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  "type": "article",
  "title": "दशहरा बीतने के बाद शुरू होता है घोसी का मेला, आजादी से पहले शुरू हुई थी अनोखी परंपरा",
  "summary": "बिहार के जहानाबाद जिले में स्थित घोसी बाजार में विजयादशमी के अगले दिन यानी एकादशी को भव्य दुर्गा पूजा मेला सजता है। साल 1945 से चली आ रही इस परंपरा में शामिल होने के लिए पटना, नालंदा और अरवल से भी हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।",
  "content": "पूरे देश में शारदीय नवरात्र के मौके पर कलश स्थापना के साथ देवी आराधना का दौर शुरू हो जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में अलग-अलग कलात्मक थीम पर बने पूजा पंडाल मुख्य आकर्षण का केंद्र होते हैं। पश्चिम बंगाल और झारखंड के साथ-साथ बिहार के विभिन्न शहरों और कस्बों में भी दुर्गा पूजा की भव्य छटा देखने को मिलती है। सामान्य तौर पर नवरात्र का मेला नौ दिनों तक चलता है और विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ यह उत्सव संपन्न हो जाता है। अधिकांश जगहों पर दशमी तिथि के साथ ही पूजा मेले की रौनक भी विदा ले लेती है।\n\nविजयादशमी के अगले दिन एकादशी पर उमड़ती है भीड़\nबिहार में एक ऐसा शहर भी है जहां की दुर्गा पूजा परंपरा बाकी सभी जगहों से बिल्कुल अलग पहचान रखती है। जब पूरे इलाके में विजयादशमी के दिन प्रतिमा विसर्जन के साथ दुर्गा पूजा का उत्सव समाप्त हो जाता है, तब इस शहर में मेले की असली शुरुआत होती है। जहानाबाद जिले के अंतर्गत आने वाले घोसी बाजार में दशहरा मेला विजयादशमी के बजाय उसके अगले दिन यानी एकादशी को आयोजित किया जाता है। आजादी से पहले के दौर से चली आ रही इस व्यवस्था के कारण एकादशी के दिन पूरा बाजार उत्सव के रंग में डूब जाता है। इस अनोखे आयोजन का हिस्सा बनने के लिए स्थानीय ग्रामीणों के अलावा पड़ोसी जिलों जैसे पटना, नालंदा और अरवल से भी हजारों की संख्या में लोग पहुंचते हैं।\n\nसाल 1945 से लगातार जारी है यह ऐतिहासिक रिवाज\nघोसी स्थित बड़ी दुर्गा मंदिर के पुजारी योगेंद्र पांडे के अनुसार, पूरे राज्य में घोसी बाजार के दशहरा मेले की यह परंपरा अपने आप में बेहद अनूठी है। जब अन्य सभी इलाकों में मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन पूरा हो जाता है, तब यहां अत्यंत भव्य स्तर पर मेले का आयोजन किया जाता है। पुजारी योगेंद्र पांडे ने बताया कि शहर में एकादशी के दिन मेला आयोजित करने का यह सिलसिला करीब 1945 से ही लगातार चला आ रहा है और समय के साथ इसका स्वरूप और भी विस्तृत होता गया है।\n\nजमींदार के अहाते से शुरू होकर भव्य मंदिर तक का सफर\nइस अनूठी परंपरा की शुरुआत के ऐतिहासिक पहलू पर प्रकाश डालते हुए पुजारी योगेंद्र पांडे ने बताया कि एक दौर में जब इस शहर की आबादी काफी कम थी, तब गांव के तत्कालीन जमींदार जगन्नाथ बाबू के परिसर में दुर्गा पूजा आयोजित की जाती थी। उस दौर में स्थानीय लोग पूरे दस दिनों तक पूरी निष्ठा के साथ पूजा-पाठ के धार्मिक अनुष्ठानों में व्यस्त रहते थे। इसके चलते सभी लोग विजयादशमी बीत जाने के बाद एकादशी की तिथि पर ही मेले में घूमने और आनंद लेने के लिए जमा होते थे। धीरे-धीरे लोगों के इसी सामूहिक जुड़ाव ने एक नियमित प्रथा का रूप ले लिया। बाद के वर्षों में दान में मिली भूमि पर एक स्थायी मंदिर का निर्माण कराया गया, जिसे आज बड़ी मां दुर्गा मंदिर के रूप में जाना जाता है, और गोपालगंज बाजार के इसी परिसर में नियमित पूजा-अर्चना और एकादशी मेले का भव्य आयोजन होने लगा।