# डीपफेक और एआई के इस दौर में सच की पहचान कैसे करें: डॉ. मनीष रंजन का विश्लेषण

> जब नकली आवाजें और कृत्रिम वीडियो हकीकत जैसे दिखने लगें, तो आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय सत्यापन की मजबूत आदतें ही साइबर धोखाधड़ी से बचा सकती हैं।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-10-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/dipapheka-aura-ai-ke-isa-daura-men-sacha-ki-pahachana-kaise-karen-dr-manish-ranjan-ka-vishleshana-46834 · **Language:** Hindi
**Tags:** डीपफेक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, डिजिटल अरेस्ट, मनीष रंजन, आईटी नियम

झारखंड के हजारीबाग में पदस्थापना के दौरान एक साधारण सरकारी कर्मी के साथ घटी धोखाधड़ी आज की डिजिटल वास्तविकता का सटीक आईना दिखाती है। उस चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को एक आभासी प्रतियोगिता में चमचमाती चार पहिया गाड़ी जीतने का झांसा दिया गया था। स्क्रीन पर सजे दफ्तर, कामकाजी मुलाजिम और आधिकारिक वर्दी जैसी वेशभूषा ने ऐसा दृश्य रचा कि उसने अपनी गाढ़ी कमाई टोकन रकम, पंजीकरण और पथकर के नाम पर गंवा दी। शाम ढलने तक जब सड़क पर कोई वाहन नहीं पहुंचा, तब उसे अहसास हुआ कि आंखों देखा हर नजारा सच नहीं होता। आज के कृत्रिम मेधा यानी जनरेटिव एआई के दौर में यही फरेब और ज्यादा खतरनाक, परिष्कृत और घातक रूप अख्तियार कर चुका है।

## जब अंतरराष्ट्रीय बैंकों के शीर्ष नेतृत्व को लगा करोड़ों का झटका
प्रौद्योगिकी आधारित छल केवल तकनीकी रूप से अनजान या कम पढ़े-लिखे लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के सबसे सुरक्षित वित्तीय प्रतिष्ठान भी इसके जाल में फंस रहे हैं। फरवरी 2026 में इटली के विख्यात निजी बैंकिंग संस्थान फिदेउराम के तत्कालीन प्रमुख पाओलो मोलेसिनी को ऐसे ही एक सुनियोजित षड्यंत्र का सामना करना पड़ा। उन्हें मुख्य बैंकिंग समूह इंतेसा सानपाओलो के मुख्य अधिशासी कार्लो मेस्सीना के नाम से एक तत्काल संदेश भेजा गया, जिसमें विदेशी खातों में फौरी वित्तीय मदद की गुहार लगाई गई थी।

इसके तुरंत बाद एक प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ की हुबहू नकल करती आवाज में फोन आया, जिसने उस वित्तीय निर्देश की पुष्टि कर दी। 25 सितंबर की सार्वजनिक जानकारी के अनुसार, इस पूरे प्रकरण में लगभग 9.5 करोड़ यूरो विदेशी खातों में भेज दिए गए। बाद में जांच एजेंसियों ने करीब 5.3 करोड़ यूरो तो रिकवर कर लिए, मगर लगभग 3.6 करोड़ यूरो का कोई सुराग नहीं मिल सका। आवाज की सटीक क्लोनिंग के लिए एआई टूल्स का सहारा लिया गया था, जिसने यह साबित कर दिया कि सत्ता और अधिकार का आभास कराकर किसी भी अनुभवी व्यक्ति को चूना लगाया जा सकता है।

