भारत और नेपाल सीमा के दसगजा क्षेत्र में अतिक्रमण चिन्हित करने के लिए शुरू होगा व्यापक ड्रोन सर्वे भारत और नेपाल ने अपनी 1,880 किलोमीटर लंबी सीमा पर दसगजा पट्टी और सीमा पार जमीन के अनधिकृत उपयोग की पहचान के लिए संयुक्त ड्रोन मैपिंग कराने का फैसला किया है। भारत और नेपाल ने अपनी 1,880 किलोमीटर लंबी खुली अंतरराष्ट्रीय सीमा पर वर्षों से चले आ रहे भूमि अतिक्रमण के मामलों को सुलझाने के लिए एक आधुनिक तकनीकी पहल शुरू की है। दोनों देशों के बीच सीमा प्रबंधन को लेकर बनी सहमति के तहत नो-मैंस लैंड यानी 'दसगजा' क्षेत्रों में अतिक्रमण की सटीक पहचान के लिए ड्रोन मैपिंग का सहारा लिया जाएगा। दसगजा अंतर्राष्ट्रीय सीमा के दोनों किनारों पर छोड़ी जाने वाली लगभग 10 गज चौड़ी एक विशेष पट्टी होती है, जहाँ नियमानुसार किसी भी प्रकार का स्थायी निर्माण, कृषि कार्य या अनधिकृत कब्जा पूरी तरह प्रतिबंधित होता है। हालांकि, लंबे समय से खुली सीमा होने के कारण इस पट्टी के आसपास दोनों ओर के नागरिकों द्वारा कृषि गतिविधियों और निर्माण कार्यों के माध्यम से सीमा का अतिक्रमण किया जाता रहा है। अब ड्रोन के ज़रिए न केवल दसगजा पट्टी की वास्तविक स्थिति की डिजिटल मैपिंग होगी, बल्कि उन सभी इलाकों को भी तकनीकी रूप से चिन्हित किया जाएगा जहाँ एक देश के नागरिक दूसरे देश की सीमा में प्रवेश कर जमीन पर खेती कर रहे हैं या किसी अन्य रूप में उसका इस्तेमाल कर रहे हैं। ड्रोन तकनीक से तैयार होगा प्रामाणिक तकनीकी रिकॉर्ड सीमा पर अतिक्रमण की सही स्थिति जानने के लिए ड्रोन सर्वेक्षण कराने का निर्णय दोनों देशों के तकनीकी और प्रशासनिक अधिकारियों की उच्चस्तरीय बैठकों में लिया गया। इस रणनीति की रूपरेखा भारत और नेपाल के सर्वे अधिकारियों की संयुक्त समिति की 13वीं बैठक में तैयार की गई थी, जिसका आयोजन लखनऊ में हुआ था। इसके बाद इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए 20 से 21 अगस्त 2026 को भारत के देहरादून शहर में 'भारत-नेपाल संयुक्त कार्य समूह' (JWG) की 14वीं बैठक का आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण बैठक में नेपाली प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई नेपाल सरकार के गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव आनंद काफले ने की। यह बैठक बेहद सौहार्दपूर्ण और सकारात्मक माहौल में संपन्न हुई, जिसमें सीमा प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। अधिकारियों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, ड्रोन मैपिंग से प्राप्त उच्च गुणवत्ता वाले डिजिटल आंकड़ों और चित्रों के आधार पर प्रभावित सीमावर्ती इलाकों का एक संयुक्त और तकनीकी रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। यह तकनीकी दस्तावेज भविष्य में दोनों देशों के राजनयिकों और अधिकारियों के लिए एक प्रामाणिक आधार के रूप में कार्य करेगा। जब दोनों पक्ष मेज पर बैठेंगे, तो इस रिकॉर्ड की मदद से यह तय करना आसान होगा कि विवादित जमीन से अवैध कब्जे किस प्रकार हटाए जाएं, मूल भूमि स्वामी देश को उसकी जमीन कैसे वापस सौंपी जाए या आवश्यकता पड़ने पर प्रभावित पक्षों के लिए मुआवजे का क्या ढांचा तैयार किया जाए। सीमा विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर दशकों से लंबित पड़े छोटे-छोटे भूमि विवादों को सुलझाने में यह वैज्ञानिक तरीका मील का पत्थर साबित हो सकता है। प्रधानमंत्री बालेन शाह का बयान और राजनीतिक पृष्ठभूमि ड्रोन मैपिंग का यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है