# जस्टिस एमएस लिब्रहान का निधन, 17 साल तक बाबरी विध्वंस की जांच करने वाले पूर्व जज ने 87 वर्ष की आयु में ली अंतिम सांस

> बाबरी मस्जिद विध्वंस जांच आयोग के अध्यक्ष रहे जस्टिस एमएस लिब्रहान का चंडीगढ़ में निधन हो गया है। उन्होंने 17 साल लंबी जांच के बाद साल 2009 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-08-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/justice-ms-liberhan-passes-away-at-87-the-man-who-led-the-17-year-babri-masjid-demolition-inquiry-13454 · **Language:** Hindi
**Tags:** जस्टिस एमएस लिब्रहान, बाबरी मस्जिद विध्वंस, लिब्राहन आयोग, अयोध्या राम मंदिर, कानूनी समाचार

न्यायिक जगत से एक बड़ी खबर सामने आई है जहां जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्रहान का चंडीगढ़ में रविवार रात को निधन हो गया। उनके निधन के बाद सोमवार को सुबह 11 बजे अंतिम संस्कार संपन्न किया गया। अपने जीवनकाल में वह 87 वर्ष के थे। वह पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व जज रहने के साथ ही आंध्र प्रदेश और मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस के रूप में भी अपनी सेवाएं दे चुके थे। हालांकि देश भर में उनकी सबसे बड़ी पहचान उस बहुचर्चित जांच आयोग के अध्यक्ष के रूप में स्थापित हुई थी, जिसकी कमान उन्हें 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में घटी बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना के बाद सौंपी गई थी। इस स्थल को लेकर उस दौरान आरएसएस और बीजेपी समेत कई हिंदूवादी संगठनों का यह दावा था कि यह रामलला का वास्तविक जन्मस्थान है और वहां भव्य राम मंदिर का निर्माण किया जाएगा। आगे चलकर नवंबर 2019 में देश की सर्वोच्च अदालत ने राम मंदिर निर्माण के पक्ष में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया था और फिर जनवरी 2024 में प्राण प्रतिष्ठा समारोह के जरिए रामलला की मूर्ति की स्थापना की गई थी।

## सत्रह वर्षों तक चली देश की सबसे लंबी जांच प्रक्रिया
जस्टिस एमएस लिब्रहान ने अपने लंबे न्यायिक करियर का एक बड़ा हिस्सा यानी पूरे 17 वर्ष केवल एक ही ऐतिहासिक मामले की तह तक पहुंचने में लगा दिए। यह कोई साधारण मामला नहीं था बल्कि भारतीय इतिहास के सबसे संवेदनशील मामलों में से एक था। उन्होंने बाबरी मस्जिद गिराए जाने की घटना की हर एक परत को खंगाला और आखिरकार साल 2009 में अपनी विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी। घटना के ठीक दस दिन बाद यानी 16 दिसंबर 1992 को केंद्र की तत्कालीन पी. वी. नरसिम्हा राव सरकार ने इस पूरी त्रासदी की जांच के लिए एक-सदस्यीय आयोग का गठन किया था, जिसे आधिकारिक तौर पर लिब्राहन कमीशन कहा गया।

शुरुआती दौर में इस आयोग को अपनी जांच का काम समेटने और रिपोर्ट सौंपने के लिए मात्र 3 महीने का समय दिया गया था। लेकिन मामले की जटिलता और विशालता के कारण जांच का यह सिलसिला बहुत लंबा खिंचता चला गया। स्थिति यह रही कि इस आयोग को कुल 48 बार समयावधि का विस्तार दिया गया। अंततः 17 साल के कड़े परिश्रम और लंबी छानबीन के बाद, 30 जून 2009 को एक हजार से अधिक पन्नों की विशाल रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को सौंपी गई। यह भारतीय न्यायिक इतिहास के पन्नों में सबसे अधिक समय तक चलने वाले जांच आयोगों में शुमार हो गया।

## लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट के मुख्य बिंदु और निष्कर्ष
जस्टिस लिब्रहान ने अपनी इस बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले खुलासे किए। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह बताया कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस कोई अचानक से हुई या स्वतःस्फूर्त घटना नहीं थी, बल्कि इसके पीछे बेहद सावधानी और गहरी प्लानिंग रची गई थी। आयोग की रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस और संघ परिवार से जुड़े विभिन्न संगठनों को इस पूरी सुनियोजित साजिश का मुख्य संचालक बताया गया।

इस रिपोर्ट में भारतीय जनता पार्टी तथा संघ परिवार के कई दिग्गज नेताओं समेत कुल 68 लोगों को इस घटना के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया था। इन प्रमुख नेताओं की सूची में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उत्तर प्रदेश के उस समय के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और उमा भारती जैसी बड़ी राजनीतिक हस्तियों के नाम शामिल थे। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया कि इन तमाम नेताओं को इस बात का कोई कानूनी लाभ नहीं दिया जा सकता कि उन्हें इस रची गई साजिश की भनक नहीं थी। जस्टिस लिब्रहान ने इन नेताओं द्वारा निभाई गई संदेहास्पद भूमिका को देश की आम जनता के अटूट विश्वास के साथ सीधा विश्वासघात करार दिया था।

एक मीडिया संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, जब साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से जुड़े सभी आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया था, तब भी एम.एस लिब्रहान ने उस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई थी। उन्होंने उस दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा था कि अदालत का फैसला चाहे जो भी आया हो, वह अपनी जांच रिपोर्ट पर पूरी तरह कायम हैं क्योंकि उनकी रिपोर्ट में हर एक घटना के पुख्ता सबूत मौजूद हैं। उन्होंने यह भी दावा किया था कि उमा भारती ने उनके सामने इस बात को खुद स्वीकार किया था कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस में उनका हाथ था।

## अंबाला से शुरू हुआ था वकालत का शानदार सफर
एम.एस. लिब्रहान का जन्म 11 नवंबर 1938 को चंडीगढ़ के नजदीक स्थित एक ग्रामीण इलाके में हुआ था। उन्होंने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत साल 1970 में हरियाणा के अंबाला शहर में वकालत करके की थी। इसके बाद वह पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट पहुंचे, जहां जज के पद पर नियुक्त होने से पहले उन्होंने वकालत में अपनी एक अलग ही धाक जमाई। अपने कई दशकों के लंबे करियर के दौरान उन्होंने हमेशा न्यायिक ईमानदारी, अटूट धैर्य और कानून के शासन के प्रति अपनी गहरी निष्ठा के दम पर अपनी एक मिसाल कायम की थी।

## सवाल-जवाब

### 1. जस्टिस एमएस लिब्रहान का निधन कब और कहां हुआ?
जस्टिस एमएस लिब्रहान का रविवार रात को चंडीगढ़ में निधन हुआ और सोमवार सुबह उनका अंतिम संस्कार किया गया।

### 2. लिब्राहन आयोग का गठन कब किया गया था?
लिब्राहन आयोग का गठन 16 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच के लिए किया गया था।

### 3. लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट कब सौंपी थी?
आयोग ने 17 साल की लंबी जांच के बाद 30 जून 2009 को अपनी रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को सौंपी थी।

### 4. लिब्राहन रिपोर्ट में कितने लोगों को जिम्मेदार ठहराया गया था?
रिपोर्ट में बीजेपी और संघ परिवार के बड़े नेताओं सहित कुल 68 लोगों को जिम्मेदार माना गया था।

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