गाजीपुर मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य सेवाओं और मरीज सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल, प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गरमाई बहस गाजीपुर के महर्षि विश्वामित्र स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय में मरीज के गिरने की घटना के बाद समाजसेवियों ने स्वास्थ्य सेवाओं, सुरक्षा इंतजामों और एमआरआई सुविधा पर सवाल खड़े किए हैं। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर स्थित महर्षि विश्वामित्र स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध अस्पताल में इलाज की व्यवस्थाओं और मरीजों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर तीखे सवाल खड़े होने लगे हैं। यहां आने वाले मरीजों को बेहतर और सुगम चिकित्सीय लाभ देने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों पर कई तरह के प्रश्नचिह्न लगा रही है। अस्पताल परिसर के भीतर सुरक्षा प्रबंधों की कमी और मरीजों को समय पर सही उपचार न मिलने जैसी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर चिंता का माहौल बनता जा रहा है। मरीज के गिरने की घटना से सहम गए लोग बीते 21 अक्टूबर को अस्पताल की तीसरी मंजिल पर बने एक चैंबर में एक मरीज के अचानक नीचे गिरने की दुर्घटना सामने आई थी। इस घटना के बाद से ही स्थानीय समाजसेवियों और जागरूक नागरिकों ने अस्पताल की कार्यप्रणाली पर खुलकर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। लोगों का कहना है कि कागजों पर भले ही व्यवस्थाओं को दुरुस्त बताया जाता हो, लेकिन असल में अस्पताल आने वाले मरीजों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस इंतजाम नजर नहीं आते हैं। ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अस्पताल प्रशासन की ओर से अब तक कोई पुख्ता और दीर्घकालिक योजना दिखाई नहीं दी है। निगरानी तंत्र और सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए समाजसेवी दीपक उपाध्याय ने 21 अक्टूबर की दुर्घटना का विशेष रूप से हवाला दिया और अस्पताल की निगरानी व्यवस्था को पूरी तरह विफल बताया। उनका साफ तौर पर कहना है कि केवल खानापूर्ति के लिए कभी-कभार निरीक्षण कर लेने भर से मरीजों की सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती। अस्पताल के हर कोने और अलग-अलग हिस्सों में मरीजों की आवाजाही पर पैनी नजर रखने की सख्त आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी एक कर्मचारी के कंधों पर जिम्मेदारी थोपने के बजाय पूरी व्यवस्था और प्रशासन को अपनी जवाबदेही तय करनी होगी। एमआरआई सुविधा के उद्घाटन के तुरंत बाद ठप होने का गंभीर आरोप अस्पताल में मिलने वाली अत्याधुनिक जांच सुविधाओं को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। समाजसेवी सुधांशु तिवारी ने दावा किया है कि हाल ही में अस्पताल में एमआरआई जांच की सुविधा का बड़े पैमाने पर शुभारंभ किया गया था और इसका उद्घाटन प्रदेश के उपमुख्यमंत्री द्वारा किया गया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि उनके मुताबिक यह सुविधा उद्घाटन के ठीक अगले दिन से ही बंद हो गई। इस तरह की स्थिति पर तीखा रोष व्यक्त करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि कागजों पर नई सुविधाएं शुरू करने का ढिंढोरा पीटा जाता है, जबकि आम मरीजों को उनका वास्तविक लाभ मिलना तो दूर, इन व्यवस्थाओं के नाम पर भ्रष्टाचार का खेल चल रहा है। पर्ची बनवाने और जांच प्रक्रिया में मरीजों की भारी फजीहत अस्पताल में आने वाले मरीजों को शुरुआती चरण से ही भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। समाजसेवी दीपक उपाध्याय ने इस मुद्दे को उठाते हुए बताया कि खासकर ग्रामीण इलाकों से आने वाले सीधे-साधे लोगों को यह तक समझ नहीं आता कि उन्हें किस विभाग या किस डॉक्टर के पास जाना चाहिए। अस्पताल में पंजीकरण यानी पर्ची बनवाने में ही लंबा समय बर्बाद हो जाता है। इसके बाद खून के नमूने यानी ब्लड सैंपल देने और उसकी रिपोर्ट हाथ में आने तक मरीजों को घंटों अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। इलाज और जांच के लिए मरीजों को परिसर के एक कोने से दूसरे कोने तक चक्कर काटने पड़ते हैं, जिससे उनकी शारीरिक और मानसिक परेशानी कई गुना बढ़ जाती है। भटकते मरीजों के लिए स्पष्ट दिशा-सूचक बोर्ड की दरकार मरीजों की इन परेशानियों को दूर करने के लिए अस्पताल परिसर में स्पष्ट दिशा-सूचक बोर्ड लगाने की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है। इसके अलावा मरीजों का मार्गदर्शन करने और उन्हें सही वार्ड तक पहुंचाने के लिए सहायता कर्मियों की तैनाती होनी चाहिए ताकि किसी को भी भटकना न पड़े। जांच की पूरी प्रक्रिया को इतना सुगम और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए कि साधारण से साधारण मरीज भी बिना किसी मानसिक तनाव के अपना इलाज करवा सके। वर्तमान स्थिति यह है कि प्रशासनिक उदासीनता के कारण मरीजों का यह दर्द और अधिक गहरा