## क्या मानव इंद्रियां अब सत्य को परखने में अक्षम हो चुकी हैं?
हांगकांग की वैश्विक इंजीनियरिंग फर्म अरूप में फरवरी 2024 के दौरान हुई एक बड़ी घटना ने कॉर्पोरेट जगत के होश उड़ा दिए थे। वहां के एक वित्तीय कर्मचारी को एक बहुपक्षीय वीडियो कॉन्फ्रेंस में शामिल किया गया, जहां स्क्रीन पर दिख रहे तमाम वरिष्ठ सहयोगी पूरी तरह नकली और एआई निर्मित थे। उस बैठक में दिए गए निर्देशों का पालन करते हुए कर्मी ने करीब 2.5 करोड़ डॉलर अज्ञात खातों में ट्रांसफर कर दिए। साइबर जालसाजों ने केवल टेक्स्ट ईमेल तक सीमित रहने के बजाय पूरी डिजिटल सभा का दृश्य ही कृत्रिम रूप से गढ़ डाला था।

पहचान सत्यापन क्षेत्र की संस्था आईप्रूव द्वारा 2025 में अमेरिका और ब्रिटेन के 2,000 नागरिकों पर कराए गए एक व्यापक सर्वेक्षण में बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। शोधकर्ताओं ने जब प्रतिभागियों को वास्तविक और कृत्रिम रूप से रची गई तस्वीरें व वीडियो दिखाए, तो दोनों श्रेणियों में सौ फीसदी सही अंतर बताने वाले लोग मात्र 0.1 प्रतिशत ही निकले। इस परीक्षण का साफ संदेश है कि केवल स्क्रीन पर कुछ देख या सुन लेना अब उसकी प्रामाणिकता का अचूक साक्ष्य नहीं माना जा सकता।

## झूठ का अतिरिक्त मुनाफा और लोकतंत्र के सामने खड़ी नई चुनौतियां
विधिक विशेषज्ञ रॉबर्ट चेज्नी और डैनियल सिट्रॉन ने कानूनी विमर्श में लायर्स डिविडेंड अर्थात झूठे व्यक्ति को मिलने वाले अनुचित लाभ की अवधारणा प्रस्तुत की है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब समाज में किसी भी वीडियो या ऑडियो की हूबहू नकली प्रति बनाना सुलभ हो जाता है, तो भ्रष्ट या अपराधी तत्व अपनी असली, आपत्तिजनक रिकॉर्डिंग को भी महज एक डीपफेक बताकर सिरे से खारिज कर देते हैं। इस तरह न्यायपालिका, निष्पक्ष पत्रकारिता और जनसंवाद तीनों के लिए प्राथमिक साक्ष्यों की प्रामाणिकता जांचना सबसे जटिल पहेली बन गया है।

राजनीतिक और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भी यह खतरा तेजी से पैर पसार रहा है। वेस्लियन मीडिया प्रोजेक्ट के आंकड़ों के अनुसार, 4 सितंबर 2026 तक अमेरिकी चुनावी विज्ञापनों में कम से कम 164 ऐसे प्रचार अभियान चिह्नित किए गए जो पूरी तरह या आंशिक रूप से एआई की मदद से रचे गए थे। इन प्रचार अभियानों पर लगभग आठ करोड़ डॉलर का अनुमानित व्यय हुआ, और हैरानी की बात यह रही कि पहचाने गए 69 प्रतिशत विज्ञापनों में मतदाताओं को यह कतई नहीं बताया गया था कि सामग्री कृत्रिम रूप से निर्मित है। इसके अलावा, महिलाओं और बालिकाओं की गरिमा को तार-तार करने के लिए बिना सहमति के बनाई गई अश्लील व आपत्तिजनक डीपफेक सामग्री उनके वास्तविक जीवन को गंभीर रूप से तबाह कर रही है, जहां फौरी शिकायत और तीन घंटे में सामग्री हटाने जैसे कड़े कानूनी प्रावधानों की दरकार है।

## भारत में वित्तीय धोखाधड़ी का बढ़ता दायरा और डिजिटल अरेस्ट का आतंक
डिजिटल भुगतान के मामले में भारत दुनिया का सिरमौर बना है, लेकिन इसी तेज रफ्तार व्यवस्था ने साइबर अपराधियों के लिए अपराध के नए द्वार भी खोल दिए हैं। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर वर्ष 2025 के दौरान लगभग 21.77 लाख शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें नागरिकों को करीब 19,813 करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान झेलना पड़ा। हालांकि इनमें शेयर बाजार व पोंजी निवेश से जुड़े पारंपरिक साइबर अपराध भी शामिल हैं, लेकिन तकनीक का दुरुपयोग लगातार बढ़ रहा है।

