# चुनाव आयोग की अंदरूनी प्रक्रिया पर उठे सवाल, शशि थरूर ने दस्तावेजी सबूतों के साथ मांगा 7 बिंदुओं पर जवाब

> चुनाव आयोग के कामकाज और फैसलों में कथित मतभेदों पर आयोग की सफाई आने के बाद कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर 7 अहम सवाल उठाए हैं। उन्होंने आयोग से सिर्फ सामान्य प्रेस नोट जारी करने के बजाय उठाए गए हर मुद्दे पर विस्तृत और दस्तावेजी स्पष्टीकरण देने की मांग की है।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-09-24 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/eci-ki-andaruni-prakriya-para-uthe-savala-shashi-tharoor-ne-dastaveji-sabuton-ke-satha-manga-7-binduon-para-javaba-37493 · **Language:** Hindi
**Tags:** चुनाव आयोग, शशि थरूर, ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू, विवेक जोशी, वोटर लिस्ट, मतदाता पंजीकरण

भारत निर्वाचन आयोग के प्रशासनिक कामकाज और शीर्ष स्तर पर निर्णय लेने की कार्यप्रणाली को लेकर सियासी हलकों में नई बहस छिड़ गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के दौरान लिए गए कुछ प्रशासनिक निर्णयों और आंतरिक आपत्तियों को लेकर खड़े हुए विवाद पर आयोग ने अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की थी। हालांकि, चुनाव आयोग के इस आधिकारिक स्पष्टीकरण के बाद भी मामला थमता नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने आयोग के रुख पर तीखे सवाल खड़े करते हुए कहा है कि केवल एक औपचारिक प्रेस नोट जारी कर देने से वे बुनियादी चिंताएं खत्म नहीं हो जातीं, जो चुनाव प्रणाली की पारदर्शिता से जुड़ी हुई हैं।

## चुनाव आयोग का आधिकारिक रुख और सर्वसम्मति का तर्क
आयोग ने सार्वजनिक किए गए अपने रुख में स्पष्ट किया कि संस्थागत फैसलों से पहले विभिन्न स्तरों पर होने वाली अंदरूनी टिप्पणियां और विचार-विमर्श किसी भी स्वस्थ प्रशासनिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा होते हैं। आयोग के अनुसार, उसके सभी कदम स्थापित कानूनी नियमों के दायरे में रहकर उठाए जाते हैं और डिजिटल प्रणालियों में सुरक्षा के पुख्ता नियंत्रण पहले से मौजूद हैं। इसके अलावा, आयोग की ओर से यह भी रेखांकित किया गया कि बीते एक वर्ष की पूरी अवधि के दौरान जितने भी आधिकारिक निर्णय लिए गए, वे सभी आपसी सर्वसम्मति से ही तय किए गए थे।

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## 10 महीने में 14 आपत्तियों का ब्योरा और विवाद के मुख्य बिंदु
इस पूरे मामले की जड़ में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी द्वारा दर्ज कराई गई असहमति के बिंदु हैं। विवरण के अनुसार, करीब 10 महीने के अंतराल में चुनाव आयोग के नाम पर जारी किए गए विभिन्न आदेशों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई गईं। ये आपत्तियां केवल औपचारिक प्रशासनिक टिप्पणियां नहीं थीं, बल्कि नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने या उन्हें हटाने की प्रक्रियाओं, नए वोटर रजिस्ट्रेशन से जुड़े फॉर्म 6 में किए गए बदलावों तथा मतदाता डेटा से जुड़े सूचना प्रौद्योगिकी सिस्टम के प्रबंधन जैसे बेहद संवेदनशील विषयों से संबंधित थीं। इसके अलावा एसआईआर और अन्य प्रशासनिक मामलों को लेकर भी मतभेद सामने आए थे।

