला देती है, तो न्यायिक प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े किए जाने लगते हैं। 'हाइड्रा-हेडेड' सोशल मीडिया और एल्गोरिदम का मायाजाल डिजिटल नेटवर्क की जटिल संरचना को समझाते हुए जस्टिस बागची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को 'हाइड्रा-हेडेड' की संज्ञा दी। पौराणिक आख्यानों के बहुसिर वाले जीव का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जिस तरह एक सिर काटने पर कई नए सिर निकल आते हैं, ठीक उसी तरह डिजिटल दुनिया में एक भ्रामक पोस्ट या हटाए गए वीडियो को रोक पाना लगभग असंभव होता है। जब किसी एक प्लेटफॉर्म से विवादास्पद या गलत सामग्री हटा दी जाती है, तो वह कई अन्य प्लेटफॉर्म्स पर नए रूप में फिर से अपलोड होकर वायरल हो जाती है। उन्होंने कहा कि भ्रामक जानकारियां और सनसनीखेज विषय वस्तु हमेशा सत्य की तुलना में बहुत तेज गति से फैलती हैं। इसमें टेक कंपनियों के एल्गोरिदम की भी बड़ी भूमिका होती है। इन प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम इस प्रकार बनाए गए हैं कि वे उन वीडियो और पोस्ट को अधिक बढ़ावा देते हैं जो लोगों का ध्यान खींचती हैं और जिन पर ज्यादा जुड़ाव मिलता है। इसके कारण गंभीर और संवेदनशील कानूनी मामलों की अधूरी या तोड़-मरोड़ कर पेश की गई जानकारी सेकंडों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती है, जिससे जनमानस में गलत धारणाएं घर कर जाती हैं। 'लाइक्स' की वेदी पर बलि चढ़ता निष्पक्ष न्याय डिजिटल मंचों पर चलने वाली लोकप्रियता की होड़ पर तीखा हमला बोलते हुए जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि निष्पक्ष और निर्लिप्त न्याय 'लाइक्स' की वेदी पर नीलाम किया जा रहा है। उन्होंने रेखांकित किया कि जब सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति की दोषी छवि पहले ही गढ़ दी जाती है, तो कानून के अनुसार साक्ष्यों का परीक्षण करके उसे बरी करने वाले जज को भी ऑनलाइन जनता गलत ठहराने लगती है। इस प्रकार की प्रवृत्तियों से अदालती स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जस्टिस बागची ने जोर देकर कहा कि न्यायिक व्यवस्था की पवित्रता बनाए रखने के लिए जजों को दो प्रमुख बाधाओं से पूरी तरह सतर्क रहना होगा। पहला, डिजिटल भीड़ का भय और दूसरा, ऑनलाइन माध्यमों से मिलने वाली प्रशंसा का आकर्षण। एक जज का कर्तव्य केवल संविधान और कानून के प्रति जवाबदेह होना है, न कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर मिलने वाली तात्कालिक तारीफ या आलोचना से प्रभावित होना। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही और लाइव स्ट्रीमिंग के जोखिम डिजिटल इंटरमीडियरीज और टेक कंपनियों के रवैये पर सवाल उठाते हुए जस्टिस बागची ने कहा कि ये प्लेटफॉर्म्स अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते। इतनी बड़ी तकनीकी शक्ति और सूचना प्रसार का नियंत्रण रखने वाली कंपनियां केवल यह तर्क देकर बच नहीं सकतीं कि वे सिर्फ एक माध्यम या मीडिया प्लेटफॉर्म हैं। उन्हें अपने एल्गोरिदम द्वारा फैलाए जा रहे सनसनीखेज कंटेंट को नियंत्रित करने और भ्रामक जानकारियों पर लगाम लगाने के लिए सक्रिय कदम उठाने होंगे। अदालती कार्यवाहियों के सीधे प्रसारण यानी लाइव स्ट्रीमिंग पर भी उन्होंने विचार रखे। उन्होंने स्वीकार किया कि लाइव स्ट्रीमिंग से अदालती कामकाज में पारदर्शिता बढ़ी है और आम नागरिकों का न्याय प्रणाली पर भरोसा सुदृढ़ हुआ है। हालांकि