हल्के लड़ाकू विमानों की ताकत बढ़ाएगी ब्रह्मोस एनजी, 4300 किमी प्रति घंटा की रफ्तार और 300 किमी से ज्यादा रेंज का लक्ष्य भारत और रूस की संयुक्त परियोजना के तहत तैयार की जा रही अगली पीढ़ी की ब्रह्मोस एनजी मिसाइल मौजूदा मॉडल के मुकाबले लगभग आधी हल्की होगी, जिसे तेजस और सुखोई दोनों पर आसानी से तैनात किया जा सकेगा। भारतीय सैन्य शस्त्रागार की सबसे घातक प्रणालियों में शुमार सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल अब एक नए और अधिक संकुचित अवतार में ढलने जा रही है। भारत और रूस के संयुक्त उपक्रम ब्रह्मोस एयरोस्पेस द्वारा तैयार की जा रही अगली पीढ़ी की क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस एनजी को विशेष रूप से इस तरह रूपांकित किया जा रहा है कि यह वायुसेना के हल्के लड़ाकू विमानों की परिचालन क्षमता को कई गुना विस्तार दे सके। मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल ने अपनी अचूक मारक क्षमता और तेज गति के दम पर वैश्विक रक्षा पटल पर एक विशिष्ट पहचान बनाई है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसके प्रदर्शन ने सीमा पार के रडार नेटवर्क और वायु रक्षा प्रणालियों की सीमाओं को उजागर करते हुए सामरिक संतुलन को पूरी तरह बदल दिया था। हालांकि, उस दौर की भारी भरकम तकनीकी संरचना की अपनी कुछ सीमाएं भी थीं, जिन्हें दूर करने के लिए अब यह नया तकनीकी कदम उठाया गया है। हल्के डिजाइन की आवश्यकता और विकास की पृष्ठभूमि ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली की नींव वर्ष 1998 में रखी गई थी, जब भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ और रूस की रक्षा विनिर्माता इकाई एनपीओ मशिनोस्त्रोयेनिया के बीच एक औपचारिक समझौता हुआ था। इस साझेदारी के तहत ब्रह्मोस एयरोस्पेस का गठन किया गया, जिसने जल और थल दोनों मोर्चों पर सटीक प्रहार करने में सक्षम क्रूज मिसाइल का खाका तैयार किया। इस रक्षा प्रणाली का पहला सफल परीक्षण वर्ष 2001 में संपन्न हुआ था। शुरुआती परीक्षणों की सफलता के बाद इसके विविध स्वरूपों को भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बेड़े में चरणबद्ध तरीके से शामिल किया गया। वर्तमान समय में सेवा में मौजूद पारंपरिक ब्रह्मोस मिसाइल लगभग मच 2.8 की सुपरसोनिक गति से लक्ष्य की ओर बढ़ती है। थल और जल आधारित लक्ष्यों पर यह अचूक वार करने की क्षमता रखती है, परंतु इसका विशाल आकार और भारी वजन इसे हर लड़ाकू विमान के लिए उपयुक्त नहीं रहने देता। वायु सेना के बेड़े में शामिल स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान तेजस जैसे छोटे फाइटर जेट के लिए इतनी वजनी मिसाइल को अपने पंखों पर ढोना तकनीकी रूप से संभव नहीं था। यही वजह है कि ब्रह्मोस एनजी परियोजना की शुरुआत की गई, ताकि उन्नत नोदन प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा और व्यापक स्वदेशी तकनीकों के मेल से एक कॉम्पैक्ट हथियार तैयार किया जा सके। भविष्य में इस परिष्कृत संस्करण को लड़ाकू विमानों, नौसैनिक युद्धपोतों, पनडुब्बियों और जमीन पर तैनात सचल प्रणालियों से संचालित करने की योजना बनाई गई है। आकार और भार में रणनीतिक कटौती ब्रह्मोस एनजी का सबसे निर्णायक पहलू इसका नाटकीय रूप से घटाया गया भार है। मौजूदा समय में तैनात ब्रह्मोस का कुल वजन लगभग 2.9 से तीन टन के बीच बैठता है। इतना अधिक वजन किसी भी लड़ाकू विमान की हथियार ले जाने की समग्र क्षमता को अत्यधिक सीमित कर देता है। इसके विपरीत, सितंबर 2025 में रूसी समाचार एजेंसी तास के विवरण के मुताबिक, नई ब्रह्मोस एनजी का वजन घटाकर लगभग 1.29 टन तक सीमित रखने की रूपरेखा तैयार की गई है। इससे पहले