जमीन की रजिस्ट्री के बाद दाखिल खारिज नहीं हुआ तो क्या मालिकाना हक छिन जाएगा, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दाखिल खारिज न होने पर भी रजिस्टर्ड सेल डीड के आधार पर मालिकाना हक पूरी तरह सुरक्षित रहता है और जमीन बेचने के लिए म्यूटेशन का सबूत अनिवार्य नहीं है। जमीन, प्लॉट या मकान खरीदने वाले खरीदारों के बीच लंबे समय से यह संशय बना रहता है कि क्या दाखिल खारिज कराए बिना प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री पूरी मानी जाती है। आम धारणा यही रही है कि अगर सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में म्यूटेशन यानी दाखिल खारिज दर्ज नहीं हुआ, तो खरीदार को संपत्ति का कानूनी मालिकाना हक हासिल नहीं हो पाता। देश की शीर्ष अदालत ने इस कानूनी भ्रम को पूरी तरह समाप्त करते हुए स्पष्ट व्यवस्था दी है कि दाखिल खारिज का दस्तावेज न होने की स्थिति में भी रजिस्टर्ड सेल डीड निष्प्रभावी नहीं होती और व्यक्ति का मालिकाना हक कानूनी तौर पर बरकरार रहता है। समीउल्लाह बनाम स्टेट ऑफ बिहार मामले में शीर्ष अदालत का निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने समीउल्लाह बनाम स्टेट ऑफ बिहार, 2025 के मामले की सुनवाई करते हुए रजिस्ट्रेशन और म्यूटेशन की कानूनी स्थिति पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब भी कोई व्यक्ति अपने मालिकाना हक वाली जमीन या अचल संपत्ति को बेचना चाहता है, तो उसके लिए म्यूटेशन यानी दाखिल खारिज का प्रमाण पेश करना अनिवार्य शर्त नहीं है। अगर किसी व्यक्ति के पास वैध सेल डीड मौजूद है, तो वह म्यूटेशन रिकॉर्ड के बिना भी अपनी मिल्कियत वाली प्रॉपर्टी का बैनामा करने और उसे बेचने का पूरा कानूनी अधिकार रखता है। अदालत ने रेखांकित किया कि रजिस्ट्री और दाखिल खारिज दो पूरी तरह अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं, जिन्हें एक साथ मिलाकर नहीं देखा जा सकता। रजिस्ट्री ही तय करती है संपत्ति का असली टाइटल अदालत के इस फैसले से साफ होता है कि किसी भी अचल संपत्ति की रजिस्ट्री यानी रजिस्टर्ड सेल डीड सीधे तौर पर उसके टाइटल यानी मालिकाना हक के हस्तांतरण का दस्तावेज होती है। इस कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत संपत्ति का मौजूदा स्वामी अपने टाइटल को विधिवत रूप से नए खरीदार के नाम पर ट्रांसफर करता है। अचल संपत्ति के लेन-देन में सेल डीड ही सबसे बुनियादी और निर्णायक टाइटल दस्तावेज मानी जाती है। कानून की नजर में यदि किसी नागरिक के पास वैध रजिस्ट्री मौजूद है, तो वही व्यक्ति उस प्रॉपर्टी का असली और कानूनी मालिक माना जाएगा, भले ही उसने स्थानीय राजस्व विभाग में दाखिल खारिज की प्रक्रिया पूरी न कराई हो। दाखिल खारिज केवल राजस्व रिकॉर्ड, मालिकाना हक का पैमाना नहीं शीर्ष अदालत ने म्यूटेशन के कानूनी दायरे की भी स्पष्ट व्याख्या की है। अदालत के अनुसार, दाखिल खारिज किसी भी प्रॉपर्टी के मालिकाना हक को परिभाषित या सृजित नहीं करता है। म्यूटेशन की प्रक्रिया केवल रेवेन्यू अथवा म्यूनिसिपल रिकॉर्ड के रखरखाव और टैक्स संकलन के उद्देश्य से की जाने वाली प्रशासनिक व्यवस्था है। यह रिकॉर्ड किसी व्यक्ति के वास्तविक स्वामित्व का निर्णय नहीं करता है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति के पास दाखिल खारिज का दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, तो इसका यह अर्थ कतई नहीं निकाला जा सकता कि संपत्ति पर उसका अधिकार खत्म हो गया है। किसी भी प्रॉपर्टी का कानूनी स्वामित्व तय करने के लिए वैध रजिस्टर्ड सेल