हाल के दिनों में डिजिटल अरेस्ट जैसी फर्जी कार्यप्रणाली ने लाखों परिवारों को खौफ में डाला है। जालसाज स्वयं को केंद्रीय जांच एजेंसियों, पुलिस या सीमा शुल्क विभाग का आला अधिकारी बताते हैं। नकली जांच कक्ष, पुलिसिया वर्दी, फर्जी वारंट और तुरंत जेल भेजने की धमकियों के दम पर पीड़ितों को कई-कई घंटों तक वीडियो कॉल पर बंधक बनाकर रखा जाता है और उनसे करोड़ों रुपये ऐंठ लिए जाते हैं। यहां असल खेल आधुनिक तकनीक से कहीं ज्यादा पीड़ितों के भीतर सत्ता और कानून का भय पैदा करने का है। इस तरह के खतरों से निपटने के लिए केंद्र सरकार की 1930 साइबर हेल्पलाइन और राष्ट्रीय पोर्टल त्वरित मदद तो पहुंचाते हैं, पर केवल प्रशासनिक सख्ती के भरोसे रहने के बजाय नागरिकों को पहले से सतर्क रहना होगा।

## सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में संशोधन और तीन घंटे का दायरा
भारत सरकार ने 10 फरवरी 2026 को सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में महत्वपूर्ण संशोधन अधिसूचित किए हैं, जिनका प्राथमिक उद्देश्य कृत्रिम रूप से तैयार की गई भ्रामक सामग्री पर लगाम लगाना है। इन नए प्रावधानों के तहत डिजिटल मंचों के लिए एआई निर्मित सामग्री पर स्पष्ट लेबल लगाना और उससे जुड़े मेटाडेटा को सुरक्षित रखना अनिवार्य किया गया है। इसके साथ ही सक्षम अदालतों या सरकारी एजेंसियों के विधिवत निर्देश मिलने पर गंभीर व आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के लिए अधिकतम तीन घंटे की समय-सीमा तय की गई है।

फिर भी केवल कानूनी प्रावधान अपने आप में पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सकते। जब तक आम नागरिक इन तकनीकी लेबलों के मायने नहीं समझेंगे और उन्हें यह जानकारी नहीं होगी कि संकट के समय किस तंत्र का दरवाजा खटखटाना है, तब तक साइबर अपराधी नए-नए रास्तों से आम जनता को शिकार बनाते रहेंगे। नियम केवल एक वैधानिक ढांचा तैयार करते हैं, असल सुरक्षा समाज की जागरूक आदतों से ही संभव है।

## सत्यापन की व्यावहारिक तकनीकें: अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा कैसे पुख्ता करें?
किसी भी संदिग्ध सूचना या आपातकालीन वित्तीय मांग को परखने के लिए संस्थागत और घरेलू दोनों स्तरों पर ठोस व्यवस्था करनी होगी। किसी भी संगठन में अगर किसी उच्चाधिकारी की आवाज में अचानक धन हस्तांतरण का मौखिक आदेश मिले, तो केवल उसी इनकमिंग कॉल पर भरोसा न करें। पहले से तय आंतरिक सुरक्षित माध्यम या अलग फोन नंबर पर दोबारा बात करके दोहरे सत्यापन के नियम का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए।

डिजिटल सामग्री के स्तर पर C2PA जैसे वैश्विक तकनीकी मानक किसी भी चित्र या वीडियो का मूल स्रोत और उसमें हुए संपादन का पूरा ब्यौरा दर्ज करते हैं। इसे किसी डिजिटल फाइल का जन्म प्रमाण पत्र कहा जा सकता है, जो उसकी यात्रा का प्रामाणिक इतिहास बताता है। इसके साथ ही स्कूली शिक्षा में आलोचनात्मक चिंतन को बढ़ावा देना अनिवार्य है, जैसा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में रेखांकित किया गया है। ताइवान की तथ्य जांच व्यवस्था और फिनलैंड की मीडिया साक्षरता के मॉडल यह सिखाते हैं कि बच्चों को इंटरनेट चलाने के साथ-साथ स्रोत की तह तक जाने की कला सिखाई जानी चाहिए।

