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  "type": "article",
  "title": "हवाई सुरक्षा के घटते बेड़े के बीच पांचवीं पीढ़ी के रूसी लड़ाकू जेट का नया विकल्प",
  "summary": "भारतीय वायुसेना में लड़ाकू स्क्वाड्रन की घटती संख्या और सीमा पार पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ विमानों के बढ़ते प्रभाव के बीच रूस ने Su-57E फाइटर जेट की संयुक्त उत्पादन साझेदारी का प्रस्ताव आगे बढ़ाया है।",
  "content": "भारतीय वायुसेना के लड़ाकू बेड़े की क्षमता और भविष्य की सुरक्षा प्राथमिकताओं को लेकर सामरिक गलियारों में विमर्श गहरा गया है। एक तरफ वायुसेना के स्वीकृत लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या में लगातार कमी देखने को मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय सीमा के दोनों ओर पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमानों की उपस्थिति तेजी से मजबूत हो रही है। इस रणनीतिक अंतर को पाटने के लिए रूस ने अपने अत्याधुनिक पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान Su-57E को एक व्यावहारिक समाधान के रूप में प्रस्तुत किया है। सुरक्षा हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या मौजूदा समय में केवल 4.5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों पर निर्भर रहकर आधुनिक हवाई युद्धक्षेत्र में तकनीकी बढ़त बरकरार रखी जा सकती है।\n\nस्क्वाड्रन संख्या का संकट और हवाई संतुलन की चुनौती\nभारतीय वायुसेना की कार्यप्रणाली के लिए स्वीकृत क्षमता 42 स्क्वाड्रन की तय की गई है। इसके विपरीत, वर्तमान समय में वायुसेना केवल 29 सक्रिय लड़ाकू स्क्वाड्रन के साथ परिचालन कर रही है। यह संख्यात्मक अंतर इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश की वायु रक्षा प्रणाली अपनी पूर्ण निर्धारित क्षमता से काफी नीचे काम करने को विवश है। पुराने पड़ चुके लड़ाकू विमानों के सेवामुक्त होने और नए विमानों के शामिल होने की धीमी रफ्तार ने इस अंतर को और संवेदनशील बना दिया है।\n\nइस स्थिति के कारण वायुसेना के रणनीतिकारों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। एक ओर वायुसेना को अपने लड़ाकू बेड़े की कुल संख्या में इजाफा करना है ताकि किसी भी बहुआयामी खतरे का सामना किया जा सके, वहीं दूसरी ओर उसे भविष्य के आधुनिक युद्ध की आवश्यकताओं के अनुरूप उन्नत रडार, स्टील्थ बनावट और दूर तक मार करने वाली हथियार प्रणालियों से लैस विमान भी हासिल करने हैं। रणनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि केवल चौथी या 4.5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ा लेने मात्र से पांचवीं पीढ़ी के उन्नत स्टील्थ विमानों से पैदा होने वाली सामरिक चुनौतियों का समुचित मुकाबला नहीं किया जा सकता।\n\nक्षेत्रीय हवाई सीमा पर पांचवीं पीढ़ी के विमानों का बढ़ता घेरा\nभारत के उत्तरी और पूर्वी मोर्चे पर चीन अपने पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के बेड़े का तेजी से विस्तार कर रहा है। चीनी वायुसेना अपने J-20 स्टील्थ लड़ाकू विमानों की कई इकाइयों को अग्रिम मोर्चों पर तैनात कर चुकी है। इसके साथ ही, चीन अपने नए J-35 स्टील्थ विमान को भी सक्रिय सैन्य उपयोग और व्यापक उत्पादन के लिए तैयार कर रहा है। यह तकनीकी पहल केवल थल आधारित हवाई क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि चीन अपने नए विमानवाहक पोत फुजियान के जरिए नौसैनिक विमानन विंग में भी पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमानों को तैनात करने की योजना पर आगे बढ़ रहा है।