# चुनाव आयुक्तों के चयन पर बृजभूषण शरण सिंह का विपक्ष पर हमला, बोले पूर्व सरकारों में थी हिटलर जैसी तानाशाही

> पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने चुनाव आयोग की नियुक्तियों और ईवीएम पर सवाल उठाने वाले विपक्षी दलों पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने 2023 के संसदीय कानून को निष्पक्ष व्यवस्था बताते हुए अतीत के उदाहरणों से विपक्ष की मंशा पर सवाल खड़े किए।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-10-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/election-commission-para-brij-bhushan-sharan-singh-ka-hamala-bole-purva-sarakaron-men-thi-hitler-jaisi-tanashahi-42863 · **Language:** Hindi
**Tags:** बृजभूषण शरण सिंह, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, ज्ञानेश कुमार, भारतीय जनता पार्टी, संसद

भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और आयुक्तों के चयन नियमों को लेकर विपक्षी दलों पर तीखा वार किया है। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2023 से पहले जब संसद ने इस संबंध में कोई स्पष्ट अधिनियम नहीं बनाया था, तब देश में चुनाव आयोग के भीतर नियुक्तियों को लेकर हिटलर जैसी तानाशाही का माहौल था। अपने बयानों के लिए लगातार चर्चा में बने रहने वाले नेता का यह रुख ऐसे वक्त में सामने आया है, जब सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा आयोग की आंतरिक प्रक्रियाओं से जुड़ी कई याचिकाओं पर बेहद अहम सुनवाई तय है।

गोंडा में संवाददाताओं से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि देश में 2023 में संसद द्वारा नया कानून पारित किए जाने से पहले तक चुनाव आयुक्तों को चुनने की कोई पारदर्शी वैधानिक व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने सीधे तौर पर तर्क दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के रुख के बाद संसद ने विधिवत एक वैधानिक प्रक्रिया तैयार की, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री की तीन सदस्यीय समिति बनाई गई।

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## विपक्ष की आपत्तियों और ईवीएम पर उठाए सवाल
बृजभूषण शरण सिंह ने आरोप लगाया कि वर्ष 2014 के बाद से विपक्षी दलों के चुनावी आधार और राजनीतिक प्रभाव लगातार कम हो रहे हैं। इसी हताशा के चलते वे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और चुनाव आयोग जैसी प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं की साख पर अकारण सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने पूछा कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब किस नियम के तहत चुनाव आयुक्त बनाए जाते थे। अपने इस तर्क को मजबूती देने के लिए उन्होंने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों नवीन चावला और एमएस गिल का विशेष उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि अतीत में आयोग के प्रमुखों के चयन को लेकर कई बार राजनीतिक झुकाव के गंभीर सवाल उठे थे। उदाहरण देते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि एमएस गिल बाद में कांग्रेस नीत सरकार में केंद्रीय मंत्री तक बने। उनका कहना था कि जब तक पुरानी व्यवस्था से विपक्षी दल लाभ में थे, तब तक उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन अब लोकतांत्रिक हार का सामना करते ही वे संस्थाओं पर दोष मढ़ने लगे हैं।

## सर्वोच्च न्यायालय में 5 अक्टूबर की सुनवाई की पृष्ठभूमि
यह पूरा राजनीतिक घटनाक्रम देश की शीर्ष अदालत में होने वाली सुनवाई से ठीक पहले उभरा है। सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्याकांत की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष 5 अक्टूबर 2026 को याचिकाओं पर सुनवाई होनी है। इन याचिकाओं में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयोग की निष्पक्षता, विशेष गहन पुनरीक्षण और आयोग के भीतर सामूहिक रूप से निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए गए हैं।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने चुनाव आयोग नियुक्ति कानून 2023 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर एक विभाजित फैसला दिया था। इसके बाद मामले को बड़ी संविधान पीठ के विचारार्थ भेजने की सिफारिश की गई थी। इस कानूनी खींचतान के बीच आया यह बयान सत्तारूढ़ खेमे की तरफ से एक रणनीतिक रक्षा पंक्ति तैयार करने जैसा माना जा रहा है।

## बयान के रणनीतिक और राजनीतिक मायने
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बृजभूषण शरण सिंह के इस आक्रामक रुख के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े संदेश छिपे हुए हैं। पहला उद्देश्य वर्ष 2023 के संसदीय कानून के समर्थन में एक मजबूत जनधारणा तैयार करना है। उनका यह कथन स्पष्ट करता है कि वर्तमान प्रणाली, जिसमें कार्यपालिका और विपक्ष दोनों का प्रतिनिधित्व शामिल है, कोई मनमाना कदम नहीं बल्कि संसद द्वारा स्वीकृत एक पूरी तरह से वैध और संवैधानिक व्यवस्था है।

दूसरा पहलू अदालत में चल रही सुनवाई के बीच विपक्षी दलों की अति-सक्रियता को राजनीतिक दबाव करार देना है। कांग्रेस और सपा जैसे दल जब आयोग पर एकतरफा निर्णय लेने के आरोप लगा रहे हैं, तब इस बात को रेखांकित किया जा रहा है कि यह कोई विधिक विवाद नहीं बल्कि चुनावी पराजयों से उपजी राजनीतिक हताशा है।