सामने आए तकनीकी आकलनों में इसका वजन करीब 1.6 टन और कुल लंबाई लगभग 6 मीटर आंकी गई थी। इन बदलते आंकड़ों से स्पष्ट संकेत मिलता है कि निरंतर विकास और परीक्षण प्रक्रियाओं के दौरान मिसाइल के मूल ढांचे में कई संरचनात्मक सुधार किए गए हैं, हालांकि इस पर आधिकारिक मुहर लगना अभी शेष है। वजन में आई इस भारी कमी का सीधा लाभ यह होगा कि छोटे और मध्यम श्रेणी के युद्धक विमान भी इसे सहजता से वहन कर सकेंगे। इसके अलावा, भारी लड़ाकू विमान उपयुक्त तकनीकी समायोजन के उपरांत अपने विंग्स पर एक से अधिक मिसाइलें तैनात करने में सक्षम हो जाएंगे। प्रणोदन प्रणाली और मच 3.5 की मारक गति गति और दूरी के मोर्चे पर भी नई मिसाइल को अभूतपूर्व स्तर पर ले जाने की तैयारी है। तकनीकी अनुमानों के अनुसार, ब्रह्मोस एनजी की अधिकतम रफ्तार मच 3.5 तक पहुंच सकती है, जो जमीन पर लगभग 4300 किलोमीटर प्रति घंटा के बराबर है। इतनी भीषण रफ्तार से उड़ान भरने वाला अस्त्र किसी भी आधुनिक मिसाइल रोधी प्रणाली जैसे थाड या आयरन डोम के प्रतिक्रिया समय को बेहद संकुचित कर देता है। मौजूदा ब्रह्मोस के प्रोपल्शन ढांचे में आरंभिक चरण के दौरान ठोस ईंधन से चलने वाला एक बूस्टर मिसाइल को सुपरसोनिक रफ्तार प्रदान करता है। निर्धारित वेग प्राप्त होते ही यह बूस्टर अलग हो जाता है और तरल ईंधन आधारित रैमजेट इंजन सक्रिय होकर पूरी उड़ान के दौरान सुपरसोनिक गति को बनाए रखता है। ब्रह्मोस एनजी में भी निरंतर उच्च गति बनाए रखने के लिए उन्नत नोदन समाधानों को समाहित किया जा रहा है। मारक दूरी की बात करें तो पहले इसके लगभग 290 किलोमीटर होने के अनुमान व्यक्त किए गए थे, लेकिन सितंबर 2025 में तास की सूचना में इसकी प्रहारक सीमा के 300 किलोमीटर से अधिक होने की प्रबल संभावना जताई गई है। विमान एकीकरण: सुखोई से तेजस तक का विस्तार इस नई मिसाइल के निर्माण का मुख्य सामरिक ध्येय इसे अधिकतम लड़ाकू विमानों के अनुकूल बनाना है। अब तक ब्रह्मोस का हवाई संस्करण केवल भारी सुखोई-30एमकेआई लड़ाकू विमानों के साथ ही एकीकृत किया जा सका है, क्योंकि इसका वजन अन्य विमानों के लिए अत्यधिक था। भारतीय वायुसेना के संदर्भ में, दिसंबर 2021 में रक्षा मंत्रालय ने ओडिशा के तटीय क्षेत्र में सुखोई-30एमकेआई से इस हवाई मिसाइल के सफल प्रक्षेपण की औपचारिक जानकारी साझा की थी। उस परीक्षण ने भारी लड़ाकू विमान और इस भारी मिसाइल के तालमेल को पूरी तरह सिद्ध कर दिया था। इसके बावजूद, वर्तमान मिसाइल के आकार के कारण वायुसेना इसे बहुत सीमित संख्या में ही तैनात कर पाती है। ब्रह्मोस एनजी के तैयार होने से स्वदेशी फाइटर जेट तेजस को लंबी दूरी के सटीक मिसाइल प्रहार की क्षमता हासिल होगी। हल्के लड़ाकू विमान तेजस के साथ सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का यह एकीकरण भारतीय वायुसेना की अग्रिम पंक्ति की आक्रामक ताकत को एक नया तकनीकी आयाम प्रदान करेगा। इसका आप पर असर हल्की और तेज ब्रह्मोस एनजी मिसाइल का विकास भारत की सीमाओं की सुरक्षा और रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को सीधे तौर पर मजबूती देता है। • राष्ट्रीय सुरक्षा स्तर पर: वायुसेना की लंबी दूरी की सटीक प्रहार क्षमता में भारी इजाफा होगा, जिससे सीमा पार के रणनीतिक लक्ष्यों को सुरक्षित दूरी से निशाना बनाया जा सकेगा। यह बदलाव देश की समग्र प्रतिरोधक क्षमता को और अधिक आक्रामक और मजबूत बनाता है। • रक्षा उद्योग और नौकरियों के लिए: मिसाइल में स्वदेशी घटकों का अनुपात बढ़ने से घरेलू रक्षा निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा। इससे भारतीय तकनीकी कंपनियों, अनुसंधान संस्थानों और एरोस्पेस विनिर्माण में कुशल रोजगार के अवसर