\n\nपश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान ने भी अपनी वायुसेना के लिए चीन से J-35 स्टील्थ विमान हासिल करने की दिशा में सहयोग और साझा समझ बनाई है। इस तरह के घटनाक्रम से भारत के सामने दोनों तरफ से पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की चुनौती उत्पन्न होने का खतरा बन गया है। उन्नत स्टील्थ आवरण, अगली पीढ़ी के सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक स्कैन रडार और अत्यंत लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों से लैस विमानों के मुकाबले पारंपरिक लड़ाकू विमानों की संख्यात्मक बढ़त हमेशा निर्णायक परिणाम नहीं दे सकती। यही कारण है कि हवाई सुरक्षा विशेषज्ञों का एक वर्ग भारतीय वायुसेना में जल्द से जल्द पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ विमानों को शामिल करने की प्रक्रिया को तेज करने की वकालत कर रहा है।\n\nसीधे खरीद और बड़े पैमाने पर घरेलू उत्पादन का रूसी प्रस्ताव\nरूसी रक्षा जगत ने भारत की इस परिचालन आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए Su-57E लड़ाकू विमान का प्रस्ताव सामने रखा है। इस सुझाव के तहत एक चरणबद्ध योजना की बात कही गई है, जिसके अंतर्गत प्रारंभिक चरण में लगभग 50 Su-57E लड़ाकू विमानों को सीधे खरीदा जा सकता है। इसके बाद दूसरे चरण में औद्योगिक साझेदारी के तहत भारत के भीतर ही लाइसेंस व्यवस्था के जरिए करीब 450 विमानों के विनिर्माण का विकल्प उपलब्ध कराने का खाका पेश किया गया है।\n\nयह प्रस्ताव केवल तैयार लड़ाकू विमान बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे भारत के घरेलू रक्षा विनिर्माण और औद्योगिक तकनीक हस्तांतरण से जोड़ने की योजना बताई गई है। रूसी पक्ष का तर्क है कि भारत लंबे समय से Su-30MKI का घरेलू स्तर पर लाइसेंस उत्पादन और तकनीकी रख-रखाव सफलतापूर्वक कर रहा है। चूंकि Su-57 का डिजाइन और विकास भी उसी डिजाइन ब्यूरो की देखरेख में हुआ है जिसने Su-30MKI को तैयार किया था, इसलिए भारत के मौजूदा एयरोस्पेस बुनियादी ढांचे, पायलट प्रशिक्षण सुविधाओं और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को Su-57E के संचालन में सीधे इस्तेमाल में लाया जा सकता है। हालांकि, 50 विमानों की सीधी खरीद और 450 विमानों के घरेलू उत्पादन से जुड़ी यह रूपरेखा रूसी रक्षा मीडिया में रखा गया एक प्रारंभिक सुझाव है, जिसे भारत सरकार या भारतीय वायुसेना की तरफ से आधिकारिक रूप से स्वीकृत योजना नहीं माना जा सकता।\n\nस्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान का समय चक्र\nभारत अपने स्तर पर पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की दीर्घकालिक आवश्यकता पूरी करने के लिए स्वदेशी उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान यानी Advanced Medium Combat Aircraft (AMCA) परियोजना पर काम कर रहा है। यह महत्वाकांक्षी रक्षा कार्यक्रम देश की भविष्य की सामरिक सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन इसे पूरी तरह तैयार होकर लड़ाकू भूमिका में उतरने के लिए एक लंबा समय अपेक्षित है।