जब नेपाल में सीमा अतिक्रमण का मुद्दा एक बार फिर गर्म राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गया था। इस विवाद की शुरुआत नेपाल में प्रधानमंत्री बालेन शाह द्वारा मई महीने में नेपाल की संसद के भीतर दिए गए एक बयान से हुई थी। संसद सत्र के दौरान जब बालेन शाह से भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से विवादित रहे लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी क्षेत्रों के संबंध में प्रश्न पूछे गए थे, तब उन्होंने उत्तर देते हुए कहा था कि नेपाल के नागरिकों ने भी भारतीय क्षेत्र की भूमि पर अतिक्रमण किया हुआ है। ज्ञात हो कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर नेपाल आधिकारिक रूप से अपना दावा प्रस्तुत करता है, जबकि भारत इन क्षेत्रों को निर्विवाद रूप से अपना अभिन्न अंग मानता है। संसद में दिए गए इस बयान के बाद नेपाल के भीतर राजनीतिक हलचल तेज हो गई थी और विपक्षी दलों ने बालेन शाह के मंतव्य पर तीखे सवाल उठाए थे। स्थिति को स्पष्ट करने के लिए नेपाल के विदेश मंत्रालय को आधिकारिक सफाई जारी करनी पड़ी थी। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री का बयान लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी जैसे प्रमुख विवादित सीमा क्षेत्रों के संदर्भ में नहीं था, बल्कि उनका तात्पर्य सीमा रेखा पर स्थित दसगजा पट्टी और उसके आसपास दोनों देशों के नागरिकों द्वारा एक-दूसरे की जमीन के अनधिकृत इस्तेमाल से जुड़े मामलों पर था। सरकार के इस स्पष्टीकरण और अब ड्रोन मैपिंग के व्यावहारिक कदम ने इस संवेदनशील मुद्दे को एक पारदर्शी और तकनीकी समाधान की दिशा प्रदान की है। क्रॉस-बॉर्डर लैंड ग्रैबिंग और जमीनी अध्ययन के आंकड़े भारत-नेपाल सीमा पर भूमि के अनधिकृत उपयोग की गंभीरता को रेखांकित करते हुए नेपाल के सर्वे विभाग के प्रवक्ता दयानंद जोशी ने पुष्टि की है कि ड्रोन सर्वेक्षण के माध्यम से दसगजा क्षेत्र में हुए सभी प्रकार के अतिक्रमण और सीमा पार जमीन के उपयोग की व्यापक मैपिंग की जाएगी। इस कदम को सीमा प्रबंधन के क्षेत्र में एक व्यावहारिक और निर्णायक पहल माना जा रहा है। दूसरी ओर, सीमा मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ और नेपाल के सर्वे विभाग के पूर्व महानिदेशक बुद्धि नारायण श्रेष्ठ ने सीमा पर स्थित इस परिस्थिति को 'क्रॉस-बॉर्डर लैंड ग्रैबिंग' की संज्ञा दी है। उनके अनुसार, खुली सीमा का लाभ उठाकर दोनों ओर के स्थानीय निवासी एक-दूसरे की भौगोलिक सीमाओं में प्रवेश कर जमीन पर कब्जा जमा लेते हैं। कुछ स्थानों पर भारतीय किसानों ने नेपाली क्षेत्र की भूमि का उपयोग खेती के लिए किया है, तो कई अन्य स्थानों पर नेपाली किसानों द्वारा भारतीय क्षेत्र की जमीन पर कब्जा करने के मामले दर्ज किए गए हैं। बुद्धि नारायण श्रेष्ठ द्वारा वर्ष 2005 में किए गए एक विस्तृत फील्ड अध्ययन के आंकड़े इस समस्या की गहराई को उजागर करते हैं। उनके 2005 के जमीनी सर्वेक्षण में ऐसे 84 विशिष्ट स्थानों की पहचान की गई थी जहाँ भारतीय किसानों ने नेपाली जमीन पर अतिक्रमण किया हुआ था। वहीं इसी अध्ययन में 27 ऐसे स्थान भी पाए गए थे जहाँ नेपाली किसानों ने भारतीय भूमि पर अनधिकृत कब्जा जमाया हुआ था। ये आंकड़े यह दर्शाते हैं कि सीमा पार भूमि अतिक्रमण की समस्या एकतरफा न होकर दोनों पक्षों से जुड़ी हुई है और इसके स्थायी समाधान के लिए निष्पक्ष तकनीकी साक्ष्यों की आवश्यकता है। सीमा स्तंभों की कमी और 1,880 किमी खुली सीमा की चुनौतियां