चुनाव आयोग के खिलाफ दो बड़े शहरों में फूटा गुस्सा, मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग तेज मतदाता सूची और एसआईआर विवाद को लेकर दिल्ली और मुंबई की सड़कों पर उग्र विरोध देखने को मिला, जहां पुलिस ने सुरक्षा कड़ी कर कई प्रमुख नेताओं को हिरासत में ले लिया। गांधी जयंती के पावन अवसर पर देश के दो प्रमुख महानगरों में चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता को लेकर तीखा टकराव सामने आया। निर्वाचन सदन के शीर्ष अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए राजधानी की प्रमुख राजनीतिक ताकतों और महाराष्ट्र के प्रदर्शनकारियों ने एक साथ आवाज बुलंद की। मतदाता सूचियों में कथित हेराफेरी तथा एसआईआर की प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव का मुद्दा उठाते हुए सड़कों पर उतरे लोगों ने चुनाव निकाय के नेतृत्व पर सीधा निशाना साधा। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए दोनों महानगरों में व्यापक पुलिस बल तैनात किया गया, जहां दर्जनों प्रमुख चेहरों के साथ भारी संख्या में कार्यकर्ताओं को रोककर हिरासत में भेज दिया गया। जंतर-मंतर पर टकराव और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां राजधानी के ऐतिहासिक धरना स्थल पर सुबह से ही तनाव की स्थिति बनी रही, जहां बैरिकेड्स लगाकर प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोका गया। इस दौरान सुरक्षाबलों और प्रदर्शन में शामिल नेताओं के मध्य तीखी बहस और धक्का-मुक्की की नौबत आ गई। संसद के उच्च सदन के सदस्य संजय सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी, संगठन के प्रांतीय प्रमुख सौरभ भारद्वाज के साथ अनुराग ढांडा और संजीव झा जैसे चर्चित चेहरों को पुलिस वाहनों में बैठाकर ले जाया गया। आंदोलनकारियों का स्पष्ट कहना था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान नागरिकों का बुनियादी अधिकार है, जिससे किसी भी सूरत में समझौता नहीं किया जा सकता। हिरासत में भेजे जाने के बाद भी पार्टी नेताओं ने अपने रुख पर अड़े रहने और नागरिकों के मताधिकार की रक्षा के लिए संघर्ष को और तेज करने का संकल्प दोहराया। शिवाजी पार्क में उमड़ा जनसैलाब और जेल भरो आह्वान उधर देश की आर्थिक राजधानी में शिवाजी पार्क का मैदान भी चुनावी सुधारों की मांग का गवाह बना। प्रशासन की तरफ से औपचारिक मंजूरी न दिए जाने के बावजूद कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आह्वान पर लोग भारी तादाद में एकत्र हुए और पूर्व निर्धारित सत्याग्रह के तहत खुद गिरफ्तारियां देने की घोषणा की। इस जुटान की सबसे उल्लेखनीय तस्वीर यह थी कि इसमें केवल दलीय कार्यकर्ता ही मौजूद नहीं थे, बल्कि सामान्य गृहस्थ, महिलाएं और बच्चे भी हाथों में राष्ट्रध्वज थामे दिखाई दिए। पुणे समेत राज्य के विभिन्न जनपदों से यात्रा करके आए आम नागरिकों ने कहा कि यह मुकाबला सत्ता की राजनीति का नहीं बल्कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे को बचाने की लड़ाई है। संवैधानिक संस्थाओं की साख और जनता का भरोसा दोनों महानगरों में उभरे इस जनाक्रोश ने एक बुनियादी विमर्श को जन्म दे दिया है कि सार्वजनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में क्यों आ रही है। आंदोलन में भाग ले रहे पक्षों का दृढ़ मत है कि मतदाता पहचान और सूचियों से संबंधित प्रत्येक प्रक्रिया जनता के सामने पूरी तरह स्पष्ट होनी चाहिए। यदि नागरिकों के मन में अपनी वोटिंग व्यवस्था को लेकर संदेह पैदा होता है, तो केवल सुरक्षा घेरे और प्रशासनिक सख्ती से उसे दूर नहीं किया जा सकता। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में संवैधानिक पदों की असली ताकत जनता के अटूट विश्वास से तय होती है, और उस विश्वास को बनाए रखने के लिए खुली जवाबदेही आवश्यक है। इसका आप पर असर चुनावी सूचियों और मतदान प्रक्रियाओं पर उठ रहे इन विवादों का सीधा असर आम नागरिक के सबसे बड़े संवैधानिक अधिकार पर पड़ता है। • भारत में: देश भर के मतदाताओं को अपनी स्थानीय मतदाता सूची में नाम और विवरण की पुष्टि समय रहते करनी होगी। यदि सूचियों में विसंगतियां बनी रहती हैं तो कई वैध नागरिक मतदान के दिन अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं। • दिल्ली और मुंबई में: राजधानी दिल्ली और मुंबई में विरोध प्रदर्शनों और पुलिस कार्रवाइयों के चलते प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है। आवागमन करने वाले यात्रियों और दैनिक राहगीरों को जंतर-मंतर और शिवाजी पार्क के आसपास यातायात प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। • राजनीतिक भागीदारी: आम नागरिकों और परिवारों द्वारा सीधे आंदोलन में शामिल होने से चुनावी सुधारों की मांग तेज हो गई है। आने वाले दिनों में नागरिक संगठनों की ओर से मतदाता जागरूकता और सूची सत्यापन के अभियान और सघन हो सकते हैं। • प्रशासनिक जवाबदेही: चुनाव आयोग पर नियमों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करने का भारी दबाव बनेगा। चुनाव से जुड़ी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ने पर ही लोगों का भरोसा पुनः सुदृढ़ हो सकेगा। ऐसा क्यों हुआ यह टकराव चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर विपक्षी दलों और नागरिक समूहों द्वारा मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के आरोपों के कारण उत्पन्न हुआ। • सीधा कारण: प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूचियों में अनियमिताओं और एसआईआर प्रक्रिया के संचालन को लेकर चुनाव निकाय पर सीधा असंतोष जताया। इसी असंतोष के चलते मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाई गई। • अनुमति न मिलना: मुंबई में स्थानीय पुलिस प्रशासन द्वारा सभा की अनुमति न दिए जाने के बावजूद आंदोलनकारियों ने जेल भरो अभियान जारी रखने का निर्णय लिया। इस अवज्ञा के कारण सुरक्षाबलों को सख्त कदम उठाने पड़े। • पारदर्शिता की मांग: राजनीतिक दलों का दावा है कि आयोग नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण में पर्याप्त खुलापन नहीं दिखा रहा है। संस्थागत जवाबदेही की मांग को लेकर लोगों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती का दिन विरोध के लिए चुना। सवाल-जवाब 1. दिल्ली और मुंबई में यह प्रदर्शन किस दिन आयोजित किए गए? यह विरोध प्रदर्शन गांधी जयंती के अवसर पर आयोजित किए गए। 2. दिल्ली में किन प्रमुख नेताओं को हिरासत में लिया गया? राज्यसभा सांसद संजय सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी, सौरभ भारद्वाज, अनुराग ढांडा और संजीव झा समेत कई नेताओं को हिरासत में लिया गया। 3. दिल्ली में कितने प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में लिया? जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान एक हजार से ज्यादा कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। 4. मुंबई में किस दल ने आंदोलन का नेतृत्व किया? मुंबई के शिवाजी पार्क में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और आम नागरिकों ने मिलकर प्रदर्शन किया। 5. प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग क्या थी? प्रदर्शनकारी मतदाता सूचियों व एसआईआर में पारदर्शिता की मांग कर रहे थे और उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग उठाई। 6. मुंबई के प्रदर्शन में कहां-कहां से लोग शामिल होने पहुंचे थे? शिवाजी पार्क के प्रदर्शन में मुंबई के अलावा पुणे और आसपास के अन्य इलाकों से भी नागरिक पहुंचे थे। https://trendkia.com/national/election-commission-ke-khilapha-do-bare-shaharon-men-phuta-gussa-mukhya-chunava-ayukta-ke-istiphe-ki-manga-teja-41958 TrendKia — Har trend, sabse pehle.