सूचना की पड़ताल के लिए वेरिफिकेशन ट्री और क्राप टेस्ट का उपयोग हर नागरिक के लिए फायदेमंद है। सबसे पहले प्राथमिक स्रोत की खोज करें, फिर प्रकाशन की तारीख व ऐतिहासिक संदर्भ देखें, इसके बाद किसी स्वतंत्र माध्यम से पुष्टि तलाशें और यह जरूर परखें कि वह संदेश आपको घबराहट, लालच या भय में डालकर जल्दबाजी में कोई कदम उठाने पर मजबूर तो नहीं कर रहा। घरों के भीतर भी परिवार के लोग एक गोपनीय आपातकालीन कोड या पहचान-वाक्य निर्धारित कर सकते हैं। जब भी कोई परिचित व्यक्ति किसी विकट परिस्थिति का हवाला देकर धन मांगे, तो तुरंत कॉल काटकर उनके मूल नंबर पर सीधे संपर्क करना सबसे सुरक्षित उपाय है।

## सजग नागरिक ही है सच का सबसे सशक्त पहरेदार
भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. मनीष रंजन, जिन्होंने एआई विषय पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं और जिन्हें राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार तथा प्रधानमंत्री पुरस्कार से नवाजा जा चुका है, इस पूरे परिदृश्य को एक बड़े अवसर के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से भयभीत होने या तकनीक से पीछे हटने की कतई आवश्यकता नहीं है। यही आधुनिक तकनीक दूरदराज के गांव में किसी छात्र के लिए उत्कृष्ट शिक्षक, किसान के लिए मौसम और फसल का सटीक सलाहकार तथा शासन के लिए पारदर्शी सेवा प्रदाता बन सकती है।

असली चुनौती सुविधा और सत्यापन के बीच संतुलन साधने की है। हजारीबाग के उस कर्मचारी ने किसी जटिल एल्गोरिदम के कारण पैसे नहीं गंवाए थे, बल्कि उसने एक ऐसे दृश्य पर सहज विश्वास कर लिया था जो उसकी उम्मीदों के अनुकूल था। आने वाले वर्षों में मशीनें दृश्यों को और ज्यादा सजीव बनाएंगी, लेकिन समाज को अविश्वास के अंधेरे में धकेलने के बजाय अपने भरोसे को जांचने योग्य बनाना होगा। सच का अंतिम पहरेदार कोई कृत्रिम सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि सवाल पूछने का मानवीय विवेक और तथ्यों की पड़ताल करने की हमारी सजग आदत है।

## इसका आप पर असर
एआई और डीपफेक तकनीक के बढ़ते दुरुपयोग से आम नागरिकों के वित्तीय और व्यक्तिगत जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।

- **भारत में:** डिजिटल अरेस्ट और फर्जी वीडियो कॉल के बढ़ते मामलों को देखते हुए किसी भी अनजान कॉल पर सरकारी अधिकारी के दावे पर भरोसा न करें। साइबर अपराध का शिकार होने पर तुरंत 1930 हेल्पलाइन पर संपर्क करके अपने बैंक खाते से जाने वाली रकम को फ्रीज करवाएं।
- **वित्तीय सुरक्षा पर:** किसी भी परिचित या वरिष्ठ अधिकारी की आवाज में अचानक आए पैसे ट्रांसफर करने के अनुरोध को तुरंत न मानें। फोन काटकर पहले से दर्ज आधिकारिक नंबर पर दोबारा बात करके ही वित्तीय लेन-देन करें।
- **डिजिटल निजता पर:** सोशल मीडिया पर अपनी और परिवार की तस्वीरें साझा करते समय प्राइवेसी सेटिंग्स का कड़ाई से पालन करें। बिना सहमति के बनी आपत्तिजनक सामग्री की शिकायत तुरंत राष्ट्रीय साइबर पोर्टल पर दर्ज कराएं।
- **दैनिक सूचनाओं पर:** इंटरनेट पर दिखने वाले सनसनीखेज वीडियो या चुनावी विज्ञापनों को बिना सोचे-समझे आगे फॉरवर्ड न करें। किसी भी महत्वपूर्ण खबर की पुष्टि कम से कम दो स्वतंत्र और स्थापित स्रोतों से अवश्य करें।