\n\nवर्तमान समयसीमा और विकास लक्ष्यों के अनुसार, AMCA के प्रोटोटाइप की पहली परीक्षण उड़ान वर्ष 2028-29 के आसपास आयोजित करने का लक्ष्य रखा गया है। परीक्षणों की पूरी प्रक्रिया संपन्न होने के बाद इस विमान का बड़े पैमाने पर विनिर्माण शुरू होने और वायुसेना के लड़ाकू स्क्वाड्रनों में शामिल किए जाने की प्रक्रिया वर्ष 2035 के बाद ही जमीन पर उतर सकती है। समय के इसी लंबे अंतर को ध्यान में रखते हुए रूसी रक्षा विश्लेषक Su-57E के पक्ष में दलील दे रहे हैं। उनका कहना है कि स्वदेशी AMCA के पूरी तरह तैयार होने से पहले के इस दौर में सुरक्षा अंतराल को पाटने के लिए एक अंतरिम पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ विमान की सख्त जरूरत पड़ सकती है।\n\nघरेलू लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में तकनीकी रुकावटें\nभारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान विनिर्माण के मौजूदा रास्ते में कई परिचालन और तकनीकी अड़चनें सामने आई हैं। स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान तेजस Mk1A के उत्पादन में तेजी लाने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन प्रमुख प्रणोदन प्रणालियों और महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक घटकों की आपूर्ति में होने वाली देरी ने विमानों के निर्माण की रफ्तार को प्रभावित किया है।\n\nतेजस कार्यक्रम को अमेरिकी कंपनी GE से मिलने वाले F404 जेट इंजनों की आपूर्ति में विलंब और इजरायली मूल के AESA रडार के एकीकरण से जुड़ी तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इन बाधाओं से यह स्थिति भी सामने आई है कि स्वदेशी विमान ढांचे का विकास करने के बावजूद देश को इंजन और आधुनिक सेंसर जैसी अहम तकनीकों के लिए विदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर रहना पड़ रहा है।\n\nइसके अतिरिक्त, विमानवाहक पोतों से संचालन के उद्देश्य से तैयार किए गए तेजस के नौसैनिक प्रोटोटाइप को नौसेना की कठिन परिचालन कसौटियों के अनुकूल नहीं पाया गया। इसके परिणामस्वरूप भारत को दो इंजनों वाले विशेष डेक-आधारित लड़ाकू विमान Twin Engine Deck Based Fighter (TEDBF) के नए कार्यक्रम पर आगे बढ़ना पड़ा है। इस नए नौसैनिक कार्यक्रम के कारण भारतीय नौसेना के लिए स्वदेशी वाहक-सक्षम लड़ाकू जेट हासिल करने की समयसीमा भी आगे खिसक गई है।\n\nइन परिस्थितियों के बीच भारत की रक्षा योजना केवल एक नए लड़ाकू विमान के चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता की दिशा में चल रहे घरेलू कार्यक्रमों को समर्थन देने और वर्तमान समय में सीमाओं पर मंडरा रहे सामरिक असंतुलन को रोकने के बीच एक सटीक संतुलन साधने की पेचीदा चुनौती बन गई है।\n\nइसका आप पर असर\nहवाई सुरक्षा और लड़ाकू विमानों की क्षमता से जुड़े इस विमर्श का सीधा असर देश की राष्ट्रीय रक्षा प्राथमिकताओं, वित्तीय आवंटन और एयरोस्पेस विनिर्माण क्षेत्र पर पड़ेगा।\n\n• भारत में: रक्षा बजट के आवंटन में लड़ाकू विमानों की खरीद को प्राथमिकता दी जा सकती है। इससे करदाताओं के धन का एक बड़ा हिस्सा त्वरित रक्षा सौदों और घरेलू विनिर्माण बुनियादी ढांचे की ओर निर्देशित हो सकता है।