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  "title": "जलवायु संकट की कोई सरहद नहीं, स्वस्थ पर्यावरण पाना हर नागरिक का मौलिक हक: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत",
  "summary": "नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण विकास में बाधक नहीं बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अनिवार्य हिस्सा है।",
  "content": "जलवायु संकट और पर्यावरण क्षरण से जुड़े संकट किसी एक देश की सीमा के भीतर कैद नहीं रहते, बल्कि इनका असर पूरी धरती पर एक समान पड़ता है। नई दिल्ली में आयोजित एक उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि प्रकृति के संरक्षण को औद्योगिक या आर्थिक विकास की रुकावट नहीं माना जा सकता। विकास की हर योजना को सतत विकास के बुनियादी सिद्धांतों पर खरा उतरना होगा, जिसमें प्रकृति और समाज दोनों के प्रति ठोस जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका, विज्ञान जगत और नीति निर्माताओं को एक साथ मिलकर ऐसे उपाय तलाशने होंगे जो वर्तमान के साथ आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी सुरक्षित बना सकें।\n\nसांस्कृतिक परंपरा और संवैधानिक व्यवस्था में प्रकृति का स्थान\nपर्यावरण रक्षा के कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए चीफ जस्टिस ने बताया कि भारत के लिए प्रकृति का सम्मान कोई नया विचार नहीं है, बल्कि यह देश की हजारों साल पुरानी सभ्यतागत परंपरा का अभिन्न अंग रहा है। आधुनिक लोकतांत्रिक ढांचे में हमारे संविधान निर्माताओं ने भी इस महत्व को बखूबी समझा और इसे कानूनी रूप दिया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 48A और अनुच्छेद 51A(g) का विशेष रूप से उल्लेख किया। इन संवैधानिक अनुच्छेदों के तहत जहां एक तरफ राज्य व्यवस्था को वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया है, वहीं दूसरी तरफ देश के प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य तय किया गया है कि वह जीवित प्राणियों के प्रति दयाभाव रखे और पर्यावरण की रक्षा करे।\n\nसर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने समय के साथ पर्यावरण न्यायशास्त्र को काफी विस्तार दिया है। अदालत ने अपने कई फैसलों में यह स्पष्ट स्थापित किया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मिलने वाला जीवन का अधिकार केवल सांस लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए प्रदूषणमुक्त और स्वस्थ पर्यावरण पाना भी प्रत्येक नागरिक का मूल अधिकार है।\n\nन्यायिक सिद्धांत और पर्यावरण बहाली की दिशा में बढ़ते कदम\nचीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पर्यावरण की रक्षा के लिए अदालतों द्वारा स्थापित प्रमुख कानूनी सिद्धांतों को रेखांकित किया। इनमें एहतियाती सिद्धांत यानी प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल, प्रदूषण फैलाने वाले से ही भरपाई कराने का सिद्धांत यानी पोल्यूटर पेज प्रिंसिपल, बिना किसी छूट के पूर्ण उत्तरदायित्व यानी एब्सोल्यूट लायबिलिटी और सार्वजनिक संपदा की रक्षा से जुड़ा पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन शामिल हैं। इन कानूनी पैमानों ने औद्योगिक गतिविधियों को नियंत्रित करने और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को रोकने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।\n\nउन्होंने कहा कि अब पर्यावरण न्यायशास्त्र का दायरा सिर्फ पेड़ों के कटने या प्रदूषण को रोकने के पुराने तौर-तरीकों तक सीमित नहीं रह गया है। आधुनिक न्याय प्रणाली अब क्षति की भरपाई, नष्ट हुए पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्बहाली, स्वतंत्र विशेषज्ञों की सतत निगरानी, आर्थिक मुआवजा और सख्त कानूनी जवाबदेही तय करने पर केंद्रित हो चुकी है। इसके अलावा न्यायपालिका अब पारिस्थितिकी केंद्रित आनुपातिकता यानी इकोसेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी के नजरिए को भी अपना रही है, जिसमें भविष्य के संभावित खतरों और जमीन की व्यावहारिक हकीकत के बीच वैज्ञानिक संतुलन साधा जाता है।\n\nवैश्विक साझेदारी और साझा अनुभवों का महत्व\nनेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी द्वारा ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ विषय पर आयोजित इस वैश्विक सम्मेलन में कई देशों के प्रतिनिधि, न्यायाधीश, पर्यावरण वैज्ञानिक, कानूनविद और वरिष्ठ नीति निर्माता शामिल हुए। सम्मेलन में पर्यावरण शासन, कानूनी सुधार और जलवायु परिवर्तन की नई चुनौतियों पर गहन विचार-विमर्श हुआ।