इसके साथ कई गंभीर जोखिम भी जुड़े हैं। सुनवाई के दौरान जजों द्वारा पूछे गए मौखिक प्रश्नों या शुरुआती टिप्पणियों को छोटी-छोटी क्लिप्स में काटकर वायरल कर दिया जाता है। आम लोग प्रायः इन मौखिक संवादों को ही अदालत का अंतिम आदेश मान बैठते हैं, जिससे भारी भ्रम की स्थिति पैदा होती है। उन्होंने सुझाव दिया कि हर केस की लाइव स्ट्रीमिंग अनिवार्य नहीं होनी चाहिए, बल्कि मामले की संवेदनशीलता और निष्पक्ष सुनवाई की जरूरत को ध्यान में रखते हुए अदालत को स्वयं इसका निर्णय लेना चाहिए। मीडिया ट्रायल पर रोक और सुरक्षित डिजिटल रिकॉर्ड का सुझाव प्रेस की स्वतंत्रता और मीडिया की भूमिका पर बात करते हुए जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र के सुचारू संचालन के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता अनिवार्य है। हालांकि मीडिया या सोशल मीडिया की जल्दबाजी का इस्तेमाल किसी आरोपी को अदालत का फैसला आने से पहले ही दोषी साबित करने के लिए नहीं किया जा सकता। इस प्रकार का मीडिया ट्रायल न्याय की मूल भावना को आघात पहुंचाता है। इस समस्या के स्थायी समाधान के रूप में उन्होंने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और देश के विभिन्न हाईकोर्ट्स की कार्यवाहियों का आधिकारिक और सुरक्षित डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए। जब भी आवश्यकता हो, कानूनी प्रक्रियाओं के तहत इन आधिकारिक रिकॉर्ड्स तक पहुंच उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इससे छोटे और संदर्भहीन वीडियो के बजाय लोगों को पूरी अदालती सुनवाई को उसके सही संदर्भ में समझने का अवसर मिलेगा, जिससे भ्रामक जानकारियों के प्रभाव को समाप्त किया जा सकेगा। इसका आप पर असर भारत में: सोशल मीडिया पर अदालती कार्यवाहियों के कटे-छांटे वीडियो देखकर धारणा बनाने वाले आम नागरिकों को अब मामलों की पूरी कानूनी सच्चाई और संदर्भ समझना होगा। न्यायिक व्यवस्था में: डिजिटल मुकदमों और ऑनलाइन दबाव के बीच मुकदमों की निष्पक्ष सुनवाई और जजों की संवैधानिक स्वतंत्रता की सुरक्षा सुदृढ़ होगी। सवाल-जवाब 1. जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सोशल मीडिया को 'हाइड्रा-हेडेड' क्यों कहा? उन्होंने बताया कि पौराणिक हाइड्रा की तरह सोशल मीडिया पर भी एक भ्रामक पोस्ट या वीडियो हटाने के बाद वह कई अन्य प्लेटफॉर्म्स पर नए रूप में दोबारा वायरल हो जाती है। 2. अनुच्छेद 121 का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया? संविधान का अनुच्छेद 121 संसद को भी जज के आचरण पर चर्चा करने से रोकता है, जबकि डिजिटल मंचों पर रोजाना जजों का मीडिया ट्रायल किया जा रहा है। 3. अदालती कार्यवाहियों की लाइव स्ट्रीमिंग को लेकर क्या चिंता जताई गई? चिंता जताई गई कि सुनवाई के दौरान जज की मौखिक टिप्पणियों को काटकर सोशल मीडिया पर वायरल किया जाता है और लोग उसे अंतिम फैसला मान बैठते हैं। 4. जस्टिस बागची ने भ्रामक जानकारियों से निपटने के लिए क्या सुझाव दिया? उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट्स की कार्यवाहियों का आधिकारिक और सुरक्षित डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने का सुझाव दिया ताकि पूरा संदर्भ उपलब्ध हो सके। https://trendkia.com/national/dijitala-midiya-aura-laiksa-ki-hora-se-nyayapalika-ki-nishpakshata-para-barhata-khatara-justice-joymalya-bagchi-ne-jatai-chinta-13796 TrendKia — Har trend, sabse pehle.