सीमा पर भूमि को लेकर पैदा होने वाले इन स्थानीय विवादों के पीछे कई मूलभूत और तकनीकी कारण जिम्मेदार हैं। सीमा विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि अंतरराष्ट्रीय सीमा को चिन्हित करने वाले सीमा स्तंभों का गायब होना, क्षतिग्रस्त होना या स्थानीय स्तर पर नापी में हुई गलतियां इन विवादों का मुख्य कारण रही हैं। आधिकारिक नक्शों और दस्तावेजों के अनुसार, भारत और नेपाल की 1,880 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कुल 8,553 सीमा स्तंभ दर्ज किए गए हैं। हालांकि, चिंताजनक तथ्य यह है कि इन दर्ज 8,553 सीमा स्तंभों में से लगभग 42 फीसदी स्तंभ अब भी धरातल पर लगाए जाने बाकी हैं या गायब हो चुके हैं। सीमा स्तंभों की इतनी बड़ी संख्या में अनुपस्थिति और 1,880 किलोमीटर लंबी सीमा के पूरी तरह खुले होने के कारण सीमावर्ती गांवों में रहने वाले किसानों के लिए अपनी-अपनी सीमाओं का सटीक निर्धारण करना अत्यंत कठिन हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप जाने-अनजाने में कृषि भूमि की सीमाएं आपस में उलझ जाती हैं। ऐसे परिदृश्य में ड्रोन मैपिंग तकनीक दोनों देशों के प्रशासन को धरातल की वास्तविक स्थिति का सटीक और डिजिटल चित्रण प्रदान करेगी। यदि दोनों देशों के तकनीकी अधिकारी संयुक्त सर्वेक्षण के आधार पर एक सर्वमान्य रिकॉर्ड तैयार करने में सफल रहते हैं, तो उच्च स्तरीय बैठकों के दौरान दशकों पुराने सीमा विवादों का स्थायी समाधान निकाला जा सकेगा, चाहे उसमें अतिक्रमण हटाना हो, जमीन की बहाली हो या उचित मुआवजे का निर्धारण हो। इसका आप पर असर भारत में: सीमावर्ती राज्यों के किसानों को जमीन की स्थिति पर स्पष्टता मिलेगी जिससे स्थानीय विवाद कम होंगे। नेपाल सीमा क्षेत्र में: दसगजा पट्टी की सटीक ड्रोन मैपिंग से दोनों ओर के नागरिकों के बीच जमीन संबंधी तनाव खत्म हो सकेगा। सवाल-जवाब 1. भारत और नेपाल सीमा पर दसगजा क्षेत्र क्या है? दसगजा अंतर्राष्ट्रीय सीमा के दोनों तरफ छोड़ी गई लगभग 10 गज चौड़ी नो-मैंस लैंड पट्टी है जहाँ किसी भी प्रकार का निर्माण या कब्जा प्रतिबंधित होता है। 2. सीमा पर ड्रोन सर्वे कराने का मुख्य उद्देश्य क्या है? ड्रोन सर्वे का उद्देश्य दसगजा क्षेत्र में हुए अतिक्रमण और एक-दूसरे देश की जमीन पर अनधिकृत कृषि या कब्जे का सटीक तकनीकी डेटा तैयार करना है। 3. नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में क्या कहा था? मई 2026 में बालेन शाह ने कहा था कि नेपाली नागरिकों ने भी भारतीय जमीन पर अतिक्रमण किया है, जिसे बाद में विदेश मंत्रालय ने दसगजा से जुड़ा मामला बताया। 4. भारत-नेपाल सीमा पर कितने सीमा स्तंभ पेंडिंग या गायब हैं? नक्शों में दर्ज कुल 8,553 सीमा स्तंभों में से लगभग 42 फीसदी स्तंभ धरातल पर लगाए जाने बाकी हैं या नष्ट हो चुके हैं। 5. 2005 के फील्ड सर्वे में जमीन पर कब्जे के क्या आंकड़े मिले थे? पूर्व सर्वे महानिदेशक बुद्धि नारायण श्रेष्ठ के 2005 के सर्वे में भारतीय किसानों के नेपाली जमीन पर 84 स्थान और नेपाली किसानों के भारतीय जमीन पर 27 स्थान दर्ज हुए थे। 6. ड्रोन मैपिंग के आंकड़ों का उपयोग कैसे किया जाएगा? ड्रोन मैपिंग से प्राप्त संयुक्त तकनीकी रिकॉर्ड के आधार पर उच्च स्तरीय बैठकों में कब्जे हटाने, जमीन वापस सौंपने या मुआवजे पर फैसला लिया जाएगा। https://trendkia.com/national/india-aura-nepal-sima-ke-dasgaja-kshetra-men-atikramana-chinhita-karane-ke-lie-shuru-hoga-vyapaka-drona-sarve-19635 TrendKia — Har trend, sabse pehle.