घर की थाली को केमिकल मुक्त बनाने के लिए चित्रकूट के किसान ने तैयार किया शानदार जैविक किचन गार्डन चित्रकूट के किसान कोठारी सिंह पटेल ने सीमित जगह और पक्के फर्श पर गमलों के जरिए ताजी सब्जियां उगाने का अनूठा मॉडल विकसित किया है। घर के चूल्हे पर पकने वाले भोजन में यदि ताजी, हरी और रसायन मुक्त सब्जियां मिल जाएं तो सेहत अपने आप दुरुस्त रहने लगती है। आजकल मिलावटी खान-पान और केमिकल युक्त उपजों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए हर व्यक्ति अपने घर में शुद्ध सब्जियां उगाने की चाहत रखता है। हालांकि घनी आबादी, छोटे मकानों और कच्ची जमीन के अभाव के कारण ज्यादातर लोग इस दिशा में कदम नहीं बढ़ा पाते। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के मानिकपुर तहसील अंतर्गत बरहट गांव के रहने वाले प्रगतिशील किसान कोठारी सिंह पटेल ने इस मुश्किल का बेहद सरल और व्यावहारिक समाधान खोज निकाला है। उन्होंने अपने घर के सीमित दायरे में एक व्यवस्थित जैविक किचन गार्डन तैयार किया है, जहां वे मौसमी सब्जियां उगाकर अपनी रोजाना की पारिवारिक जरूरतों को बिना बाजार जाए पूरा कर रहे हैं। स्वास्थ्य समस्याओं ने बदली सोच और जैविक राह पर बढ़े कदम कोठारी सिंह पटेल पहले पारंपरिक ढर्रे पर खेती करते थे, लेकिन जीवन में आए कुछ स्वास्थ्य संकटों ने उन्हें अपनी जीवनशैली बदलने पर मजबूर कर दिया। लगातार बीमारियों और शारीरिक दिक्कतों से जूझने के बाद उन्होंने अपनी रोजमर्रा की भोजन प्रणाली पर गहराई से विचार किया। इसके बाद वर्ष 2023 में उन्होंने रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से पूरी तरह तौबा करते हुए जैविक खेती की राह पकड़ी। उन्होंने अपने भोजन में शुद्ध प्राकृतिक पद्धति से उपजे अनाजों और सब्जियों को शामिल करना शुरू किया, जिससे कुछ ही समय के भीतर उनके स्वास्थ्य में अप्रत्याशित सुधार देखने को मिला। अपने खेतों में वे मुख्य फसलों के तौर पर धान, अरहर और ज्वार की पूरी तरह जैविक पैदावार लेते हैं, जबकि दैनिक सब्जी के लिए उन्होंने घर के निकट ही किचन गार्डन स्थापित किया है। रसोई के नजदीक सीमित जगह में मौसमी सब्जियों का चक्र किचन गार्डन को स्थापित करने को लेकर कोठारी सिंह पटेल का अनुभव बताता है कि इसे हमेशा रसोई घर के बिल्कुल नजदीक रखना चाहिए ताकि खाना बनाते समय जरूरत के मुताबिक तुरंत ताजी सब्जियां तोड़ी जा सकें। इसके अलावा इसमें केवल उन्हीं किस्मों को प्राथमिकता देनी चाहिए जिनका दैनिक खान-पान में लगातार इस्तेमाल होता है। उन्होंने अपने इस छोटे से बगीचे में पहले परवल और शकरकंद जैसी फसलों को सफलतापूर्वक उगाया था। वर्तमान समय में उनके बगीचे में लौकी, बैंगन, हरी मिर्च और टमाटर जैसी रोजमर्रा की जरूरत वाली सब्जियां लहलहा रही हैं। उनका मानना है कि इस तरह के घरेलू बागानों से भले ही व्यावसायिक स्तर का भारी उत्पादन न मिले, लेकिन एक मध्यमवर्गीय परिवार की दैनिक सब्जी की थाली आसानी से भर जाती है। पक्के फर्श और गमलों में बागवानी का व्यावहारिक तरीका जिन घरों में कच्ची मिट्टी, लॉन या खुली क्यारियां नहीं हैं और पूरा आंगन पक्का बना हुआ है, उनके लिए भी कोठारी सिंह पटेल ने आसान रास्ता सुझाया है। उनका कहना है कि पक्के फर्श वाले घरों में बड़े आकार के गमलों या प्लास्टिक कंटेनरों की मदद से बहुत आसानी से सब्जियों की बागवानी की जा सकती है। इसके लिए गमलों में अच्छी गुणवत्ता वाली मिट्टी और जैविक खाद का मिश्रण भरना होता है। इस मिश्रण में बैंगन, टमाटर, मिर्च और बेल वाली