## शशि थरूर के 7 सवाल: विस्तृत और बिंदुवार जवाब की मांग
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि आयोग का सामान्यीकरण करने वाला जवाब उन विशिष्ट पहलुओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता है, जो सीधे चुनावी अखंडता से जुड़े हैं। उन्होंने आयोग के सामने 7 स्पष्ट सवाल रखते हुए कहा कि केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि अंतिम फैसला सर्वसम्मति से हुआ था, बल्कि यह जानना आवश्यक है कि निर्णय प्रक्रिया के दौरान दर्ज की गई आपत्तियों का क्या हश्र हुआ। थरूर द्वारा उठाए गए प्रमुख सवाल इस प्रकार हैं

- क्या रिकॉर्ड में दर्ज बताई गई 14 आपत्तियां वास्तव में आधिकारिक फाइलों पर दर्ज थीं और उनमें से प्रत्येक आपत्ति पर क्या प्रशासनिक कार्रवाई की गई?
- कमिश्नरों द्वारा आपत्ति दर्ज कराए जाने के बावजूद फॉर्म 6 के नियमों और प्रारूप में किए गए बदलावों का ठोस कानूनी आधार क्या था?
- मतदाता सूची के डेटाबेस तक पहुंच और आईटी नियंत्रण प्रणाली के केंद्रीकरण को लेकर जो गंभीर चिंताएं जताई गई थीं, उनका क्या समाधान निकाला गया?
- गोवा में 97 मतदाताओं से जुड़े विशिष्ट मामले को लेकर निर्वाचन आयोग का वास्तविक और स्पष्टीकरण क्या है?
- जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के बाद दोबारा जोड़े गए, उनसे जुड़ी अपीलों को किस अधिकारी या स्तर पर मंजूरी दी गई और इसके लिए किस प्रक्रिया का पालन हुआ?
- कैबिनेट सेक्रेटरी को भेजे गए संदेशों के पीछे कौन से प्रशासनिक हालात और कारण मौजूद थे?
- क्या आयोग के नाम से बिना आवश्यक औपचारिक मंजूरी के कोई संदेश या निर्देश जारी किए गए थे, जैसा कि सामने आया है?

## संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और पारदर्शिता का तकाजा
शशि थरूर ने इस बात पर विशेष बल दिया कि संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति आम जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए पूरी प्रक्रिया का पारदर्शी होना अनिवार्य है। उनका कहना है कि जब दो चुनाव आयुक्तों ने अहम प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए थे, तो उन आपत्तियों की अनदेखी कर सिर्फ अंतिम सर्वसम्मति का हवाला देना प्रक्रिया की खामियों को नहीं छिपा सकता। उन्होंने मांग की कि चुनाव आयोग को इन सभी सात बिंदुओं पर केवल संक्षिप्त खंडन करने के बजाय पूरे आधिकारिक दस्तावेजों के साथ सार्वजनिक रिकॉर्ड में तथ्यों को सामने रखना चाहिए, ताकि चुनावी प्रणाली पर किसी प्रकार का संदेह न रहे।

## इसका आप पर असर
चुनाव आयोग के अंदरूनी कामकाज और वोटर लिस्ट से जुड़े नियमों में पारदर्शिता का सीधा असर देश के हर नागरिक के मताधिकार पर पड़ता है।

- **भारत में:** यदि मतदाता पंजीकरण, फॉर्म 6 और मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के नियमों में प्रशासनिक फेरबदल होते हैं, तो आम नागरिकों के लिए वोटर आईडी बनवाने और सूची में नाम बनाए रखने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। मतदाताओं को चुनाव से पहले मतदाता सूची में अपने नाम की पुष्टि नियमित रूप से ऑनलाइन पोर्टल पर करते रहना चाहिए।
- **गोआ में:** 97 मतदाताओं के विशिष्ट मामले की जांच स्थानीय स्तर पर मतदाता सूची के सत्यापन और अपील प्रक्रिया की शुद्धता को तय करेगी। संबंधित क्षेत्र के नागरिकों के लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी हो जाता है कि उनके स्थानीय पते और पहचान के दस्तावेज आधिकारिक रिकॉर्ड में पूरी तरह अद्यतन रहें।
- **डिजिटल सुरक्षा और डेटा नियंत्रण:** मतदाता डेटाबेस के आईटी नियंत्रण और केंद्रीकरण पर उठ रहे सवालों से आम जनता के निजी चुनावी डेटा की सुरक्षा का मुद्दा गहराता है। आयोग की डिजिटल प्रणालियों में कड़े सुरक्षा नियंत्रण होने से नागरिकों का डेटा सुरक्षित रहता है और अनधिकृत बदलावों पर रोक लगती है।
- **प्रशासनिक फैसलों पर निगरानी:** चुनाव प्रक्रिया में निष्पक्षता और आयुक्तों की आपत्तियों पर स्पष्टता आने से लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाताओं का भरोसा मजबूत होता है। यदि नियमों में बदलाव के कानूनी आधार स्पष्ट होंगे, तो किसी भी वैध मतदाता का नाम गलती से सूची से हटने की गुंजाइश खत्म होगी।