डीड ही अपने आप में पर्याप्त आधार है। इसका आप पर असर यह फैसला उन लाखों प्रॉपर्टी मालिकों और खरीदारों को बड़ी कानूनी राहत देता है जो केवल म्यूटेशन न होने के कारण अपनी संपत्ति बेचने या स्वामित्व साबित करने में दिक्कतों का सामना कर रहे थे। • संपत्ति विक्रेताओं के लिए: जमीन बेचने के लिए अब दाखिल खारिज का पर्चा दिखाना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं रहेगा। यदि आपके पास वैध रजिस्टर्ड सेल डीड है तो आप बिना किसी प्रशासनिक रुकावट के अपनी प्रॉपर्टी का सौदा कर सकते हैं। • संपत्ति खरीदारों के लिए: रजिस्ट्री कराने के बाद मालिकाना हक पर कोई खतरा नहीं रहेगा भले ही म्यूटेशन प्रक्रिया लंबित हो। हालांकि नगर निकाय या रेवेन्यू टैक्स रिकॉर्ड के लिए म्यूटेशन कराना प्रशासनिक रूप से अब भी उपयोगी रहेगा। • विवादों में राहत: म्यूटेशन न होने की आड़ में मालिकाना हक को चुनौती देने वाले मुकदमों में कमी आएगी। अदालतों में वैध सेल डीड को ही स्वामित्व का प्राथमिक और निर्णायक दस्तावेज माना जाएगा। • प्रशासनिक चक्करों से बचाव: जमीन मालिकों को रजिस्ट्री के तुरंत बाद दाखिल खारिज के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने या सौदे रुकने का डर नहीं रहेगा। इससे संपत्ति के सौदों में अनावश्यक कानूनी अड़चनें दूर होंगी। ऐसा क्यों हुआ सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह विवाद इसलिए पहुंचा क्योंकि अचल संपत्ति की बिक्री के दौरान अक्सर दाखिल खारिज न होने को आधार बनाकर सौदों और स्वामित्व पर आपत्तियां उठाई जा रही थीं। • सीधा कारण: समीउल्लाह बनाम स्टेट ऑफ बिहार, 2025 के मामले में यह विवाद उठा कि क्या बिना दाखिल खारिज वाली जमीन का मालिक अपनी संपत्ति बेच सकता है या नहीं। अदालत ने इसी कानूनी सवाल पर स्पष्ट व्यवस्था दी। • प्रक्रियागत भ्रम: जमीन की रजिस्ट्री सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में होती है जबकि दाखिल खारिज का काम राजस्व विभाग करता है, जिससे आम लोगों और अधिकारियों के बीच दोनों प्रक्रियाओं को एक मानने का भ्रम पैदा हुआ। • कानूनी स्थिति का दोहराव: राजस्व रिकॉर्ड केवल टैक्स और लगान वसूली के प्रशासनिक दस्तावेज होते हैं, जिनका मालिकाना हक तय करने से कोई सीधा संबंध नहीं होता है। अदालत ने इसी स्थापित सिद्धांत को पुनः रेखांकित किया। सवाल-जवाब 1. क्या बिना दाखिल खारिज कराए सिर्फ रजिस्ट्री से मालिकाना हक मिल जाता है? हां, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार वैध सेल डीड ही मालिकाना हक तय करती है और दाखिल खारिज न होने पर भी स्वामित्व सुरक्षित रहता है। 2. सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला किस मामले में सुनाया? यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने समीउल्लाह बनाम स्टेट ऑफ बिहार, 2025 (Samiullah vs State of Bihar, 2025) के मामले में दिया है। 3. क्या जमीन बेचने के लिए म्यूटेशन का प्रूफ देना जरूरी है? नहीं, अदालत ने साफ किया है कि अपनी जमीन बेचने के लिए व्यक्ति को दाखिल खारिज का प्रमाण देना अनिवार्य नहीं है। 4. कानून में रजिस्ट्री और दाखिल खारिज में क्या मुख्य अंतर है? रजिस्ट्री संपत्ति के टाइटल यानी मालिकाना हक का कानूनी ट्रांसफर है, जबकि दाखिल खारिज सिर्फ टैक्स और प्रशासनिक कार्यों के लिए राजस्व रिकॉर्ड होता है। https://trendkia.com/national/jamina-ki-rajistri-ke-bada-dakhila-kharija-nahin-hua-to-kya-malikana-haka-chhina-jaega-supreme-court-ka-ahama-phaisala-44963 TrendKia — Har trend, sabse pehle.