लौकी जैसी सब्जियां तेजी से पनपती हैं। उन्होंने यह भी साझा किया कि यदि पौधों को पर्याप्त धूप, नियमित पानी और सही पोषण मिले तो कुछ किस्में रोपाई के मात्र 20 दिन बाद ही फल देना शुरू कर देती हैं। जैविक खाद का प्रयोग और बुंदेलखंड में जागरूकता की मुहिम घर में तैयार होने वाली इन सब्जियों में किसी भी प्रकार के सिंथेटिक यूरिया या रासायनिक कीटनाशक का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित रखा जाता है। कोठारी सिंह पटेल के मुताबिक केवल शुद्ध जैविक खाद के प्रयोग से ही सब्जियों का प्राकृतिक स्वाद और पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं। इससे जहां परिवार का बाजार पर निर्भर रहने का खर्च घटता है, वहीं पौधों की निराई-गुड़ाई और देखभाल से घर के सदस्यों का मानसिक तनाव दूर होता है और यह एक स्वास्थ्यवर्धक मनोरंजन का रूप ले लेता है। इसके अलावा घर के चारों ओर हरियाली और ताजगी का वातावरण बना रहता है। अपने इस सफल अनुभव को व्यापक स्तर पर ले जाने के लिए वे 'खेती बचाओ बुंदेलखंड' नाम से एक संगठन का संचालन भी कर रहे हैं। इस मंच के जरिए वे क्षेत्र के अन्य किसानों और आम नागरिकों को जैविक कृषि अपनाने और घरों में किचन गार्डन लगाने के लिए लगातार जागरूक कर रहे हैं। इसका आप पर असर घर में जैविक किचन गार्डन तैयार करके परिवार न केवल बाजार के महंगे और रासायनिक खाद्य पदार्थों से बच सकता है, बल्कि ताजी सब्जियों से स्वास्थ्य भी बेहतर रख सकता है। • भारत में: पक्के मकानों और सीमित जगह वाले लोग गमलों का उपयोग करके अपने घरों में रासायनिक मुक्त सब्जियां उगाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। इससे बाजार से सब्जी खरीदने का मासिक खर्च कम होता है और ताजी हरी सब्जियों का नियमित सेवन सुनिश्चित होता है। • चित्रकूट में: बुंदेलखंड क्षेत्र के स्थानीय किसान और ग्रामीण कोठारी सिंह पटेल के मॉडल को देखकर घरेलू बागवानी अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। इससे स्थानीय स्तर पर जैविक खेती के प्रसार को गति मिल रही है और खान-पान में शुद्धता बढ़ रही है। • सीमित जगह का उपयोग: कच्ची जमीन न होने पर भी बड़े गमलों और प्लास्टिक कंटेनरों में लौकी, बैंगन, मिर्च और टमाटर जैसी फसलें लगाई जा सकती हैं। बालकनी या छत पर सही धूप और पानी की व्यवस्था करके कोई भी परिवार इसे आसानी से शुरू कर सकता है। • दैनिक खान-पान में सुधार: रासायनिक खादों के बिना तैयार की गई सब्जियों के सेवन से पाचन और समग्र शारीरिक स्वास्थ्य में सकारात्मक बदलाव आते हैं। स्वास्थ्य संबंधी पुरानी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए यह एक सुलभ प्राकृतिक उपचार बन सकता है। • तनाव मुक्ति और हरियाली: पौधों की रोजाना देखभाल करने से मानसिक सुकून मिलता है और घर के आसपास स्वच्छ वातावरण बना रहता है। यह खाली समय बिताने का एक स्वस्थ और उत्पादक जरिया साबित होता है। ऐसा क्यों हुआ कोठारी सिंह पटेल द्वारा घर पर किचन गार्डन तैयार करने और रासायनिक खेती को त्यागने का मुख्य कारण उनके अपने स्वास्थ्य में आई गंभीर परेशानियां थीं। खान-पान की गुणवत्ता सुधारने की इसी व्यक्तिगत जरूरत ने उन्हें जैविक बागवानी की ओर प्रेरित किया। • गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं: रासायनिक खादों और दवाओं से उपजे अनाज व सब्जियों के निरंतर सेवन के कारण पटेल को शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। इन व्याधियों से निजात पाने के लिए उन्होंने अपने खान-पान