## ऐसा क्यों हुआ
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वॉयस क्लोनिंग तकनीक के आसान होने से साइबर अपराधियों को लोगों का विश्वास जीतने के नए हथियार मिल गए हैं।

- **तकनीकी सुलभता:** जनरेटिव एआई और डीपफेक टूल्स के सार्वजनिक प्रसार ने किसी भी व्यक्ति की आवाज और चेहरे की सटीक नकल तैयार करना बेहद सस्ता और आसान बना दिया है। इसके चलते अपराधी वास्तविक दिखने वाले वीडियो और ऑडियो कॉल के जरिए आसानी से जाल बिछा लेते हैं।
- **मानवीय भय और लालच का दोहन:** जालसाज केवल तकनीक का सहारा नहीं लेते, बल्कि लॉटरी जीतने का लालच या पुलिस कार्रवाई का भय दिखाकर लोगों की सोचने-समझने की क्षमता को पंगु बना देते हैं। अधिकार की नकली मुद्रा और फर्जी माहौल के सामने आम लोग स्वतंत्र जांच करना भूल जाते हैं।
- **सत्यापन तंत्र की कमी:** डिजिटल सामग्री के मूल स्रोत और उसमें हुए बदलावों को दर्शाने वाले तकनीकी मानक अभी आम जनता की रोजमर्रा की आदत में शामिल नहीं हो पाए हैं। इसके साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर सामग्री की त्वरित जांच की पुख्ता व्यवस्था न होना भी इस संकट को बढ़ाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. डीपफेक तकनीक का उपयोग करके इटली के बैंक में कितनी धोखाधड़ी की गई थी?
इटली के फिदेउराम बैंक के चेयरमैन को निशाना बनाकर लगभग 9.5 करोड़ यूरो विदेशी खातों में भेजे गए थे, जिनमें से करीब 5.3 करोड़ यूरो वापस मिल गए लेकिन लगभग 3.6 करोड़ यूरो का पता नहीं चल सका।

### 2. हांगकांग की इंजीनियरिंग कंपनी अरूप में ठगी कैसे हुई थी?
कंपनी के एक कर्मचारी को ऐसी वीडियो बैठक में शामिल किया गया जहां स्क्रीन पर दिख रहे अन्य सभी सहकर्मी एआई से बनाए गए थे, जिसके निर्देश पर 2.5 करोड़ डॉलर ट्रांसफर कर दिए गए।

### 3. डिजिटल अरेस्ट से क्या आशय है और इसमें क्या होता है?
इसमें जालसाज खुद को पुलिस या जांच अधिकारी बताकर नकली वर्दी और दफ्तर के जरिए वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी का डर दिखाते हैं और डरा-धमकाकर पैसे वसूलते हैं।

### 4. भारत के संशोधित आईटी नियमों में सामग्री हटाने की समय-सीमा क्या रखी गई है?
10 फरवरी 2026 को अधिसूचित नियमों के अनुसार सरकार या अदालत के निर्देश पर कुछ प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के लिए अधिकतम तीन घंटे का समय तय किया गया है।

### 5. आईप्रूव के 2025 के परीक्षण में कितने लोग असली और नकली वीडियो को सही पहचान सके?
अमेरिका और ब्रिटेन के 2,000 लोगों पर किए गए परीक्षण में सभी नमूनों की सही पहचान करने वाले प्रतिभागी मात्र 0.1 प्रतिशत थे।

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