\n\nइसका आप पर असर\nइस ऐतिहासिक और अनोखी परंपरा के कारण मेले में आने वाले लोगों और श्रद्धालुओं को दशहरा उत्सव का आनंद एक अतिरिक्त दिन तक उठाने का मौका मिलता है।\n\n• बिहार में: राज्य के कई जिलों के लोगों को विजयादशमी के बाद भी उत्सव में भाग लेने का अवसर मिलता है। अगर कोई व्यक्ति दशमी तक अन्य आयोजनों में व्यस्त रहता है, तो वह अगले दिन एकादशी पर घोसी पहुंचकर मेले की रौनक देख सकता है।\n• जहानाबाद में: स्थानीय दुकानदारों और व्यापारियों के लिए यह आयोजन व्यापार का अतिरिक्त जरिया बनता है। जहानाबाद सहित पटना, नालंदा और अरवल से आने वाली हजारों लोगों की भीड़ से स्थानीय परिवहन और बाजार की आर्थिक गतिविधियों को सीधा फायदा पहुंचता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nघोसी में विजयादशमी के बजाय एकादशी को मेला आयोजित करने के पीछे दशकों पुराना सामाजिक और व्यावहारिक कारण जुड़ा हुआ है। शुरुआती दौर में पूजा की व्यस्तता के चलते लोग दशमी के बाद ही फुरसत पा पाते थे, जिससे यह अनूठी परंपरा बनी।\n\n• पूजा-पाठ में दस दिन की व्यस्तता: आजादी से पूर्व जब आबादी सीमित थी, लोग नवरात्र के दसों दिन पूरी तरह धार्मिक विधियों और उपासना में लीन रहते थे। ऐसे में मेले में घूमने और खरीद-फरोख्त करने के लिए एकादशी का ही समय बचता था।\n• जमींदार के अहाते से शुरुआत: इस आयोजन की नींव तत्कालीन जमींदार जगन्नाथ बाबू के परिसर में दुर्गा पूजा से पड़ी थी। वहीं से लोगों का एकादशी के दिन जुटना शुरू हुआ जो बाद में एक स्थायी सार्वजनिक परंपरा बन गया।\n• मंदिर निर्माण और निरंतरता: दान में मिली जमीन पर बड़ी दुर्गा मंदिर स्थापित होने के बाद भी पुरानी समय-सारिणी बदली नहीं गई। 1945 से चली आ रही इसी दिनचर्या को स्थानीय समाज ने आज तक कायम रखा है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. घोसी का दशहरा मेला किस दिन आयोजित किया जाता है?\nघोसी में दशहरा मेला विजयादशमी के अगले दिन यानी एकादशी की तिथि को आयोजित होता है।\n\n2. घोसी बाजार किस जिले के अंतर्गत स्थित है?\nघोसी बाजार बिहार के जहानाबाद जिले में स्थित है।\n\n3. एकादशी को मेला आयोजित करने की यह परंपरा कब से चली आ रही है?\nमंदिर के पुजारी के अनुसार यह परंपरा आजादी के पहले यानी लगभग साल 1945 से चली आ रही है।\n\n4. शुरुआती दौर में यह दुर्गा पूजा कहां आयोजित होती थी?\nशुरुआती दिनों में यह पूजा गांव के पूर्व जमींदार जगन्नाथ बाबू के अहाते में आयोजित की जाती थी।\n\n5. घोसी के इस मेले में किन-किन जिलों से श्रद्धालु आते हैं?\nइस मेले में स्थानीय लोगों के अलावा पटना, नालंदा और अरवल जैसे नजदीकी जिलों से भी हजारों लोग आते हैं।",
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  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-10-14",
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