को शुद्ध और प्राकृतिक बनाने का निर्णय लिया। • वर्ष 2023 का बदलाव: स्वास्थ्य लाभ पाने के उद्देश्य से उन्होंने वर्ष 2023 में रसायनों का पूर्ण बहिष्कार कर जैविक खेती की शुरुआत की। प्राकृतिक अनाज और ताजी घरेलू सब्जियों के सेवन से उनके स्वास्थ्य में तेजी से सुधार देखा गया। • दैनिक जरूरतों की सुलभता: बाजार पर बार-बार निर्भर रहने और बासी सब्जियों से बचने के लिए उन्होंने रसोई के निकट ही बागान लगाने की सोची। इससे बिना अतिरिक्त धन खर्च किए रोजाना ताजा भोजन तैयार करना संभव हो गया। • बुंदेलखंड में जन-जागरूकता का संकल्प: अपने व्यक्तिगत स्वास्थ्य सुधार के सकारात्मक परिणामों को देखकर उन्होंने अन्य लोगों को भी इस दिशा में प्रेरित करने की जिम्मेदारी समझी। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने 'खेती बचाओ बुंदेलखंड' संगठन बनाकर लोगों को जागरूक करना शुरू किया। सवाल-जवाब 1. कोठारी सिंह पटेल कहां के रहने वाले हैं? वे उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले की मानिकपुर तहसील स्थित बरहट गांव के निवासी हैं। 2. उन्होंने जैविक खेती की शुरुआत कब और क्यों की थी? उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से निजात पाने और खान-पान सुधारने के लिए वर्ष 2023 में जैविक खेती शुरू की थी। 3. वे अपने खेतों में कौन सी मुख्य फसलों की जैविक खेती करते हैं? वे अपने खेतों में धान, अरहर और ज्वार जैसी प्रमुख फसलों की जैविक खेती करते हैं। 4. वर्तमान में उनके किचन गार्डन में कौन सी सब्जियां उग रही हैं? वर्तमान में उनके बगीचे में लौकी, बैंगन, हरी मिर्च और टमाटर जैसी दैनिक सब्जियां तैयार की जा रही हैं। 5. यदि घर में कच्ची जमीन न हो तो किचन गार्डन कैसे बनाया जा सकता है? पक्के फर्श पर बड़े गमलों या कंटेनरों में जैविक खाद और मिट्टी भरकर सब्जियां आसानी से उगाई जा सकती हैं। 6. सही देखभाल करने पर कितने दिनों में कुछ सब्जियों से पैदावार मिलने लगती है? कोठारी सिंह पटेल के अनुसार सही देखभाल और पोषण मिलने पर कुछ सब्जियां 20 दिन बाद ही फल देने लगती हैं। 7. वे जन-जागरूकता के लिए किस संगठन का संचालन कर रहे हैं? वे जैविक खेती और किचन गार्डन के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए 'खेती बचाओ बुंदेलखंड' नामक संगठन चलाते हैं। प्रेरणा और सबक चित्रकूट के किसान कोठारी सिंह पटेल की कहानी दर्शाती है कि दृढ़ संकल्प और सही सोच से व्यक्तिगत परेशानियों को भी समाज के लिए प्रेरणा में बदला जा सकता है। • स्वास्थ्य के प्रति सजगता ही सबसे बड़ा धन: जब स्वास्थ्य खराब हुआ, तो उन्होंने दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय अपनी बुनियादी खान-पान की आदतों को सुधारा। अपनी थाली को शुद्ध रखना ही दीर्घकालिक आरोग्य का सबसे ठोस मार्ग है। • सीमित संसाधनों में समाधान खोजना: कच्ची जमीन या बड़े लॉन का इंतजार करने के बजाय उन्होंने गमलों और कंटेनरों का प्रयोग कर पक्के फर्श पर ही हरियाली उगा दी। इच्छाशक्ति हो तो जगह की कमी कभी बाधा नहीं बन सकती। • सकारात्मक बदलाव को साझा करना: खुद के जीवन में सुधार महसूस करने के बाद वे शांत नहीं बैठे, बल्कि संगठन बनाकर पूरे क्षेत्र के लोगों को जागरूक करने निकल पड़े। सच्चा विकास वही है जो पूरे समाज को साथ लेकर आगे बढ़े। https://trendkia.com/national/ghara-ki-thali-ko-kemikala-mukta-banane-ke-lie-chitrakoot-ke-kisana-ne-taiyara-kiya-shanadara-jaivika-kichana-gardana-35075 TrendKia — Har trend, sabse pehle.