होता जा रहा है। गलत अंगों के इलाज संबंधी गंभीर शिकायतें और उनकी सच्चाई इलाज के दौरान गंभीर लापरवाही बरते जाने के भी संगीन आरोप सामने आए हैं। समाजसेवी दीपक उपाध्याय ने शिकायत दर्ज कराई है कि कई बार मरीजों के गलत अंगों या गलत पैर के इलाज से जुड़े मामले सामने आते हैं। कभी दाएं पैर के बजाय बाएं पैर का उपचार कर दिए जाने की बात कही जाती है, तो कभी हड्डी टूटने यानी फ्रैक्चर के मामलों में सही इलाज न मिलने से मरीज और अधिक लाचार हो जाते हैं। हालांकि, इन गंभीर आरोपों की सच्चाई जानने के लिए संबंधित मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड, इलाज करने वाले डॉक्टरों का पक्ष और अस्पताल प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया बेहद जरूरी है। जब तक निष्पक्ष जांच नहीं होती, तब तक यह साफ नहीं हो सकेगा कि तकनीकी रूप से कोई चिकित्सीय गलती हुई थी या इन शिकायतों के पीछे कोई अन्य कारण छिपा हुआ है। प्रशासन की जवाबदेही तय होने का इंतजार कुल मिलाकर 21 अक्टूबर की घटना और समाजसेवियों द्वारा उठाए गए तमाम मुद्दों ने अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं, जांच तंत्र, मरीज मार्गदर्शन और कर्मचारियों की कार्यशैली की पोल खोल दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि अस्पताल प्रशासन मरीजों की सुरक्षा को पुख्ता करने, बंद पड़ी जांच सुविधाओं को दोबारा नियमित रूप से शुरू करने और पूरी उपचार प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए आखिर क्या ठोस कदम उठा रहा है। जब तक अस्पताल प्रशासन इन तमाम शिकायतों पर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करता और जमीनी स्तर पर सुधार नजर नहीं आता, तब तक आम जनता का इस सरकारी चिकित्सा व्यवस्था से भरोसा उठना स्वाभाविक ही है। इसका आप पर असर गाजीपुर मेडिकल कॉलेज की इन व्यवस्थाओं और सुरक्षा कमियों का सीधा असर स्थानीय मरीजों और उनके परिजनों पर पड़ रहा है। • उत्तर प्रदेश में: सरकारी चिकित्सा संस्थानों में प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा मानकों के अभाव से आम जनता का भरोसा डगमगाता है। मरीजों और तीमारदारों को स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने के लिए भारी मानसिक और शारीरिक संघर्ष करना पड़ता है। • गाजीपुर में: स्थानीय निवासियों और विशेषकर ग्रामीण इलाकों से आने वाले मरीजों को इलाज, पर्ची बनवाने और जांच के लिए लंबी लाइनों में जूझना पड़ता है। सुरक्षा इंतजाम पुख्ता न होने से अस्पताल आने वाले मरीजों और उनके बुजुर्ग या लाचार परिजनों की जान का जोखिम बना रहता है। ऐसा क्यों हुआ गाजीपुर मेडिकल कॉलेज में सामने आई इन गड़बड़ियों और सुरक्षा चूकों के पीछे प्रशासनिक उदासीनता और लचर निगरानी मुख्य कारण रही है। • प्रशासनिक लापरवाही: अस्पताल के उच्च अधिकारियों द्वारा नियमित निरीक्षण न किए जाने और सुरक्षा कर्मचारियों की जवाबदेही तय न होने के कारण ऐसी दुर्घटनाएं और व्यवस्थागत खामियां जन्म लेती हैं। • संसाधनों का कुप्रबंधन: नई सुविधाओं के उद्घाटन के तुरंत बाद उनका बंद होना इस बात का संकेत है कि उद्घाटन के समय बड़े दावे तो किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर संचालन के लिए प्रशिक्षित तकनीकी स्टाफ और रखरखाव की योजना का अभाव रहता है। • मार्गदर्शन की कमी: अस्पताल परिसर में स्पष्ट साइनबोर्ड और हेल्प डेस्क न होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मरीजों को सही विभाग तक पहुंचने में कठिनाई होती है, जिससे भीड़भाड़ और अव्यवस्था बढ़ती है। सवाल-जवाब 1. गाजीपुर मेडिकल कॉलेज में कौन सी दुर्घटना हुई थी? 21 अक्टूबर को महर्षि विश्वामित्र स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध अस्पताल की तीसरी मंजिल पर बने चैंबर में एक मरीज के गिरने की घटना हुई थी। 2. अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था पर किसने सवाल उठाए हैं? समाजसेवी दीपक उपाध्याय ने अस्पताल की निगरानी व्यवस्था और मरीजों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। 3. एमआरआई सुविधा को लेकर क्या आरोप लगाया गया है? समाजसेवी सुधांशु तिवारी ने आरोप लगाया है कि एमआरआई जांच सुविधा का उद्घाटन उपमुख्यमंत्री द्वारा किए जाने के ठीक अगले दिन ही वह बंद हो गई थी। 4. मरीजों को अस्पताल में किन मुख्य परेशानियों का सामना करना पड़ता है? मरीजों को पर्ची बनवाने में लंबा समय लगने, ब्लड सैंपल देने और रिपोर्ट मिलने में इंतजार करने तथा सही विभाग तक पहुंचने में कठिनाई होती है। 5. इलाज के दौरान किस तरह की गंभीर शिकायतें सामने आई हैं? शिकायतें मिली हैं कि कभी दाएं पैर की जगह बाएं पैर का इलाज कर दिया जाता है या फ्रैक्चर से संबंधित उपचार में मरीजों को परेशानी उठानी पड़ती है। https://trendkia.com/national/ghazipur-medical-college-men-svasthya-sevaon-aura-marija-suraksha-para-uthe-gnbhira-savala-prashasana-ki-karyapranali-para-garamai-51872 TrendKia — Har trend, sabse pehle.