\n\nसीजेआई ने इस बात पर विशेष बल दिया कि विभिन्न न्यायक्षेत्रों और अंतरराष्ट्रीय मंचों के बीच निरंतर संवाद बना रहना चाहिए। जब अलग-अलग देशों के विशेषज्ञ अपने सबसे सफल प्रयोगों और कार्यप्रणालियों को आपस में साझा करेंगे, तभी दुनिया भर की अदालतों और सरकारों को पर्यावरणीय संकटों से निपटने के लिए व्यावहारिक और प्रभावी रणनीतियां बनाने में मदद मिलेगी।\n\nइसका आप पर असर\nयह न्यायिक दृष्टिकोण आम नागरिकों के स्वच्छ हवा, पानी और प्रदूषणमुक्त माहौल पाने के विधिक अधिकारों को मजबूत करता है।\n\n• भारत में: निर्माण और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को मंजूरी मिलने से पहले सख्त पर्यावरणीय मानकों से गुजरना अनिवार्य रहेगा। इससे अनियंत्रित औद्योगिक प्रदूषण पर रोक लगेगी और नागरिकों के जीवन जीने के मौलिक अधिकार को मजबूती मिलेगी।\n• नई दिल्ली में: राजधानी क्षेत्र में हवा और पानी की गुणवत्ता से जुड़े मामलों में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की जवाबदेही और सख्त होगी। प्रशासनिक तंत्र को प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर तुरंत कार्रवाई और भारी जुर्माना लगाने के निर्देश मिलेंगे।\n• उद्योगों के लिए: विकास परियोजनाओं में केवल नुकसान की भरपाई नहीं बल्कि पर्यावरण को पुनर्जीवित करने का खर्च भी कंपनियों को उठाना पड़ेगा। इससे लापरवाह परियोजनाओं पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा और जिम्मेदारी सुनिश्चित होगी।\n• आम नागरिकों के लिए: किसी भी इलाके में प्रदूषण फैलने पर लोग अनुच्छेद 21 के तहत अदालतों का दरवाजा सीधे खटखटा सकेंगे। इससे स्थानीय स्तर पर गंदगी और जहरीले कचरे के खिलाफ कानूनी लड़ाई आसान होगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह वक्तव्य नई दिल्ली में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन के दौरान सामने आया, जहां दुनिया भर के विशेषज्ञ जलवायु संकट पर जुटे थे।\n\n• वैश्विक जलवायु संकट: प्रदूषण, अनियंत्रित कार्बन उत्सर्जन और तापमान वृद्धि जैसी समस्याएं किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं हैं। इसी कारण न्यायिक संस्थाओं को सामूहिक अंतरराष्ट्रीय समाधान तलाशने की जरूरत महसूस हुई।\n• विकास और प्रकृति का टकराव: बुनियादी ढांचे और आर्थिक विस्तार की दौड़ में प्राकृतिक संसाधनों का भारी क्षरण हो रहा था। चीफ जस्टिस ने यह स्पष्ट करने के लिए बात रखी कि विकास टिकाऊ सिद्धांतों पर ही होना चाहिए।\n• संवैधानिक दायित्वों का स्मरण: प्रदूषण के बढ़ते मामलों के बीच राज्य सरकारों और नागरिकों दोनों को उनके संवैधानिक कर्तव्यों, विशेषकर अनुच्छेदों 48A और 51A(g) के प्रति आगाह करना जरूरी था।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पर्यावरण और विकास को लेकर क्या बात कही?\nउन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण विकास के रास्ते में बाधा नहीं है, बल्कि विकास प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो प्रकृति और जनता के प्रति पूर्ण जवाबदेह हो।\n\n2. स्वस्थ पर्यावरण को किस संवैधानिक अधिकार का हिस्सा बताया गया है?\nसुप्रीम कोर्ट के न्यायशास्त्र के तहत स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण को संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन के अधिकार का अनिवार्य हिस्सा माना गया है।\n\n3. संविधान के किन अनुच्छेदों का उल्लेख सम्मेलन में किया गया?\nपर्यावरण रक्षा के लिए संविधान के अनुच्छेद 48A (राज्य के कर्तव्य) और अनुच्छेद 51A(g) (नागरिकों के मौलिक कर्तव्य) का विशेष रूप से उल्लेख किया गया।\n\n4. न्यायपालिका द्वारा विकसित किन प्रमुख सिद्धांतों का जिक्र किया गया?\nइसमें प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल, पोल्यूटर पेज प्रिंसिपल, एब्सोल्यूट लायबिलिटी और पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन जैसे स्थापित न्यायिक सिद्धांतों का जिक्र किया गया।\n\n5. यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन किस संस्था द्वारा और किस विषय पर आयोजित किया गया था?\nयह सम्मेलन नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा नई दिल्ली में 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स' विषय पर आयोजित किया गया था।",
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  "publishedAt": "2026-09-20",
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