## ऐसा क्यों हुआ
यह विवाद तब उत्पन्न हुआ जब निर्वाचन आयोग के भीतर नीतिगत और प्रक्रियात्मक बदलावों पर चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियां सामने आईं। आयोग द्वारा सर्वसम्मति का सामान्य दावा किए जाने के बाद विपक्ष ने प्रक्रियागत पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए।

- **आंतरिक आपत्तियों का सामने आना:** चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लगभग 10 महीने की अवधि में मतदाता पंजीकरण, फॉर्म 6 में बदलाव और आईटी सिस्टम से जुड़े निर्णयों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इन दस्तावेजों के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त के स्तर पर लिए गए कुछ प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल खड़े हुए।
- **आयोग की सफाई से असंतोष:** चुनाव आयोग ने प्रेस वक्तव्य जारी कर यह तो कहा कि सभी निर्णय सर्वसम्मति से हुए और मतभेद सामान्य हैं, लेकिन दर्ज की गई विशिष्ट आपत्तियों पर क्या कदम उठाए गए, इसका कोई ब्योरा नहीं दिया। इसी प्रशासनिक अस्पष्टता ने राजनीतिक स्तर पर 7 विशिष्ट सवालों को जन्म दिया।
- **संवैधानिक प्रक्रियाओं का महत्व:** चुनावी डेटाबेस के केंद्रीकरण, कैबिनेट सेक्रेटरी को भेजे गए पत्राचार और गोवा में 97 मतदाताओं से जुड़े मामलों में स्थापित नियमों के अनुपालन को लेकर दस्तावेजी साक्ष्य की मांग की जा रही है। मामले में आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर पूर्ण स्पष्टीकरण का इंतजार है।

## सवाल-जवाब

### 1. शशि थरूर ने चुनाव आयोग से क्या मांग की है?
शशि थरूर ने चुनाव आयोग से केवल एक सामान्य प्रेस नोट जारी करने के बजाय 14 आपत्तियों और 7 विशिष्ट बिंदुओं पर दस्तावेजी सबूतों के साथ स्पष्टीकरण देने की मांग की है।

### 2. चुनाव आयोग ने अपने स्पष्टीकरण में क्या कहा था?
चुनाव आयोग ने कहा कि अंदरूनी टिप्पणियां विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं, उसके सभी फैसले कानून के मुताबिक और पिछले एक साल में सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

### 3. चुनाव आयुक्तों ने किन मुद्दों पर 14 बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं?
ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, वोटर लिस्ट से नाम जोड़ने-हटाने, फॉर्म 6 में बदलाव और चुनावी डेटा से जुड़े आईटी सिस्टम के केंद्रीकरण जैसे मुद्दों पर थीं।

### 4. किन चुनाव आयुक्तों ने फैसले लेने की प्रक्रिया पर आपत्तियां जताई थीं?
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 10 महीने की अवधि में कम से कम 14 बार इन निर्णयों पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

### 5. गोवा से जुड़ा कौन सा मामला सवालों के घेरे में है?
शशि थरूर ने अपने सवालों में गोवा के 97 मतदाताओं से जुड़े विशिष्ट मामले पर चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है।

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