\n• घरेलू एयरोस्पेस उद्योग: यदि बड़े पैमाने पर स्थानीय उत्पादन का मॉडल अपनाया जाता है, तो भारतीय विनिर्माण इकाइयों को नई तकनीक और रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। इसके विपरीत, प्रत्यक्ष विदेशी खरीद से रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में विदेशी निर्भरता का दायरा बढ़ सकता है।\n• सीमा सुरक्षा: वायुसेना की परिचालन क्षमता सीधे तौर पर क्षेत्रीय स्थिरता और सीमाओं पर संभावित हवाई खतरों की रोकथाम से जुड़ी है। स्टील्थ विमानों की समय पर तैनाती से दोनों सीमाओं पर रणनीतिक संतुलन मजबूत बना रहेगा।\n• स्वदेशी विकास परियोजनाएं: अंतरिम विदेशी विमान खरीदने का निर्णय स्वदेशी AMCA परियोजना के लिए उपलब्ध संसाधनों और प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकता है। इससे घरेलू वैज्ञानिक संस्थानों पर समयसीमा का दबाव भी बढ़ सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nभारतीय वायुसेना के लड़ाकू बेड़े में उत्पन्न संख्यात्मक कमी और सीमावर्ती क्षेत्रों में पांचवीं पीढ़ी के विमानों की तेज तैनाती के कारण यह रणनीतिक विमर्श शुरू हुआ है।\n\n• स्वीकृत क्षमता में गिरावट: वायुसेना के पास स्वीकृत 42 स्क्वाड्रन की तुलना में वर्तमान में केवल 29 स्क्वाड्रन मौजूद हैं। पुराने पड़ चुके लड़ाकू विमानों के लगातार रिटायर होने और नए विमानों के धीमे आगमन से यह संख्यात्मक अंतर पैदा हुआ है।\n• क्षेत्रीय स्टील्थ विस्तार: चीन द्वारा J-20 की सक्रिय तैनाती और J-35 का विकास करने के साथ-साथ पाकिस्तान द्वारा J-35 में रुचि दिखाने से नई चुनौती खड़ी हो गई है। दोनों सीमाओं पर उन्नत स्टील्थ विमानों के आगमन ने पारंपरिक विमानों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए हैं।\n• स्वदेशी परियोजनाओं की समयसीमा: भारत के स्वदेशी AMCA कार्यक्रम की पहली उड़ान 2028-29 और बड़े पैमाने पर शामिल होना 2035 के बाद संभावित है। इसके अलावा तेजस Mk1A में इंजन आपूर्ति और रडार एकीकरण में आई देरी ने इस अंतर को भरने के लिए त्वरित विकल्प तलाशने पर विमर्श शुरू किया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. भारतीय वायुसेना के पास इस समय कितने लड़ाकू स्क्वाड्रन सक्रिय हैं?\nभारतीय वायुसेना के पास वर्तमान में 29 लड़ाकू स्क्वाड्रन सक्रिय हैं, जबकि इसकी स्वीकृत जरूरत 42 स्क्वाड्रन की है।\n\n2. रूसी रक्षा विश्लेषकों ने Su-57E को लेकर क्या खाका पेश किया है?\nप्रस्ताव के तहत पहले चरण में 50 विमानों की सीधी खरीद और बाद में भारत में लाइसेंस के तहत 450 विमानों के निर्माण का सुझाव दिया गया है।\n\n3. भारत का स्वदेशी AMCA लड़ाकू विमान कब तक तैयार होने की उम्मीद है?\nस्वदेशी AMCA के प्रोटोटाइप की पहली उड़ान 2028-29 के आसपास लक्षित है, जबकि वायुसेना में बड़े पैमाने पर इसकी तैनाती 2035 के बाद संभावित है।\n\n4. तेजस Mk1A कार्यक्रम में किस कारण से देरी दर्ज की गई है?\nतेजस Mk1A के उत्पादन में अमेरिकी कंपनी GE से मिलने वाले F404 इंजन की आपूर्ति और इजरायली AESA रडार एकीकरण की अड़चनों से देरी हुई है।\n\n5. क्षेत्रीय सीमाओं पर पांचवीं पीढ़ी के कौन से लड़ाकू विमान मौजूद हैं?\nचीन J-20 विमानों का संचालन कर रहा है और J-35 को आगे बढ़ा रहा है, जबकि पाकिस्तान भी चीन से J-35 हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।",
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