तीसरा पहलू ऐतिहासिक प्रसंगों को सामने लाकर रक्षात्मक मुद्रा से आक्रामक रुख में बदलना है। नवीन चावला और एमएस गिल का नाम लेकर यह याद दिलाने का प्रयास किया गया है कि पिछली सरकारों के दौर में संवैधानिक पदों पर किस तरह के फैसले लिए गए थे। इस प्रकार, जहां विपक्षी खेमा अदालत के सहारे आयोग की मौजूदा कार्यप्रणाली और चयन ढांचे को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है, वहीं सत्ता पक्ष संसदीय कानून की संप्रभुता के आधार पर इस नैरेटिव का जवाब दे रहा है।

## इसका आप पर असर
चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर राजनीतिक बहस सीधे तौर पर देश में निष्पक्ष चुनाव और नागरिकों के मताधिकार की विश्वसनीयता से जुड़ी है।

- **भारत में:** संसद द्वारा बनाए गए 2023 के कानून और उस पर अदालत की सुनवाई से यह तय होगा कि भविष्य में देश के चुनाव आयुक्तों का चयन किस प्रक्रिया से किया जाएगा। इससे नागरिकों के लिए चुनावी प्रणाली की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक शुचिता पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
- **उत्तर प्रदेश में:** गोंडा से उठे इस राजनीतिक बयान से राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन के बीच संस्थागत निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक बहस और तेज होगी। आगामी चुनावों में मतदान और चुनाव प्रबंधन को लेकर दोनों पक्षों का रुख अधिक आक्रामक दिखेगा।
- **मतदाताओं के लिए:** विशेष गहन पुनरीक्षण और मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण जैसे कदमों पर चल रही कानूनी जांच से आम नागरिकों के वोटर आईडी और मताधिकार की सुरक्षा पर विमर्श गहराएगा। मतदाता सूची में नाम जुड़वाने या संशोधन कराने की प्रक्रिया पर चुनाव आयोग का प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत रहेगा।
- **संविधान और कानून के स्तर पर:** सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के संभावित विचार से यह स्पष्ट होगा कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में न्यायपालिका, कार्यपालिका और संसद की क्या संवैधानिक सीमाएं होंगी। इसका असर आने वाले दशकों में भारत के चुनावी शासन तंत्र पर देखने को मिलेगा।

## ऐसा क्यों हुआ
यह राजनीतिक बयान सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर होने वाली एक महत्वपूर्ण सुनवाई से ठीक पहले उपजा है।

- **सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाएं:** मुख्य न्यायाधीश सूर्याकांत की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष 5 अक्टूबर 2026 को चुनाव आयोग की निष्पक्षता, विशेष गहन पुनरीक्षण और निर्णय प्रक्रिया पर सुनवाई होनी है। इसी कानूनी दबाव को संतुलित करने के लिए राजनीतिक बयानबाजी तेज हुई है।
- **2023 के कानून पर विभाजित फैसला:** सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने 2023 के चुनाव आयुक्त चयन कानून की वैधता पर विभाजित फैसला देकर इसे संविधान पीठ को भेजने की सिफारिश की थी। इससे इस मुद्दे पर कानूनी अनिश्चितता बनी हुई है।
- **विपक्ष द्वारा उठाए गए सवाल:** कांग्रेस और समाजवादी पार्टी समेत विपक्षी दल लगातार ईवीएम और आयोग के फैसलों की तटस्थता पर आरोप लगा रहे हैं। सत्तारूढ़ खेमे के नेता इन आरोपों को चुनावी हार से उपजी हताशा बताकर खारिज करने का प्रयास कर रहे हैं।
- **अतीत की नियुक्तियों का प्रसंग:** बीजेपी नेताओं द्वारा नवीन चावला और एमएस गिल जैसे पूर्व चुनाव आयुक्तों का नाम लेकर यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि पहले बिना किसी कानून के राजनीतिक आधार पर नियुक्तियां की जाती थीं।

## सवाल-जवाब

### 1. बृजभूषण शरण सिंह ने चुनाव आयोग की पुरानी व्यवस्था पर क्या बयान दिया?
उन्होंने दावा किया कि 2023 से पहले जब संसद का कोई कानून नहीं था, तब चुनाव आयोग में नियुक्तियों को लेकर हिटलर जैसी तानाशाही का माहौल था।

### 2. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा 2023 का कानून क्या है?
इस कानून के तहत चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री की तीन सदस्यीय समिति बनाई गई है।

### 3. सुप्रीम कोर्ट में 5 अक्टूबर 2026 को किस मामले में सुनवाई होनी है?
मुख्य न्यायाधीश सूर्याकांत की अध्यक्षता वाली पीठ चुनाव आयोग की निष्पक्षता, विशेष गहन पुनरीक्षण और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।

### 4. बृजभूषण शरण सिंह ने किन पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों का नाम लिया?
उन्होंने नवीन चावला और एमएस गिल का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि पिछली सरकारों के दौरान चुनाव प्रमुखों पर राजनीतिक झुकाव के आरोप लगे थे।

### 5. विपक्षी दल चुनाव आयोग पर क्या आरोप लगा रहे हैं?
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सहित विपक्षी दल चुनाव आयोग के फैसलों की निष्पक्षता और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर सवाल उठा रहे हैं।

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