पैदा होंगे। • हल्के लड़ाकू विमान तेजस के लिए: स्वदेशी तेजस जेट को पहली बार एक घातक लंबी दूरी का सुपरसोनिक क्रूज अस्त्र प्राप्त होगा। इससे भारतीय वैमानिकी कार्यक्रम की वैश्विक साख बढ़ेगी और भविष्य के रक्षा निर्यात को मजबूती मिलेगी। • करदाताओं के संसाधनों के उपयोग पर: आयातित रक्षा प्रणालियों पर निर्भरता घटने से विदेशी मुद्रा की बचत होगी। संयुक्त उत्पादन और निर्यात संभावनाओं से सरकारी खजाने को अतिरिक्त राजस्व लाभ मिल सकेगा। ऐसा क्यों हुआ मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल के अत्यधिक वजन और आकार ने इसे केवल भारी लड़ाकू विमानों तक सीमित कर दिया था, जिसके चलते हल्के विमानों के लिए एक कॉम्पैक्ट संस्करण विकसित करना अनिवार्य हो गया। • वजन की तकनीकी बाधा: मौजूदा मिसाइल का वजन करीब 2.9 से 3 टन है, जिसे केवल भारी सुखोई-30एमकेआई जैसे विमान ही वहन कर सकते हैं। हल्के विमानों पर इसे तैनात न कर पाने की इसी बाधा ने नए हल्के संस्करण के निर्माण की राह खोली। • तेजस को लंबी दूरी की मारक क्षमता देने का लक्ष्य: स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान तेजस के पास लंबी दूरी के सुपरसोनिक स्ट्राइक विकल्प का अभाव था। ब्रह्मोस एनजी के जरिए तेजस को 300 किमी से अधिक दूरी तक हमला करने वाला हथियार प्रदान करने की योजना है। • आधुनिक एयर डिफेंस को भेदने की जरूरत: आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों की तेज प्रतिक्रिया गति को मात देने के लिए मच 3.5 की गति और कम रडार पकड़ वाला डिजाइन तैयार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य किसी भी परिष्कृत सुरक्षा चक्रव्यूह को चकमा देकर सटीक प्रहार करना है। • संयुक्त उद्यम का साझा तकनीकी विस्तार: डीआरडीओ और रूसी एनपीओ मशिनोस्त्रोयेनिया के 1998 के समझौते के तहत दोनों देश अपनी स्थापित ब्रह्मोस तकनीक को आधुनिक सामरिक जरूरतों के अनुरूप अपग्रेड कर रहे हैं। 2001 के पहले परीक्षण के बाद अब अगली पीढ़ी के प्लेटफॉर्म की दिशा में यह स्वाभाविक तकनीकी प्रगति है। सवाल-जवाब 1. ब्रह्मोस एनजी मिसाइल का वजन कितना रखने की योजना है? सितंबर 2025 के आकलनों के अनुसार इसका वजन लगभग 1.29 टन रखने की योजना है, जबकि पूर्व अनुमानों में इसे 1.6 टन बताया गया था। 2. मौजूदा ब्रह्मोस और ब्रह्मोस एनजी के वजन में क्या अंतर है? मौजूदा ब्रह्मोस का वजन लगभग 2.9 से तीन टन है, जबकि नई ब्रह्मोस एनजी का वजन घटकर लगभग 1.29 टन होने का अनुमान है। 3. ब्रह्मोस एनजी की अनुमानित रफ्तार और रेंज कितनी होगी? इसकी गति मच 3.5 तक यानी लगभग 4300 किलोमीटर प्रति घंटा और मारक क्षमता 300 किलोमीटर से अधिक रहने का लक्ष्य है। 4. ब्रह्मोस एयरोस्पेस की स्थापना कब और किनके बीच हुई थी? इसकी स्थापना 1998 में भारत के डीआरडीओ और रूस की एनपीओ मशिनोस्त्रोयेनिया के बीच हुए समझौते के तहत हुई थी, जिसका पहला परीक्षण 2001 में हुआ था। 5. वर्तमान में ब्रह्मोस का हवाई संस्करण किस लड़ाकू विमान में तैनात है? मौजूदा हवाई संस्करण केवल सुखोई-30एमकेआई लड़ाकू विमान में ही एकीकृत है, जिसका सफल परीक्षण दिसंबर 2021 में ओडिशा तट के पास किया गया था। 6. ब्रह्मोस एनजी को किन नए विमानों और प्लेटफॉर्मों पर तैनात किया जाएगा? इसे स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान तेजस सहित लड़ाकू विमानों, युद्धपोतों, पनडुब्बियों और जमीन आधारित प्रणालियों से इस्तेमाल करने की योजना है। https://trendkia.com/national/halke-laraku-vimanon-ki-takata-barhaegi-brahmos-ng-4300-kimi-prati-ghnta-ki-raphtara-aura-300-kimi-se-jyada-renja-ka-lakshya-46808 TrendKia — Har trend, sabse pehle.